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धान के खेत में चाचा का मज़ाक(Dhaan ke khet mein chacha ka mazaak)

sunitamanish3

30 May 2013 को प्रकाशित

धान के खेत में चाचा का मज़ाक(Dhaan ke khet mein chacha ka mazaak)
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मेरा नाम प्रिया है। उम्र 19 साल। मैं दिल्ली में कॉलेज करती हूं, लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में हमेशा अपने गाँव हरिपुर (बिहार) आ जाती हूं। हमारे घर में मम्मी, मैं और सुनील चाचा रहते हैं। पापा दिल्ली में जॉब करते हैं, इसलिए साल में सिर्फ दो-तीन बार आते हैं।

सुनील चाचा मेरे पापा के छोटे भाई हैं। उम्र 42 साल, लेकिन शरीर बहुत मजबूत है – काला चिकना रंग, चौड़ी छाती, मोटी बाहें और हमेशा मुस्कुराते रहते हैं। मुझे बचपन से चाचा बहुत पसंद थे, लेकिन इस बार जब मैं गाँव आई तो कुछ अलग सा महसूस हो रहा था।

जून का महीना था। धान की रोपाई चल रही थी। एक दिन सुबह मम्मी ने कहा, “प्रिया, आज तू भी खेत में चल। चाचा धान का बीज बो रहे हैं, तू मेरे साथ धान रोपने में मदद कर।”

मैं तैयार हो गई। मैंने एक पुरानी हल्की नीली सलवार-कमीज पहन ली, जिसका दुपट्टा मैंने कमर में खोंस लिया था। खेत में पानी था, इसलिए कुछ भी अच्छा कपड़ा पहनने का मतलब नहीं था।

जब हम खेत पहुँचे तो सुनील चाचा पहले से ही वहाँ थे। वे लूंगी और बिना गंजी के काम कर रहे थे। उनकी चौड़ी छाती और पसीने से चमकती त्वचा देख कर मेरा मन अजीब सा हो रहा था। चाचा ने मुझे देख कर मुस्कुराते हुए कहा, “अरे प्रिया बेटी! आज तू भी आई है? बहुत अच्छा।”

हम काम शुरू कर दिया। चाचा आगे-आगे धान का बीज (बिया) बो रहे थे। मम्मी और मैं उनके पीछे धान की पौध रोप रही थी। खेत में घुटनों तक पानी भरा हुआ था। धूप तेज थी, लेकिन हवा में धान की हरी महक आ रही थी।

कुछ देर बाद चाचा ने मजाक शुरू किया।“प्रिया, देख तेरा दुपट्टा कितना गीला हो गया है। कमीज़ भी चिपक गई है। अंदर क्या छिपा रखा है?”

मैंने नीचे देखा। मेरी कमीज़ पानी से भीग कर मेरे स्तनों पर चिपक गई थी। मेरे 34D वाले स्तन साफ उभरे हुए दिख रहे थे। मैं शर्मा गई और बोली, “चाचा! शरम नहीं आती? मम्मी के सामने मजाक कर रहे हो।”

मम्मी हँस दी और बोली, “छोड़ो प्रिया, चाचा तो मजाक ही कर रहे हैं।”

लेकिन चाचा रुके नहीं। उन्होंने एक मुट्ठी बीज मेरी तरफ उछाल दिया। कुछ बीज मेरी कमीज़ पर गिर गए, कुछ मेरे गले में। मैंने भी बदला लेने के लिए पानी के छींटे मार दिए।

“अरे! भतीजी ने हमला कर दिया!” चाचा हँसते हुए बोले और उन्होंने भी छींटे मारे। अब मम्मी भी खेल में शामिल हो गई। हम तीनों हँसते-हँसते पानी के छींटे मार रहे थे।

एक छींटे में चाचा की लूंगी का किनारा खुल गया। उनकी जाँघें और थोड़ा-थोड़ा लंड का आकार दिखने लगा। मैंने झट से नजर फेर ली, लेकिन दिल जोर से धड़कने लगा।

थोड़ी देर बाद मम्मी बोली, “मुझे पेट में दर्द हो रहा है, मैं घर जाती हूं। तुम दोनों ही काम पूरा कर लो।” कह कर मम्मी खेत से चली गई। अब खेत में सिर्फ मैं और सुनील चाचा रह गए थे।

चाचा मेरे पास आए और बोले, “प्रिया, अब तो मजाक और मजेदार हो जाएगा।”

