कोई मिल गया

आह’ उनका बॉस- 3

लेखक: लीलाधर दिनांक: 18-07-2022 पठन समय: 14 मिनट

Xxx ऑफिस सेक्स कहानी में मेरे पति के बॉस बाजार में मिले तो उनकी वासना दृष्टि मेरी कामुक देह-यष्टि पर जम गयी. बॉस ने मेरे पति को पदोन्नति देकर हम दोनों को ऑफिस में बुलाया.

कहानी का दूसरा भाग था:परपुरुष के हाथ मेरे बदन पर

अब आगे Xxx ऑफिस सेक्स कहानी:

“शी इज़ अ वेरी इन्टेलिजेण्ट लेडी। नोज अ लॉट ऑव थिंग्स। नॉट मी, रादर शी हैज केप्ट मी एण्टरटेण्ड।” (वह बहुत बुद्धिमान स्त्री है। बहुत सी चीज जानती है। मैंने उसे नहीं, बल्कि उसने मुझे बहलाए रखा है.)

मुझे फोन के पीछे श्रीधर की हँसी सुनाई दी।इधर मेरे होंठ गोल होकर दैत्याकार से संयुक्त हुए।

पहला चुम्बन, फिर दूसरा, फिर तीसरा…

“एक्सलेण्ट!” उसने पति को कहा या मुझे?

मैंने उसकी नोक पर जीभ से कुरेदा, होंठों से चूसा।अंदर लेने के लिए मुझे मुँह काफी बड़ा खोलना पड़ा।

“सच ए ग्रेट वूमन हैज सिलेक्टेड यू, यू मस्ट हैव समथिंग इन यू, मैन।” (ऐसी कमाल की स्त्री ने तुम्हें चुना, तुममें जरूर कोई बात होगी)

फोन में हँसी की आवाज, किंतु संकोच से भरी।श्रीधर प्रशंसा को सम्हालने में अच्छे नहीं है, शरमा जाते हैं।

मेरा मुँह युद्धास्त्र पर फिसल रहा था – आगे पीछे।साँस लेने के लिए पीछे आती तो उसका हाथ आगे ठेलता।

“इम्प्रेस्ड? यू डोंट नो इवेन हाफ ऑफ इट।” (प्रभावित? तुम उसका आधा भी नहीं जानते।)

सचमुच! मैं अभी उसे आधा भी नहीं जान पाई थी।और इतने में ही मेरा मुँह भर गया था।आधा अभी बाहर ही था।

‘कुछ देर में मेरी योनि की भी यही दशा होने वाली है?’ मेरे दिमाग में प्रश्न कौंधा।

व्रज की नोक मेरे गले तक पहुँच गई। कैसे झेलूंगी इस चुनौती को?

मैंने कंधे मोड़े, गर्दन को उठाकर मुँह को गले की सीध में लिया, साँस भरी और मुँह में लेकर जोर से उस पर ठेल दिया।पीछे से हाथ का भी दबाव आया और वज्र अपने लक्ष्य से पार हो गया।लगा जैसे कोई मोटी शहतीर मेरे मुँह से गले के अंदर तक ठुक गई।मुझे जोर की उबकाई आई।

मेरी जिंदगी की सबसे कठिन चुनौती!मैंने जीत की सफलता को और बढ़ाते हुए कुछ और अंदर लेने का प्रयास किया।मैं जानती थी कि उसे अच्छा लग रहा होगा, बल्कि बहुत ही अच्छा लग रहा होगा।इतना प्रभावित तो अब तक किसी से नहीं हुआ होगा।

मैं उबकाई दबाए साँस रोके रही।एक, दो, तीन… चार…!फिर छुड़ा लिया, अब दम घुट जाता।

जान की बाजी लगाकर इस सीमा तक सुख मैं पति को कभी नहीं दे सकी।

दुष्ट ने उसी वक्त मोबाइल मुझे वापस दे दिया।मैं व्याकुल थी। जितनी साँस चाहिए, ले नहीं पा रही थी।

“जानेमन!” मैंने हाँफते हुए कहा और मोबाइल को ऊपर सीधा हवा में उठा दिया, जलती मशाल की तरह, और ज़िन्दगी की सबसे बड़ी साँस ली।

दण्डपाणि ने मेरी उठी हुई बाँह को पकड़ा और मुझे ऊपर खींच लिया।

मेरी कमर में ढीला पड़ा साया गिरकर एड़ियों के चारों तरफ जमा हो गया।

“वण्डरफुल!” उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा- लाइक द स्टैच्यू ऑव लिबर्टी! (आश्चर्यजनक! अमेरिका की स्वतंत्रता की मूर्ति जैसी।)

स्वतंत्रता देवी की मूर्ति! नग्नप्राय, केवल चड्डी में … हवा में एक हाथ उठाए, मशाल की तरह फोन पकड़े, पैरो में साया गिराए… पातिव्रत्य से और नैतिकता के गहरे जमे संस्कार से स्वतंत्रता पाती हुई।आह! कितनी महान उपमा दी उसने मेरी!

