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Parivar Me Chudai पठन समय: 18 मिनट पढ़ा गया: 514 बार

घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-1(Ghoonghat ki aadh se dekha sasur ji ka fauladi lund-1)

moodchangerboy

20 Jul 2013 को प्रकाशित

घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-1(Ghoonghat ki aadh se dekha sasur ji ka fauladi lund-1)
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हेलो दोस्तों, आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्ते। मैं हूं आपका अमित, एक बार फिर हाजिर हूं एक मजेदार नई कहानी लेकर। उम्मीद करता हूं यह कहानी आप लोगों को पसंद आएगी। यह कहानी मेरे एक पाठक की है, जिसे अब मैं उसी की जुबानी सुनाने जा रहा हूं।

नमस्ते दोस्तों! मेरा नाम डिंपल सिंह है। मेरी उम्र 25 साल और लंबाई 5’2″ है। मैं देखने में जितनी सुंदर हूं, उससे कहीं ज्यादा हसीन मेरा बदन है। मेरा चेहरा सिर्फ गोरा ही नहीं, बल्कि मेरे नैन-नक्श इतने कातिल हैं कि किसी भी मर्द की नज़र एक बार मुझ पर पड़ जाए, तो उनके दिलों की धड़कनें बेकाबू हो जाती हैं।

मेरे शरीर की बनावट किसी को भी मदहोश कर दे। मेरी 34″ साइज की आकर्षक चूचियां और 36″ साइज की बाहर की ओर निकली हुई भारी गांड, मेरा उभार ऐसा है कि राह चलते मर्द भी मुझे देख लें, तो अपना लंड पकड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।तो दोस्तों, अब मैं अपनी असल कहानी पर आती हूं। यह कहानी मेरे और मेरे ससुर जी के बीच की है, जो अब मैं आप लोगों को बताने जा रही हूं।

मेरी शादी आज से 5 साल पहले हुई थी। मेरे पति का नाम राजू है और उनकी उम्र 26 साल है। राजू देखने में बहुत ज्यादा स्मार्ट तो नहीं हैं, पर घरवालों की पसंद से हमारी शादी हो गई। आज मैं एक बच्ची की माँ हूं। मेरे पति की गुजरात में अपनी एक ट्रांसपोर्ट कंपनी है और वो वहीं रहते हैं।

मेरे ससुर जी का नाम जगदीश सिंह है। उनकी उम्र कहने को तो 54 साल है, पर अपने खान-पान और कसरत की वजह से वो आज भी 38-40 के जवान लगते हैं। वो गाँव के एक बड़े जमींदार हैं और ज्यादातर समय खेती-बाड़ी ही संभालते हैं। हमारे ससुराल में पैसे की कोई कमी नहीं थी।

ससुर जी अपने शरीर का पूरा ख्याल रखते हैं, जिसकी वजह से उनका बदन एक-दम गठीला और तंदुरुस्त बना हुआ है। मेरी सासू माँ का इंतकाल 7 साल पहले ही हो गया था, इसलिए घर में ससुर जी के अलावा और किसी का ज्यादा दखल नहीं है।

पहले मैं अपने पति के साथ गुजरात में ही रहा करती थी, पर बच्चे के जन्म के एक साल बाद ही उन्होंने मुझे गाँव में छोड़ दिया। अब मैं अपने बच्चे के साथ यहाँ गाँव में रह कर ससुर जी का ख्याल रखने लगी। दिन भर मैं एक आज्ञाकारी बहू की तरह घर का सारा कामकाज संभालती थी।

पर दोस्तों, मेरे लिए हर रात अकेले काटना मुश्किल होता जा रहा था। पति के साथ संबंध बनाए 8 महीने बीत चुके थे और मैं दिन-रात बस अपनी प्यास बुझाने के लिए तड़प रही थी। जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता, तो रातों को बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं अपनी चूत में उंगली कर लिया करती थी। पर जब उंगली से भी मन नहीं भरता, तो मुझे बैंगन का सहारा लेना पड़ता था।

घर में मैं पूरा दिन साड़ी पहने रहती और ससुर जी के सामने लाज-शर्म के मारे अपना आधा चेहरा पल्लू से ढके रहती थी। कभी-कभी जब मैं बैकलेस डोरी वाला ब्लाउज पहन लेती, तो पूरा दिन खुद को संभालना भारी पड़ जाता था।