वे मेरे बहुत करीब आ गए। उनकी साँस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। उन्होंने मेरे गीले दुपट्टे को खींच कर अलग कर दिया। मेरी भीगी कमीज़ अब और ज्यादा चिपक गई थी। चाचा ने अपनी उँगलियाँ मेरी कमीज़ के ऊपर से मेरे स्तनों पर फेरते हुए कहा, “बेटी, तू बहुत बड़ी हो गई है। ये तो फूट पड़े हैं।”

मैं शर्मा कर सिर झुका ली, लेकिन शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी। ये मेरा पहली बार था। चाचा ने मेरी ठोड़ी उठाई और धीरे से मेरे होंठों पर किस्स कर दिया। सिर्फ हल्का सा किस्स। फिर मुस्कुराए और बोले, “मजाक है बेटी… डर मत।”

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लेकिन अब मजाक मजाक नहीं लग रहा था। उन्होंने मेरी कमीज़ के ऊपर वाले बटन खोलने शुरू कर दिए। एक-एक करके जब तीन बटन खुल गए तो मेरे गोरे स्तन आधे बाहर झांकने लगे। चाचा ने एक हाथ से मेरे स्तन को दबाया और बोले, “कितने नरम और गर्म हैं… चाचा को छूने दे ना।”

मैं कुछ नहीं बोली। चाचा ने मेरी कमीज़ के बाकी बटन भी खोल दिए। अब मेरे दोनों बड़े स्तन पूरी तरह नंगे थे। निप्पल पहले से ही खड़े हो चुके थे। चाचा ने दोनों स्तनों को हाथों में लेकर धीरे-धीरे मसलने लगे। फिर एक निप्पल को मुंह में ले लिया और चूसने लगे।

“आह… चाचा…” मेरे मुंह से निकल गया।

वे दूसरे स्तन पर भी वैसा ही करने लगे। उनकी जीभ मेरे निप्पल को घुमा रही थी। मैं उनकी पीठ पर हाथ रख कर सहलाने लगी।

चाचा ने मुझे धीरे से पानी में झुकाया। मेरी सलवार को कमर तक खींच कर नीचे सरका दिया। अब मेरी चूत उनके सामने थी। उन्होंने उँगलियों से मेरी चूत को सहलाया और बोले, “प्रिया बेटी… तू तो पूरी गीली हो चुकी है। चाचा का मजाक पसंद आ रहा है ना?”

मैं शर्म से लाल हो गई, लेकिन “हाँ” में सिर हिला दिया।

चाचा ने अपनी लूंगी उतार दी। उनका मोटा, काला और लंबा लंड बाहर आ गया। मैंने पहली बार इतने करीब से किसी लंड को देखा। वे मेरी जाँघें फैला कर लंड का सिरा मेरी चूत पर रखने लगे। धीरे-धीरे रगड़ रहे थे।

“चाचा… डाल दो ना…” मैं बेचैनी से बोली।“अभी नहीं बेटी… पहले मजा लो।”

काफी देर तक वे सिर्फ रगड़ते रहे। फिर धीरे से लंड अंदर डाला। पहले सिरा, फिर आधा, फिर पूरा। “उफ्फ… चाचा… बड़ा है… धीरे…” मैं कराह उठी।

मेरी चूत फट चुकी थी। चाचा ने धीरे-धीरे धक्के मारना शुरू किया। खेत का पानी हम दोनों के बीच छप-छप कर रहा था। धान की पौधें इधर-उधर हिल रही थी। चाचा मेरे स्तनों को चूसते हुए तेजी से चोदने लगे।

“प्रिया… तेरी चूत बहुत टाइट है बेटी… चाचा का लंड स्वर्ग में है… आह…”

मैं भी अब पूरी तरह शामिल हो गई थी। अपने कूल्हे उठा कर उनकी हर ठोकर का जवाब दे रही थी। “चाचा… और जोर से… फाड़ दो मेरी चूत… आह… मजा आ रहा है…”

बहुत देर तक चोदने के बाद चाचा ने मेरी चूत के अंदर ही अपना गर्म-गर्म वीर्य छोड़ दिया। हम दोनों थक कर पानी में ही लेट गए। मेरी सलवार-कमीज पूरी तरह गीली और गंदी हो चुकी थी।

चाचा ने मुझे गले लगाया और कान में फुसफुसाया, “प्रिया बेटी, अब से रोज खेत में आना। चाचा तुझे और भी मजेदार मजाक सिखाएगा।”

मैंने शर्मा कर उनकी छाती पर सिर रख दिया। उस दिन के बाद धान के खेत हमारा गुप्त ठिकाना बन गया। मम्मी जब भी घर पर रहती, मैं और चाचा किसी ना किसी बहाने खेत चले जाते। मजाक-मज़ाक में शुरू हुई ये आग अब रोज जलने लगी थी।

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