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गे सेक्स स्टोरी पठन समय: 13 मिनट पढ़ा गया: 431 बार

मुंबईकर का मूसल

चन्दा रानी

10 Sep 2020 को प्रकाशित

मुंबईकर का मूसल
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पुराने पाठक और प्रशंसक मुझे जानते हैं। नए पाठकों को बता दूँ मैं एक गांडु हूँ। बहुत बड़ा वाला गांडु। दो सौ लोगों से पाँच सौ से अधिक बार अपनी मखमली गांड मरवा चुका हूँ। नाम है चंद्रप्रकाश मगर चन्दा कहलाना अच्छा लगता है। जब कोई चंदा कहता है तो बहुत अच्छा महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे वो मेरे साजन और मैं अपने साजन की सहेली। मन करता है पैन्ट खोलूँ और उनके लंड के सामने अपनी गुफा अड़ा दूँ और बोलूँ ‘साजना जी, खुला छोड़ दो अपने शेर को। भेज दो मेरी गुफा के कोने कोने में।अगर आप भी मेरी गांड मारना चाहते हैं तो मुझे चन्दा बोलें, मुझसे वैसे ही बात करें जैसे एक मर्द एक औरत से बात करता है।

यह मेरी पाँचवी कहानी है। इसके पहले चार कहानियाँ आप तक पहुँच चुकी हैं। इनके नाम बता दूँ आपको।ऐसे बना चंद्रप्रकाश से चंदा रानीबन गयी सत्यम की दुल्हनवह खतरनाक शामऔरवह अविस्मरणीय पूजनीय लंड

पहले आप इन कहानियों को पढ़ लीजिये ताकि आप मेरे बारे में ज्यादा से ज्यादा जान सके। आप भी मेरे आशिक बनकर मेरे मजे ले सकें।

अब मैं अपनी इस कहानी पर आती हूँ. आपको मालूम है ना कि मैं जन्म से लड़का था मगर सत्यम ने फिल्म दिखाने के दौरान मुझे पटा लिया और मेरी गांड मारकर मुझे स्त्री बना दिया. तब से मैं स्त्रीलिंग में ही बात करना पसंद करता हूँ. तो आगे पूरी कहानी उसी रूप में लिखूंगा.

बात इंदौर की ही है। बारिश का मौसम था, अगस्त माह, कभी बारिश होती … कभी थम जाती। मैं ऑफिस के काम से इंदौर गई थी। सरकारी नौकरी है। बड़ी अधिकारी हूँ। शाम पाँच बजे तक काम सम्पन्न हो गया।

जैसे ही दुनियादारी से फ्री हुई तो मेरी दारी गांड ने सताना शुरू कर दिया। एकदम से नागमणि की याद आ गई। सात इंच के काले कलूटे लंड का मालिक जो मुझे सुख दे चुका था। उसका लंड अब तक मुझे मिले सभी लंडों में सबसे शानदार था। इसको आधार बनाकर मैंने एक कहानी लिखी थी ‘वह अविस्मरणीय, पूजनीय लंड’यदि आप नागमणि और उसके भयंकर लंड से मिलना चाहते हो तो पहले वह कहानी पढ़ लो।

सोचा, उसी के पास चली जाऊँ। वो तो मुझे देखते ही मस्त हो जायेगा।

दिन भर की थकान से चेहरा कुम्हला गया था। अधिकारी से गांडु बनना है, जरा चेहरा चमकना चाहिए।मैंने सामने देखा कि ज्यूस की दुकान थी। चलो वहीं मुंह धो लूँगी और मौसम्बी का ज्यूस ले लूँगी, थोड़ी तरावट आ जायेगी।ज्यूस बहुत ही अच्छा था, मजा आ गया।

मगर अगला ही पल मेरे लिए बहुत भारी सिद्ध होने वाला था। काउंटर पर एक दादाजी बैठे थे, नाटा कद, सफेद बाल और सफेद मूंछें, मध्यम बॉडी। धोती और कमीज पहने हुये थे, आँखों पर चश्मा। ग्राहकों से पैसे ले रहे थे।चेहरे पर क्रूरता के भाव … हाथ में जैसे ही पैसे जाते तो चेहरे पर रंगत आ जाती। जैसे वो केवल पैसे के लिए ही बने हों।

