पड़ोसी

गोरा लिंग लेने की लालसा-2

लेखक: टी पी एल दिनांक: 24-05-2010 पठन समय: 14 मिनट

लेखिका- रुचिकासम्पादिका- टी पी एल

कहानी का पिछला भाग :गोरा लिंग लेने की लालसा-1

विजय की पीठ मेरी ओर थी और मैं उससे चिपक कर लेटे हुए उसके सीने को अपने हाथों से सहलाने लगी और अपनी जांघें तथा टांगों को उसकी जाँघों एवं टांगों के साथ रगड़ने लगी।मेरी इस हरकत से विजय की नींद खुल गई और वह करवट बदला कर सीधा हो गया ओर अपना सिर ऊँचा करके अचंभित हो कर मेरी ओर देखने लगा।विजय के सीधा होते ही मैंने अपने हाथ को उसके सीने सा हटा कर उसकी जाँघों पर ले गई और उसके लिंग तथा उसके अंडकोष को सहलाने लगी।विजय ने ‘नहीं, बिल्कुल नहीं…’ कहते हुए मेरा हाथ को पकड़ कर हटाने की कोशिश की।लेकिन असफल रहा क्योंकि मैंने उसके लिंग को कस कर पकड़ लिया था और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए थे।

कहते हैं कि जब भी कोई स्त्री अपनी वासना की आग में जलते हुए शरीर की गर्मी से किसी भी पुरुष को अवगत कराती है तब वह पुरुष मोम की तरह पिघल जाता है।विजय के साथ भी वही हुआ क्योंकि मेरे चुम्बनों की मिठास, शरीर की गर्मी और उसके लिंग एवं अंडकोष को सहलाने के कारण उसका लिंग तन कर एक लोहे की छड़ की तरह सख्त हो गया था।

शीघ्र ही विजय पर भी वासना का भूत सवार हो गया और वह मेरी हर गतिविधि में सम्पूर्ण सहयोग देने लगा तथा मेरे गुप्तांगों को सहलाने तथा मसलने में लीन हो गया।दस मिनट के बाद जब मैंने देखा की विजय की ओर से पूर्ण सम्मति मिल गई है तब मैंने उसके पजामे और अंडरवियर के अन्दर हाथ डाल कर उसके लिंग को पकड़ कर हिलाने लगी।तब विजय ने बहुत धीमे स्वर में मेरे कान में कहा- ऐसे करने से ना तो तुम्हें और ना ही मुझे कोई आनन्द आ रहा है। क्यों नहीं हम सभी कपड़े उतार कर करें?

विजय की बात सुन कर मेरे दिल की धड़कन अकस्मात् ही बढ़ गई लेकिन अपने को संयम में रखते हुए मैंने उसे कहा- विजय, अंकुश पास में सोया हुआ है इसलिए मैं सभी कपड़े नहीं उतार सकती। मैंने नाइटी के नीचे सिर्फ पैंटी ही पहनी हुई है, उसे तुम उतार दो और नाइटी को ऊँची कर लो।विजय मेरी बात सुन कर बोला- ठीक है, इससे पहले की मैं तुम्हारी पैंटी उतारूँ तुम पहले मेरे सभी कपड़े उतार दो।यह सुन कर मैं विजय से अलग हुई और पहले उसके पजामे का नाड़ा खोल कर उसकी टांगों से निकाल प्रिया और फिर उसके अंडरवियर को नीचे सरकाते हुए उसकी टांगों से अलग कर प्रिया।

विजय के शरीर के नीचे के भाग के नग्न होते ही मैं उसके गोरे एवं लोहे के छड़ जैसे सख्त लिंग पर टूट पड़ी और उसे चूमते हुए अपने मुँह में भर लिया।मुझे लिंग से खेलता देख कर विजय ने अपना कुरता उतार प्रिया और मेरी टांगों को अपनी ओर खींच कर मेरी नाइटी को ऊँचा करके मेरी पैंटी को खींच कर उतार प्रिया।

उसके बाद विजय ने मेरी दोनों टाँगें चौड़ी करी और मेरी जाँघों के बीच में अपना मुँह डाल कर मेरी योनि को चाटने लगा।

