रिश्तों में चुदाई

हसीन गुनाह की लज़्ज़त-5

लेखक: राज वीर मिड्ढा दिनांक: 14-09-2018 पठन समय: 13 मिनट

बाहर आते ही मैंने अपने बैडरूम का दरवाज़ा और बच्चों के कमरे का दरवाज़ा बाहर से लॉक किया और दिया को बताया कि मौसी नहीं उठेंगी क्योंकि मौसी आज नींद में नहीं नशे में है।फिर मैंने उसको नींद की गोलियों वाली बात बताई तो दिया आश्वस्त हुई।

मैंने दिया को बाहों में लेकर उसके तपते होठों पर होंठ रख दिए। अब दिया भी दुगने जोशो-खरोश से मेरा साथ देने लगी। मैं दिया का निचला होंठ चूस रहा था और दिया मेरा ऊपर वाला होंठ चूस रही थी।कभी मैं दिया की जुबान अपने मुंह में पा कर चूसता और कभी मेरी जीभ दिया के मुंह के अंदर प्रिय के दांत गिनती।

मेरे दोनों हाथ दिया के जिस्म की चोटियों और घाटियों का जायज़ा ले रहे थे, दिया का एक हाथ मेरे लिंग के साथ अठखेलियां कर रहा था और दूसरा हाथ मेरी गर्दन के साथ लिपटा था और दिया खुद मेरे साथ लिपटी हुई पूरी हवा में झूल रही थी।

ऐसे ही दिया को अपने साथ लिपटाये लिपटाये चलते हुये मैंने ड्राइंग रूम में बिछे दीवान के पास उस को खड़ा कर प्रिया और खुद दिया का नाईट सूट उतारने लगा।दिया ने रस्मी सा प्रतिरोध किया तो सही पर मैं माना ही नहीं… पलों में मैंने दिया के नाईट सूट के साथ साथ नीचे पहनी इनर भी उतार दी और अगले ही पल मैंने अपने कपड़ों को भी तिलांजलि दे दी और दिया की ओर मुड़ा।

वस्त्रविहीन खड़ी दिया कभी अपनी नग्नता छुपाने की, कभी दिखाने की कोशिश करती, कोई खजुराहो का दिलकश मुज्जस्मा लग रही थी। दिया के अनावृत दो उरोज़ और उन पर तन कर खड़े दो निप्पल जैसे पूरे संसार को चुनौती दे रहे थे कि ‘है कोई… जो हमें झुका सके?’

मेरा मन भावनाओं से भर आया, मैंने दिया को जोर से अपने आलिंगन में कस लिया और बदले में दिया ने दुगने जोर से मुझे अपने आलिंगन में कस लिया।दिया के दोनों उरोज़ मेरे सीने में धँसे हुए से थे। मैं दिया के दिल की धड़कनें साफ़ साफ़ अपने सीने में धड़कती महसूस कर रहा था। वक़्त का पहिया चलते-चलते अचानक थम सा गया था, उस वक़्त मैं… सिर्फ मैं था, ना कोई पति… ना पिता, सिर्फ मैं!

मेरी दोनों बाजुयें सख़्ती से दिया को लपेटे हुए दिया की पीठ पर जमी थीं। मैं अपना एक हाथ दिया की पीठ पर ऊपर नीचे फिरा रहा था कंधों से लेकर नितंबों के नीचे तक!कभी कभी मेरी उंगलियां नितंबों की दरार के साथ साथ नीचे… गहरे नीचे उतर जाती, बिल्कुल योनि-द्वार तक!