मेरे तन में जो मस्ती छाई हुई थी उसको ज्यूस और मौसम ने बहुत बढ़ा दिया। मेरी चाल में लचक आ गई, एक तरह से लहराते हुये मैं काउंटर पर पहुंची। सर्विस बॉय ने आवाज लगाकर कहा- डेढ़ सौ रुपए।यह मेरा बिल बना था।

मैंने पैन्ट के पिछले जेब में अपने ही कूल्हे को दबाते हुये हाथ डाला। ओह … मेरा पर्स गायब था। कोई आठ दस हजार रुपए और एटीएम भी उसी में था। मैं स्तब्ध हो गई।दादाजी- जल्दी करो! पैसे निकालो।मैं- सॉरी! मेरा जेब कट गया है। किसी ने मेरा पर्स मार लिया.

चटाक!! मेरा जवाब पूरा होते ही दादाजी ने जोरदार थप्पड़ मुझे जड़ दिया।इतनी बड़ी अधिकारी हूँ मैं … केवल डेढ़ सौ रुपए के लिए ऐसा दुर्व्यवहार? बिना कुछ बात किए सीधे हमला।मुझे रोना आ गया। वैसे भी मैं एक औरत हो चुकी थी और मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। हल्की काजल लगी मेरी आँखों से आँसू टपकने लगे।

दादाजी- स्साले … तेरे जैसे रोज बहुत आते हैं। जब तक पैसे नहीं देगा तुझे जाने नहीं दूंगा।मेरे आशिक मुझे कितने प्यार से रखते हैं। मेरे नखरे उठाते हैं और ये दादाजी जरा से पैसे के लिए कैसा कर रहे हैं।

“क्यों मारा आपने इनको?” तभी एक आवाज आई।मैंने आवाज की तरफ चेहरा किया तो एक जेंटलमेन खड़े थे। सारी बात जानकार उन्होंने खुद के और मेरे पैसे चुकाए और मेरा हाथ थामकर मुझे ज्यूस सेंटर के बाहर ले आये। मैं आभारी थी, सम्मोहित सी उनके साथ चलने लगी। मेरे एक हाथ में ऑफिस का बेग था।

उन्होंने अपना एक हाथ मेरे कमर में डाल दिया और सड़क क्रास करके होटल में ले गए, बोले- मैं मुंबई से आया हूँ। मेरा नाम जगत सिंह आरी है। व्यापारी हूँ। इसी होटल में ठहरा हूँ। तुम थोड़ी देर में नॉर्मल हो जाओ तो चले जाना।मुझे वाकई सहारे की जरूरत थी।

बड़ा होटल था, शानदार रूम था। मुझे कंधे से पकड़कर उन्होंने बेड पर बैठाया।

अब मैंने उनकी तरफ ध्यान से देखा, काफी मोटे थे, तोंद बाहर निकली हुई थी, क्लीन शेव। उम्र ज्यादा थी मगर बाल काले किए हुये थे। स्मार्ट लग रहे थे। आदत के अनुसार मेरे निगाहें उनके पैन्ट की चेन पर गई। हल्का सा उभार दिखा। मैं आँखों से ही उनका लंड पैन्ट के अंदर ढूँढने लगी।“क्या नाम है तुम्हारा?”“चन्दा।”“चन्दा? मगर ये तो लड़की का नाम है।”“मैं लड़की ही हूँ।”“हा हा हा …” वो ज़ोर से हंस पड़े।

मैंने सोच लिया था कि आज इनकी ही सेवा करूंगी। इन्होने मेरे हेल्प की है, मैं इन्हें अपनी गुफा दूँगी।वो बोले- चलो तुमने कनफर्म कर दिया। मैं जब भी इंदौर आता हूँ तो किसी गांडू की जुगाड़ जरूर करता हूँ। जब तुम ज्यूस सेंटर में आए तो मुझे तुम्हारे हाव भाव से तुम्हारे बॉटम गे होने का शक हो गया था। आज की रात मैं यहीं हूँ, सुबह मेरे फ्लाइट है। बोलो क्या करना है?

