कोई मिल गया

आह’ उनका बॉस- 2

लेखक: लीलाधर दिनांक: 12-07-2022 पठन समय: 12 मिनट

ऑफिस पोर्न कहानी में मैं अपने पति के नए ऑफिस में उनके बॉस के साथ थी. उनको मेरी देसी जवानी भा गयी थी शायद. उनके हाथ मेरे जिस्म पर फिसलने लगे थे.

कहानी का पहला भाग था:पति के नए ऑफिस में उनके बॉस के साथ

अब आगे ऑफिस पोर्न कहानी:

तभी श्रीधर ने मुझसे कुछ पूछा.लेकिन दण्डपाणि की हरकतों के कारण मैं कुछ समझ नहीं पायी.

तब भी मेरे मन में गुस्से की लहर उठी।जिस व्यक्ति को चिंतित होना चाहिए था कि दूसरा पुरुष उसकी पत्नी के साथ क्या कर रहा है, वह दूसरी चीजों की चिंता में लगा था।इस बात पर भी गुस्सा आ रहा कि मैं इतनी बुरी तरह क्यों बहे जा रही हूँ।

उसकी मोटी उंगलियाँ मेरे रस में फिसल रही थी।लेकिन क्या करूँ … जब शरीर खुद अपनी मर्जी चला रहा हो?गलत करने, छिपकर करने और धोखा देने का रोमांच ऐसी बेसम्हाल उत्तेजना पैदा करता है कि व्यभिचार (उफ, नहीं!) और भी आकर्षक, स्वीकार्य, बल्कि आगे बढ़कर स्वागत योग्य लगने लगता है।

“बहुत अच्छा” हाँफती साँसों के बीच मैं बोली।कौन सी चीज, मुझे खुद नहीं मालूम।

इस वक्त कोई संयम बरतने का उपदेश दे तो सबसे ज्यादा गलत बात होगी।

मेरी उंगलियाँ डेस्क की सतह को परख रही थीं।

मैंने खुद को उसकी गोद में खींचा जाता हुआ पाया।मैंने पूरी क्षमता से रोकने की कोशिश की।

लग रहा था कि जब तक खड़ी हूँ – चाहे उसकी उंगलियाँ जहाँ भी हों – स्थिति मेरे नियंत्रण में रहेगी।तब तक मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख सकूंगी, और पैंटी में सुरक्षित अपने सतीत्व पर भी।आप चाहे जो समझें, अपने सतीत्व की चिंता मैं शुरू से कर रही थी।

लेकिन जब एक बार मैं उस विशाल और शक्तिशाली पुरुष की गोद में स्थित हो गई, अफसोस … तो लगा कि ये चीजें मूल्यहीन हो गईं।अब मेरी हैसियत एक सहकर्मी की सम्माननीय पत्नी की भी नहीं रह गई है।अब मैं उसके लिए बस खिलौने-सी हूँ, जैसे चाहे खेले।

शीऽऽऽ… मैं बहक गई।

उसकी गर्म गोद में मुझे नीचे कोई चीज गड़ रही थी।

“शायद यह महोगनी है।” मैंने कहा डेस्क के बारे में!मेरे पति ने इसी के बारे में पूछा था।

मेरा एक हाथ उसके किनारे पर टिका था।मेरी गर्दन पर उसकी साँसें पड़ रही थीं।

बालों की जड़ों से लेकर पीछे चोली का बड़ा गला जहाँ तक खुला था, वहाँ तक वह सूंघ और चूम और चाट रहा था।

मैंने उसकी उपेक्षा करने की कोशिश की.लेकिन यह आसान नहीं था।

उसकी भारी और चौड़ी जीभ मेरी त्वचा पर गोल वृत्त बना रही थी।उसके कठोर दाँत मेरे कान की लवों को हल्के हल्के चबा रहे थे।

उसके मोटे होंठ मेरे मांसल चिकने कंधे को चूस रहे थे।कंधों और गर्दन पर उसकी ठुड्ढी की दाढ़ी की चुभन, उसके गालों का खुरदरा स्पर्श गुदगुदी और सनसनी पैदा कर रहे थे।

