अब तक आपने पढ़ा..मैंने किरण को कस कर अपनी बाहों में समेट लिया और आँखें मूँद कर उन पलों का आनन्द लेने लगा।उसके फूल से कोमल स्तन मेरे सीने से दबे हुए थे और मैं धीरे-धीरे उसकी गर्दन को चूम-चाट रहा था। उसके दिल की धक.. धक.. मुझे अपने सीने पर साफ़ सुनाई पड़ रही थी।जब मेरा हाथ उसकी जाँघों पर से फिसलते हुए योनि प्रदेश की ओर बढ़ चला तो उसने अपनी जांघें कस कर भींच लीं और मेरा हाथ वहीं फंस कर रह गया।अब आगे..
‘पैर खोलो न किरण..’‘नहीं बड़े पापा.. वहाँ कुछ नहीं करना..’‘अरे पगली.. अभी वहीं पर तो सब कुछ होना है..’‘नहीं.. मुझे बहुत डर लग रहा है..’‘अभी तू देखना.. वहीं पर तुझे बहुत अच्छा लगने लगेगा..’
और मैंने अपना घुटना उसकी जाँघों के बीच फंसा कर उसके पैर खोल दिए और उसकी चूत अपनी मुट्ठी में कैद कर ली, वो कसमसा कर रह गई और मेरा पैर अपनी जाँघों के बीच से निकालने की कोशिश करने लगी..लेकिन उसकी एक न चली और मैंने उसकी चूत को उंगलियों से आहिस्ता-आहिस्ता कुरेदना शुरू कर प्रिया।
इसका असर यह हुआ कि उसका प्रतिरोध लगभग समाप्त हो गया और उसने अपने पैरों को थोड़ा सा खोल प्रिया, अब मेरे लिए उसकी जाँघों और चूत से खेलना आसान हो गया था.. जाँघों का वो मखमली स्पर्श मुझे बेचैन करने लगा।मेरे लण्ड में जबरदस्त तनाव आ चुका था.. लेकिन मैं बड़े धैर्य से काम ले रहा था।
फिर मैंने धीरे से उसकी सलवार का नाड़ा खोल प्रिया और उसकी नंगी चिकनी जाँघों को सहलाने लगा। वो एकदम से घबरा के उठकर बैठ गई और अपने हाथ से सलवार पकड़ ली..लेकिन मेरे आगे बेचारी क्या करती।
जल्दी ही मैंने सलवार उसके बदन से उतार डाली.. उसकी हल्के गुलाबी रंग की कच्छी के ऊपर से उसकी चूत का उभरा हुआ त्रिभुज कुछ पल के लिए मुझे दिखा.. फिर उसने फ़ौरन अपने बदन को समेट उसे छुपा लिया।
अब मैं उसकी कुर्ती के भीतर हाथ डाल के उसके नंगे उरोजों से खेलने लगा.. उन्हें हौले-हौले दबाने लगा।अब वो कोई ख़ास विरोध नहीं कर रही थी.. हाँ.. बीच-बीच में एकाध बार अपने बदन को छुड़ा लेती.. जिससे उसके दूध पकड़ना आसन नहीं रह जाता..
मुझे अब बेचैनी होने लगी थी और मैं जल्दी से जल्दी अपनी मंजिल पा लेना चाहता था। मेरे लिंग में बहुत देर से तनाव था और अब पेट के निचले हिस्से में हल्का-हल्का दर्द सा होने लगा था।
मैंने किरण की बाहें अपने गले में डाल लीं और उसकी कुर्ती फुर्ती से पकड़ कर ऊपर ले जाते हुए उसके सिर पर से निकाल दी। उसने कुर्ती को अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लिया.. लेकिन उसकी ये कोशिश भी नाकाम रही।
मैंने उसे छीन कर उसकी सलवार के साथ रख दी.. उसने अपने कमसिन मम्मों को हाथों से छिपाने की कोशिश की.. लेकिन मैंने उसे ऐसा नहीं करने प्रिया और उसका दायां वाला चीकू अपने मुँह में भर लिया और बायें वाले से खेलने लगा। रुई के फाहे जैसे उसके कोमल स्तन मेरे मुँह में जैसे घुले जा रहे थे। पुरुष के होठों का प्रथम स्पर्श जैसे उन्हें जगा रहा था।
धीरे-धीरे उनमें कसाव आने लगा.. उनकी घुन्डियाँ जो किशमिश की तरह थीं.. मेरे चूसने और मसलने से अंगूर बन चुकी थीं। अब वो खुद मुझे अपने से चिपटा लेती.. कभी अपने पैरों को आपस में रगड़ने लगती या सिहर उठती। काम वासना की तरंगें उसके स्तनों से निकल कर उसके पूरे बदन में फैल रही थीं।
अब उसके बदन पर सिर्फ एक छोटी सी पैन्टी ही बची थी.. बाकी जिस्म नंगा हो चुका था।
मैंने धीरे से उसे अलग किया और खड़े होकर अपनी पैंट और चड्डी फुर्ती से उतार कर अलग कर दी। अब मैं पूरा नंगा उसके सामने खड़ा था।
मेरा लण्ड आजाद होकर झूम रहा था.. जैसे ही उसकी नज़र मेरे नंगे जिस्म.. मेरे खड़े लण्ड पर पड़ी.. उसने घबरा कर जल्दी से आँखें मीच लीं और अपना चेहरा हथेलियों में छुपा लिया।‘क्या हुआ किरण.. आँखें खोलो न.. देखो इसे..’‘नहीं देखना.. मुझे डर लग रहा है..’
