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Hindi Chudai Kahani पठन समय: 9 मिनट पढ़ा गया: 646 बार

Drishyam, ek chudai ki kahani-52

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19 Feb 2025 को प्रकाशित

Drishyam, ek chudai ki kahani-52
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इतना चोदा तुमने मुझको की सुध न रही मेरे तन में,यह लण्ड तेरा कैसा लण्ड है, कोई रहम नहीं उसके मन में?दिन में था बेहोशी का आलम रातों को चुदी दिन में सोई,चूत सूज गयी लहराये कदम तब कैसे भला चलता कोई?

कोई काम धाम होता ही नहीं एक नशा दिमाग पे छाया है,किया प्यार मुझे इतना उसने लगता ही नहीं वह पराया है।चोदा उसने ऐसा मुझको की चूत सूजी सुध बुध खोई,इतना जालिम था वह फिर भी जब चला गया मैं खूब रोई।

आरती ने रमेशजी को चोदते हुए गहरी साँसें लेते हुए हाँफते हुए कहा, “बाहर मत निकालिये। उसे मेरी चूत में जाने दीजिये। मेरी चूत में ही छोड़ दीजिये। अभी मैं सेफ हूँ। भर दीजिये चूत मेरी। वैसे तो कुछ होगा नहीं, पर अगर मैंने गर्भ भी धारण कर लिया तो कोई बात नहीं। आपका बच्चा पालने के लिए मैं तैयार हूँ।”

रमेश के लिए अब वीर्य लण्ड में रख पाना मुश्किल था। जैसे ही आरती ने उ िकलसकी चूत में सारा वीर्य उंडेल ने की इजाजत दी की फ़ौरन रमेशजी के लण्ड से गजब का गरम गरम वीर्य का फव्वारा छूटने लगा। आरती ने महसूस किया की रमेशजी का वीर्य इतना गाढ़ा और गरम था की आरती की चूत की पूरी सुरंग अंदर से काफी गरम हो गयी।

काफी देर तक रमेशजी का वीर्य निकलता ही जा रहा था। आरती की चूत तो कुछ पलों में ही भर गयी। वीर्य चूत में से बाहर निकल कर चद्दर को गीला कर रहा था।

करीब तीन घंटे की तगड़ी चुदाई के बाद रमेश झड़ गया। आरती रमेश का पूरा वीर्य झड़ने तक रमेशजी का लण्ड अपनी चूत में रखे हुए लेटी रही।

जब रमेशजी का सारा माल निकल गया और रमेशजी भी थकान के मारे शिथिल हो गए, तब आरती धीरे से उठी और रमेशजी का लण्ड अपनी चूत में से निकाल कर आरती ने चैन की साँस ली की “चलो, इतना चोदने के बाद भी आखिर में रमेशजी का लण्ड झडा तो सही!”

सुबह का आलम यह था की रमेशजी की छाती पर सर रख कर आरती चुदाई की तगड़ी मार से थक कर बेहोशी वाली गहरी नींद में सोई हुई थी। रात भर की चुदाई का दर्द अभी भी उसे खाये जा रहा था। पर बेहोशी के कारण वह उसे महसूस करने की हालत में नहीं थी। पूरी रात भर की चुदाई ने तो खूबसूरत फूलों से सजाया गए पलंग को भी बेहाल कर दिया था।

जो पलंग फूलों के महल की तरह सजा हुआ था उसका हाल ऐसा था जैसे कोई टूटा फूटा खंडहर हो। पलंग पर बिछाये गए सुन्दर फूल रणभूमि में घोड़ों और हाथियों के पैरों से कुचले गए सिपाहियों की तरह मुरझाये इधर उधर बिखरे हुए दिख रहे थे। आरती की चूत में से रमेशजी का वीर्य ऐसे बह रहा था जैसे कुचले हुए सिपाहियों के बदन से खून बह रहा हो।

आरती का हाल कौनसा अच्छा था? सुबह के करीब चार बज रहे थे। आरती की आँखें थकान, दर्द और नींद के मारे खुल ही नहीं रह पा रहीं थीं।

आरती का मन हुआ की रमेशजी को एक कप चाय पिलाई जाए। उसे भी चाय पिने की तलब हुई। रात में रमेशजी ने एक बार चाय बनायी थी।

रमेशजी भी पलंग पर आधी नींद में ही थे। आरती का पूरा बदन पसीने से तरबतर था। उठने की कोशिश करते हुए अनायास ही आरती का हाथ रमेशजी की जाँघों के बिच जा पहुंचा।

गहरी नींद में सोये हुए रमेशजी का तगड़ा, मोटा और लोहे के छड़ जैसा लंबा लण्ड गुब्बारे में से हवा निकाल दी गयी हो ऐसे बेजान सा ढीला पड़ा था।

हालांकि बेजान सा लण्ड भी लम्बाई और मोटाई में तब भी काफी तगड़ा दिख रहा था। आरती को वह दृश्य याद आया जब बचपन में घर के पीछे एक कोने में आरती ने एक लम्बे मोटे साँप को अपनी बाहरी पारदर्शी चमड़ी उतारते हुए देखा था।

अच्छेअच्छों को अपने बड़े लम्बे कद से और अपनी फुंफकार से डरा देने वाला घना काला साँप उस समय विशाल होते हुए भी दयनीय हालत में ढीला सिकुड़ा हुआ बाहर की चमड़ी उधड़ जाने से गोरा सा असहाय लग रहा था। ऐसा ही कुछ हाल रमेशजी के लण्ड का भी उस समय था।