श्रीधर ने कुछ और पूछा।मुझे वह मालूम नहीं था।मैंने ‘हम्म’ कर दिया।

मैं कोई उत्तर ढूंढ रही थी।उस समय दण्डपाणि मेरे साये की गाँठ ढूंढ़ रहा था।

‘दाएँ!’ मैंने कहा उस कोट टांगने वाले स्टैंड के बारे में।उसकी उंगलियाँ दाईं तरफ पहुँचीं, वहाँ साए में उसने अंग्रेजी की ‘V’ जैसी छोटी फाँक ढूंढ़ी और उसमें घुसकर गाँठ के सिरे निकाल लिए।

अब आगे क्या होने वाला है, जाहिर था, फिर भी मैंने साँस रोक ली!

डोर खिंची, गाँठ खुलने का मीठा-सा झटका महसूस हुआ और साया मेरी कमर में ढीला होकर पड़ गया।श्रीधर ने एक बार मुझे बिस्तर पर निर्वस्त्र करते कहा था, “एक नंगी स्त्री देह – चाहे जिस भी भूमिका में अपने को प्रकट करे, गरिमापूर्ण है।”

गरिमापूर्ण शब्द मुझे अधिक लगा था लेकिन आज पूछना था ‘क्या व्यभिचार में भी?’

मैं इंतजार कर रही थी वह साए को उतारेगा.लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, वह जीत के बाद किले में तुरंत दाखिल होने के बजाय दूसरे महत्वपूर्ण किलों को जीतने निकल जाता था।

उसने मेरे चेहरे को घुमाकर एक गहरा चुम्बन दिया और उसी दौरान मेरी पीठ पर चोली के बटन (दो ही तो थे) अभ्यस्त हाथों से खोल डाले।

‘कितने मातहतों की बीवियों की चोली खोली होगी इसने?’ उस वक्त मेरे दिमाग में प्रश्न कौंध रहा था।

मेरा एक हाथ मोबाइल में फँसा था इसलिए मैंने दूसरी से छातियाँ दबा लीं।लेकिन इस प्रभावशाली पुरुष का विरोध करना कोई दूर देश की बात लगी।

चोली उतारते समय मेरा मोबाइल पकड़ा हाथ अपने आप कान से अलग हो गया, और स्तनों को दबाए दायाँ हाथ उसकी बलिष्ठ हाथ की हल्की पकड़ से ही यूँ उठ गया जैसे कोई फूल हो।

मुझे लज्जित करने के लिए उसने चोली उतारकर उसकी दोनों बाँहों को चुटकी से पकड़कर मेरे चेहरे के सामने फैला दिया।

उसमें मेरे स्तनों की गोलाई और उनके खिंचाव से बनी सलवटें साफ दिख रही थीं।यहाँ तक कि सख्त नोकों के उभार का भी ताजा ताजा पता चल रहा था।

मैंने सिर घुमाकर उसके कंधे में ही अपना मुँह छुपा लिया।मुझे पता नहीं चला कि इस प्रक्रिया में एक गुलाबी कली मेरी उंगलियों के बीच से प्रकट हो गई है।

उसने झट उसे अपनी चुटकी में ग्रहण कर मंद कहकहा लगाया- वाह!

मैं बचने के लिए आगे झुक गई।श्रीधर सुन न लें इसके लिए भी।

“क्या कह रहा है वह?” श्रीधर पूछ रहे थे।

मेरे भोले पति! वह क्या कह नहीं, क्या ‘कर’ रहा है, ये पूछो।

“कुछ नहीं।” मैंने कहा।

कमरे में गहरी शांति थी, एसी की बेहद हल्की आवाज और हमारी सांसों के सिवा।उसने मुझे एक तरफ अपनी बाईं बाँह पर झुकाया और मेरी दूसरी टांग के नीचे हाथ डाला।

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, मेरी दाईं टांग हवा में सिर तक उठी और मैंने खुद को उसकी गोद में घूमते हुए उसके चेहरे के सामने पाया।

उसकी इस कमाल की हरकत पर मैं हैरान हो ही रही थी कि मेरे चूचुक पर दो होंठ आ जमे।‌“सस्स्…!”

