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पहली बार चुदाई पठन समय: 6 मिनट पढ़ा गया: 269 बार

कवि की अन्तर्वासना

छटके 69

08 Jun 2008 को प्रकाशित

कवि की अन्तर्वासना
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हूं मैं लगभग 32 वर्ष का, मध्य भारत में रहताकर्म मेरा बहुचर्चित सा है, धूप छांव सब सहता!

मत पूछो कि हम अब तक, क्या खोऐ क्या पाए थेकुछ लड़कियों का चुम्बन तो कुछ के स्तन दबाये थे!

मगर अब हमउम्र लड़कियां, बच्ची लगती थीबड़े दूध और उठी गांड वाली ही अच्छी लगती थी!

इस उम्र में तो अब हर वक्त चूत की खुमारी थीऊपर का सब कर चुका था पर चूत नहीं मारी थी!

मैं चूतिया से कैसे बना चुदक्कड़, बताऊं कहानीबात यह आज की नहीं … है 10-12 साल पुरानी!

यह कहानी है दुबली पतली पर, बड़े दूध वाली कीदेखने में सीधी सादी सी पर अंदर से मतवाली की!

जिसे देखकर मेरे अंदर पहली बार हवस भड़की थीवह हमारे कर्मचारी की मेरी हमउम्र ही लड़की थी!

देखकर मुझको बदले चाल और चूतड़ खूब मटकातीयह मांगे या मैं खुद दे दूं … सोच सोच के सकुचाती!

स्वाभिमान के चलते चाहे यह पहले शुरुआत करेमैं तो हां भर ही दूंगी, पहले आकर बात तो करे!

मैंने भी फिर मौका पाकर, बात एक दिन छेड़ीवह पहले रूठी फिर मुस्काई करके नजरें टेढ़ी!

उसकी इस हरकत पर मैं फूला नहीं समायापकड़ के पीछे से मैंने उसको तनिक दबाया!

पतली कमर में हाथ डाल कर जैसे उसे घुमायाएक झटके में एक दूजे को बाहों में हमने पाया!

मौन स्वीकृति मिली जो उसकी, मेरी हिम्मत बढ़ गईनजर उसकी आंखों से हट, अब लाल होठों पर पड़ गई!

एक हाथ चूतड़ पर, दूसरा उसकी पीठ पर घूमेकभी गाल तो कभी होंठ मैंने कस कर चूमे!

आलिंगन से शरीर में एक झुरझुरी सी लगी होने,मैं उसकी मदहोशी में, और मुझमें लगी वो खोने!

कुछ देर में ही दोनों अगले चरण पर बढ़ने लगेदोनों हाथ पीछे से हट अब छाती पर चलने लगे!

धीरे-धीरे करके उसकी कुर्ती सीने तक खिसकाईफिर बारी-बारी उन खरबूजों की की खूब चुसाई!

आनाकानी की थोड़ी सी, फिर जमीं पर उसे लिटायामैंने भी देर न की और झट से उसके ऊपर आया!

पता नहीं था मुझको, वह कमाल कर देगीपहली बार में ही वो चुदने को हाँ भर देगी!

मुझसे पहले भी उसका लफड़ा था किसी और सेमेरा पहला अनुभव था, वो गुजर चुकी थी इस दौर से!

वह बोली करना है जल्दी कर लो, मुझे घर जाना हैया फिर मुझको जाने भी दो, कल भी तो आना है!

चूंकि मेरा प्रथम प्रयास था, लगा मैं थोड़ा डरनेसोचा ना था काम ये इतनी जल्दी मिलेगा करने!

चूड़ीदार सलवार थी उसकी, एक ही पैर निकालाजल्दी से चड्डी नीचे खिसका लंड जरा सम्भाला!

लंड को मेरे बिल्कुल न छूती, कुर्ती से मुँह ढकतीनौसिखिया कैसे करता है, चोर नजर से वह तकती!

पहली चुदाई की हड़बड़ी में आधा खड़ा ही लंड घुसायाउसकी बुर खेली खाई थी, लंड झट से उसमें समाया!

लंड ने झट से पानी उगला, बस अठ दस झटके मारेमैं खुद पर शर्मिंदा था, मेरा मन खुद को ही धिक्कारे!

