माँ की चुदाई

छत पर गलती, बेड पर माँ-1(Chhat par galti, bed par maa-1)

लेखक: sunitamanish3 दिनांक: 25-01-2022 पठन समय: 10 मिनट

मेरा नाम विनीत है। उम्र 24 साल। लंबा कद, चौड़े कंधे, और सबसे खास — मेरा मोटा, लंबा और बेहद आकर्षक लंड, जो किसी भी औरत को देखते ही खड़ा हो जाता है।

मेरी मां, सुनीता। 44 साल की, लेकिन उम्र उनके जिस्म पर बिल्कुल असर नहीं दिखाती। गोरा रंग, भरी-भरी छाती, पतली कमर, और गोल-मटोल गांड। चेहरे पर वो नूर है जो संस्कारी औरतों में ही होता है। पापा पिछले तीन साल से अमेरिका में रहते हैं। साल में सिर्फ एक-दो बार आते हैं। घर में सिर्फ मैं और मां।

मां बहुत संस्कारी हैं। घर से बाहर निकलती हैं तो साड़ी में पूरी तरह ढकी रहती हैं। कोई भी पुरुष उन्हें देखे तो बस नज़रें झुका लेती हैं। पड़ोस वाले, रिश्तेदार — सब उनकी तारीफ करते हैं।

मेरी मां कुछ दिनों के लिए नानी के घर चली गई थी। पापा तो पहले से ही विदेश में थे। तो घर में सिर्फ़ मैं और हमारी नौकरानी प्रीति रह गए थे। प्रीति 32 साल की थी – गोरी, मोटी-मोटी जाँघें, भारी-भारी छातियाँ और कमर इतनी पतली कि देखते ही लंड खड़ा हो जाता था। वो सुबह से शाम तक साड़ी में घर के काम करती, और हर बार झुकते वक्त उसकी कसी हुई चोली से उसके उभरे हुए स्तन की गहरी खाई साफ़ दिख जाती।

मैं पिछले तीन दिनों से उसे पटाने की कोशिश कर रहा था।‌ पहले दिन मैंने हल्का-हल्का छेड़ा था। “प्रीति, आज-कल कितनी गर्मी है ना… तुम्हारी साड़ी भी भीग गई है पसीने से।”

वो शरमाई, साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बोली, “बाबू, ऐसे मत बोलो… मैं नौकरानी हूं, आपको शरम नहीं आती?”

दूसरे दिन मैंने और आगे बढ़ाया। रात को खाना खिलाते वक्त मैं उसके पीछे खड़ा हो गया और धीरे से उसकी कमर पर हाथ रख दिया। “प्रीति… तुम्हारी ये कमर… कितनी नरम है यार। छूते ही मन करता है ज़ोर से पकड़ लूँ।”

वो थरथरा गई, पर हाथ हटाया नहीं। सिर्फ़ फुसफुसाई, “बाबू… मां जी को पता चल गया तो?”

मैंने उसके कान में फूँक मारी, “मां जी तो नानी के यहां हैं… तीन दिन तक घर खाली है। सिर्फ़ तुम और मैं।”

तीसरे दिन वो थोड़ी ढीली पड़ गई। मैंने उसे चाय बनाते वक्त पीछे से चिपक गया। मेरा सख्त लंड उसकी नितंबों के बीच दब गया।

“देखो प्रीति… ये देखो कितना तना हुआ है तुम्हारे लिए। तीन दिन से तुम्हें देख-देख कर मर रहा हूं।”

वो सांसें तेज़ कर गई, पर फिर भी हंसते हुए बोली, “बाबू… आप बड़े शरारती हो। मैं गरीब हूं, आप अमीर… ये ठीक नहीं।”

कल रात आख़िरकार वो टूट गई। रात के दस बज रहे थे। मैं लिविंग रूम में टीवी देख रहा था, सिर्फ़ शॉर्ट्स पहने हुए। प्रीति रसोई से आकर बोली, “बाबू, खाना लगा दूँ?”

