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Behan Ki Chudai • पठन समय: 14 मिनट • पढ़ा गया: 377 बार

रात की बारिश और दीदी की गर्मी(Raat ki barish aur didi ki garmi)

sunitamanish3

02 Jan 2023 को प्रकाशित

रात की बारिश और दीदी की गर्मी(Raat ki barish aur didi ki garmi)
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मेरा नाम विजय है। उम्र 19 साल। गाँव में कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ खेती-बाड़ी में हाथ बँटाता हूं। दीदी का नाम दिया है — उम्र 23 साल। वो गाँव से 10 किमी दूर कॉलेज में पढ़ती है। लेकिन पिछले साल से घर पर ही रह रही है, क्योंकि मम्मी की तबीयत खराब रहती है। दीदी गोरी, लंबी, पतली कमर, लेकिन छातियाँ और नितंब अच्छे भरे हुए। सलवार-सूट में वो बहुत सुंदर लगती है। बाल लंबे, काले, और आँखें ऐसी कि देखते ही मन डोल जाता है।

घर में पापा-मम्मी, मैं और दीदी। पापा दिन भर खेत में, मम्मी घर संभालती। रात को सब सो जाते। हमारा कमरा एक ही था — बड़ा सा, दो चारपाइयाँ अलग-अलग, बीच में पंखा। गर्मियों में बिजली चली जाती, तो रात भर पसीना बहता।

एक रात मूसलाधार बारिश हो रही थी। बिजली गई हुई थी। कमरे में सिर्फ मोमबत्ती की रोशनी। मैं अपनी चारपाई पर लेटा था, दीदी अपनी पर। बारिश की आवाज से नींद नहीं आ रही थी। दीदी करवट बदल रही थी। उनकी साड़ी (रात को वो साड़ी पहन कर सोती थी) थोड़ी सरक गई थी, पेट दिख रहा था।

मैंने धीरे से कहा, “दीदी, नींद नहीं आ रही?”

दीदी मुड़ीं, मुस्कुराई, “हां रे… बारिश की वजह से। तू भी जाग रहा है?”

“हां… गर्मी भी बहुत है।”

दीदी उठ कर बैठ गई। साड़ी का पल्लू नीचे सरका हुआ था। ब्लाउज टाइट, छातियाँ उभरी हुई। वो बोली, “पंखा भी नहीं चल रहा। आजा मेरे पास, थोड़ी हवा लगेगी।”

मैं उठ कर उनकी चारपाई पर गया। पास बैठ गया। दीदी ने मेरे कंधे पर सिर रख प्रिया। उनकी खुशबू आई — नहाने के बाद वाली साबुन की। मैं सिहर गया। धीरे-धीरे बातें होने लगी। दीदी बोली, “विजय… तू बड़ा हो गया है। अब लड़कियों से बात करता है?”

मैं शरमा गया, “नहीं दीदी… बस पढ़ाई।”

दीदी हंसीं, “झूठ मत बोल। मैं देखती हूं कैसे तू मेरी तरफ देखता है।”

मेरा दिल धड़कने लगा। मैं चुप रहा। दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा, अपनी कमर पर रख प्रिया।

“छूकर देख… कितनी गर्म हूं।”

मैंने हाथ फेरा। उनकी कमर नरम थी। दीदी ने मेरी तरफ देखा, आँखों में कुछ अलग था। वो धीरे से बोली, “विजय… आज रात… बस हम दोनों हैं। कोई नहीं देखेगा।”

मैं समझ गया। डर भी लगा, लेकिन मन में आग लग गई। मैंने दीदी को खींचा। उनके होंठों पर होंठ रख दिए। दीदी ने जवाब प्रिया — गहरा किस्स। उनकी जीभ मेरी जीभ से खेलने लगी।

बारिश बाहर तेज़ हो चुकी थी। मोमबत्ती की हल्की रोशनी में दीदी की चारपाई पर हम दोनों बैठे थे। दीदी ने मेरी शर्ट पूरी उतार दी थी। उनकी साड़ी का पल्लू अब बिल्कुल गिर चुका था। ब्लाउज के दोनों हुक मैंने खोल दिए थे। दीदी की भारी-भरकम छातियाँ बाहर आ गई — गोरे, गोल, निप्पल हल्के गुलाबी और सख्त हो चुके थे।

मैंने दोनों हाथों से उन छातियों को नीचे से ऊपर उठाया। उँगलियाँ छाती के नरम मांस में धँस गई। दीदी की साँसें तेज़ हो गई।