मेरे ससुर जी भी नंबर एक के ठरकी इंसान थे। वो अक्सर गाँव की दूसरी औरतों के साथ-साथ मुझे भी बड़ी गंदी नज़रों से निहारा करते थे। मैंने कई बार घूँघट के अंदर से उनकी वो प्यासी नज़रें भांप ली थी। साड़ी और ब्लाउज के बीच से मेरी आधी नंगी कमर, गोरी पीठ और खुला हुआ पेट… उन्हें ढकते-ढकते मैं खुद परेशान हो चुकी थी। मैं अपनी साड़ी इतनी टाइट बाँधती थी कि मेरी गांड का उभार एक-दम साफ़ नज़र आता था। उठते-बैठते और आते-जाते ससुर जी की नज़रें बस मेरी गांड पर ही टिकी रहती थी।

गाँव में हमारा घर काफी बड़ा है, जिसकी दीवारें बहुत ऊँची हैं। मेरा कमरा घर के बिल्कुल पीछे एक कोने में था और उसके पीछे घना जंगल। ससुर जी कमरे के बजाय रात को आंगन में ही चारपाई लगा कर सोते थे। मुझे अगर रात को पेशाब करने जाना होता, तो आंगन से होकर ही गुज़रना पड़ता था। हमारा बाथरूम भी घर के एक कोने में एक-दम खुला हुआ था।

ससुर जी सुबह का नाश्ता करके खेतों पर निकल जाते और दोपहर को खाना खाने घर आते। शाम होते ही गाँव के लोग उनके पास गप-शप करने जुट जाते थे।

कभी-कभी गाँव की एक-दो औरतें भी वहां आकर बैठ जाती थी। मैंने कई बार अपनी आँखों से देखा कि बातें करते-करते ससुर जी कैसे चुपके से उन औरतों की जांघों पर हाथ फेर देते थे, और वो औरतें भी हंस कर उनकी इस हरकत का मज़ा लेती थी। मुझे पक्का यकीन हो गया था कि ससुर जी कई औरतों के साथ खेल चुके होंगे।

शुरुआत में उनकी इन हरकतों पर मुझे गुस्सा आता था, पर फिर मैं यह सोच कर नज़र-अंदाज कर देती कि सासू माँ के जाने के बाद आखिर उन्हें भी तो जिस्म की ज़रूरत पड़ती ही होगी।

वैसे मेरे ससुर जी बड़ी मूँछों वाले, सॉलिड और गठीले बदन के बड़े ही आकर्षक मर्द हैं। जब कभी मैं सुबह नहाने के बाद उन्हें बिना कुर्ते के देख लेती, तो मेरे खुद के बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ जाती थी। उनका वो चौड़ा सीना और कसरती बदन देख कर मेरा मन एक पल के लिए रिश्तों की सारी सरहदें लांघने को बेताब हो जाता। फिर मैं तुरंत एक गिलास ठंडा पानी पीकर किसी तरह अपने आप को काबू में करती।

रातों को पति से फोन पर बात करके अपनी चूत की आग को शांत करने की कोशिश करती, पर वह आग भला फोन पर बुझने वाली कहाँ थी? बस मन को थोड़ी देर के लिए तसल्ली मिल जाती, लेकिन प्यास वैसी की वैसी ही बनी रहती।

मैं महीनों से अपने पति को घर बुला रही थी, पर मेरी तड़प का उन पर कोई असर नहीं होता था। इसी बात को लेकर अक्सर फोन पर हमारा झगड़ा भी हो जाता। मैं ससुराल में अकेली बहू थी, और शायद इसी वजह से ससुर जी भी मुझे मायके जाने की इजाजत नहीं देते थे। उन्होंने घर की तिजोरी से लेकर अनाज के गोदाम तक की सारी चाबियां मेरे हाथों में सौंप रखी थी—इसी भरोसे और जिम्मेदारी की वजह से मुझे उनकी हर बात माननी पड़ती थी।

फिर भी जब मैं एक-दो दिन गुस्से में मुँह फुला कर कमरे में बैठ जाती, तो मुझे मनाने के लिए ससुर जी बाज़ार से कुछ ना कुछ खाने के लिए ले आते और कहते:“डिंपी बहू, यह घर भी तो तुम्हारा ही है। कुछ खाना-पीना हो या किसी चीज़ की कमी हो, तो मुझसे कह दिया करो। तुम मेरी इतनी सेवा करती हो, तो मेरा भी फर्ज़ बनता है कि मैं तुम्हारे लिए कुछ करूँ!”