उसने मुझे कमर से पकड़ा और एक साफ, शक्तिशाली गति से ज़मीन से उठाकर मेज पर पीठ के बल लिटा दिया।मेरे पैर उठा करके एड़ियाँ मेज के किनारे पर टिका दीं।इससे सुविधा हो गई उसे मेरी चड्डी उतारने में!जिसके लिए मैंने नितम्ब उठा दिए.

और मुझे श्रीधर को कमरे की कुछ और विशेषताएँ बताने में!जैसे छत के चारों ओर की ढलाई, ऊपर की लाइटें, कमरे में आग लगने पर पानी छिड़कने वाले छोटे लाल स्प्रिंकलर!

मैंने भगों को एक हाथ से ढक लिया था।वे उसके चेहरे के बिल्कुल सामने खुले थे और मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही थी।

वह बीच को छोड़कर अगल बगल जांघों को चूम रहा था।पता नहीं श्रीधर से बातों के बीच कब मेरा हाथ हट गया और मुझे भगों पर ठंडी हवा का स्पर्श महसूस हुआ।

फिर सीधी गर्म साँस पड़ी।मैं रुक गई।

मेरा दूर बैठा पति अभी भी कमरे के ही बारे में पूछ रहा था और यह भी कि क्या अब भी उनका बॉस मुझमें उतनी ही दिलचस्पी ले रहा है।

काश वे जान पाते।

मैं उनको बता नहीं सकती थी।

तब तो और नहीं जब एक उत्सुक जिह्वा पंखुड़ियों पर सरक रही हो, जब पूरा भगप्रदेश बड़े मुँह के दायरे में आया हुआ हो।बोलना तक मुश्किल है ऐसे में!

मेरी पंखुड़ियाँ यूँ अलग हो गई थीं जैसे सूरज की रोशनी पाने को लालायित फूल हों।उसने मेरी जाँघें अपने कंधों पर चढ़ाईं और हाथों को बाहर से लाकर पंखुड़ियों को पूरा अलगा दिया।

ओ माँ…. यह तो पूरा उद्घाटित हो गया।

बॉस के चैम्बर में मातहत की बीवी के ‘चैम्बर’ का उद्घाटन!क्या गजब हो रहा था!

“प्च्च… कहाँ हो? सुन नहीं रही?”

मुश्किल है ऐसे वक्त में मोबाइल संभालना… “अँऽऽऽ.. हाँऽऽऽ… बोलो।”उसके होंठ भौंरे की तरह घूम घूमकर मधु चूस रहे थे, जीभ योनि के अंदर लपलपा रही थी।

“वो अभी भी वहीं है?”“कौन?” मैंने वार्तालाप के सिरे को पकड़ने की कोशिश की।“और कौन तुम्हारे साथ है? वही, मेरा बॉस, दण्डपाणि।”

“अच्छा… वे?… हाँ… यहीं हैं।” और क्या बोलती। बात गलत भी नहीं थी। और बोलती भी कैसे, मेरी साँसें किसी दूसरी कीमती चीज पर खर्च हो रही थीं।उसकी नाक मेरी भगनासा को रगड़ रही थी।

इस तरह बेहिचक, पूरी तल्लीनता से चाटे जाने और चूसे जाने का अनुभव मेरे अंगों ने कभी पहले पाया हो, मुझे याद नहीं नहीं।पति की लज्जित संकुचित कोशिशें कितनी फीकी थीं।

अद्भुत! अद्वितीय! स्वर्ग बस मेरी हाथ की पहुँच में था।

बदन में मरोड़ उठी, मेरा पेड़ू उठा।हरक्यूलिस ने जैसे अपने कंधों पर धरती को उठा रखा है उसी तरह दण्डपाणि ने मेरे नितंब व जांघों को अपने कंधों में उठा लिया और भगनासा को होठों में खीचकर दाँतों से चबा लिया।

एक बड़ी सी लहर मुझे उछाल उछालकर पटकने लगी।आँखों के आगे रोशनी के अनार फूटने लगे।मैंने दण्डपाणि का सिर जांघों में कस लिया।