“आह्ह… विजय… पहले चूस… बहुत दिन से इंतज़ार था…”

मैंने मुंह खोला और बाएं निप्पल को पूरी तरह मुंह में ले लिया। जीभ से घुमाया, हल्का काटा, फिर चूसने लगा जैसे बच्चा दूध पी रहा हो। दायाँ निप्पल उँगलियों से मसलता रहा। दीदी की कमर झुक गई, उन्होंने मेरे सिर को छातियों में दबा लिया।“उफ्फ्फ… हां… और ज़ोर से चूस… दीदी की चूचियाँ तेरा ही इंतज़ार कर रही थी… आह्ह…”

मेरा लंड अब पैंट फाड़ने को तैयार था। दीदी ने हाथ नीचे सरकाया, पैंट का बटन खोला, ज़िप खींची और लंड बाहर निकाल लिया। गरम, सख्त, नसें उभरी हुई। दीदी ने उसे दोनों हाथों में पकड़ा, ऊपर-नीचे सहलाने लगी। अँगूठे से टिप पर फैला हुआ पानी फैलाया।

“वाह रे… मेरा छोटा भाई कितना मोटा और लंबा हो गया… 7 इंच से भी ज़्यादा… दीदी की चूत फाड़ने के लिए बिल्कुल परफेक्ट।”

दीदी लेट गई। साड़ी को कमर तक ऊपर चढ़ा प्रिया। पेटीकोट का नाड़ा खींच कर उतार प्रिया। पैंटी अब तक गीली हो चुकी थी। मैंने पैंटी भी उतारी। दीदी की चूत बिल्कुल सामने थी — हल्के भूरे बाल, मोटी-मोटी लेबिया, बीच में गुलाबी अंदरूनी हिस्सा जो पहले से ही चमक रहा था।

मैं घुटनों के बल बैठ गया। दोनों हाथों से उनकी जाँघें फैलाई। जीभ बाहर निकाली और सबसे पहले चूत के ऊपरी हिस्से पर रखी। दीदी सिहर उठी।

“आआह्ह्ह… उफ्फ… चाट… अच्छे से चाट…”

मैंने पूरी जीभ से चूत को ऊपर से नीचे तक चाटा। स्वाद मीठा-खारा, गर्म। फिर क्लिटोरिस को जीभ से घुमाया — तेज़-तेज़, फिर धीरे-धीरे। दीदी की कमर उछलने लगी। उन्होंने मेरे बाल पकड़ लिए।

“हाय… वहां… हां… क्लिट पर… और ज़ोर से… आह्ह… दीदी पागल हो रही है… उफ्फ्फ…”

मैंने दो उँगलियाँ भी अंदर डाल दी। अंदर बहुत गर्म और चिकना था। उँगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। दीदी की चूत उँगलियों को चूस रही थी। उनकी आहें अब चीख में बदलने लगी, “आआह्ह… तीन उँगलियाँ डाल… हां… फाड़ दे… दीदी की चूत फाड़ दे… आह्ह… मैं झड़ने वाली हूं…”

मैंने तेज़ी बढ़ाई। उँगलियाँ अंदर तक घुस रही थी, चूत से “चर-चर” की आवाज़ आने लगी। दीदी की जाँघें काँपने लगी। अचानक उनकी कमर ऊपर उठी और चूत मेरी उँगलियों और मुंह पर पानी छोड़ने लगी। दीदी चीखी, “आआआह्ह्ह्ह… आ गया… दीदी झड़ गई… हाय… कितना पानी निकला…”

लेकिन मैं रुका नहीं। लंड अब फटने को था। मैंने दीदी की जाँघों के बीच घुटनों के बल बैठ गया। लंड की टिप चूत के मुहाने पर रखी। दीदी ने खुद हाथ बढ़ा कर लंड पकड़ा और अपनी चूत पर रगड़ा।

“अब डाल… पूरा डाल… धीरे से शुरू कर… फिर दीदी को फाड़ दे…”

मैंने कूल्हे आगे किए। लंड का सिरा चूत में घुसा। दीदी की आँखें बंद हो गई।“आह्ह… हां… और अंदर… उफ्फ्… कितना मोटा है… दीदी की चूत फैल रही है…”

मैंने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर डाल प्रिया। चूत बहुत टाइट थी, फिर भी गीली होने की वजह से पूरा घुस गया। अंदर बहुत गर्म और चिकना महसूस हो रहा था। मैं रुका, दीदी को आदत पड़ने दी। फिर धीरे-धीरे धक्के मारने लगा।