हाँ, ससुर जी प्यार से मुझे डिंपी कह कर बुलाते थे, और उनके मुँह से अपना यह नाम सुन कर मुझे काफी अच्छा लगता था।

अब मैं ससुर जी को कैसे समझाती कि औरत का सिर्फ पेट भरने से काम नहीं चलता। पेट की तरह औरत की चूत भी लंड खाने के लिए उतनी ही भूखी होती है। इस भूख को तो आपका बेटा मुझसे दूर रहकर और बढ़ा रहा है। यह तो मेरा सती-सावित्री का रूप था, जो खुद को किसी गैर मर्द की बाहों में जाने से रोके हुए थी।

मेरे पति अक्सर मुझे फैशनेबल ड्रेसेस में देखना पसंद करते हैं, पर गाँव-समाज के डर से मुझे साड़ी ही पहननी पड़ती थी। फिर भी मैं साड़ी के नीचे जो पेंटी पहनती थी, वह इतनी शॉर्ट होती कि बस चूत की फांकों को ही कवर करती थी। पेंटी का पिछला हिस्सा मेरी भारी गांड की दरार में समा जाता था, जिससे मेरी गांड की गोलियां और भी उभरी हुई और मादक नज़र आती थी।

मेरी ब्रा भी पैडेड और छोटे साइज़ की होती थी, जिसमें मेरे बूब्स के गोल आकार बड़े आकर्षक नज़र आते थे। मैं रात को सोते समय सिल्क की शर्ट-नाइटी पहनती थी जो घुटनों तक होती थी। उसके नीचे मैं ब्रा-पेंटी कभी नहीं पहनती थी। जब कभी मैं रात को चूत में उंगली कर लेती, तो पूरी थकान उतरने के बाद अक्सर नंगी ही सो जाती थी।

रोज सुबह मैं जल्दी नहा-धोकर पहले पूजा-पाठ करती, फिर रसोई का काम संभालती। ससुर जी हर सुबह उठते ही सबसे पहले अपनी पोती का चेहरा देखना पसंद करते थे। वह कुछ देर पोती के साथ खेलते, फिर जब वह रोने लगती, तो उसे लाकर मेरी गोद में थमा देते।

ससुर जी कभी-कभी बच्ची को मेरी गोदी में देते समय अपनी उंगलियाँ मेरी चूचियों पर फेर देते थे। उनके मर्दाने और कठोर हाथों की छुअन से मेरा पूरा बदन सिहर उठता था। मेरी चूचियाँ फूल कर टाइट हो जातीं और निप्पल्स नुकीले होकर तन जाते थे। उनकी इस छुअन से मेरी चूत भी पानी छोड़ने लगती थी। मैं घूँघट के अंदर से ससुर जी का चेहरा देखती, तो उनके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान होती थी, जिसे देखकर मैं समझ जाती थी कि यह सब उन्होंने जान-बूझ कर किया है।

फिर ससुर जी नहा-धोकर आते और आंगन में लगी चारपाई पर बैठ जाते थे। मैं उन्हें नाश्ता देने जाती, तो पहले अपनी साड़ी के पल्लू को कमर में खोंस लेती थी, ताकि जब मैं उनके पैरों को छूने के लिए नीचे झुकूँ, तो मेरी चूचियों की गहराई वह न झाँक सकें। ससुर जी के पैरों को छू कर आशीर्वाद लेना मेरा रोज़ का नियम बन गया था।

ससुर जी मेरे इन्हीं संस्कारों की वजह से पूरे गाँव में मेरी आज्ञाकारी बहू होने का बखान करते थे, और हर महीने वह मेरे लिए नई-नई साड़ियाँ भी लाते थे। उनका मेरे लिए यह सब करना मुझे साफ़ समझ आता था। पर मैं ससुर जी को उनके बेटे की जगह कैसे दे सकती हूं, बस यही कश्मकश थी।

