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Hindi Chudai Kahani पठन समय: 18 मिनट पढ़ा गया: 1,058 बार

बड़ी बहन के साथ छुप-छुप कर बदन की आग बुझाई-10(Badi behan ke sath chhup chhup kar badan ki aag bujhayi-10)

sayko@07

27 Nov 2022 को प्रकाशित

बड़ी बहन के साथ छुप-छुप कर बदन की आग बुझाई-10(Badi behan ke sath chhup chhup kar badan ki aag bujhayi-10)
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भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-

स्नेहा दीदी बिस्तर पर पूरी तरह से नंगी होकर लेटी थी। मैं बार-बार उस किताब में देख कर समझने की कोशिश कर रहा था कि उनके नाज़ुक हिस्सों को कैसे सहलाना है, कहाँ छूने पर उन्हें अच्छा लगेगा और मैं कैसे धीरे-धीरे अपना लंड अंदर डालूँ, ताकि दीदी को दर्द ना हो, बल्कि उन्हें मज़ा आए।

मैं थोड़ा हिचकिचाया, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और हाथ काँप रहे थे। तभी दीदी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में शरारत भी थी और भरोसा भी।

धीरे से मुस्कुरा कर उन्होंने कहा, “गोलू… अब अपने कपड़े उतारो।”

मैंने गहरी सांस ली और एक-एक करके अपने कपड़े उतार दिए। पहले टी-शर्ट, फिर पैंट, और अंत में मेरी अंडरवियर भी जमीन पर गिर गई। अब मैं भी पूरी तरह नंगा उनके सामने खड़ा था।

मेरी धड़कन और तेज हो गई, लेकिन दीदी के चेहरे पर बस वही हल्की, गर्माहट भरी मुस्कान थी। वो कई बार मेरा लंड देख चुकी थी, इसलिए आज भी वो ज़रा भी शरमाई नहीं। मैं धीरे-धीरे उनके करीब गया। जितना पास जाता, उतना ही तन-मन गर्म होता जाता। उनकी आँखें सीधे मेरे लंड पर थी, जैसे वो देख रही हों कि ये पल कितना असली था, कितना चाहा हुआ था।

फिर मैंने बगल में रखी किताब उठाई। दोबारा पढ़ कर यकीन किया कि मैं कुछ गलत ना कर दूँ। उसमें साफ-साफ लिखा था कि सबसे पहले लड़की की कमर के नीचे तकिया रखना चाहिए, ताकि उसका निचला हिस्सा थोड़ा ऊपर उठ जाए और अंदर जाना आसान हो।

मैंने तकिया उठाया और बहुत नरमी से दीदी की कमर के नीचे सरका दिया। जैसे ही उनके कूल्हे ऊपर उठे, उनका नाज़ुक हिस्सा और खुल कर दिखने लगा और पूरी तरह तैयार जैसे वो मुझे ही बुला रहा हो।मैंने किताब एक तरफ रखी और फिर उनके पैरों के बीच आकर घुटनों के बल बैठ गया। मेरा लंड पूरा तन चुका था, गर्म और धड़कता हुआ। मैं धीरे-धीरे आगे झुक कर उसे उनकी चिपचिपी लाइनों के बीच ले जाने ही वाला था कि तभी उन्होंने तेज आवाज़ में कहा “गोलू, रुक!”

मैं रुक गया, शरीर बीच हरकत में जम सा गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “याद है ना? पहले कुछ लगाना है… वरना दर्द होगा।”

मैंने तुरंत सिर झुकाया और बोला, “सॉरी दीदी… आपको देख कर ना सब भूल जाता हूँ।”

मैं थोड़ा पीछे हट गया और कमरे में इधर-उधर देखने लगा। डॉक्टर ने जो लोशन दिया था, वह कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा था। मेरे हाथ तकिए, कुर्सी और पलंग के नीचे तक चले गए। दिल की धड़कनें और तेज थी, एक पल भी रुकना मुश्किल लग रहा था। आखिरकार, मेज़ के कोने पर रखी छोटी सी बोतल नज़र आई। मैंने उसे झट से उठाया और मुस्कुराता हुआ वापस दीदी के पास लौट आया, उनकी फैली टांगों के बीच फिर से घुटने के बल बैठते हुए।

