पिछला भाग पढ़े:-गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-6
आशा है आपने पिछली सेक्स कहानी को पढ़ लिया होगा, आगे की कहानी…
करीब एक हफ्ते तक लगातार हर रोज काव्या को लाखन और मोहन चाचा उसी सरसो के खेत में बजाते रहे। काव्या की हालत खराब हो चुकी थी, पर फिर भी लाखन चाचा और मोहन चाचा का मन नहीं भरा था। वो दोनों काव्या को अपनी रखैल बनाने की ठान रखे थे। क्यूंकि इतनी खूबसूरत तो उन दोनों चाचा की बेटियां भी नहीं थी। उनकी बेटियां माल तो थी, पर इतनी गोरी नहीं थी फिर भी उनकी बेटियों को गांव के ही दो लड़के पटा लिए थे। पर ये बात तो था कि वो दोनों अभी तक चुदी नहीं थी।
इधर खेत की उन गुप्त मुलाकातों ने काव्या के शरीर और उसकी चाल-ढाल को पूरी तरह बदल दिया था। लाखन और मोहन की बेरहम चुदाई और रोज-रोज के रगड़े ने काव्या की जवानी को किसी पके हुए फल की तरह सुजा और निखार दिया था। अब वह गाँव की गलियों से गुजरती, तो सन्नाटा पसर जाता और मर्दों की धड़कनें तेज़ हो जाती।
काव्या जब तंग सूट पहन कर मटकती हुई पनघट या बाजार की ओर निकलती, तो उसकी भारी और गदराई हुई गांड किसी मदमस्त हाथी की चाल की तरह दाएं-बाएं डोलती। उन दो चाचाओं ने उसकी गांड को ठोक-ठोक कर इतना लचीला और उभारदार बना दिया था कि हर कदम पर उसका पिछवाड़ा एक अलग ही लय में थरथराता था।
मर्दों की बेताबी: गाँव के चौपाल पर बैठे जवान हों या बूढ़े, जैसे ही काव्या की मटकती गांड पर उनकी नज़र पड़ती। उनके हाथों में खलबली मच जाती। कई तो अपनी धोती या पजामे के ऊपर से ही अपना तनाव हुआ लंड पकड़ने पर मजबूर हो जाते।
अब काव्या को इन नज़रों से डर नहीं लगता था। उसे पता था कि उसके बदन में क्या आग है। वह जान-बूझ कर अपनी कमर को थोड़ा और ज्यादा लचकाती, जिससे उसकी गांड के दो भारी हिस्से आपस में टकराते और देखने वालों के पसीने छूट जाते।
राजू का घर अब गाँव के लंपटों के लिए तीर्थ स्थान बन गया था। काव्या जब छत पर कपड़े सुखाने आती, तो आस-पड़ोस के लड़के अपने छज्जों पर खड़े होकर उसे हवस भरी निगाहों से देखते।
एक दिन काव्या ने जब झुक कर कपड़े फैलाए, तो उसका टाइट सलवार उसकी गांड की दरार में फंस गया। पीछे से उसका पिछवाड़ा दो बड़े तरबूजों की तरह उभर कर सामने आ गया। नीचे गली में खड़े दो-तीन लड़कों ने जैसे ही यह मंजर देखा, उनकी सांसें अटक गई। उनमें से एक ने फुसफुसा कर कहा—
“अरे भाई, ये राजू की बहन की गांड है या कोई फौलाद? देखो कैसे फड़क रही है, मन करता है अभी यहीं लंड निकाल कर हाथ में ले लूँ।”
काव्या को अब अपनी इस ताकत का अहसास हो गया था। उसे मज़ा आने लगा था कि कैसे पूरा गाँव उसकी जवानी का गुलाम बनता जा रहा है। लाखन और मोहन ने उसे सिर्फ चोदना नहीं सिखाया था, बल्कि उसे एक “नशे” में बदल दिया था।