महीनों से लंड ना मिलने के कारण मैं भी काफी चुदासी हो रही थी, फिर भी मैं अपने ससुर जी के साथ मर्यादा पार नहीं करना चाह रही थी।

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दिन, महीने और साल ऐसे ही गुज़र रहे थे। मुझे अपना मन मार कर ससुराल में रहना पड़ रहा था, तभी एक रात गाँव में ऐसा कुछ हुआ कि सुबह पूरा गाँव सदमे में आ गया।

तो दोस्तों, मेरी कहानी यहाँ से मोड़ लेती है। यह बात पिछले साल अक्टूबर के महीने की है। रात के अंधेरे में जब पूरा गाँव चैन की नींद सो रहा था, तो कुछ चोरों ने एक घर को पूरी तरह लूट लिया था। यह खबर जैसे ही चारों तरफ फैली, तो सभी की तरह ससुर जी भी देखने चले गए। घर आकर ससुर जी ने मुझे सारी बातें बताई, जिसे सुन कर मेरी रूह काँप गई।

फिर किसी तरह रात हुई। खाना खाने के बाद ससुर जी बोले: ‘डिंपी बहू, माहौल ठीक नहीं है। मैं चाहता हूं कि तुम तिजोरी को अब अच्छे से लॉक करके रखना।’

मैं ससुर जी के सामने साइड पोज़िशन में खड़ी, अपने एक हाथ से साड़ी के पल्लू को पकड़े हुए बोली: ‘ठीक है पापा जी।’

मैं घूँघट के अंदर से ही उनकी नज़रों को देख रही थी। वह मेरी गांड का भारी उभार ही निहार रहे थे। इतना बोल कर मैं अपने कमरे में आ गई और तिजोरी को चेक करके सो गई।

अगले दिन फिर पता चला कि रात को किसी और के यहाँ चोरी हो गई है। चोर इतने शातिर थे कि वे घरों की दीवारें तोड़ कर अंदर घुस रहे थे। ससुर जी सब देख कर आते और मुझे अपने फोन में (तस्वीरें) दिखाते थे। पूरे दिन सब की बातें सुन कर मेरा दिल बहुत डरने लगा था।

इसी तरह दो-तीन दिन लगातार आस-पास के गाँवों में चोरियाँ हुईं, जिससे पूरे गाँव में खौफ छा गया। मुझे रात को अकेले सोने में काफी डर लग रहा था और नींद भी सही से नहीं आ रही थी।

अगले दिन मैंने पति को सब बताया। मेरे पति ने ससुर जी से मेरे डर के बारे में बात की और आने की कोशिश की, पर ससुर जी ने उसे यह कह कर रोक दिया कि वह अकेले सब संभाल लेंगे।

ससुर जी ने अपने बेटे से बात करने के बाद मुझे आंगन में बुलाया और बोले: ‘डिंपी बहू, मुझे पता है माहौल ठीक नहीं है। अब राजू बेटा यहाँ आएगा, तो उसके कारोबार में नुकसान हो जाएगा।’

मैंने घूँघट के अंदर से कहा: ‘पापा जी, डर लगा रहता है। रातों को मुझे नींद नहीं आ रही है।’

ससुर जी बोले: ‘बहू, मैं तुम्हारा डर समझ सकता हूं। घर के पीछे जंगल है, ऊपर से तुम्हें अकेले सोना पड़ता है। तुम कहो तो मैं कमरे के बाहर चारपाई लगा कर लेट सकता हूं। आज-कल इस माहौल की वजह से गाँव में कोई भी चैन से नहीं सो पा रहा है, सभी मर्द पहरेदारी कर रहे हैं। बहू, तुम आराम से सो जाना, आज मैं पहरेदारी कर लूँगा!’