‘अरे देख तो सही.. डर और शर्म निकाल दे दिल से.. तभी पूरा मज़ा आएगा..’ मेरे बार-बार कहने पर उसने अपनी उंगलियों के बीच से मेरे लण्ड की तरफ देखा और फिर से आँखे बंद कर लीं।‘क्या हुआ किरण.. आँखें खोलो ना..!’ मैं उसका गाल चूमते हुए बोला।‘नहीं देखना मुझे.. आपका वो कैसा डरावना सा है.. काला कलूटा.. देखने से ही दुष्ट खूंख्वार लगता है.. आप तो पहले कपड़े पहन लो..’
वो बड़ी मासूमियत से बोली.. उसकी बात पर मुझे हँसी आ गई।‘पगली कहीं की.. अब कपड़े तो बाद में पहनूंगा.. पहले तेरी इस मुन्नी को असली लण्ड का स्वाद तो चखा दूँ.. फिर देखना मेरा ये काला-कलूटा दुष्ट तुझे कितना प्यारा लगने लगेगा..’
मैं उसकी कच्छी के ऊपर से ही उसकी चूत का उभार टटोलने लगा.. लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे हटाने की कोशिश करने लगी। लेकिन मैंने उसकी कच्छी नीचे घुटनों तक सरका दी और उसकी नंगी चूत को मुट्ठी में भर के मसलने लगा।उसकी चूत की दरार को उंगलियों से खोल कर चूत के भीतर तक उंगली डाल कर रगड़ने लगा, मुझे अपनी उंगलियों में कुछ नमी सी महसूस हुई।
किरण अब बेचैन होने लगी थी.. उसका विरोध तो कब का खत्म हो गया था और अब उसकी उंगलियाँ मेरी पीठ पर फिरने लगी थीं।‘किरण..’‘हाँ बड़े पापा..’ उसकी आवाज़ कांप रही थी।‘मेरा लण्ड पकड़ लो..’‘धत्त.. बड़े बेशरम हो आप.. मुझे कुछ नहीं करना..’ वो बोली।
लेकिन मैंने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में अपना लण्ड पकड़ा प्रिया.. और उसके हाथ पर हाथ रख उसे ऊपर-नीचे करने लगा।‘इसे छोड़ना मत.. बस ऐसे ही करती रहो धीरे-धीरे..’ मैं उसके मम्मों को मसलते हुए बोला।
किरण का हाथ लगते ही लण्ड तो जैसे निहाल हो गया.. फूल कर कुप्पा हो गया.. लण्ड में ऐसी कठोरता मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। उसकी कोमल उंगलियाँ मेरे लण्ड से लिपटी हुईं उसे ऊपर-नीचे कर रही थीं.. जिससे मेरा सुपाड़ा बार-बार खुलता और फिर छुप जाता।मैं तो जैसे आसमान में उड़ रहा था। पिछली रात अगर मैंने दो बार मुठ न मारी होती तो अभी तक मैं उसकी मुट्ठी में ही झड़ चुका होता।
‘आह्ह.. किरण..’ मैं उसके निप्पलों को चुटकियों में मसलते हुए बोला।‘हाँ बड़े पापा..’‘थोड़ी देर लण्ड चूसो ना मेरा..’‘हट.. मैं ये नहीं करूँगी..’