दिया की योनि से कामरस का अविरल प्रवाह जारी था जिससे मेरा हाथ सना जा रहा था लेकिन उस अलौकिक आनन्द को पाते रहने में मुझे दिया की योनि-द्वार तक अपने हाथों की गर्दिश कयामत के दिन तक मंज़ूर थी।

थोड़ी देर बाद मैंने बहुत प्यार से दिया को आलिंगन में लिए लिए, दीवान पर लेटा प्रिया और दिया के निप्पलों को अपने मुंह में लेकर कर खुद दिया के ऊपर झुक सा गया, उसके मुंह से सिसकारियां अपने चरम पर थी।

अचानक दिया ने अपना एक हाथ नीचे कर के मेरा लिंग अपने हाथ थाम लिया और जोर जोर से अपनी ओर खींचने लगी।

आज़माइश की घड़ी पास आती जा रही थी, बतौर प्रेमी, मेरे कौशल का इम्तिहान बहुत सख़्त था, मुझे ना सिर्फ बिना कोई हल्ला किये एक सफल अभिसार करना था, बल्कि अपनी कँवारी प्रेमिका को बिना कोई ठेस लगाए अपने प्यार का एहसास भी करवाना था।बगल वाले कमरे में मेरी पत्नी सो रही थी और किसी किस्म का हल्ला-गुल्ला उसकी नींद उचाट कर सकता था।

काम मुश्किल था… पर मुझे करना ही था… हर हाल में करना था और अभी करना था।

मैंने दिया को जरा सा सीधा किया और घुटनों के बल बैठ कर दिया की दोनों टांगों के बीच में आ गया, अपना लिंग मैंने अपने दाएं हाथ में लेकर दिया की योनि की दरार पर रख कर थोड़ा अंदर की ओर दबाते हुए ऊपर नीचे फिराना शुरू कर प्रिया। दिया के मुंह से आहें, कराहें क्रमशः तेज़ और ऊँची होती जा रही थी और उसके शरीर में रह रह कर उत्तेजना की लहरें उठ रही थी।

जैसे ही मेरे लिंग का शिश्नमुंड दिया की योनि की दरार के ऊपर भगनासा को दबाता, दिया के शरीर में मदन-तरंग उठती जिसका कम्पन मैं स्पष्टत: महसूस कर रहा था।दिया की योनि से कामरस अविरल बह रहा था, दिया रह-रह कर मुझे अपने ऊपर खींच रही थी जिससे यह बात साफ़ थी कि गर्म लोहे पर चोट करने का वक़्त आ गया था पर मैं कोई रिस्क नहीं ले सकता था।

अचानक मेरे लिंग का शिश्नमुंड दिया की योनि के मध्य भाग से जरा सा नीचे जैसे किसी नीची सी जगह में अटक गया और तभी दिया के शरीर में भी जोर से इक झुरझुरी सी उठी, जन्नत का मेहमान जन्नत की दहलीज़ पर ख़डा था, मैंने अपना लिंग दिया की योनि में वहीं टिका छोड़ प्रिया और ख़ुद दिया के ऊपर सीधा लेट गया।

मैंने दिया का निचला होंठ अपने होंठों में लिया और हौले हौले उस को चुभलाने लगा। दिया ने प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी दोनों टांगें हवा में उठाईं और मेरी क़मर पर कैंची सी मार कर अपने पैरों से मेरी क़मर नीचे की ओर दबाने लगी।अभी मेरा शिश्नमुंड भी पूरा दिया की योनि के अंदर नहीं गया था और लड़की मेरे लिंग को और अपनी योनि के अंदर लेने को उतावली हो रही थी।

मैंने अपने लिंग पर हल्का सा दबाव बढ़ाया, अब मेरे लिंग का शिश्नमुंड पूरा दिया की योनि के अंदर था।

‘आ… ई…ई…ई… ई…ई…ईईईई!!!’ दिया के मुंह से आनन्द स्वरूप निकल रही सीत्कारों में पीड़ा का जरा सा समावेश हो गया। मुझे इस का पहले से ही अंदाज़ा था, मैंने फ़ौरन अपने लिंग पर दबाब डालना बंद कर प्रिया और यहीं से शिश्नमुंड वापिस खींच कर हौले से दिया की योनि में वापिस यही तक दोबारा ले जा कर फिर वापिस खींच लिया।

