वेश्या पतिता नहीं होती, पतन को रोकती हैपतित जन की गन्दगी, अपने हृदय में सोखती हैजो विषैलापन लिए हैं घूमते नरपशु जगत मेंउसे वातावरण में वह फैलने से रोकती है…
यही तो गंगा रही कर, पापियों के पाप धोतीवह सहस्रों वर्ष से बस बह रही है कलुष ढोतीशास्त्र कहते हैं कि गंगा मोक्षप्रद है, पावनी हैकिसलिए फिर और कैसे वेश्या ही पतित होती?
मानता हूँ वेश्या निज तन गमन का मूल्य लेतीकिन्तु सोचो कौन सा व्यापार उनका कौन खेती?और यह भी कौन सी उनकी भला मजबूरियाँ हैंविवश यदि होती न, तो तन बेचती क्यों दंश लेती?
मानता यह भी कि वेश्यावृत्ति पापाचार है यहकिन्तु रोटी है यह उनकी, पेट हित व्यापार है यहदेह सुख लेते जो उनसे, वही उनको कोसते भीऔर फिर दुत्कार सामाजिक भी, अत्याचार है यह…
गौर से देखो, बनाते कौन उनको वेश्याएँऔर वे हैं कौन, जो इस वृत्ति को खुद पोषते?पतित तो वे हैं जो रातों के अंधेरों में वहाँ जादेह सुख भी भोगते हैं, और फिर खुद कोसते हैं…