मैं अपने स्थान से उठकर उनके सीने से लग गई।वो- लोगे ना मेरा लंड?मैं- मुझे औरत मानकर बात करो ना!वो- ओके चन्दा डार्लिंग!! लोगी न रात भर।मैं- हाँ।

वो वाकई गजब के गांड मारू थे। उन्होंने अपने कपड़े खोले तो देखकर मजा आ गया। उनकी पूरी बॉडी पर अनिल कपूर की तरह बड़े बड़े बाल थे। आधे काले आधे सफ़ेद। तोंद बिलकुल ऐसी लग रही थी जैसे नौ माह की गर्भवती औरत की होती है। लंड लटका हुआ था। न गोरा न काला। पर लटकी हुई अवस्था में पाँच इंच का था।

मेरे मुंह में पानी आ गया … आज आएगा मजा। मेरे शरीर पर अब बनियान और पैन्टी थी। मैंने बनियान उतारा और ऑफिस बेग में से पैन्टी के कलर की ब्लू ब्रा निकाली और पहन ली। गद्देदार ब्रा थी। पूरा शरीर चिकना था। एकदम गोरा।वो- चन्दा!! तुम तो वाकई लड़की हो। और ये तुम्हारा सामने का भाग तो एकदम सपाट है।मैं- हाँ, एक दुर्घटना में मेरा लंड कट गया था।मैंने उन्हें संक्षेप में जानकारी दी। वो खुश हो गये।

मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैं घुटनों के बल बैठ गई। उनकी जांघों को चूमने लगी। उनकी गांड के थोड़ा नीचे अपने नाखून भी चुभाते जा रही थी। वो मस्त होने लगे। इसका सबूत यह था कि उनका शेर यानि कि लंड अंगड़ाई लेने लगा था।

उन्होंने मेरे बाल पकड़े और धीरे से खींचते हुये मेरा मुंह अपनी जांघों से हटाकर लंड पर रख लिया। मैंने धीरे धीरे अपनी जुबान से उनके लंड के टोपे को चाटना शुरू किया। मेरे लाल सुर्ख जुबान उनके पूरा लंड पर मर्सडीज़ कार की तरह दौड़ने लगी। मैंने इतनी मस्ती से अभी तक किसी का लंड नहीं चाटा था।

वो उछलने लगे जैसे रस्सी कूद रहे हों, बोले- आज तो जान ले लोगी तुम चन्दा रानी।मुझे और जोश आ गया। मैं लंड के साथ ही उनके गोटे भी चाटने लगा। उन्हें मुंह में भरकर हल्के हल्के काट भी लेती।

वो सातवें आसमान पर थे और मैं अपने अपमान का दुख भूल चुकी थी। दुनिया के सबसे खूबसूरत आनंद का उपभोग कर रही थी। मन ही मन उस जेबकतरे का आभार कर रही थी। वो पर्स नहीं निकालते तो मुझे मुंबईकर का लंड इंदौर में कहाँ से मिलता।सच ही कहा गया है- जो भी होता है वो अच्छे के लिए ही होता है।

अब तक उनका लंड पूरी तरह से तन चुका था। आठ इंच से कम नहीं था। मैं पहले भी इतने बड़े ले चुकी थी तो मुझे कोई डर नहीं था।

उन्होंने मुझे कंधे से पकड़कर उठाया और मेरे पीछे आकर मुझे बांहों में भर लिया। उनका लंड मेरी पैन्टी के ठीक उस हिस्से पर था जहां मेरे गांड का गुलाबी प्यारा छेद था। वो ब्रा पर से ही मेरे छाती मसलने लगे।वो- हमेशा पैन्टी पहनती हो?मैं- हाँ! और कोशिश करती हूँ कि ब्रा भी पहनूँ। ठंड में स्वेटर या कोट पहनती हूँ तो ब्रा छिप जाती है, मगर गर्मी में ब्रा की स्ट्रिप दिखती है। एक बार ब्रा ने मुझे बलवंत से फंसवा दिया था।(पढ़िये मेरी कहानी वह खतरनाक शाम)

वो पूरी मस्ती में थे। एक तो खड़े लंड का असर था और दूसरे मेरी बॉडी भी गर्लिश है तो वो भी प्रभाव छोड़ रही थी। मैंने सुना है और देखा भी है कि किसी सच्चे मर्द का लंड खड़ा हो जाये तो वो फिर रुक नहीं सकता।