ऐसा मैंने तीन चार बार किया, दिया पर इसकी तत्काल प्रतिक्रिया हुई, पांचवी बार जैसे ही मैंने अपना लिंग दिया की योनि से बाहर निकाला, दिया ने मेरी पीठ पर अपनी टांगों की कैंची तत्काल पूरी ताक़त से अपनी ओर खींची, परिणाम स्वरूप मैं भी दिया की ओर जोर से खिंचा और मेरा लिंग भी दिया की योनि में ढाई से तीन इंच और गहरा चला गया।

दिया की योनि एकदम कसी हुई और अंदर से जैसे धधक रही थी, मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरा लिंग जैसे किसी नर्म गर्म संडासी में फंसा हुआ हो। ऐसा लगता था कि योनि की उष्मा शनैः शनैः मेरे लिंग को पिंघला कर ही मानेगी तो विरोध स्वरूप मेरा लिंग भी बृहत्तर से बृहत्तर आकार लेने लगा।

योनि और लिंग के स्राव मिल कर खूब चिकनाहट पैदा कर रहे थे और योनि में लिंग का आवागमन थोड़ा सा सुगम होता जा रहा था लेकिन अभी मैं अपने लिंग को दिया की योनि के और ज्यादा अंदर प्रवेश करवाने से परहेज़ कर रहा था, आराम-आराम से अपने लिंग को दिया की योनि से बाहर खींच कर, फिर जहां था वहीं तक दोबारा ठेल रहा था।

अब दिया भी इस रिदम का लुत्फ़ अपने नितम्ब उठा-उठा कर ले रही थी, ऐसे करते करते दस मिनट हो चुके थे और दिया आँखें बंद कर के अभिसार का सम्पूर्ण आनन्द ले रही थी, लेकिन अभी कहानी आधी ही हुई थी, समय आ गया था कि इस अभिसार को सम्पूर्णता की ओर अग्रसर किया जाए।

प्रेमपूर्वक किये जा रहे अभिसार का सबसे मुश्किल क्षण आने को था, यह वो क्षण होता है जब एक पुरुष, पूर्ण-पुरुष की उपाधि पाता है और एक स्त्री, सुहागिन की पदवी पाती है। इसी क्षण से आगे चल कर स्त्री, एक जननी बनती है, एक माँ बनती है और एक नई सृष्टि रचती है।

इस पल में पुरुष अपनी प्रेयसी के साथ प्यार के साथ साथ थोड़ी सी क्रूरता से पेश आता है, वही क्रूरता दिखाने का पल आ पहुंचा था। मैंने दिया के बाएं उरोज़ के निप्पल को मुंह में लिया और उसे चुभलाने लगा, दिया के गर्म शरीर का उत्ताप फिर से बढ़ने लगा और उन्माद में दिया बिस्तर पर जल बिन मछली की तरह तड़पने लगी।

मैंने दिया का सर अपने दोनों हाथों से दाएं-बाएं से दबा कर, दिया के उरोज़ के निप्पल से मुंह उठाया और दिया के दोनों होठों को अपने होठों में दबा लिया और लगा चूसने!

अगले ही पल मैंने अपना लिंग दिया की योनि से बाहर निकाल कर पूरी शक्ति से वापिस दिया की योनि में उतार प्रिया। अगर मैंने दिया के दोनों होंठ अपने होंठों से बंद नहीं कर दिए होते तो यकीनन दिया की चीख सड़क के परले सिरे तक सुनाई दी होती।

तत्काल दिया के दोनों हाथों ने दीवान की चादर पकड़ कर गुच्छा-मुच्छा कर डाली और अपने पैरों से मुझे पर धकेलने की असफल कोशिश करने लगी। दिया की आँखों से आंसुओं की धारें फ़ूट पड़ी पर अब तो जो होना था सो हो चुका था।अब दिया कुंवारी नहीं रही थी।