अगले पन्द्रह मिनट तक हम दोनों उस 69 की अवस्था में एक दूसरे के गुप्तांगों को चूसते एवं चाटते रहे और एक दूसरे की कामाग्नि को भड़काते रहे।उन पन्द्रह मिनट में मेरी योनि में से एक बार रस स्खलित हुआ था जिसे विजय ने बहुत ही चाव से चाट लिया लेकिन उसके लिंग में से मुझे सिर्फ पूर्व रस की कुछ बूँदें ही पीने के लिए मिली।

क्योंकि मुझे विनय के डेढ़ इंच मोटे लिंग को ही मुँह में लेने की आदत थी इसलिए विजय के ढाई इंच मोटे लिंग को मुँह में लेने में मुझे कुछ दिक्कत आई और उन पन्द्रह मिनटों में तो मेरा मुँह का जबड़ा ही अकड़ गया।

तब मैंने उसे मुँह से निकालते हुए विजय से पूछा- तुम्हारा लिंग तो काफी मोटा है। तुमने यह इतना मोटा कैसे किया?मेरे प्रश्न के उत्तर में विजय बोला- मैं जब छत्तीसगढ़ के जंगली इलाके में ड्यूटी पर था तब मैंने इससे वहाँ की आदिवासी लड़कियों की बहुत सेवा की और एवज में मैंने उनसे इसकी बहुत मालिश भी करवाई थी।

मैंने फिर प्रश्न किया- तो यह मालिश करवाने से पहले कितना मोटा था? क्या मालिश करवाने से इसकी लम्बाई भी बढ़ी गई थी?विजय ने कहा- नहीं, मालिश करवाने से इसकी लम्बाई में कोई ख़ास अंतर नहीं आया था और यह सात इंच का सात इंच ही रहा। लेकिन इसकी मोटाई डेढ़ इंच से बढ़ कर ढाई इंच हो गई थी।

तभी मेरी योनि में एक बार फिर गुदगुदी और हलचल होने लगी तब मैंने विजय के मुँह को योनि से दूर करते हुए उसे सीधा किया और उसके ऊपर चढ़ कर बैठ गई।फिर मैं थोड़ा ऊँची होकर विजय के लिंग को अपनी योनि के द्वार पर लगा कर जैसे ही नीचे बैठने के लिया दबाव डाला तो लिंग अन्दर जाने के बजाये बाहर की ओर फिसल गया।मैंने तब विजय की ओर बड़ी आशा भरी नजरों से देखा तो उसने तुरंत अपने लिंग को पकड़ कर स्थिर कर प्रिया और मुझे बैठने का संकेत प्रिया।

उसका संकेत मिलते ही मैं एक झटके के साथ नीचे बैठी जिससे लिंग-मुण्ड सहित उसका आधा लिंग मेरी योनि को चीरता हुआ अन्दर घुस गया।

अत्यंत दर्द के कारण मेरी चीख निकल गई जिसे विजय ने मेरे मुँह पर अपना हाथ रख कर मेरे गले में ही दबा दी।

मेरा शरीर कांपने लगा और मेरी आँखों में आँसू आ गए तथा मैं अपने सिर को हिलाते हुए उस दर्द को सहने का प्रयास करती रही।अभी तक विनय के डेढ़ इंच मोटे लिंग की ही अभ्यस्त योनि के अंदर जब विजय का ढाई इंच मोटे लिंग जबरदस्ती प्रवेश हुआ तब उसके अंदर की सभी माँस पेशियाँ के खिचते ही दर्द की लहरें उठने लगी थी।

मेरी वेदना को समझते हुए तब विजय ने अपने आधे लिंग को मेरी योनि के अंदर ही फंसे रहने प्रिया और मुझे खींच कर अपने ऊपर लिटा लिया तथा मेरे स्तनों की चुचूकों को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा।

उसके द्वारा मेरी चुचूकों को चूसने से मेरी योनि के अंदर की मांस पेशियों में हलचल हुई जिससे नसों में आये तनाव से राहत मिली और जल्द ही दर्द भी समाप्त हो गया।