शाम को जब वह फिर से सरसों के खेत की ओर मुड़ी, तो पीछे से कई जोड़ी आँखें उसे जाते हुए देख रही थी। सबको शक तो था, पर काव्या की वह कातिलाना मटकती गांड सबको चुप करवा देती थी। अब खेल सिर्फ दो चाचाओं तक सीमित नहीं रहने वाला था; काव्या की जवानी की महक अब पूरे गाँव के मर्दों को अपना लंड पकड़ने और उसे पाने के लिए पागल करने लगी थी।
गाँव की आबोहवा अब पूरी तरह बदल चुकी थी। काव्या जब भी घर से निकलती, ऐसा लगता जैसे पूरे गाँव के मर्दों का चैन छिन गया हो। उसकी जवानी की चर्चा अब दबी जुबान में नहीं, बल्कि उन प्यासी निगाहों में साफ दिखने लगी थी जो उसकी एक झलक पाने के लिए घंटों चौपाल पर बैठे रहते थे।
जवानी के नये नशे से काव्या अब अपने बदन की नुमाइश करने से कतराती नहीं थी। उसने जान-बूझ कर ऐसे कपड़े पहनना शुरू कर दिया था जो उसके उभारों को और भी ज्यादा उभारते थे। अपने कातिलाना चाल की वजह से जब वह गाँव के कुएं की तरफ जाती, तो उसकी भारी गांड का थरथराना किसी भूचाल से कम नहीं होता था।
हर धमक पर उसकी सलवार के ऊपर से ही गांड के मांसल हिस्सों का उछलना मर्दों के दिल में छुरियां चला देता था। लाखन और मोहन चाचा अब अपनी “जागीर” पर गर्व करने लगे थे। वे अक्सर गाँव के नुक्कड़ पर खड़े होकर काव्या को आते-जाते देखते और एक-दूसरे को देख मुस्कुराते, जैसे कह रहे हों कि इस खजाने की चाबी सिर्फ हमारे पास है।
एक शाम जब काव्या हमेशा की तरह सरसों के खेत पहुंची, तो वहाँ लाखन और मोहन के साथ गाँव का एक और रसूखदार आदमी, सरपंच का बेटा विक्रम भी मौजूद था। काव्या को देख कर विक्रम ने अपना लंड पाजामे के ऊपर से ही सहलाया।
विक्रम: “चाचा, आप तो छुपा रुस्तम निकले! इतनी गदराई छमिया को अकेले-अकेले डकार रहे थे?”
काव्या ने डरने के बजाय अपनी कुर्ती का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया। उसकी आँखें अब शरम से नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्तेजना से चमक रही थी।
काव्या: “क्यों सरपंच जी, क्या आपको भी इस मखमली जवानी का स्वाद चखना है?”
लाखन और मोहन ने काव्या को बीच में घेरा और विक्रम को भी शामिल कर लिया। आज खेल और भी ज्यादा खौफनाक होने वाला था।
काव्या की बेबाकी: उसने खुद अपनी सलवार उतार कर दूर फेंक दी। उसकी गोरी और चौड़ी गांड अब तीनों के सामने बिल्कुल नग्न थी। धमाकेदार शुरुआत के साथ लाखन ने उसे पीछे से पकड़ा, मोहन ने उसके मुँह में अपना लंड डाला और विक्रम उसके सामने बैठ कर उसकी चूत को अपनी उंगलियों से फाड़ने लगा।
जब लाखन ने अपनी पूरी ताकत से काव्या की गांड में पहला झटका मारा, तो उसकी गांड थर-थर-थर-थर बिजली की तरह कांप उठी। ‘थप-थप-थप’ की आवाज इतनी तेज़ थी कि जैसे कोई ढोल बज रहा हो।
विक्रम: “वाह! ऐसी गांड तो मैंने शहर की रंडियों की भी नहीं देखी। क्या उछाल है साला!” काव्या अब एक साथ तीन मर्दों की हवस का केंद्र थी। उसकी चीखें, उसकी आहें और उसके जिस्म का वो पागलपन अब उसे गाँव की सबसे बड़ी “शहज़ादी” बना चुका था, जिसकी जवानी के आगे अब पूरा गाँव घुटने टेकने को तैयार था। सरसों के खेत की मिट्टी आज फिर से एक नए और गहरे सैलाब से भीगने वाली थी।