मैं खिलाड़ी हारी टीम का, बिल्कुल ऐसा दिखताकवि होकर भी मनोस्थिति, शब्दों में कैसे लिखता!

वह कपड़ों को सम्भालती नीचे से सामने आईमेरी व्यथा समझ गई और नकली सा मुस्काई!

मैं अब ये लगा सोचने, उसको कैसे बेहतर चोदूँगाऐसे में तो आत्मविश्वास, मैं अपना खो दूँगा!

दोबारा मिलन करने की योजना फिर बनाईवो इठलाकर अगले दिन आती पड़ी दिखाई!

पहले उसको चूमा चाटा, उसके गालों को काटा,उसकी कुछ बनावटी शर्म पर मैंने उसको डांटा!

अब वह थोड़ी शर्म छोड़ मेरा साथ थी देतीधीरे-धीरे चुम्बन करती, लंड हाथ में लेती!

उसकी प्रतिक्रिया से मुझमें जोश बढ़ा अबपहले से कुछ बेहतर, मेरा लंड खड़ा अब!

जल्दी से चड्डी उतारकर, चूत को तनिक निहारामखमली चूत को देखकर, चढ़ गया मेरा पारा

मैंने फिर हाथ बढ़ाकर चूत को खूब टटोलादोनों उंगलियां फंसाकर चूतद्वार को खोला!

उसकी खाईनुमा चूत में लंड गोताखोर घुसतापर इस बार की चुदाई में मैं पहले से खुश था!

30-40 झटके थे मारे, बांध सब्र का टूटापता नहीं इस बार भी कैसे जल्दी मैं छूटा!

फिर अगले दिन चोदने को मन लगा घबरानेचूत मार के मुझको होता क्या मेरा मन ना जाने!

कुछ रूठी कुछ चिड़चिड़ी सी वो लगी थी जानेशायद अब वह चाहती थी मुझको कुछ समझाने!

इस बार गोली खाकर चुदाई करने का सोचापर उस दिन वो ना आई, हो गया पूरा लोचा!

अबकी बार वो मिली तो मैंने पूरी व्यथा बताई,उसने मेरे मन की पीड़ा समझी, मुझे समझाई!

चुदाई को बस सहज समझना, उतावले कभी ना होनाधीरे-धीरे सब सही करूंगी, तुम धैर्य तनिक ना खोना!

जैसे जैसे मैं बोलूंगी, वैसा वैसा ही करनाडर को अपने पीछे छोड़ो, अब कभी न डरना!

खुद को आज गुरु समझती, जाने कैसे है ऐंठीमुझको लिटा धरती पर आकर मेरे लंड पर बैठी!

मेरा जोश बड़ा जैसे ही, उसने मुझको डांटामैं थोड़ा शिथिल हुआ तो उसने होंठ को काटा!

कभी बेरुखी तो कभी उत्तेजना, मैं उस पर झन्नायावो बोली बुर में लंड को तुमने कितनी बार घुसाया!

वो चाहे ध्यान को मेरे, बार-बार भटकानाचरमसुख की दौड़ को बार-बार लटकाना!

मनोबल मेरा बढ़ चुका था, उसके इस प्रयोग सेपर मैं अब तड़प उठा था चरमसुख के वियोग से!

अब उसको नीचे गिराकर, जमकर करी चुदाईऐसा मेरा रूप देखकर, वो खुलकर मुस्काई!

मेरी जब जब बढ़ी गति, तब तब उसने रोकाऐसे करके उसको मैंने 20 मिनट तक ठोका!

इसके बाद वो कई बार चुदी और लब से लब मिलेउसकी ढीली चूत से मुझे कई कड़क अनुभव मिले!

उसकी नित्य चुदाई से मैं, दिनोदिन परिपक्व होने लगाचूत उसकी बनी भोसड़ा और लंड फक फक होने लगा!

ना तो वह मनोवैज्ञानिक थी, ना ज्यादा पढ़ी लिखी थीपर उसमें उत्कृष्ट गुरु की, मुझको दिखी छवि थी!

चूतिया से मैं बना चुदक्कड़, उसका ही आभार हैमेरे वीर्य की एक एक बूँद पर उसका ही अधिकार है!

ऐसी ही एक अन्य कविता:जब साजन ने खोली मोरी अंगिया

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