तब मैं विजय का चुम्बन लेते हुए उठी और थोड़ा सा ऊँचा हो कर एक झटके के साथ उसके लिंग पर बैठ गई तथा उसे जड़ तक अपनी योनि में समेट लिया।एक बार फिर मुझे बहुत ही तीव्र दर्द हुई और अपने पर बहुत संयम रखने के बावजूद भी मेरे मुँह से एक चीख निकल ही गई।मैंने और विजय ने गर्दन घुमा कर अंकुश की ओर देखा और उसे गहरी नींद में सोया देख कर दोनों ने चैन की सांस ली और मैं भी दर्द के मारे एक बार फिर विजय के ऊपर लेट गई।

इस बार विजय मेरे होंठों को चूमता रहा और मेरे दोनों स्तनों को चुचुकों को अपने हाथों के अंगूठे और उँगलियों के बीच में लेकर मसलता रहा।उसके ऐसा करने से मुझे एक बार दर्द से जल्द राहत मिल गई और तब मैं अपनी योनि में फसे विजय के लिंग में हो रहे स्पंदन को महसूस करने लगी थी।विजय के लिंग में हो रहे स्पंदन और मेरी योनि में हो रही सिकुड़न से मिल रहे आनन्द के कारण हम दोनों की उत्तेजना में बहुत वृद्धि हो गई और तब विजय नीचे से धक्के लगाने लगा।

मैं उसके धक्कों के संकेत को समझ गई और तुरंत ही उछल उछल कर विजय के लिंग को अपनी योनि के अन्दर बाहर करने लगी।दस मिनट उछलने के बाद मेरी योनि में एकदम से सिकुडन हुई और मेरा शरीर ऐंठने लगा, मेरी टांगों में कंपकंपी होने लगी तथा मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी थी।

मेरी योनि में विजय का लिंग ऐसे फंसा हुआ था जैसे वह उसी का ही अभिन्न अंग था और उसने मेरी योनि के अन्दर के खालीपन को बिल्कुल गायब कर प्रिया था।उस हालत में मैंने उछालना बंद करके विजय के पूरे लिंग को अपनी योनि में समेटे हुए उसके शरीर के उपर ही लेट गई तथा अपनी योनि के अन्दर होने वाली खिंचावट से उसके लिंग का मर्दन करने लगी।

लगभग पांच मिनट के बाद जब मैं सामान्य हुई तब फिर से मैंने उछल उछल कर विजय के तने हुए और रोड की तरह सख्त लिंग को अपनी योनि के अन्दर बाहर करने लगी।दस मिनट के बाद एक बार फिर मुझे योनि के अंदर खिंचावट और टांगों में थकावट महसूस हुई तब मैंने रुक कर विजय को मेरे ऊपर आने को कहा।

मेरे कहते ही विजय ने मुझे अपने सीने के साथ चिपका लिया और मेरे नितम्बों को हाथों से पकड कर लिंग को योनि के अंदर ही रखते हुए उसने मुझे एक फूल की तरह उठा कर खड़ा हो गया।फिर उसने खड़े खड़े ही अपने हाथों से मुझे उपर नीचे करके अपने लिंग को मेरी योनि के अंदर बाहर करने लगा।पांच मिनट के बाद उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर चूमने लगा और मुझे बिस्तर पर लिटा कर मेरे उपर लेट कर तीव्र गति से सम्भोग करने लगा।मैंने भी चुम्बन में उसके होंठों एवं जीभ को चूस कर उसका साथ प्रिया तथा सम्भोग में नीचे से अपने कूल्हे उठा कर उसके हर धक्के का उपयुक्त उत्तर प्रिया।दस मिनट के इस तीव्र गति के संसर्ग में हम दोनों पसीने से नहा गए और दोनों के सांसे उखड़ने लगी थी तभी विजय बोला- रुचि मेरा वीर्य-रस संखलन होने वाला है, बोलो कहाँ पर स्खलित करूँ। तुम्हारी योनि के अंदर ही करूं या फिर बाहर?