मैंने टीवी बंद किया और उसकी तरफ़ देखा। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था, ब्लाउज के ऊपर वाले दो हुक खुले हुए थे। मैं उठा और सीधे उसके सामने खड़ा हो गया।

“प्रीति… अब बहुत हो गया। तीन दिन से मैं तुम्हें छूने के लिए तरस रहा हूं। तुम्हारी ये भारी-भारी चूचियाँ… ये मोटी जाँघें… ये गदराई हुई गांड… सब कुछ मेरा होना चाहिए आज।”

मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख दिया। वो चौंक गई, पर हाथ हटाया नहीं।‌ “बाबू… ये… ये बहुत बड़ा है…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

मैंने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखी और धीरे से बोला, “हां प्रीति… बड़ा है। और पूरा तुम्हारे लिए खड़ा है। कल रात तुम सोच रही थी ना कि मैं क्या कर रहा हूं? मैं तुम्हें चोदने के सपने देख रहा था। तुम्हारी चूत में अपना ये मोटा लंड घुसाने का… तुम्हें चीख-चीख कर चोदने का।”

वो आँखें बंद करके साँस ले रही थी। मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचा। ब्लाउज के बाकी हुक भी खोल दिए। उसके भारी स्तन बाहर आ गए – गुलाबी चुचक, सख्त और खड़े। मैंने एक को मुट्ठी में भर लिया और दबाया।

“आह्ह्ह… बाबू… धीरे…” “धीरे? नहीं प्रीति। मैं तीन दिन से जल रहा हूं। आज रात तुम मेरी हो। बोलो… तैयार हो ना? बोलो कि तुम अपनी चूत मुझे दे रही हो।”

वो कुछ सेकंड चुप रही। फिर धीरे-धीरे आँखें खोलीं और मेरी आँखों में देखते हुए फुसफुसाई, “हां बाबू… मैं तैयार हूं। आपकी प्रीति आज रात आपकी रंडी बन जाएगी। जितना मर्ज़ी चोद लो… जितना मर्ज़ी अपने मोटे लंड से मेरी चूत फाड़ दो।”

मैंने मुस्कुराते हुए उसके होंठ चूस लिए और कान में फुसफुसाया, “वादा है प्रीति… कल सुबह तक तुम चीख-चीख कर मेरा नाम लोगी… और कोई नहीं सुनेगा।”

वो कल रात चुदने को पूरी तरह तैयार हो गई थी। दूसरे दिन… मां वापस आ गयी। मैं परेशान हो गया कि अब कैसे नौकरानी को पेलूं….

रात के ग्यारह बज चुके थे। मां सुबह ही नानी के घर से वापस आ गई थी। साड़ी में लिपटी, थोड़ी थकी हुई, लेकिन इतनी खूबसूरत कि देखते ही मेरा लंड पत्थर हो गया था। दिन भर मैंने किसी तरह खुद को संभाला, रात का इंतज़ार किया। प्रीति काम खत्म करके छत पर चली गई थी। मैंने मां के कमरे की तरफ झाँका – लाइट ऑफ थी, शायद सो गई होगी।

मेरा दिल धड़क रहा था। मैं चुपके से छत की सीढ़ियाँ चढ़ गया। अंधेरे में एक गदराया हुआ, मोटा-मुलायम बदन साड़ी में लिपटा दिखाई दिया – भारी छातियाँ, पतली कमर, और वो मोटी-मोटी गांड। मैंने समझा प्रीति ही होगी।

कंट्रोल नहीं रहा। मैंने झपट कर उसे पीछे से दबोच लिया। एक हाथ से उसका मुंह कस कर दबा दिया ताकि वो आवाज़ ना निकाल सके। दूसरा हाथ उसकी कमर पर। मेरा मोटा, टाइट लंड सीधा उसकी साड़ी के ऊपर से गांड की दरार में रगड़ने लगा।“उफ्फ्फ़… क्या मुलायम बदन है रे तेरा…” मैंने उसके कान में गरम साँस छोड़ते हुए फुसफुसाया।

वो बुरी तरह छटपटाई। जोर-जोर से मेरे हाथ में अपना मुंह छुड़ाने की कोशिश करने लगी। लेकिन मैंने और ज़ोर से जकड़ लिया। मैंने उसकी गर्दन पर गहरे-गहरे चुंबन किए, दाँत गढ़ाए, और अपना लंड उसकी गांड पर तेज़ी से रगड़ता रहा।“शश्श्श… चुप प्रीति… आज रात तू मेरी है…”