मैंने ढक्कन खोला और थोड़ा सा लोशन अपनी उंगलियों पर निचोड़ा। मैं धीरे-धीरे उनकी बाहरी लाइन पर उंगलियाँ फेरने लगा। लोशन पिघलता जा रहा था और मेरी उंगलियाँ उनके हर मोड़, हर नर्मी को महसूस कर रही थी। फिर बहुत सावधानी से मैंने अपनी एक उंगली उनके अंदर सरका दी, ताकि लोशन हर जगह लग जाए। अंदर की गर्मी ने मेरी उंगली को जैसे चूस लिया। दीदी की कमर हल्की सी ऊपर उठी, उनकी आवाज़ काँपते हुए निकली “म्ह्म्म… बस ऐसे ही…”

जब दीदी का पूरा नाज़ुक हिस्सा चमकदार और फिसलन से भर गया, मैंने बोतल बंद की और उसे पलंग के किनारे रख दिया। फिर मैंने दीदी की आँखों में देखते हुए धीमे से कहा, “दीदी… अब क्या मैं अंदर डाल दूँ?”

दीदी ने होंठ भींचे, एक गहरी सांस ली, और आधी मुस्कान के साथ धीरे से कहा, “हाँ गोलू… अब डाल दो।”

उनकी हां सुन कर मैं फिर एक बार उनके करीब गया, इस बार पहले से भी ज्यादा। मेरा सख्त लंड मैंने हौले से उनके नाज़ुक हिस्से की गुलाबी लाइन पर रखा। उस छुअन से दीदी के शरीर में एक लहर सी दौड़ गई। उन्होंने पैर उठा कर मुझे अपने पास जकड़ लिया। मैं पीछे नहीं हट सकता था। नाज़ुक हिस्से पर लगा लोशन धीरे-धीरे मेरे लंड के अगले हिस्से को भिगोने लगा।मैंने धीरे-धीरे अपना लंड अंदर धकेला। पहले तो बस सिरा ही अंदर गया, दीदी का बदन जैसे एक झटके में सख्त हो गया। उनकी उंगलियाँ चादर पकड़ कर खिंच गई।

“ऊँह… धीरे गोलू… धीरे…” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।

मैंने उनकी बात मान कर कमर रोकी, और फिर एक सांस लेकर धीरे-धीरे थोड़ा और अंदर गया। गर्मी बढ़ती चली जा रही थी, दीदी का नाज़ुक हिस्सा मेरे लंड को कस के पकड़ रहा था जैसे मुझे खुद से अलग ना होने देना चाहता हो। धीरे-धीरे मेरा आधे से ज्यादा लंड अंदर घुस चुका था।

“दिदी… कैसा लग रहा है?” मैंने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।

उन्होंने आँखें खोल कर मुझे देखा, होंठों पर आधी मुस्कान और धड़कन उनके सीने में साफ दिखाई दे रही थी।

“अब मत रुक…” उन्होंने धीरे से कहा और अपनी कमर खुद मेरी ओर धकेल दी।

मैंने उनकी जांघों को पकड़ा, और बहुत धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया। मेरा लंड पूरी तरह अंदर नहीं जा पा रहा था—दीदी इतनी टाइट थी कि मेरा सिर्फ आधा हिस्सा ही अंदर समा पाता था। लेकिन वही आधा हिस्सा भी अंदर-बाहर होते हुए दीदी को पिघला रहा था। हर पल के साथ दीदी की साँसें भटकने लगी। उनकी कमर खुद मेरे मूवमेंट के साथ चलने लगी।

मैंने होंठ भींच कर कहा, “दीदी… कितना टाइट हो… मेरा पूरा अंदर नहीं जा रहा…”

उन्होंने पलकें झुकाते हुए फुसफुसाया, “जितना जा रहा है… उतना ही पागल कर रहा है… रुको मत…”

मैंने उनकी बात सुन कर दिमाग में कुछ और नहीं सोचा और अपनी कमर आगे धक्का दी। मेरा लंड लगभग पूरी लंबाई तक अंदर चला गया। दीदी जोर से चीखी, “आह्ह गोलू रुक! दर्द हो रहा है! प्लीज रुक जाओ!” उनकी आवाज़ सीधी कमरे में गूँजी और उनका शरीर मेरे नीचे सिकुड़ गया।

मैं तुरंत रुक गया। मैंने अपनी कमर पीछे खींची और धीरे से लंड बाहर निकाल लिया। दीदी की आँखों में पानी आ गया था और वो तेजी से सांस ले रही थी।

मैं थोड़ा पीछे हट कर घुटनों पर बैठ गया। दीदी ने अपने पैरों को जोड़ा और एक हाथ अपने नाज़ुक हिस्से के पास ले गई। वो वहाँ उंगलियाँ फेरने लगी, जैसे दर्द को शांत करने की कोशिश कर रही हो। मैंने देखा, वहाँ से हल्का सा लाल निशान निकल रहा था, और उनकी उंगलियों पर थोड़ा ताज़ा खून लगा।

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मैंने तुरंत आगे झुक कर उनकी तरफ देखा और घबरा कर कहा, “दीदी, आप ठीक हो?”