उन्होंने मेरी पैन्टी उतारी और मेरे गांड को देखकर रुक न पाये। पाँच मिनट में पाँच सौ से ज्यादा चुम्मे दे दिये उन्होंने मेरे दोनों कूल्हों पर! बोले- तुम्हारी दुकान तो बहुत ही शानदार है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे ये गांड न हो बल्कि किसी हीरोइन का सुंदर सलोना मुखड़ा हो।इतना अच्छा कोम्प्लीमेंट पहले किसी ने नहीं दिया था।

मैं- अब सबर नहीं हो रहा है जी। अब तो फाड़ दो आप!वो- आओ! आज तुम भी देखोगी कि असली टॉप गे क्या होता है।मुझे लग रहा था कि कयामत आने वाली है।

उन्होंने एक बार फिर अपना लंड मेरे मुंह में देकर उसे कुछ देर आगे पीछे किया। लंड थूक से तरबतर होकर पूरी तरह से चिकना हो गया था। मुझे उल्टा लिटाकर उन्होंने मेरे गांड की दरार में उंगली घुमाई। छेद का जायजा लिया।

अचानक पूरी गांड में ठंडा ठंडा कूल कूल लगने लगा।मैं- ये क्या किया आपने?वो- तुम्हारी मुनिया को मैंने नवरत्न तेल से नहला दिया है। मैं जब भी किसी गांड को बजाता हूँ तो नवरत्न तेल की संगत ही लेता हूँ। तुम्हें मजा आएगा।

वाकई बहुत थ्रिल फील हो रहा था। मैंने अपने आपको उनके हवाले कर दिया जैसे कोई दुल्हन सुहागरात को अपने आपको पति के सुपुर्द कर देती है। ओह, मुझे कितने सारे पति मिले … एक से बढ़कर एक दीवाने।

कुछ देर वे उंगली से सुख देते रहे। फिर मेरे पेट को हाथ से पकड़कर ऊंचा किया और घोड़ी बना दिया। गंडमरों के नसीब में सबसे ज्यादा यही पोज है।

बहुत अनुभवी थे वो … बहुत प्यार से उन्होंने अपने लंड को चार पाँच बार दरार पर घिसा। नवरत्न तेल की ठंडक और विशाल लौड़े की गर्माहट का मजा ही कुछ और था। ऐसे मजे को वो ही महसूस कर सकता है जो इससे गुजरता है।

लंड छेद पर रखकर वो एक दो मिनट बहुत धीरे धीरे प्रेस करते रहे और जब मैं भुलावे में आ गई तो उन्होंने जोरदार झटका दिया। आधे से अधिक लंड मेरे कूल्हों को चीरता हुआ अंदर। अगले धक्के में पूरा फंस गया। मेरी चीख उम्म्ह… अहह… हय… याह… और आँसू दोनों निकल गये। बहुत दमदार लंड ही ये दोनों कमाल कर पाते हैं।

कुछ क्षणों के विराम में वो मेरी पीठ को चूमते रहे और मेरे बूब्स को सहलाते रहे।फिर शुरू हुई गांड की धुनाई … गजब का स्टेमना … बीस मिनिट तक निरंतर वे अंदर बाहर करते रहे, होटल के रूम में धप-धप की आवाज आती रही।

जब मंजिल निकट आई तो मेरे कहने पर लावा मेरी गांड में ही डाल दिया। मैं पलंग पर बिछ गई और वो मुझ पर बिछ गये।

फिर उन्होंने खाना खिलाया और सारी रात ये ही खेल चलता रहा। खूब चूसा, खूब चाटा और खूब मरवाई।

सुबह उन्होंने मुझे एक हजार रुपए दिये। मैं मजबूर थी। मेरे पास भोपाल जाने का किराया भी नहीं था। एक दूसरे से लिपटे और अपनी अपनी मंजिल की तरफ बढ़ गये।

मेरे गांडू जीवन की सुखद यात्रा में एक यादगार मिल का पत्थर हैं मुंबईकर जगत सिंह आरी। मैं मुंबईकर के मूसल और उनके नवरत्न तेल को कभी नहीं भूल पाऊँगी।

आपको मेरी यह गे कहानी कैसी लगी. आप मुझे मेल करके बताएं.आपकी चंदाsupport@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

बिपाशा

2 weeks ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

अमित शर्मा पुणे

4 weeks ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

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