मेरी एक हाथ उसकी भारी चूचियों पर पहुंच गया। ब्लाउज के ऊपर से ही मैंने उन्हें जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके स्तन मेरी हथेली में दबते-फैलते जा रहे थे। वो लगातार विरोध कर रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका बदन शिथिल पड़ने लगा।

मैंने साड़ी का पल्लू खींचा। एक झटके से साड़ी को कमर तक ऊपर उठा दिया। उसकी पैंटी पर हाथ डाला और सरका दिया। उंगलियां सीधे उसकी चूत पर पहुंची।

“अरे… गीली तो पूरी तरह भिगो रखी है रे तूने…” उसकी चूत में उँगली डालते ही वो सिहर उठी। अब उसका कोई विरोध नहीं बचा। वो पूरी तरह शिथिल हो गई थी। मैंने उसे दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। उसने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर दीवार पर टिका दिए। उसकी कमर थोड़ी पीछे की तरफ़ झुकी हुई थी, गांड मेरी तरफ़ उठी हुई। उसकी चूत अब मेरे लंड का इंतज़ार कर रही थी।

मैंने अपनी शॉर्ट्स नीचे सरकाई। मेरा मोटा, लंबा लंड बाहर आ गया – पूरी तरह खड़ा, नसों से फटा हुआ। एक हाथ से मैंने उसकी भारी-भारी चूचियों को पीछे से मसलते हुए, दूसरे हाथ से अपना लंड पकड़ कर उसकी गीली चूत की स्लिट पर रगड़ा।“प्रीति… ले अब… तेरा बाबू अपना मोटा लंड तेरी चूत में घुसा रहा है…”

मैंने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया। उसकी चूत की फूली हुई लिप्स मेरे लंड के सिरे को चूसने लगीं। फिर एक ज़ोरदार धक्का।“आआह्ह्ह्ह…”

मेरा पूरा मोटा लंड एक ही झटके में उसकी चूत के अंदर तक घुस गया। उसका गर्म, भीगा हुआ अंदरूनी मांस मेरे लंड को कस कर जकड़ लिया। वो पूरी तरह सिहर उठी। उसका पूरा बदन थरथरा गया। उसकी चूत की दीवारें मेरे मोटे लंड के चारों तरफ़ सिकुड़-सिकुड़ कर दबा रही थी।

मैंने उसकी चूचियों को और ज़ोर से मसलते हुए, कान में फुसफुसाया,“ले प्रीति… पूरा लंड अंदर चला गया… कितनी टाइट और गर्म है तेरी चूत… आज रात तुझे मैं बार-बार चोदने वाला हूं…”

वो दीवार का सहारा लेकर काँप रही थी, मेरे लंड को अपनी चूत के अंदर पूरी तरह समेटे हुए।

छत पर अंधेरा छाया हुआ था। मैंने उसे पीछे से जकड़ लिया था, मेरा मोटा लंड पहले ही उसकी चूत में पूरी तरह घुसा हुआ था। उसका गर्म, भीगा अंदरूनी मांस मेरे लंड को कसकर जकड़े हुए था। तभी अंधेरे में उसकी दबी हुई, काँपती हुई आवाज आई, “वि… विनीत… छोड़… मैं… मैं तेरी मां हूं…”

मेरा शरीर एक पल के लिए सख्त हो गया।मैंने झटके से उसका चेहरा मोड़ा। स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी में उसका चेहरा साफ दिखा — मेरी मां।

मेरा लंड अभी भी उसकी चूत के सबसे गहरे हिस्से में धंसा हुआ था, और अब और भी ज़्यादा फूल गया, नसों से फटा हुआ।“मां…?” मेरी आवाज़ में हैरानी और भयंकर कामुकता दोनों थी। “तुम… तुम प्रीति नहीं… मेरी मां हो?”

मां की आँखों में आँसू भर आए, चेहरा शर्म से लाल। लेकिन उनकी चूत मेरे लंड को बार-बार सिकोड़ रही थी, जैसे उसे अंदर खींचना चाह रही हो। “हां बेटा… मैं तेरी मां हूं… सुनीता… प्लीज… निकाल दो… ये पाप है… आह…”

इसके आगे की कहानी अगले पार्ट में।