उन्होंने लगभग रोती आवाज़ में, धीमे-धीमे साँस लेते हुए कहा, “बहुत दर्द हो रहा था गोलू… सहा नहीं गया…”

मैंने और पास जाकर उनके कंधे पकड़ कर उन्हें अपनी तरफ खींचा। मैं घुटनों के बल बैठा रहा और दीदी मेरे सीने से लग गई। जैसे ही मैंने उन्हें गले लगाया, वो टूट कर रो पड़ी। उनका चेहरा मेरे कंधे पर दबा हुआ था और उनकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थी।

उस दिन भी हम दोनों कुछ ज्यादा नहीं कर पाए। उस दिन भी स्नेहा दीदी ने मुझे अपने मुंह से खुश कर दिया। अगले दो दिन हम दोनों एक साथ बैंगलोर में रहे और उसके बाद मुझे वापस घर जाना पड़ा। दीदी के बिना वापस उसी छोटे से घर में जाना बेहद उदास लग रहा था। मैं बैंगलोर में दीदी के साथ सिर्फ चार दिनों तक रहा था, लेकिन फिर भी एक अलग सी खुशी लग रही थी।

घर लौटते समय ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हर रंग फीका पड़ गया हो। जैसे शहर में आते ही सारी रौनक मुझसे दूर चली गई हो। मैं अपने कमरे में आया तो दीवारें भी खाली लग रही थी। कोई हँसी नहीं, कोई आवाज़ नहीं, बस खामोशी। मैं बार-बार उसी पल में लौट रहा था जब वो मेरे पास बैठी थी, जब उसका हाथ मेरे हाथ पर था, जब उसने मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा था।

उसी रात मैं बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद एक-दम नहीं आ रही थी। मेरी आँखों के सामने बस दीदी ही थी। उसकी खुशबू, उसके बाल, उसका चेहरा, और उसकी आँखों में वो हल्की सी शर्म जो उसकी खूबसूरती को और गहरा बना देती थी। मैं समझ गया था कि मैं सिर्फ उसे मिस नहीं कर रहा था… मैं हर सेकंड उसके बारे में सोच रहा था।

अगले एक महीने तक मैंने अपने दिन उसके बिना गुज़ारे। मुझे लगा था शायद एक दो हफ्तों में वो फिर आयेगी, लेकिन कोई त्योहार नहीं था, कोई मौका नहीं था और कंपनी भी उसे छुट्टी नहीं दे रही थी। मैं सुबह उठता, काम करता, रात को जल्दी सोने की कोशिश करता। लेकिन हर काम के बीच में बस वही आती-जाती रहती।

हम रोज़ बात नहीं करते थे, लेकिन कॉल पर उसकी आवाज़ सुन लेना भी जैसे राहत देता था। कभी वो ऑफिस की बातें करती, कभी मैं अपने शहर की। लेकिन जितना हम बातें करते, उतनी ही ज्यादा उसकी कमी महसूस होने लगती। फोन कटते ही कमरे में वही सन्नाटा लौट आता।

लेकिन एक बात दीदी ने कभी नहीं बदली— मुझे याद रखना। हर दूसरे-तीसरे दिन वो मुझे अपनी तस्वीरें भेजती थी। कभी वो सिर्फ ब्रा में होती, कैमरे के लिए हल्का सा पोज़ बनाती हुई। उसकी मुस्कुराहट और उसके गोल-मटोल सीने की झलक देख कर मेरे बदन में एक अजीब सी गर्मी दौड़ जाती।

