पिछला भाग पढ़े:-छोटी बहन सपना की बम्पर चुदाई अलग-अलग लंड से-2
आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा। आगे की कहानी-
आखिरकार वह वक्त भी आ गया जब सपना का कॉलेज का आखिरी साल पूरा होने को था। मेरठ कॉलेज के उन तमाम हादसों, उतार-चढ़ावों और फिर विनय के साथ बने उस नए रिश्ते के बाद सपना ने अपनी पढ़ाई शानदार तरीके से पूरी की। अब कॉलेज का आखिरी हफ़्ता चल रहा था और कुछ ही दिनों में हॉस्टल खाली करके उसे हमेशा के लिए गाँव लौट आना था।
सपना के मेरठ से हमेशा के लिए विदा होने की खबर ने विनय को अंदर से थोड़ा उदास कर प्रिया था। भले ही उनका रिश्ता हालातों के समझौते से शुरू हुआ था। लेकिन इन दो सालों में विनय सपना के इस गदराए बदन और उसकी बेबाकी का पूरी तरह आदी हो चुका था। वह उसे एक ऐसी विदाई देना चाहता था जिसे दोनों जिंदगी भर ना भूल सकें।
फेयरवेल पार्टी खत्म होने के बाद, हॉस्टल के ज्यादातर स्टूडेंट्स अपने-अपने घर के लिए निकल चुके थे। पूरा हॉस्टल लगभग खाली हो चुका था। सपना के कमरे की पार्टनर भी सुबह की ट्रेन से जा चुकी थी। कमरा आधा खाली था, सूटकेस पैक हो चुके थे और चारों तरफ एक अजीब सी शांति थी।
शाम के करीब सात बज रहे थे। सपना ने उस दिन फेयरवेल वाली गहरे नीले रंग की जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी, जिसका बैकलेस ब्लाउज उसकी गोरी पीठ और 32-30-32 के कातिलाना फिगर को पूरी तरह से उभार रहा था। वह खिड़की के पास खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्का सा नॉक हुआ।
सपना ने मुड़ कर देखा, सामने विनय खड़ा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशिश थी।
“विनय? तुम इस वक्त यहाँ? हॉस्टल में सब मना है ना…” सपना ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।
विनय ने अंदर आकर कमरा बंद कर प्रिया और कुंडी चढ़ा दी। “अब कोई रोकने वाला नहीं है सपना। पूरा विंग खाली है। मैं तुम्हें इस तरह बिना अलविदा कहे जाने नहीं दे सकता था।”
विनय धीरे-धीरे सपना के करीब आया और उसकी पतली कमर पर अपने दोनों हाथ रख दिए। जॉर्जेट की पतली साड़ी के पार से सपना के बदन की गरमाहट विनय की हथेलियों को छूने लगी। सपना ने कोई विरोध नहीं किया; वह जानती थी कि मेरठ की इस जमीन पर यह उनकी आखिरी शाम थी।
विनय ने धीरे से उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिरा प्रिया। मद्धम रोशनी में उसका गोरा बदन और बिना ब्रा के ब्लाउज के अंदर कसे हुए पपीते जैसे सुडौल बूब्स साफ झलकने लगे। विनय ने आगे बढ़ कर उसके होंठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह किस पिछले दो सालों के सारे अहसासों, झगड़ों और समझौतों का निचोड़ थी।
सपना ने भी अपनी बाहें विनय की गर्दन में डाल दीं। विनय के हाथों ने तेजी से काम करते हुए उसकी साड़ी और पेटीकोट को एक झटके में नीचे सरका प्रिया। अब सपना सिर्फ एक नीली पैंटी में हॉस्टल के उस सिंगल बेड पर विनय के सामने खड़ी थी।
विनय ने बिना कोई वक्त गंवाए अपने सारे कपड़े उतार फेंके। उसका 8 इंच लंबा लंड पूरी तरह अकड़ कर खड़ा हो चुका था। उसने सपना को बेड पर पीठ के बल लेटाया और उसकी पैंटी को भी पैरों से बाहर निकाल प्रिया।