पड़ोसन बनी दुल्हन
विक्रम के आने से खेल में एक नई और खूंखार ऊर्जा भर गई थी। लाखन और मोहन, जो अब तक काव्या के शरीर के मालिक बने हुए थे, विक्रम की मौजूदगी में अपनी मर्दानगी का और भी भद्दा प्रदर्शन करने लगे। काव्या, जिसका जिस्म अब पूरी तरह से बेशर्म हो चुका था, तीन फौलादी लंडों के बीच किसी शिकार की तरह छटपटा रही थी।
विक्रम ने काव्या को बीच में खड़ा किया और लाखन-मोहन को उसकी बाहें पकड़ने का इशारा किया। काव्या अब हवा में अधूरी लटकी हुई थी और उसका भारी पिछवाड़ा पीछे की ओर पूरी तरह से तन गया था। विक्रम ने अपना भारी लंड काव्या की गांड के मुहाने पर सेट किया और एक ऐसा जानलेवा धक्का मारा कि काव्या की चीख सरसों के पौधों के पार निकल गई।
जैसे ही विक्रम ने अपनी रफ़्तार पकड़ी, काव्या की गांड थर-थर-थर-थर किसी इंजन की तरह कांपने लगी। हर झटके के साथ मांस से मांस टकराने की ‘थप-थप- थप-थप’ और ‘चट-चट’ की आवाज़ें इतनी तेज़ थी कि गाँव के कुत्तों के भौंकने की आवाज़ भी दब जाए।
मोहन और लाखन चुप-चाप खड़े रहने वाले नहीं थे। मोहन ने काव्या की चूत में अपनी उंगलियां ठूंस दी और उसे नीचे से ऊपर की ओर मथने लगा, जबकि लाखन ने काव्या का सिर पीछे खींच कर अपना लंड उसके मुँह में घुसा दिया।
विक्रम: “चाचा, इस छमिया की गांड तो फौलाद की बनी है! साला जितना गहरा मारता हूँ, उतना ही ये और ज़ोर से पीछे धक्का मारती है।”
काव्या की हालत अब देखने लायक थी। उसकी आँखें पलट रही थी, मुँह में लाखन का लंड था इसलिए वह सिर्फ गले से आवाज़ें निकाल पा रही थी। उसकी कमर झटकों की वजह से आगे-पीछे डोल रही थी और उसकी चौड़ी गांड हर धक्के पर विक्रम के पेट से टकरा कर ‘पट-पट-पट-पट’ का संगीत पैदा कर रही थी।
सूरज पूरी तरह ढल चुका था और अंधेरे में इन तीनों मर्दों के जिस्म पसीने से चमक रहे थे। काव्या अब पूरी तरह से ढीली पड़ चुकी थी, पर उसके अंगों की फड़कन अब भी जारी थी।
विक्रम के प्रहार: वह अपनी कमर को किसी मशीन की तरह चला रहा था। उसकी हर धमक काव्या की गांड के भीतर तक महसूस हो रही थी। काव्या ने अपनी मुट्ठियाँ मोहन के बालों में गड़ा दी थी और वह हवा में पैर मार-मार कर उस दोहरे आनंद को सह रही थी। अंत में, विक्रम ने अपनी पूरी ताकत समेटी और एक आखिरी सबसे लम्बा झटका काव्या की गांड की गहराई में मारा। उसी पल लाखन ने अपना सारा रस उसके हलक में और मोहन ने उसकी चूत पर उड़ेल दिया। काव्या का शरीर एक बार ज़ोर से थरथराया और फिर वह निढाल होकर उन तीनों के ऊपर ही झूल गई।
आज के इस खेल ने काव्या को सिर्फ रखैल नहीं, बल्कि उन तीनों की हवस की एक ऐसी दासी बना दिया था जिसे अब दर्द में ही सबसे ज़्यादा मज़ा आता था। सरसों का वो खेत अब उसकी रूह का हिस्सा बन चुका था।