उसकी बात सुन कर मैं बहुत ही रोमांचित हो उठी थी जिसके कारण मेरी उत्तेजना चरमरीमा की ओर अग्रसर होने लगी थी और मैं वह आनन्द और संतुष्टि से वंचित नहीं रहना चाहती थी।मैंने विजय का साथ देते हुए कहा- मैं भी स्खलित होने वाली हूँ इसलिए तुम रुको मत और इसी तीव्रता से संसर्ग करते हुए मेरे साथ ही मेरी योनि में ही अपना वीर्य-रस स्खलित कर दो।

इसके बाद हम दोनों एक दूसरे से चिपके हुए तेजी से हिलने लगे और देखते ही देखते दोनों के शरीर अकड़ गए, विजय का लिंग फूलने लगा और मेरी योनि सिकुड़ने लगी तथा हम दोनों के मुख से सिसकारियाँ और हुंकार निकलने लगी थी।

तभी मेरी योनि का जवालामुखी फूटा जिससे उसके अन्दर आग लग गई थी और उस आग को शांत करने के लिए विजय के लिंग में से पिचकारी भी छूट पड़ी थी।मेरी योनि के अंदर इस गतिविधि के कारण हम दोनों को जो आनन्द एवम् संतुष्टि मिली उसका विवरण लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता, वह तो सिर्फ महसूस ही किया जा सकता था।

अगले पन्द्रह मिनट तक हम दोनों पसीने में नहाये हुए और उखड़ी सांसों को नियंत्रण करने की कोशिश में एक दूसरे के ऊपर निढाल हो कर पड़े रहे।ऐसा लग रहा था कि हम दोनों किसी और ही दुनिया में पहुँच गए थे जहाँ सिर्फ आनन्द और संतुष्टि का ही वास रहता है।जब पंखे की हवा से पसीना तेज़ी से सूखने लगा और हमारी सांसें भी सामान्य हो गई तब विजय ने अपने लिंग को मेरी योनि में से निकाला और मेरे ऊपर से लुढ़क कर मेरी बगल में लेट गया।

उसके आधे घंटे के बाद हम दोनों ने उठ कर बाथरूम में जाकर अपने अपने गुप्तांगों के साफ़ किया और कपड़े पहन कर अपने अपने बिस्तर पर सो गए।सुबह हॉस्पिटल से रिपोर्ट लेने पर पता चला की अंकुश के सभी परीक्षण परिणाम सामान्य है और उसके स्वास्थ में कोई भी समस्या नहीं है और वह एक तंदरुस्त बालक की तरह अपना जीवन व्यतीत कर सकता है।

यह खुशखबरी सुन कर मन को बहुत राहत मिली और हम वापिस बोकारो की ओर चल पड़े।रास्ते में मैंने विजय को कहा- इस मुश्किल के समय में तुमने मेरा साथ प्रिया और इतने कष्ट उठाए, इसके लिए मैं तुम्हारी बहुत आभारी हूँ। मैं तुम्हारा धन्यवाद कसे करूँ और यह कर्ज कैसे चुका पाऊँगी?

तो विजय ने उत्तर प्रिया- अरे, धन्यवाद तो तुमने रात को ही दे प्रिया था लेकिन जहाँ तक कर्ज चुकाने की बात है वह तुम किश्तों में उतार देना।

विजय की बात सुन कर मैंने उससे थोड़ा भ्रमित होते हुए पूछा- किश्त!!! कर्ज़ की किश्त? किश्त को कैसे चुकाना होगा तथा इसमें कितना देना होगा और कब तक?मेरी सूरत और जिज्ञासा को देखते हुए विजय ने हँसते हुए कहा- अरे, घबराने की कोई बात नहीं। मैंने कुछ अधिक बड़ी मांग नहीं रखी है।मैंने व्याकुल होते हुए उससे पूछा- पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो। अब साफ़ और सीधी तरह से बता दो।

तब विजय ने साफ़ और सीधा कह प्रिया- मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे कल रात जैसा धन्यवाद हर सप्ताह कम से कम एक बार तो दे प्रिया करना।उसकी बात सुन कर मैं थोड़ा हैरान हो गई क्योंकि मैंने उससे ऐसे उत्तर की आशा नहीं करी थी लेकिन मन ही मन खुश भी हुई कि वह मुझे और भी अधिक आनन्द एवं संतुष्टि देना चाहता है।जब मैंने शरमाते हुए चुप हो गई और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तब विजय ने कहा- लगता है कि तुमने मेरे मज़ाक को गंभीरता से ले लिया है। मैं तो मज़ाक में यह सब कह प्रिया था और मुझे कुछ नहीं चाहिए।