‘अच्छा.. सिर्फ एक बार.. तू तो प्यारी प्यारी गुड़िया है न मेरी.. मेरी हर बात मानती है ना..’ मैंने उसे प्यार से फुसलाया उसकी आँखों में असमंजस का भाव दिखाई प्रिया। मैंने आँखों ही आँखों में उसे फिर कहा।‘नहीं.. बड़े पापा मैं वो मुँह में नहीं लूँगी.. ये मत करवाओ मुझसे..’
मैंने भी जिद करना ठीक नहीं समझा.. सोचा कि चलो फिर किसी बार चुसवा लूँगा। मैंने उसे मचान के नर्म बिस्तर पर लिटा प्रिया और उसकी चड्डी भी उतारने लगा।उसने हल्का सा विरोध किया और अपनी लाज के आखिरी आवरण को बचाने की असफल कोशिश की। अगले ही पल वो मेरे सामने मादरजात नंगी पड़ी थी। हाँ.. उसने एक हाथ अपनी चूत और दूसरा अपने स्तनों पर रख लिया लेकिन मैंने हटा दिए।
मित्रो.. उसका वो रूप आज भी याद है मुझे.. छरहरी छुईमुई सी काया.. गुलाबी रंगत लिए उसका जिस्म.. वो काले-काले कमर तक आते लम्बे बाल.. केले के तने जैसी चिकनी मांसल जांघें.. संतरे की फांक जैसा निचला होंठ.. छोटे-छोटे मम्मे.. जो अभी ठीक से उभरे भी नहीं थे। उसकी फूली हुई चूत पर हल्की-हल्की काली रेशमी झांटें.. जिनसे चूत के लबों की गुलाबी आभा साफ़ झलक रही थी।
पोर्न फिल्मों की भाषा में जिसे ‘यंग’, पीटाईट’ या ‘टाइनी’ कहते हैं.. बिल्कुल वैसा बदन.. अगर आपने पोर्न स्टार ‘डकोटा स्काई.. (Dakota Skye)’ की कच्ची उम्र वाली ब्लू-फिल्म्स देखी हों.. तो किरण बिल्कुल वैसी ही मासूम और भोली सी लग रही थी कि जैसे लण्ड क्या होता है.. उसे अभी तक पता ही न हो.. इसका नाम भी कभी न सुना हो..
ऐसी भोली मदमस्त अभी खिली कली जब सामने नंगी लेटी हो.. तो कौन अपने पर काबू रख सकता है। मैंने उसके पांव की उंगलियों को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा। फिर उसके तलवे चाटने लगा.. उसे गुदगुदी सी होती तो जोर से हँसने लगती और पैर सिकोड़ने की कोशिश करती।
उसकी पिंडलियों.. घुटनों को चाटते-चाटते मेरी जीभ की यात्रा ऊपर की बढ़ चली और उसकी मरमरी गुदाज़ गुलाबी जाँघों पर पहुँच कर ठहर गई।मुझे उसकी जाँघें चाटने में अजीब सी मस्ती आ रही थी.. मेरी नाक बार-बार उसकी चूत को छू जाती और उसके मुँह से मीठी कराह सी निकल जाती।बीच-बीच में मैं दांतों से उसकी जाँघें हल्के से काट लेता और उसके मुँह से चुदास भरी ‘आई..’ निकल जाती..
फिर मैंने उसके दोनों मम्मों पर अपनी हथेलियां जमा दीं और उसकी झांटें चाटने लगा.. जीभ से ही उसकी चूत की दरार खोलकर भीतर तक ‘लपलप..’ करके चाटने लगा। ऐसे करते ही उसने पैर ऊपर की तरफ मोड़ लिए.. जिससे चूत और उभर गई। मेरी जीभ अब उसकी कुंवारी चूत में क़यामत ढा रही थीं।मैं चूत का चप्पा-चप्पा चूम-चाट रहा था और उसके मुँह से कामुक किलकारियाँ निकलने लगी थीं।
जल्दी ही उसने मेरे सिर के बाल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिए और अपनी कमर को उचकाते हुए मेरा सिर अपनी चूत पर दबाने लगी।
दोस्तो, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको मेरी इस सत्य घटना से बेहद आनन्द मिला होगा.. एक कच्ची कली को रौंदने की घटना वास्तव में कामप्रेमियों के लिए एक चरम लक्ष्य होता है.. खैर.. दर्शन से अधिक मर्दन में सुख होता है.. इन्हीं शब्दों के साथ आज मैं आपसे विदा लेता हूँ.. अगली बार फिर जल्द ही मुलाक़ात होगी। आपके ईमेल मुझे आत्मसंबल देंगे.. सो लिखना न भूलियेगा।support@mohakkisse.com