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चुदाई की कहानी पठन समय: 6 मिनट पढ़ा गया: 506 बार

दोनों हाथों में लड्डू

अजय

03 Mar 2009 को प्रकाशित

दोनों हाथों में लड्डू
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हाय दोस्तो, मेरी उम्र 27 साल है, मैं कोइम्बटोर तमिलनाडु में नौकरी करता हूँ।

आज पहली बार मैं अंतर्वासना पर कहानी नहीं, सच्ची घटना लिखने जा रहा हूँ।

मेरे सेठ के परिवार में मेरे सेठजी, सेठानी और उनका एक लड़का जो 8 साल का तीसरी कक्षा में पढ़ता है, रहते हैं। कुल मिला कर 4 लोग हैं, सेठजी की दुकान पर वैसे तो और भी 3-4 लोग काम करते हैं लेकिन वे सब तमिल हैं जो अपने-अपने घर चले जाते हैं, सिर्फ मैं सेठजी के घर पर रहता हूँ।

हमारा काम सुबह 9.30 बजे दुकान आना और रात को 8.00 बजे दुकान बंद करके घर पर चले जाना है।

मेरे सेठजी की उम्र 40 और सेठानी की 32 है। सेठजी पूरा दिन दुकान में लगे रहते हैं और अपनी सेहत का ख्याल न रखने की वजह से 45-50 के लगते हैं, वहीं हमारी सेठानी ब्यूटी पार्लर और योग से अपने फिगर को पूरा ख्याल रखती है। मेरी सेठानी का फिगर 38-26-36 का है।

दोपहर को मैं घर जाकर सेठानी के हाथ का बढ़िया खाना खाकर सेठजी का खाना टिफिन में लेकर दुकान चला आता हूँ।

एक दिन की बात है, दोपहर को जब मैं घर गया तो सेठानी स्नान कर रही थी। स्नान करते समय उसका पाँव फिसल गया तो वो ज़ोरों से दर्द से चिल्लाई… उ इ माँ, मर गई।

मैंने पूछा- क्या हुआ?

तो बोली- पाँव में मोच आ गई है आयोडेक्स लाओ।

फिर मैंने सहारा देकर उन्हें हॉल तक पहुँचाया। उसने मेरे कन्धों पर हाथ रख दिया और मैंने उनकी कमर में।

वाह क्या जन्नत थी मेरे लिए, उस क्षण मेरा लंड एकदम से खड़ा होकर खम्भा हो गया था। उन्हें सोफे पर बिठा कर मैं उसके पाँव पर आयोडेक्स लेकर मालिश करने लगा। उसके गोरे-गोरे पाँव इतने हसीन थे कि मन क़ाबू में करना मुश्किल हो रहा था। मेरे हाथ काँप रहे थे मालिश करते हुए।

सेठानी ने प्यार से कहा- मालिश ढंग से, जोर से करो, तो ही मोच जाएगी।

और उन्होंने अपना गाउन घुटनों तक ऊपर उठा दिया।

वाह क्या नज़ारा था, उसकी गोरी-गोरी पिंडलियाँ मेरी आँखों के सामने थीं। मालिश मैं कर रहा था, मज़ा दोनों को आ रहा था। अब मेरी हिम्मत थोड़ी बढ़ी और मेरा हाथ घुटनों तक पहुँच रहा था। सेठानी आँख बंद करके सोफे पर लेटी हुई थी।

धीरे-धीरे मेरा हाथ घुटनों से ऊपर जाने लगा तो सेठानी ने पूछा- क्या कर रहे हो?

मैंने कहा- सेठानी जी, आज मैं आपकी खूबसूरती का दीवाना हो गया हूँ, प्लीज़ आज मुझे मत रोकिए।

सेठानी बोली- कोई देख लेगा तो?

उनके इतना कहते ही मैं समझ गया कि आग दोनों ओर बराबर की लगी है। फिर मैंने दरवाजा बंद किया और सेठानी को गोद में उठाकर बेडरूम में ले गया। सेठानी जान चुकी थी कि आज उसकी चुदाई होकर रहेगी।

मैंने हिम्मत करके पूछा- सेठजी चोदते हैं क्या?