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हर धक्के के साथ दीदी की छातियाँ उछल रही थी। मैंने दोनों छातियों को पकड़ लिया, निप्पल उँगलियों से दबाया। रफ्तार बढ़ाई। अब हर थप्पड़ जोरदार था — “पच-पच-पच” की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।

दीदी चीख रही थी, “जोर से… मार… फाड़ दे चूत… हां… और तेज़… दीदी को चोद… आह्ह… तेरा लंड दीदी की चूत का राजा है… उफ्फ्फ्… गहराई तक… हाय… मेरा पॉइंट आ रहा है…”

मैंने दीदी की दोनों टाँगें कंधों पर रख दी। अब लंड और गहराई तक जा रहा था। हर झटके में लंड की जड़ तक चूत में घुस रहा था। दीदी की चूत लंड को चूस रही थी। पसीना हम दोनों का मिल गया था। मोमबत्ती की रोशनी में दीदी का चेहरा लाल, आँखें आधी बंद, मुंह से लार टपक रही थी।

मैंने रफ्तार और बढ़ाई, तेज़, बहुत तेज़। हर झटका इतना ज़ोरदार कि चारपाई हिल रही थी। दीदी अब लगातार चीख रही थी, “आआह्ह… मार डाल… चोद डाल… दीदी की चूत फाड़ डाल… हां… और… और… आ रहा है… मैं फिर झड़ रही हूं… आआआह्ह्ह्ह…”

दीदी की चूत सिकुड़ी, फिर ढीली हुई और दूसरी बार झड़ गई। गर्म पानी मेरे लंड पर बहने लगा। मैं भी अब रुक नहीं सकता था। आखिरी 10-12 झटके मैंने पूरी ताकत से मारे, इतने तेज़ कि दीदी की चीखें बाहर तक सुनाई दे रही थी।फिर मैं चीखा, “दीदी… अंदर… झड़ रहा हूं… ले ले सब…”

मेरा लंड फड़का और गर्म-गर्म वीर्य दीदी की चूत के सबसे गहरे हिस्से में फूटने लगा। एक… दो… तीन… चार… सात-सात बार फड़का। इतना वीर्य कि चूत से बाहर निकलने लगा। दीदी की चूत उससे भर गई।

हम दोनों थक कर एक-दूसरे पर गिर गए। लंड अभी भी चूत के अंदर था। दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज तूने दीदी को तीन बार झड़ाया… कभी इतना मज़ा नहीं आया… कल रात फिर… और भी ज़ोर से… अब तो तू रोज़ दीदी की चूत का मालिक है।”

बारिश बाहर थम चुकी थी। लेकिन हमारे बीच की चुदाई की गर्मी अभी भी जल रही थी। चुदाई खत्म होने के बाद का वह पल… जैसे समय रुक सा गया हो। मेरा लंड अभी भी दीदी की चूत के अंदर ही था। धीरे-धीरे नरम हो रहा था, लेकिन पूरी तरह बाहर नहीं निकला। हम दोनों एक-दूसरे पर लेटे हुए थे, पसीने से तर-बतर, साँसें तेज़ और भारी। दीदी की छातियाँ मेरे सीने पर दब रही थी, उनके निप्पल अभी भी सख्त और गरम। मेरी साँसें उनकी गर्दन पर पड़ रही थी, और उनकी साँसें मेरे कंधे पर।

कमरे में अब सिर्फ बारिश की हल्की-हल्की बूँदों की आवाज़ बची थी — बाहर थम चुकी थी, लेकिन छत पर टपक रही थी। मोमबत्ती की लौ कमज़ोर पड़ रही थी, रोशनी और धुंधली हो गई थी। हवा में हमारी चुदाई की गंध फैली हुई थी — पसीना, वीर्य, चूत का रस, सब मिल कर एक मीठी-खारी महक बना रहे थे।

दीदी ने धीरे से मेरे बालों में उँगलियाँ फिराई। उनकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी, थकी हुई लेकिन संतुष्ट।

“विजय… कितना गरम वीर्य निकाला है तूने… अभी भी महसूस हो रहा है अंदर… जैसे चूत भर गई हो।”