गनीमत थी कि श्रीधर उस वक्त फोन में सुन नहीं, कुछ कह रहे थे।अगर मेरी कोई सिसकारी निकली थी तो छिप गई होगी।

फिर भी मैंने अपनी ओर से दो और हाँ हाँ जोड़ दी।

काश वे दूर से बात करने की बजाय मुझे खोजते हुए यहीं पहुँच जाते!मेरी दृष्टि दरवाजे की ओर चली गई।

मुझे लगा कि ‘खट’ की आवाज भी हुई है।अचानक से मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने ध्यान उधर से हटा लिया।

मेरे चूचुक पहले से उत्तेजित थे।उन्हें वह इतना हल्के से चूस रहा था कि व्यग्र होकर मैंने उसका सिर हाथों से दबा लिया।मैं अपना निचला होंठ काटने लगी थी, भौहों में सलवटें पड़ रही थीं और पीठ धनुष की तरह पीछे अकड़ गई थी, जिससे स्तन और उठ गए थे।

“अंग्गा…ऽऽऽ…!!”

“क्या बोली?” फोन में श्रीधर।

“नीला” मैं गुर्राई। मेरी आँखें बंद थीं।‌ मैंने गला खँखारा। “अँऽऽ… नीला… शायद…!”

वे हँसे,‌ पूछा- तुम पक्का क्यों नहीं हो।

क्योंकि मैं तुम्हारे बॉस की गोद में टांगें दोनों तरफ किए बैठी हूँ, कमर तक नंगी हूँ और उसका मुँह मेरे चूचुक पर और हाथ मेरी चड्डी में है। कैसे पक्का हो सकती हूँ।

मैंने घूमने की कोशिश की ताकि उस दीवार को देख सकूँ जिसके बारे में वे बोल रहे थे।

कुर्सी में बैठे बॉस के ठीक सामने वाली दीवार।मैंने स्तनों को जहाँ थे वहीं छोड़ कर सिर घुमाया।

“हाँ, यह नीला ही है।”

मेरा सिर घूमा हुआ… स्तन उसके मुँह में… खुला चूचुक उसके मुँह में बंद पड़ोसी जैसा ही सख्त और फूला हुआ… लार में भींगा… बगल से आती रोशनी में चमकता…

“सिस्सऽऽऽ… !!” उसने हल्के से दाँत काटा।“क्या?” फोन ने कहा।

“मैं बस… आ…ऽऽऽ…ह!!” उसने फिर से दांत काट लिया, “पेपर क्लिप पर बैठ गई थी।”उसकी हरकतों से मेरे दिमाग में खतरे की घंटियाँ बज रही थीं।“वे मुझे दिखा रहे थे, स्टेशनरी व अन्य चीजें, जो आपको दी जाएंगी।”

मैं घूमी और फोन के रिसीवर पर अपना हाथ रख दिया। चूचुकों में जलन हो रही थी, जैसे उन्हें आग से छुला दिया गया हो। मैं उसके मुँह पर चीखना चाहती थी।‌

“अभी वह वहीं है?” श्रीधर ने पूछा।

“हाँ।” मैं, बस, क्षणभर के लिए रिसीवर पर से हाथ हटाकर किसी तरह बोल सकी। एक मोटी उंगली मेरे भगों के अंदर घुसी और पुनः मेरे मुँह से फिर एक मोटी गुर्राहट निकल गई।

यह तो हद से ज्यादा हो गया।

उसने सिर उठाया और मेरे मुख पर चुंबन लेकर, मेरी निकलती हुई साँस खींच ली।

“वाह!” फोन से आवाज आई, “वह अभी भी तुम्हारे साथ है! कमाल की बात है! तुम जरूर उसे बहुत पसंद आ रही होगी।” पता नहीं क्यों, श्रीधर फुसफुसाने लगे थे, मानों कोई राज की बात बता रहे हों, कहीं बॉस सुन न ले।