“कभी-कभार करते भी हैं तो उनका लंड अन्दर जाते ही झड़ जाता है, फिर मैं ऊँगली डाल कर अपनी प्यास बुझाती हूँ, वो तो आराम से खर्राटे मारते हैं।”

“सेठानी जी अब आप चिंता मत करो, जब भी आप चाहो, आपकी चुदाई मैं करूँगा।”

“बाथरूम में मेरा कोई पाँव नहीं फिसला था, वो तो एक बहाना था तुम्हें झाँसे में लेने का। मेरा तो उसी दिन से तुमसे चुदने का मन था जिस दिन तुम हमारे यहाँ पहले दिन नौकरी पर लगे थे।” – सेठानी ने रहस्योद्घाटन किया।

अब मैंने सेठानी का गाऊन ऊपर कर उतार दिया। ब्रा और चड्डी में सेठानी वाकई हसीन लग रही थी। सेठानी भी मेरे कपड़े उतारने लगी, मेरा लंड देखते ही वो बड़ी खुश हुई और अपने मुँह में लेकर चूसने लग गई।

मैंने कहा- आराम से चूसो, दाँत मत चुभोना, नहीं तो दर्द होगा।

उसके चूसने का अंदाज़ महसूस करके मैं तो जन्नत की सैर कर रहा था। मैं एक हाथ से उसकी चूचियाँ दबा रहा था, दूसरा हाथ चूत पर सहला रहा था।

अब तक सेठानी गर्म हो चुकी थी, सेठानी ने कहा- अब सहा नहीं जाता, जल्दी से मेरी खुजली शांत कर दो !

मैंने सेठानी को कहा- अब आप मेरे ऊपर आ जाओ।

सेठानी तुंरत मेरे ऊपर आकर लंड को हाथ से चूत का दरवाजा दिखा रही थी। मैंने कमर से एक धक्का ऊपर की ओर दिया और सेठानी ने नीचे की ओर, और लंड चूत के अन्दर।

अब सेठानी आराम से धक्के लगा रही थी और मुझे स्वर्ग का आनंद आ रहा था। मैं दोनों हाथों से अब सेठानी की चूचियाँ पकड़ कर मसल रहा था। सेठानी आनंद विभोर हो रही थी। करीबन दस मिनट के बाद मैं सेठानी को नीचे लिटा कर उनके ऊपर आ गया और लंड एक बार फिर चूत में घुसा दिया।

सेठानी बोली- चोदो राजा, ज़ोर से चोदो, बहुत मज़ा आ रहा है। ऐसा मज़ा तो कभी नहीं मिला।

मैंने धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के पर सेठानी चूतड़ उठा कर साथ दे रही थी। दस मिनट बाद सेठानी हाँफने लगी ओर कहा- अब मैं झड़ने वाली हूँ।

तो मैंने कहा- मुझे कस कर पकड़ लो, मैं भी गया।

और हम दोनों शिथिल अवस्था में कुछ देर पड़े रहे।

उसके बाद जब भी मौक़ा मिलता, मैं सेठानी को बीवी की तरह ही चोदता। सेठानी भी मुझे बहुत खुश रखती थी। तरह-तरह के पकवान व्यंजन बना कर खिलाती थी। मैं दुकान की वसूली, बैंक के काम का बहाना बना कर सेठानी को चोद कर आ जाता था। सेठजी को भनक तक नहीं पड़ती थी।

अब सेठानी सेठ का भी ख्याल न रख के मेरा ध्यान अधिक रखती थी। मेरे दोनों हाथों में लड्डू थे। मुफ़्त की चूत, अच्छा खाना, और सेठ जी से तनख्वाह। सेठ मेरे काम से खुश, सेठानी मेरे लंड से खुश !

मैं दोनों खुशियों से बहुत खुश।

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

रीना गुप्ता

4 days ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

राहुल सिंह सोनाली

3 weeks ago

सच में बहुत ही हॉट और उत्तेजक कहानी है भाई। मजा आ गया पढ़कर।

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