मैंने हल्का सा कूल्हा हिलाया। लंड अभी भी आधा अंदर था। बाहर निकालते ही दीदी की चूत से हमारा मिला-जुला रस बहने लगा, सफेद-दूधिया, चिपचिपा। वो मेरी जाँघों पर गिर रहा था, गीला और गर्म। दीदी ने हाथ नीचे सरकाया, अपनी चूत पर रखा। उँगलियों से वो रस छुआ, फिर उँगलियाँ मेरे मुंह के पास लाई।

“देख… हम दोनों का मिश्रण… चख…”मैंने उनकी उँगलियाँ चाटी। स्वाद नमकीन, थोड़ा मीठा। दीदी मुस्कुराई, फिर मेरे होंठ चूम लिए — गहरा, धीमा किस। उनकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी, जैसे अभी भी भूख बाकी हो।

काफी देर हम ऐसे ही लिपटे रहे। दीदी की जाँघें अभी भी हल्के-हल्के काँप रही थी — दो-तीन बार झड़ने के बाद का कंपन। उनकी चूत बार-बार सिकुड़ रही थी, जैसे लंड को और अंदर खींचना चाहती हो। मैंने धीरे से लंड बाहर निकाला। “प्लॉप” की हल्की आवाज़ आई। चूत का मुहाना अब खुला हुआ था, अंदर से वीर्य धीरे-धीरे बह रहा था। दीदी ने अपनी उँगलियाँ अंदर डाली, बाहर निकाला — उँगलियाँ चिपचिपी हो गई।

“देख… कितना निकला है… तेरे वीर्य से मेरी चूत सफेद हो गई।”

वो हंसीं, फिर उठ कर बैठ गई। साड़ी अभी भी कमर तक ऊपर थी। छातियाँ बाहर, ब्लाउज फटा हुआ। वो मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गई, मेरे लंड को हाथ में लिया। अभी भी आधा खड़ा था, वीर्य और उनके रस से चमक रहा था।

“इतना मोटा… अभी भी गरम है।”

दीदी ने जीभ निकाली और लंड की टिप चाटी। फिर पूरा मुंह में लिया — धीरे-धीरे, साफ करने की तरह। मैं सिहर उठा।

“दीदी… अभी तो… थक गया हूं…”“श्श्श… बस साफ कर रही हूं। तेरा वीर्य और मेरा रस… दोनों का स्वाद लेना है।”

वो अच्छे से चाटती रही — लंड की जड़ से टिप तक, गेंदों तक। फिर उठी, मेरे पास आई और लेट गई। मुझे अपनी बाँहों में खींच लिया। हम दोनों नंगे, एक-दूसरे से चिपके। उनकी छातियाँ मेरे सीने पर, मेरी टाँग उनकी टाँगों में फँसी हुई।

दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “विजय… आज पहली बार इतना गहरा महसूस हुआ। तेरे लंड ने मेरी चूत के वो कोने छुए जो कभी किसी ने नहीं छुए। तीन बार झड़ गई मैं… कभी इतना नहीं हुआ।”

मैंने उनकी कमर पर हाथ फेरा। “दीदी… मुझे भी… जैसे स्वर्ग मिल गया हो।”वो हँसीं, हल्की, थकी हुई हँसी।

“कल रात फिर… लेकिन इस बार मैं ऊपर रहूंगी। तुझे देखना है कि दीदी कैसे तेरे लंड पर सवार होकर झड़ती है।”

मैंने उनकी गर्दन चूमी।“हां… और सुबह-सुबह भी… जब सब सो रहे होंगे।”

हम दोनों चुप हो गए। सिर्फ साँसों की आवाज़। दीदी की चूत अभी भी मेरी जाँघ पर रगड़ रही थी — हल्के-हल्के, जैसे कह रही हो कि अभी खत्म नहीं हुआ। बाहर बारिश पूरी तरह थम चुकी थी। चाँद की हल्की रोशनी खिड़की से आ रही थी।दीदी ने मेरे सीने पर सिर रखा, आँखें बंद कर ली।

“सो जा… लेकिन याद रखना — अब से हर रात तेरी दीदी की चूत सिर्फ तेरे लिए है।”

मैंने उन्हें कस कर गले लगाया। हम दोनों ऐसे ही सो गए — नंगे, चिपके हुए, चुदाई के बाद की वो गर्माहट लिए हुए।

अगली सुबह जब आँख खुली, दीदी पहले ही उठ चुकी थी। लेकिन मेरे लंड पर उनका हाथ था — हल्के से सहला रही थी। मुस्कुराकर बोली, “उठ जा… अभी तो शुरुआत हुई है।”

और बस… दिन की शुरुआत फिर से गर्म हो गई।

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