श्री दंडपाणि महाराज को ठेंगा मतलब नहीं था किउसका मातहत क्या बोल रहा है। उनकी दिलचस्पी इस वक्त उसकी बीवी में थी, जो इस वक्त उनकी गोद में बैठी, गर्म साँसें छोड़ती, आहें भरती उनकी हरकतों पर थिरक रही थी।‌

फोन बड़बड़ा रहा था… “इतना बड़ा आदमी है… कितना व्यस्त रहता है… कितना प्रभावशाली है… तुम्हें इतना समय दे रहा है… बड़ी बात है।”

मैं उनको जरूर बता सकती थी कि क्यों वह मुझे इतना समय दे रहा है लेकिन मेरा ध्यान उसकी योनि में घूमती उंगलियों पर था। उसके अंगूठे की बेहद हल्की छुअन मेरी भगनासा पर गुजरी।‌ मेरे पेड़ू ने तत्काल प्रतिक्रिया दी – पानी से हवा में उछली किसी बड़ी मछली की तरह…

“ङ्गा…ऽऽऽ…ह!!”

मैंने मोबाइल पर हाथ कस दिया।

“बताऊँ?” मेरे कानों में फुसफुसाहट आ रही थी, “सामान्य बनी रहो, उसको पता मत चलने दो कि वह तुमपर ध्यान दे रहा है तो इससे हम खुश हैं।” मेरा मन हुआ कि उसी समय टोककर उनको बताऊँ कि वह क्यों मुझपर ध्यान दे रहा है। जानकर उन्हें बिल्कुल खुशी नहीं होगी।‌

“बस तुम मुझे उस कमरे के बारे में बताओ। उसपर जाहिर मत होने दो कि वहांँ तुम उसके साथ खुश हो।”

किसने कहा कि मैं यहाँ खुश हूँ? मैं और नहीं कर सकती।

“हेलो श्रीधर,” उसका सिर मेरे स्तनों पर से उठा और मोबाइल के पास आ गया।‌ उसने मोबाइल मेरे हाथ से छीन ली।

मैं अपना मोबाइल खोकर पहले कभी इतना खुश नहीं हुई थी।

उसने मुझे गोद से धकेल दिया और अपना बड़ा और भारी हाथ मेरे सिर पर रख दिया।

“What is the progress (क्या प्रगति है)?”

मैं फर्श पर थी – उसके खुले पैरों के बीच, घुटनों के बल बैठी, प्रार्थना की मुद्रा में। सामने युद्ध का देवता था, कपाट के अंदर बंद।

श्रीधर की धीमी अस्पष्ट आवाज पृष्ठभूमि में आ रही थी।पता नहीं वे क्या बोल रहे थे।

दण्डपाणि को भी कुछ खास मतलब नहीं था कि क्या बोल रहे हैं।उसने अपनी बेल्ट ढीली की, पैंट के बटन खोले और चेन खींचकर कपाट खोल दिए।चड्डी में उभार बता रहा था कि युद्ध का देवता शस्त्र उठा चुका है।

“टेक योर टाइम, डू इट परफैक्टली. (आराम से करो, कोई कमी न रहे)।”

ये हुक्म केवल उन्हीं के लिए था या मुझे भी? मुझे उनकी घुटी सी “यस सर, यस सर” सुनाई दी।‌

उसने मोबाइल पकड़ने का हाथ बदला और पुनः मेरे सिर पर हाथ रख दिया।

“डोन्ट वरी फॉर हर।‌ आइ एम टेकिंग केयर। (उसकी चिंता मत करो। मैं ख्याल रख रहा हूँ।)”

मैंने कुछ खिसियाते से चड्ढी में हाथ डाला और युद्ध देवता को बाहर निकाल लिया।

इंद्र का वज्र – मेरे पति की अपेक्षा विशाल। वे भी छोटे नहीं हैं, पर यह दैत्याकार था।

मैंने उसके अग्रचर्म को होंठों से स्पर्श कर पहला अर्घ्य दिया।

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