मैं दिया के ऊपर औंधा पड़ा धीरे धीरे दिया के सर को सहला रहा था, उसके आंसू अपने होंठों से बीन रहा था।धीरे-धीरे दिया का रोना कम होता गया और मैंने हौले हौले अपनी क़मर को हरकत देना प्रारंभ किया, चार-छह धक्कों के बाद, अचानक दिया के शरीर में वही जानी पहचानी कम्पन की लहर उठी।

दो पल बाद ही दिया का शरीर इस रिदम का जवाब देने लगा। लिंग को दिया की योनि से बाहर खींचने की क्रिया के साथ साथ ही दिया अपने नितम्ब नीचे को खींच लेती और जैसे ही लिंग योनि में दोबारा प्रवेश पाने को होता तो दिया शक्ति के साथ अपने नितंब ऊपर को करती, परिणाम स्वरूप एक ठप्प की आवाज के साथ मेरा लिंग दिया की योनि के अंतिम छोर तक जाता।

दिया के मुख से ‘आह…आई… ओह… मर गई… हा… उफ़… उम्म्ह… अहह… हय… याह… हाय… सी… ई…ई’ की आधी-अधूरी सी मज़े वाली सिसकारियां अविरल निकल रही थी और मैं बेसाख्ता दिया को यहाँ-वहाँ चूम रहा था, चाट रहा था माथे पर, आँखों पर, गालों पर, नाक पर, गर्दन पर, गर्दन के नीचे, कंधो पर, उरोजों पर, निप्पलों पर, उरोजों के बीच की जगह पर!

हमारा अभिसार अपनी अधिकतम गति पर था, अचानक दिया का शरीर अकड़ने लगा, दिया ने अपने दांत मेरे बाएं कंधे पर गड़ा दिए, मेरी पीठ पर दिया के तीखे नाख़ून पच्चीकारी करने की कोशिश करने लगे।

ये लक्षण मेरे जाने पहचाने थे, मैं तत्काल अपनी कोहनियों के बल हुआ और दिया के दोनों हाथ अपने हाथों में जकड़ कर बिस्तर पर लगा दिए और अपनी कमर तीव्रतम गति से चलाने लगा, साथ साथ मैं कभी दिया के होठों पर चुम्बन जड़ रहा था, कभी उसके निप्पलों पर, कभी उसकी आँखों पर!

अचानक दिया का सारा शरीर कांपने लगा और दिया की योनि में जैसे विस्फोट हुआ और दिया की योनि से जैसे स्राव का झरना फूट पड़ा। दिया जिंदगी में पहली बार सम्भोगरत हो कर स्खलित हो रही थी और दिया की योनि की मांसपेशियों ने संकुचित होकर मेरे लिंग को जैसे निचोड़ना शुरू कर प्रिया।

प्रतिक्रिया स्वरूप मेरा लिंग और ज्यादा फूलना शुरू हो गया, इसका नतीजा यह निकला कि मेरे लिंग के लिए संकरी योनि में रास्ता और भी ज्यादा संकरा हो गया और मेरे लिंग पर दिया की योनि की अंदरूनी दीवारों की रगड़ पहले से भी ज्यादा लगने लगी।

करीब एक मिनिट बाद ही जैसे ही मैंने पूरी शक्ति से अपना लिंग दिया की योनि में अंदर तक डाला मेरे अंडकोषों में एक जबरदस्त तनाव पैदा हुआ और मेरे लिंग ने पूरी ताक़त से वीर्य की पिचकारी दिया की योनि के आखिरी सिरे पर मारी फिर एक और.. एक और… एक और… एक और… मेरे गर्म वीर्य की बौछार!अपनी योनि में महसूस कर के अब तक निढाल और करीब-करीब बेहोश पड़ी दिया जैसे चौंक कर उठी और उसने मुझसे अपने हाथ छुड़ा कर जोर से मुझे आलिंगन में ले लिया और मुझे यहाँ-वहाँ चूमने लगी।

एक भँवरे ने एक कली को फूल बना प्रिया था, एक लड़की, एक औरत बन चुकी थी, एक सफल अभिसार का समापन हो चुका था।

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