सपना ने अपनी दोनों टांगें फैला दी और विनय को अपने ऊपर खींच लिया। विनय ने अपने लंड की टोपी को उसकी चूत के मुहाने पर सेट किया और पूरे वेग के साथ एक ही गहरा धक्का मारा।‘पकाक-फच’ की आवाज के साथ उसका पूरा लंड सपना की चूत की गहराई में समा गया।
“आहहह… विनय… हाँ, आज आखिरी बार मुझे पूरी तरह से अपने अंदर भर लो…” सपना के मुंह से सिसकारी निकली।
खाली हॉस्टल के उस कमरे में ‘फच-फच-फच’, ‘चट-चट-चट’ की आवाजें गूंजने लगीं। विनय बिना रुके लगातार भारी और जोरदार धक्के मार रहा था। हर धक्के के साथ हॉस्टल का वह लोहे का बेड दीवार से टकराकर ‘चरर-चरर’ की आवाज कर रहा था, जिसने उस माहौल के रोमांच को और बढ़ा प्रिया था।
विनय ने सपना को बेड के किनारे लाकर खड़ा किया और उसे पीछे से घोड़ी बना प्रिया। उसकी भारी, कद्दू जैसी गांड पर हाथ से दो-तीन तेज थप्पड़ मारते हुए उसने पीछे से ताबड़तोड़ धक्के लगाने शुरू किए। सपना पूरी तरह मदहोश होकर बेडशीट को दांतों से दबाए सिसक रही थी।
करीब 30 मिनट की इस जोरदार और आखिरी चुदाई के बाद जब दोनों का सब्र जवाब दे गया, तो विनय ने एक आखिरी गहरा झटका मारा और अपना सारा गर्म वीर्य सपना की चूत के अंदर खाली कर प्रिया। दोनों हांफते हुए एक-दूसरे से लिपट कर उसी छोटे से बेड पर लेट गए।
अगली सुबह, सपना अपना सूटकेस लेकर कॉलेज के गेट से बाहर निकली। विनय उसे छोड़ने स्टेशन तक आया था। दोनों ने एक-दूसरे को आखिरी बार देखा—इस बार आँखों में कोई वासना नहीं, बल्कि एक अजीब सा सम्मान और संतुष्टि थी। सपना ट्रेन में बैठ गई और मेरठ की यह दास्तान हमेशा के लिए पीछे छूट गई।
ट्रेन जैसे-जैसे गाँव की तरफ बढ़ रही थी, सपना का दिल अपने भाई (मेरे) और गाँव के उन गन्ने के खेतों की याद में दोबारा धड़कने लगा था। उसे पता था कि मेरठ की यात्रा भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन गाँव की मिट्टी पर उसके भाई के लंड के साथ उसका असली रोमांच अब फिर से शुरू होने वाला था।
Gitu Ki Chudayi – Part II
मेरठ की यादों को पीछे छोड़ते हुए जब सपना दिल्ली स्टेशन पर उतरी, तो उसे गाँव जाने वाली कनेक्टिंग ट्रेन पकड़नी थी। सफर लंबा था और वह मेरठ की फेयरवेल वाली थकान से पूरी तरह चूर थी, इसलिए उसने इस बार ‘1st AC’ (प्रथम श्रेणी) का टिकट बुक करवाया था। उसे उम्मीद थी कि दो सीटों वाले उस कूपे (Coupe) में उसे पूरा एकांत मिलेगा, जहाँ वह आराम से सोकर अपना सफर काट सकेगी।
शाम के करीब आठ बजे ट्रेन दिल्ली से रवाना हुई। सपना ने अपनी भारी जॉर्जेट की साड़ी बदल कर अब एक बेहद आरामदायक और हल्के कपड़े का स्लीवलेस सलवार-सूट पहन लिया था। बिना ब्रा के उसके 32″ के पपीते जैसे सुडौल बूब्स उस पतले कपड़े के अंदर पूरी तरह आज़ाद महसूस कर रहे थे। वह अपनी लोअर बर्थ पर बैठकर खिड़की से बाहर अंधेरे को देख रही थी, तभी कूपे का भारी दरवाजा खुला।
कूपे के अंदर एक नया लड़का दाखिल हुआ। उसका नाम विकास था, उम्र करीब 24-25 साल, गठीला बदन, साफ रंग और आँखों में एक संजीदा सी चमक। उसने ब्लैक टी-शर्ट और जींस पहन रखी थी, जिसमें उसके चौड़े कंधे और उभरे हुए डोले साफ नज़र आ रहे थे।
विकास ने अपना बैग ऊपर की सीट पर रखा और सपना की तरफ देख कर शालीनता से मुस्कुराया, “हेलो, आई एम विकास। मुझे लगता है इस कूपे में हम दोनों ही सह-यात्री हैं।”
सपना ने भी शिष्टाचार के नाते मुस्कुरा कर जवाब प्रिया, “हेलो, मैं सपना।”