कभी-कभी तो वो और भी आगे बढ़ जाती। पूरा शरीर नंगा करके, बस चादर को कमर तक खींच कर तस्वीर भेजती। उसकी चमकती त्वचा, पेट की हल्की लाइनें, और नीचे की तरफ छिपी गर्म जगह… सब कुछ जैसे स्क्रीन से निकल कर मेरे हाथों में आना चाहता था। उन तस्वीरों को देखते-देखते मेरी सांसे तेज़ हो जाती, और मैं फिर से उसी रात में चला जाता – जहां वो मेरे ऊपर झुकी थी, जहां उसकी सांसें मेरे चेहरे को छू रही थी।

फिर धीरे-धीरे तस्वीरें वीडियो में बदल गई। कभी रविवार की सुबह, जब उसे थोड़ा वक्त मिलता, वो बाथरूम में फोन सेट करके मुझे दिखाती कि कैसे वो नहा रही है— पूरा बदन साबुन से भीगा हुआ, पानी की पतली धार उसकी छाती और पेट पर फिसलती हुई नीचे जाती। वो जान-बूझ कर अपने सीने को दोनों हाथों से मलती, उँगलियों के बीच निप्पल दबाती और हल्की कराह निकालती, जैसे उसे पता हो कि मैं हर पल पागल हो रहा हूँ।

कभी वो सोफे या बेड पर पूरी तरह नंगी लेटी होती। कैमरा थोड़ा नीचे की ओर और वो अपने पैर धीरे-धीरे फैलाते हुए अपना सबसे गहरा हिस्सा दिखाती। फिर उँगलियाँ वहाँ जातीं, पहले हल्की सी छुआई, फिर धीरे-धीरे अंदर तक। उसकी साँसों की आवाज़ वीडियो में गूँजती, और उसके कंधे कांपते दिखते। कभी एक उँगली, फिर दो… और वो खुद को वहीं भिगोती रहती, जब तक कि उसका पूरा शरीर तन कर एक तेज़ कराह के साथ पलट ना जाता।

लेकिन असली पागलपन तो उसके अगले वीडियोज़ में था। ज्यादातर रविवार जब उसके पास अकेलापन और वक्त होता, वो कैमरा सेट करती और किताब उठा कर टाइट स्कीन को ढीला बनाने की एक्सरसाइज करती, जो हमने किताब में पढ़ी थी। इसके लिए दीदी पहले उंगलियाँ, फिर वो खिलौना जो उसने मुझे दिखाया था – लाल रंग का मोटा डिल्डो इस्तेमाल करती। वो उसे हाथ में लेकर मुस्कुराती, टिप को अपनी गीली जगह पर टिकाती और धीरे-धीरे अंदर धकेलती। उसकी आँखें सिकुड़ जाती, होंठ भींच जाते, कभी हल्की सी “आह” निकलती, लेकिन वो रुकती नहीं।

कभी कभी तो वो सब्ज़ी भी उठा लेती खीरा, या फिर केला। और जान-बूझ कर बड़ा वाला। मैं वीडियो देखते-देखते पागल हो जाता। वो अपनी टांगें फैला कर उस मोटाई को अपने अंदर जाने देती। शुरू में उसकी साँसें रुक जाती, शरीर थोड़ा सिकुड़ता जैसे दर्द हो रहा हो… पर फिर वो कैमरे में देख कर मुस्कुराती और अपना नाज़ुक हिस्सा आगे धकेल देती, जैसे कह रही हो,‌ ‘ये तुम्हारे लिए।’

कभी खीरा आधा अंदर तक चला जाता, कभी वो केला मोड़ देती और फिर धीरे-धीरे लय में चलाने लगती। और जब उसका छेद उस बड़े आकार का आदी होने लगता, उसकी सांसें छोटी-छोटी और तेज़ होने लगती, वो खुद अपनी उंगलियों से उसे फैलाते हुए कैमरे के लिए दिखाती कि कैसे वो खुद को मेरे आने के लिए तैयार कर रही थी।

एक दिन कॉलेज से लौट कर मैं कमरे में आया। बैग अपने रूम में फेंका और लिविंग रूम में खाने के लिए चला गया। माँ किचन में थी और मैं मेज़ के पास कुर्सी पर बैठ गया। मैंने कहा, “माँ खाना दो, भूख लगी है।”

माँ ने किचन से ही जवाब दिया, “पहले हाथ धोकर आओ।”