मोबाइल हाथ से छूटकर मेज़ पर गिर पड़ा।मैं निश्चित पकड़ी जाती, अगर उसने मोबाइल के रिसीवर के छिद्र पर अंगूठा न दबा दिया होता, जिसके बारे में उसने मुझे बाद में बताया।

“हाउ फार यू आर फ्रॉम साल्यूशन?”(समाधान से कितने दूर हो) उसने मेरे पति से पूछा।

मैं भी समाधान से ज्यादा दूर नहीं थी।‌वह प्रश्न पर दस्तक दे रहा था।‌मैंने स्वयं अपने ‘प्रश्न’ को उंगलियों से खोला, क्योंकि उसका एक हाथ मोबाइल थामे था।

श्रीधर उन्हें बता रहे थे कितना कर चुके हैं, कितना और वक्त लगेगा।वक्त तो इधर भी लग रहा था।समाधान कोई छोटा-मोटा नहीं था। प्रश्न में प्रवेश कर उसको अपने विस्तार का अभ्यस्त बनाता, धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था।आधा तो चला गया।

मैंने पैरों को और फैलाया … कुछ और गया।

इंद्र का वज्र शची के योनि-कमल को भेद रहा था।खुशी से या जबरदस्ती से।

“ओके, यू डू दिस वन एण्ड… ” कमाल था उसका आत्म-नियंत्रण।ऐसी अवस्था में भी वह विस्तार से निर्देश दे रहा था, ये करो, वो करो।मैं क्या तो सुनूँ और क्या तो जोर लगाऊँ।

मैं बस अपने पेड़ू को उठाकर उसके बल की दिशा में बनाए रखने का प्रयास कर रही थी।

वह अपने काम को जानता था – फोन के उधर भी और इधर भी।ऐसे ही बॉस नहीं था।

उसकी बात समाप्त हुई और उसके साथ ही मेरी योनि भी उसके लिंग से ढक्कन की तरह बंद हो गई।गर्भग्रीवा में चुभन का दर्द हुआ।

किंतु साथ ही एक जबरदस्त भराव का अहसास भी तन-मन पर छा गया।कितना कष्टदायी और कितना आनंददायी अनुभव था।

पुरुष स्त्री को कितना कष्ट देता है, पर खुद भी कितना कष्ट उठाता है उसको सुख देने के लिए!

मैं ऐसी अवस्था में कुछ कर नहीं सकती, सिवाय हाँफने, सीत्कार भरने और बल खाने के।

अचानक मेरे नितंब एकदम चंचल हो उठे, उसकी उंगली उनके बीच ‘छिद्रान्वेषण’ कर रही थी।

श्रीधर ऐसा नहीं करते।मैं ऐसा करने नहीं देती।

लेकिन इस व्यक्ति का अपना तरीका है।यह बस कर डालता है, आपको अच्छा लगे या नहीं।

लेकिन बता दूं कि इससे मुझ पर कोई कयामत नहीं आ गिरी थी।

फिर मैं कराह उठी, फिर चीख निकली।उस समय श्रीधर किसी और से बात कर रहे थे।शायद एचआर में कोई … कोई तीसरा व्यक्ति।

फ़ोन पर पृष्ठभूमि में आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।श्रीधर फिर भी कॉल तोड़ना नहीं चाहते थे।

फ़ोन मेरे सिरहाने डेस्क पर रखा था।

मैं झड़ चुकी थी … दो बार!पहली बार एक तेज़, विस्फोटक चरमसुख, जो एचआर वाले के श्रीधर के पास आने के ठीक बाद आया।श्रीधर ने मुझसे कहा कि फ़ोन मत काटना क्योंकि वह अभी वापस आ जाएगा।

और फिर फ़ोन मेरे हाथ से फिसलकर कान के पास डेस्क पर आ गया।मैंने पूरे निढाल होकर तीव्र आनंद के साथ राहत पाई।

इस समय मेरे पति के ऑफिस में क्या चल रहा था, मुझे कोई चिंता नहीं थी, उसमें मेरा कोई दखल नहीं था।मैं किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह धड़धड़ाती हुई झड़ती गई।अपनी चीख को गले में दबाए रही।मेरी कमर डेस्क से ऊपर उठ गई और मैंने मिस्टर बॉस को हवा में ऊपर उठा लिया।

श्रीधर फोन में वापस आ गए और पूछा कि मैं ठीक तो हूं न? उन्हें लगा कि कोई चीखने की आवाज आई है। क्या हुआ। मैं तो नहीं थी न?