आरती लेटे हुए रमेशजी के पास बाजू में लेट गयी। रमेशजी ने आँखें खोली और आरती के अपने करीब देखा तो उसे अपनी बाँहों में भर लिया और बड़ी आत्मीयता से आरती के होँठों को चूमा।

रमेशजी ने आरती से कहा, “आरती मैं तुम्हें जिंदगी भर नहीं छोडूंगा।” यह कह कर रमेशजी एकदम सो गए और गहरी नींद में खर्राटे मारने लगे।

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कुछ देर तक आरती खर्राटे मारते हुए रमेशजी की बाँहों में पड़ी रही। फिर कुछ मुस्कुराती हुई सिकुड़ कर रमेशजी के सिकंजे से बाहर निकली।

आरती रमेशजी की बाँहों में से बाहर आयी और खड़ी हो कर लड़खड़ाते क़दमों से रसोई घर में जा कर उसने चाय बनायी। पर उसकी हालत नहीं थी की चाय छान कर कप में डालकर रमेशजी को पिलाये। गैस को बुझा कर फिर लड़खड़ाती हुई आरती बैडरूम में आयी।

आ कर रमेशजी के बाजू में लेट कर रमेशजी की बाँहों में लिपट कर आरती ने रमेशजी से कहा, “चाय तैयार है। आप छान कर ले आओगे प्लीज?” पर बस इतना ही बोल कर वह रमेशजी की बाँहों में एकदम गहरी निंद सो गयी। दो नंगे बदन एक दूसरे के आहोश में बेहोश सो रहे थे। चाय को छान कर पिने का होश किसे था?

मैं भी दोनों प्रेमियों को एकदूसरे की बाँहों में नंगे लिपटे हुए देख कर अपना लण्ड पकड़ कर सो गया। उस रात मैंने भी रमेशजी और आरती की चुदाई देखते हुए अपने हाथोँ से मेरा माल निकाला था।

सुबह आठ बजे रमेश को महसूस हुआ की आरती उससे चिपक कर सोई हुई है। आरती का एक पाँव रमेश के बदन पर था। रमेश के थोड़ा ऊपर उठने पर रमेश को आरती की चूत के दर्शन हुए।

आरती की चूत फूल कर लाल हो गयी थी। जो चूत चुदाई से पहले नाजुक छोटी गोरी सी दिख रही थी, अब फूल कर बेड़मी पूड़ी की तरह दिख रही थी। लाल चूत को देख कर ऐसा लगता जैसे अभी खून निकलेगा।

रमेशजी आरती की सूजी हुई चूत देख कर कुछ मुस्कुराये। उन्हें आरती की चूत में अपनी पहली पत्नी की चूत के दर्शन हुए। उस बेचारी का सुहाग रात की रात भर की चुदाई के बाद यही हाल हुआ था।

रमेश आरती के घर तीन रात रहे। दोनों की चुदाई पूरी रात चलती थी। अर्जुन अपने बैडरूम से पूरी रात आरती की चीखें सुनता रहता था। सुनते सुनते अर्जुन अपना लण्ड निकाल कर अपने हाथों से अपना माल निकाल देता था। आरती इन तीनों दिन दिन में सोती रहती थी। खाना बाहर से आता था। अर्जुन आर्डर कर देता था।

रमेश और आरती कभी सुबह ग्यारह बजे से पहले नहीं उठते थे। उसके अहले ही अर्जुन अपने काम से निकल जाता था। नहा धो कर कुछ खा कर रमेशजी एक बार दिन में भी आरती की चुदाई जरूर करते थे। फिर दोनों सो जाते थे।

अर्जुन ने एक कामवाली रखी थी, जो चुपचाप आ कर घर का सारा काम कर चली जाती थी। ना वह कुछ देखती थी ना वह कुछ सोचती थी। उसके बोलने का तो कोई सवाल ही नहीं।

अर्जुन ने कामवाली को सख्त हिदायत दे रखी थी। जब अर्जुन साहब ने कह दिया तो कामवाली की क्या हिम्मत की कुछ बोले? अर्जुन ने भी कामवाली को काफी पैसे देकर लालच और डर दोनों से सेट कर रखा था। कभी कभी यही कामवाली आरती के घर नहीं रहने पर रात में घर आकर अर्जुन साहब की सेवा कर देती थी।

रमेश चले गए। इस कहानी में आगे कई मोड़ आये। आरती, अर्जुन और रमेश और भी लोगों के बिच उसके बाद काफी कुछ हुआ। पर चूँकि यह कहानी सत्य तथ्यों पर आधारित है और मुझे यह हिदायत है की मैं इससे आगे ना बढूं, क्यूंकि कहानी के सारे कलाकार इस कहानी को पढ़ रहे हैं, तो मुझे पाठको से इजाजत लेनी पड़ेगी।

इस कहानी में आगे बड़े खतरनाक मोड़ आते हैं। पर पाठकगण मुझे क्षमा करेंगे की मुझे यह कहानी यहीं ख़तम करनी पड़ रही है।

आखिर सब कुछ करते हुए भी इज्जत और संबंधों का ख्याल तो रखना ही पड़ता है।

ना पति कहता है कुछ पत्नी ना कह पाती हैरिश्तों के परदे में सच्चाई भी छुप जाती है।पति और पत्नी मिलकर साथ में होते हैं जहांलोग सोचेंगे क्या चिंता वही सताती है।रिश्तों के परदे में सच्चाई भी छुप जाती है।

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कुल भाग: 52
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