मैंने मोबाइल मेज़ पर रखा और बाथरूम की तरफ चला गया। हाथ धोते समय मैंने सिंक के पास कुछ देखा। वहाँ एक कपड़ा पड़ा था। मैंने उठाया तो वो स्नेहा दीदी की पैंटी निकली। हल्का गुलाबी रंग और उस पर काले गुलाब बने थे। शायद पिछली बार जब वो आई थी तब यहीं भूल गई थी। मैंने उसे हाथ से पकड़ा और ध्यान से देखा। कपड़ा नरम था और साइड में लेस थी। मैंने पैंटी को नाक के पास ले जाकर सूंघा। कोई खास महक नहीं थी, बस डिटर्जेंट की हल्की खुशबू थी।

मुझे तुरंत याद आए वह दिन जब हम दोनों एक-दूसरे के लिए सिर्फ भाई-बहन थे। उस समय मैं दीदी को अपनी असलियत नहीं बता पाता था। उन दिनों जब वो नहा कर कपड़े बदलती थी, मैं बाद में कपड़े टटोलता रहता था कि ताकी उनकी पैंटी और ब्रा देख सकूं। कई बार जब वो घर से बाहर चली जाती थी, और मैं अकेला होता था, मैं उसकी छोड़ी हुई चीज़े ढूँढता था, कभी उसका दुपट्टा, कभी रुमाल, और एक बार उसकी पैंटी भी । मैं घंटों उसे पकड़ कर सोचता रहता, काश मैं दीदी को एक बार छू पाता।

उस वक़्त सिर्फ पैंटी छूना ही मुझे पागल कर देता था। मैं उसे हाथ में मसलता, उँगलियों से उसका कपड़ा रगड़ता और कल्पना करता कि वो अभी भी उसके शरीर को छू रही है। कभी उसे अपने गाल पर भी रख लेता था और सोचता था कि मैं कितना बेवकूफ़ हूँ जो बस यही कर पा रहा हूँ।

अब फिर वही पैंटी हाथ में थी, साफ, धुली हुई, लेकिन फिर भी वही स्नेहा दीदी का एहसास लिए हुए। मैंने उसे धीरे से मोड़ा, वापस उसी जगह रखा और पानी से हाथ धोने लगा।

जैसे ही मैं लिविंग रूम में पहुँचा, मेरे कदम वहीं रुक गए। माँ मेरी कुर्सी पर बैठी थी और हाथ में मेरा मोबाइल था। स्क्रीन चालू थी और उस पर वही वीडियो चल रहा था, जो स्नेहा दीदी ने मुझे भेजा था। माँ स्क्रीन को घूर रही थी। उसकी आँखें बड़ी हो चुकी थी। चेहरे पर डर, सदमा और गुस्सा सब एक साथ था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

मैंने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन माँ खड़ी हुई और मेरी तरफ तेज़ी से आई। माँ ने जैसे ही मेरे पास कदम रखा, बिना कुछ पूछे सीधे मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारा। फिर एक और। फिर एक और। लगातार। वह रुक ही नहीं रही थी।

मेरे गाल सुन्न पड़ गए थे। मैं पीछे हट भी नहीं पा रहा था। माँ रो रही थी, हाँफ रही थी, और हर थप्पड़ के साथ उसकी आवाज़ भारी हो रही थी। माँ हाँफते हुए रो रही थी। एक आखिरी थप्पड़ मार कर उसने चिल्लाते हुए कहा “स्नेहा तेरी बड़ी बहन है! फिर वो तुझे अपनी ऐसी नंगी वीडियो क्यों भेज रही है?!”

उसकी आवाज़ पूरे घर में गूँज गई। वह रोते-रोते घुटनों पर बैठ गई और सिर पकड़ लिया। मैं वहीं खड़ा था, दिल धड़कता हुआ, समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। तभी मेरी आँखों में भी आँसू भरने लगे। गाल अब भी जल रहे थे, पर उससे ज़्यादा अंदर से कुछ टूट रहा था। उसी पल पहली बार समझ में आया कि हम क्या कर रहे थे।

मैं दीदी से प्यार करता था और दीदी मुझसे। उसी के लिए हम दोनों एक-दूसरे के साथ सेक्स कर रहे थे लेकिन हम दोनों ने यह कभी नहीं सोचा था कि अगर घरवालों ने हमें पकड़ लिया तो क्या होगा। दिल में ऐसा डर बैठ गया जैसे किसी ने लोहे की कील घोंप दी हो। मैं सिर्फ खड़ा रह गया, रोता हुआ, और मन में एक ही ख़्याल घूम रहा था, अब आगे क्या होगा?

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