दण्डपाणि ने तेजी से सम्हाला- शायद नीचे सड़क पर कोई ऐम्बुलेन्स गुजरा है।

ऐसी बकवास बात पर भी लोग कैसे यकीन कर लेते हैं?क्योंकि वह बॉस है।

दूसरी बार मैं तब झड़ी जब उसने संभोग की लय अचानक तेज कर दी।अभी तक मैं उसके लिंग के आवागमन की धीमी लय‌ पर नृत्य कर रही थी।लेकिन जब उसने गति बढ़ाई तो मैं उछल पड़ी।

मेरी स्थिति देखकर उसने फ़ोन डेस्क से उठा लिया।मैंने मुंह पर हाथ दबाकर अपनी कराहों को घोंटा।

इस कोशिश में अपने हाथ की उँगलियों भी काट लीं।इस बीच दण्डपाणि श्रीधर या एचआर वाले से कुछ न कुछ बकता रहा।

जब मेरा काम पूरा हो गया और मेरी साँसें थम गईं और मैंने उसके नीचे काँटे से बिंधी मछली की तरह तड़पना बंद कर दिया तो उसने मुझे फ़ोन वापस दे दिया।

इस बार उसने मुझे झुककर चूमा।छोटा चुंबन, शाबाशी देने जैसा।

और फिर मुझे चोदना शुरू कर दिया उसी लय में स्तनों को जोर जोर से कुम्हार की तरह गूंधते हुए, उन्हें झुककर चूसते हुए।

मेरा परमानन्द अभी चल ही रहा था कि उसी में तीसरी बार शुरू हो गया।

मैंने फ़ोन से उसके कंधे को थपथपाया।उसका मुँह मेरे स्तन से ऊपर आया और मैंने उसकी तरफ गुहार से देखा।धक्के कुछ पल के लिए धीमे हो गए‌ ताकि समझ सके कि समस्या क्या है।

अब तक उसे लग रहा था कि जब तक मैं उसकी हरकतों पर इतने जोश से प्रतिक्रिया दे रही हूँ, मुझे कोई समस्या नहीं है।

लेकिन वह तुरंत समझ गया कि उसकी कामुक और पसीने से तर, संभोग में कमज़ोर कद-काठी वाली जोड़ीदार एक और चरम आनंद का तोहफा पाने वाली है।

उसने फोन ले लिया।

मैं मुक्त होकर झड़ने लगी “आऽऽऽ…ह!”

मैंने टखने उसके नितंबों पर कैंची की तरह फँसाकर और जोर से भींच लिया.“अंह…ऽऽऽ…ह!!”“ओऽऽऽ…ह!!!”“हुस्स…ऽऽऽ…!!!!”“सीऽऽऽ…!!”

यह बहुत ज़्यादा, बहुत ही ज्यादा था।असहनीय।

मुझे चूचुकों में दर्द और ऐसा खिंचाव महसूस हुआ मानों बोतल के कॉर्क की तरह खुलकर उड़ जाएंगे।

मुझे उसकी भी गुर्राहटें सुनाई दीं “हुम्म… हुम्म… हुम्म…”

मैं बेहोश हो गई।

मुझे ठीक से याद नहीं कि उसके बाद मुझे फ़ोन वापस मिला या नहीं।हो सकता है कि दण्डपाणि ने हम दोनों की तरफ से अलविदा कह दिया हो।

मैं मेज़ पर चित पड़ी थी, मेरे स्तन पसीने से चमक रहे थे, टांगें लटक रही थीं।

उनके बीच इतनी गर्मी थी कि मैंने घबराहट में हाथ नीचे करके जाँच की।वहां उसका पानी डबडबा रहा था।

कहीं मेरे अंदर ही तो नहीं स्खलित हो गया?लेकिन पूछना, पता नहीं क्यों, फिर से कोई दूर देश की बात प्रतीत हुई।

मैं मेज से उतरकर खड़ी हुई तो वह आकर मुझसे लिपट गया।

पहला आलिंगन!Post coital affection!मैथुन के उपरांत का लगाव!

इस भाव से मैं भी गुजर रही थी पर मैं अपने हाथों को रोके रही।

अब मैं पातिव्रत्य का दावा नहीं कर सकती थी।लेकिन दूसरा पुरुष भी होता है, इसका अहसास उसने दिया था जबरदस्त!

“तुम दुष्ट हो।” पहली बार मैंने उससे कोई आलोचनात्मक बात कही।

वह मुस्कुरा रहा था।

मैं झुकी और साया और चड्डी जमीन से उठाते हुए उसके पाँव छू लिए।

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