विकास जब सामने वाली बर्थ पर बैठा, तो उसकी नजरें अनजाने में ही सपना के उभरे हुए कातिलाना फिगर पर टिक गई। सूट का गला थोड़ा गहरा होने के कारण सपना की गोरी गर्दन और बूब्स की बीच की गहरी घाटी साफ नज़र आ रही थी। दो साल तक मेरठ के लड़कों के बीच रह चुकी सपना तुरंत समझ गई कि इस नए लड़के के अंदर भी उसके जिस्म को देख कर हलचल शुरू हो चुकी है।
रात के ग्यारह बज चुके थे। ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और ट्रैक पर होने वाली ‘खट-खट’ की आवाज एक अलग ही संगीत पैदा कर रही थी। कूपे का दरवाजा अंदर से पूरी तरह बंद था और बाहर गलियारे में सन्नाटा पसर चुका था। कूपे की मुख्य लाइटें बंद कर दी गई थीं, और सिर्फ दोनों बर्थ के पास की हल्की नीली नाइट-रीडिंग लाइट्स जल रही थी।
सपना को उमस महसूस हो रही थी, इसलिए उसने अपने सूट का दुपट्टा हटा कर साइड में रख प्रिया। दुपट्टे के हटते ही उसके सुडौल बूब्स हवा में खुल कर और भी तीखे लगने लगे।
विकास ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “सपना, तुम बहुत शांत हो। मेरठ से आ रही हो क्या? तुम्हारे चेहरे पर थकान साफ दिख रही है।”
सपना ने अपनी मखमली आवाज में कहा, “हाँ विकास, कॉलेज खत्म हुआ है तो हमेशा के लिए घर लौट रही हूँ।” इतना कहते हुए उसने अपनी पोजीशन बदली और अपनी लंबी, गोरी जांघों को थोड़ा आराम देने के लिए सलवार को हल्का सा ऊपर खींच लिया।
चांदनी रात की मद्धम रोशनी में सपना की गोरी पिंडलियों को देख कर विकास का सब्र डगमगाने लगा। उसके टाइट जींस के अंदर उसका लंड अब पूरी तरह अकड़ने लगा था। वह अपनी सीट से उठा और धीरे से सपना की बर्थ के किनारे आकर बैठ गया।
“सपना… अगर तुम्हें बुरा ना लगे, तो क्या मैं तुम्हारी थकान दूर करने में थोड़ी मदद कर सकता हूँ? मेरा मतलब है… एक अच्छा फुट मसाज या बैक मसाज?” विकास ने बेहद धीमी और भारी आवाज में पूछा।
सपना ने विकास की आँखों में छिपी भूख को देख लिया था। मेरठ के अनुभवों ने उसे डरना नहीं, बल्कि पुरुषों की हवस को अपने इशारों पर नचाना सिखा प्रिया था। वह जानती थी कि इस बंद कूपे में कोई तीसरा आने वाला नहीं था।
उसने अपनी आँखें आधी मूंदते हुए कहा, “विकास… अगर कोई आ गया तो?”
“कोई नहीं आएगा जान…” विकास ने फुसफुसाते हुए तुरंत सपना की गोरी जांघों पर अपना हाथ रख प्रिया। उसका हाथ रखते ही सपना के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। विकास के गठीले बदन और उसके मर्दाने स्पर्श ने सपना के अंदर सोई हुई कामवासना की आग को दोबारा सुलगा प्रिया था।
विकास ने बिना देर किए अपना चेहरा आगे बढ़ाया और सीधे सपना के गुलाबी होंठों को चूमना शुरू कर प्रिया। सपना ने भी अपनी दोनों बाहें विकास के चौड़े कंधों पर कस दीं और पागलों की तरह उसके होंठों का रस पीने लगी। विकास का एक हाथ तुरंत उसके कुर्ते के अंदर गया और उसने बिना ब्रा के झूल रहे उसके पपीते जैसे बूब्स को अपनी मजबूत हथेलियों में दबोच लिया।
“उहहह… विकास… हाँ… जोर से दबाओ…” सपना के मुंह से ट्रेन के शोर के बीच एक रसीली सिसकी निकली।
अगले भाग में जानें कैसे फर्स्ट एसी के उस बंद कूपे की छोटी सी सीट पर विकास ने सपना के सारे कपड़े उतारे, और चलती ट्रेन के झटकों के बीच कैसे उनकी पहली चुदाई का ‘फच-फच’ का दौर शुरू हुआ? जानने के लिए बने रहिए।
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