फिर गाँव में अंधेरा होने से पहले मैंने खाना बना कर तैयार कर दिया। ससुर जी खाने के बाद मेरे कमरे के बाहर अपनी चारपाई लगा लेते हैं। ससुर जी शाम को ही अपनी कुछ नींद पूरी कर लेते हैं, ताकि वह रात भर जाग कर घर की रखवाली कर सकें।

अब कमरे के बाहर ससुर जी सो रहे थे। मैं नाइटी में भी नहीं सो पा रही थी और डर के मारे लाइट भी ऑन रखनी पड़ रही थी। अगली रात मुझे साड़ी में नींद नहीं आ रही थी, मैं कमरे के अंदर इधर-उधर टहल रही थी। ससुर जी पहरेदारी शुरू करने से पहले अपनी एक नींद पूरी करके उठते थे, तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ गई।

ससुर जी बाहर से ही खाँसते हुए बोले: “क्या हुआ बहू? इस तरह क्यों टहल रही हो?”

मैंने थोड़ी परेशानी भरी आवाज़ में कहा: “पापा जी, वो… नींद नहीं आ रही थी!”

ससुर जी बोले: “बहू, मुझे पता है औरत को साड़ी पहन कर सोने की आदत नहीं होती। तुम्हें मेरी चिंता किए बगैर, जिस कपड़े में आराम मिले उसे पहन कर सो जाना चाहिए।”

ससुर जी की बात मुझे बहुत अच्छी लगी कि वह बिना बताए मेरी परेशानी समझ गए थे। फिर मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और अपने बदन से सारे कपड़े उतार कर पैरों तक की फुल मैक्सी पहन ली और सो गई।

अगले दिन ससुर जी देर से सोकर उठे। नाश्ता करने के बाद वह गाँव में घूमने निकल गए। जब वह वापस आए, तो बड़ी दुखद खबर लेकर आए। ससुर जी ने बताया कि कल रात घर के पीछे वाले जंगल में चोर छुपे हुए थे; कुछ गाँव वालों ने उन्हें देखा, पर डर की वजह से कोई कुछ नहीं कर पाया।

गाँव के दूर एक घर में लूट रोकने के लिए परिवार के एक सदस्य ने कोशिश की, तो चोरों ने उसे मौत के घाट उतार दिया। ससुर जी से यह सब सुन कर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। मुझे अब और भी ज़्यादा खौफ महसूस हो रहा था।

शाम होते ही ससुर जी खाना खाकर सो गए। मैंने कमरे में बच्ची को सुलाने के बाद साड़ी उतार कर नाइटी पहननी चाही, पर मैंने देखा कि मेरी फुल नाइटी आज गीली है। अब मेरे पास बस घुटनों तक की शॉर्ट नाइटी बची थी, जो मेरे जिस्म से पूरी तरह चिपक जाती थी। मुझे ससुर जी का ख्याल आया कि वह बाहर ही हैं; अगर उन्होंने मुझे इस हाल में देख लिया, तो क्या सोचेंगे?

फिर एक बार मैंने बाहर झाँका, ससुर जी अभी सो रहे थे। मैंने जल्दी से कमरे का गेट बंद किया और अपने बदन से सभी कपड़े उतारकर सिर्फ वह शर्ट-नाइटी पहन ली। कमरे में डिम लाइट जला कर मन में सोचा—’भगवान, बस मुझे उनके सामने न जाना पड़े।’

मुझे बेड पर लेटे थोड़ी ही देर हुई थी कि अचानक बिजली चली गई। घने अंधेरे के कारण अब मुझे और भी डर लगने लगा। मेरी पूरी बॉडी के रोंगटे खड़े हो गए। थोड़ी हिम्मत करके मैंने फोन की लाइट जलाई और कमरे का गेट खोल दिया, ताकि बाहर से कुछ रोशनी अंदर आ सके।

मेरे दिल की धड़कन तेज़ी से चल रही थी। हाथ में फोन की लाइट जलाकर मैं बेड के इर्द-गिर्द टहल रही थी। मेरा पूरा शरीर डर से काँप रहा था, ऊपर से मुझे ज़ोरों से पेशाब लगने लगी थी। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ—ससुर जी को आवाज़ दूँ या अकेले बाहर चली जाऊँ?

तो दोस्तों, इसके आगे क्या हुआ, वह अगले भाग में बताऊँगी। तब तक मेरी इस कहानी पर बने रहें। उम्मीद करती हूं कि मेरी कहानी आप सभी को पसंद आ रही होगी।

अगला भाग पढ़े:-घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-2

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