काव्या अब वह भोली-भाली लड़की नहीं रही थी जिसे अपनी जवानी का अहसास ना हो। सरसों के खेत के अनुभवों ने उसे एक ऐसी बेबाकी देदी थी कि अब वह मर्दों की आँखों में छिपी हवस को कोसों दूर से पहचान लेती थी।
उस दोपहर, काव्या छत पर कपड़े सुखाने आई। उसने जान-बूझ कर एक पतला सफेद कुर्ता पहना था जो पसीने से हल्का चिपक रहा था। जैसे ही उसने हाथ ऊपर उठा कर कपड़े रस्सी पर फैलाए, उसकी कुर्ती ऊपर चढ़ गई और उसकी पतली कमर और गदराया हुआ पेट धूप में चमकने लगा।
गली के उस पार वाले छज्जे पर वही दो लड़के—आर्यन और विक्की—खड़े थे। काव्या को झुकते और मुड़ते देख उनकी आँखों में जैसे खून उतर आया हो। वे आपस में फुसफुसा रहे थे, पर हवा के रुख की वजह से उनकी बातें काव्या के कानों तक पहुँच रही थी।
आर्यन: “देख बे विक्की, क्या माल है साला! जब ये झुकती है तो इसकी गांड का जो उभार दिखता है, कसम से मेरा लंड पाजामे को फाड़ कर बाहर आना चाहता है।”
विक्की: “सच कह रहा है भाई। सुना है आजकल ये रोज़ शाम को सरसों के खेत की तरफ जाती है। ज़रूर उन बूढ़े चाचाओं ने इसे चख लिया है। पर अपन कब तक हाथ मलते रहेंगे? एक बार इसे कोने में दबा लिया ना, तो इसकी ऐसी सुजा कर चोदेंगे कि ये चाचाओं को भूल जाएगी।”
आर्यन: “हाँ भाई, इसकी वो भारी गांड पकड़ कर जब पीछे से रेल बनाएंगे ना, तो इसकी सारी अकड़ ढीली हो जाएगी। देख तो सही, कैसे मटक-मटक के चल रही है, जैसे हमें दावत दे रही हो।”
काव्या ने उनकी बातें सुन ली, पर उसने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। इसके बजाय, उसने अपनी ओढ़नी को जान-बूझ कर कंधे से थोड़ा और नीचे खिसका दिया और एक तिरछी नज़र उन लड़कों पर डाली। उसने अपने होंठों पर एक नशीली मुस्कान लाई और अपनी भारी गांड को एक बार ज़ोर से झटका देकर अंदर की ओर मुड़ी।
उसकी इस हरकत ने उन दोनों लड़कों के होश उड़ा दिए। उनके लंड अब पाजामे के अंदर पत्थर की तरह टाइट हो चुके थे।काव्या ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाते हुए पीछे मुड़ कर देखा और अपनी उंगली से “इंतज़ार” का इशारा किया। विक्की और आर्यन एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे।
विक्की: “अबे! इसने हमें सुना क्या? या ये हमें बुला रही है?”
आर्यन: “लगता है छमिया को अब जवान खून का चस्का चाहिए। आज शाम खेत में सिर्फ चाचा नहीं होंगे, आज हम भी अपना झंडा गाड़ेंगे।”
काव्या नीचे उतरते हुए मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसे पता था कि अब खेल और बड़ा होने वाला है। वह उन लड़कों की बेताबी का मजा ले रही थी और जानती थी कि आज शाम सरसों के खेत में जब ये दो नए शिकारी पहुँचेंगे, तो उसकी जवानी का तमाशा और भी धमाकेदार होगा। अब वह सिर्फ रखैल नहीं, बल्कि पूरे गाँव के मर्दों को अपने इशारों पर नचाने वाली एक “कामुक जादूगरनी” बन चुकी थी।जानने के लिए बने रहें अपने भाई राजू के साथ।
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