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भाभी की चुदाई • पठन समय: 26 मिनट • पढ़ा गया: 482 बार

अक्षतयौवना अंजलि का स्वैच्छिक समर्पण-2

कान्हा तोमर

19 Aug 2020 को प्रकाशित

अक्षतयौवना अंजलि का स्वैच्छिक समर्पण-2
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अक्षतयौवना अंजलि का स्वैच्छिक समर्पण-1

वैसे तो मैं अंजलि के पति का बड़ा भाई हूँ पर अपनी चाँद सी भाभो के शादीशुदा होते हुए भी अभी-अभी संज्ञान में आए उसके पूर्ण परिपक्व कुँवारे नारी शरीर और अनभोगे, सुडौल, बेहद कड़े और भरपूर उभरे आसमान छूती गर्म चूचियों के सानिध्य से मेरा दिल विषय-वासना के ज़्वार-भाटे में डगमगा उठा, मेरा लिंग बेहद कड़ा होकर गदहलन्ड का विशाल रूप लेते हुए और काफ़ी यौन-रस रिसाते हुए मेरे जांघिया और मेरी पैन्ट की ढीली चेन को चीर कर छुटे स्प्रिंग की तरह कूद कर बाहर आ गया।

अंजलि मेरे विशालकाय लौड़े को अपने हाथों में लेकर खुशी से पागल जैसी हो गई। विवाहिता होते हुए भी अब तक कुंवारी रही अपनी हसीन भाभो की उम्मीद से परे इस सुखद और यौन-उत्प्रेरक अदा पर मैं भी एक तरह से कमज़ोर पड़ गया और न चाहते हुए भी अपनी हसीन भाभो अंजलि का सिर चूमते हुए उसके उन्नत उरोज़ों को हल्के से दबाया, कामातुर होते हुए दोनों भरी चूचियों के बीच के निमन्त्रण देते कसे गहरे गड्ढे को चूमा, फ़िर उसके गहरे गले के ब्लाउज़ के पीछे हाथ डाल उसकी बेहद गोरी सिलकन पीठ और कमर सहलाते-दबाते हुए उसके दोनों स्तनों के बीच से अपना सिर नीचे लाकर उसकी रमणीय नाभि को चूमा।

तत्काल किसी के देख लेने और बदनामी के डर से खुद को और अंजलि को जज़्बात की रौ में बहने से रोका। मैंने झट अपना चन्चल, बेहया और बदमाश बड़ा फुदुआ अन्डरवीयर के अन्दर वापस डाल कर पैन्ट का ज़िप क़ायदे से बन्द किया और तुरन्त बाथरूम जाकर अंजलि के नग्न माँसल शरीर की अर्चना करते हुए तेज़ गति हस्त-मैथुन द्वारा ज़बर्दस्त वीर्य-स्खलन किया।

दफ़्तर से लौटते वक्त अंजलि को कुछ इशारों, कुछ शब्दों के द्वारा रविवार की सुबह घर की छत पर मेरे शान्त पढ़ाई वाले कमरे में अकेले बुलाया। हमारे घर की छत पर बस एक ही कमरा था जिसे मैंने खुद की पढ़ाई-लिखाई हेतु सुरक्षित रखा था। विरले ही इस कमरे में किसी और का आना-जाना होता था। वैसे अन्दर की बात यह है कि अंजलि का जेठ होने के बावज़ूद, तीन वर्ष पूर्व से ही, एक प्राकृतिक यौनेच्छा रखने वाले स्वस्थ मर्द होने के नाते अपनी भाभो का विशेष रूप से अत्याकर्षक शरीर देख मेरे मुँह से भी अक्सर लार टपक जाया करती थी और मेरे बड़े फुदुए से अनायास ही काफ़ी लसलसा यौन-स्राव रिसने लगता था। अत: अंजलि के निर्वस्त्र शरीर की अर्चना मात्र से ही मैं सदा उसे मन ही मन चोदने-चोदने हो जाया करता था। पर चूंकि भारतीय सामाजिक ढाँचे के अन्तर्गत एक जेठ अपनी भाभो से ऐसी बातें नहीं कर सकता, लिहाज़ा मैं मन मसोस कर रह जाया करता था।

वैसे यदि मैं एक राज़ की बात बताऊँ तो मेरे स्टडी-रूम से एक अतिरिक्त पुरानी सँकरी सीढ़ी नीचे की ओर उतरती थी जो सामान्यत: इस्तेमाल में ना के बराबर थी। जहाँ बीचो-बीच यह सीढ़ी भूतल के लिए मुड़ती थी वहाँ मेरी भाभो (अंजलि) के बाथरूम का एक पुराना बन्द रौशनदान पड़ता था, जो अपनी भाभो को अन्दर ही अन्दर जी-जान से मूक प्यार करने वाले इस अति कामुक जेठ के लिए ईश्वर का प्रिया हुआ एक अज़ूबा वरदान था।

वस्तुत: अन्दरूनी कौतूहलवश, अब तक ध्यान से परे रहे इस पुराने रौशनदान में मैंने चुपके से एक कैमरे के लेन्स जितना गोल छिद्र बना डाला था, जिसमें से मैंने पहले से ही, अंजलि की शादी के बाद से ही आज तक लगातार, अपनी भाभो का भरपूर नंगा, अति मनमोहक ताज़े गोश्त से भरा चिकना बदन पूर्ण नग्न स्नान करते हुए पूरी कामुकता के साथ अनेकों बार देखा था, और अपने गुप्त डिजिटल कैमरे से चोरी-चोरी उसकी तमाम अति-स्पष्ट यौन-उत्प्रेरक रंगीन नग्न तस्वीरें और वीडियो भी उतारी थीं।

फ़ुर्सत के क्षणो में अंजलि की ये अति-स्पष्ट पूर्ण नग्न जान-लेवा रंगीन तस्वीरें और वीडियो मैं बड़े पर्दे पर कैमरा-प्रोजेक्टर के द्वारा बड़े आकार में छाया-चित्रण कर घन्टों अकेले देखा करता था, तथा कामोत्तेज़ना-वश अपने यौन-रस से ओत-प्रोत खड़े लण्ड पर अपने मुख से स्रावित अतिरिक्त लार को थूकते हुए अपना फुदुआ-क़बाब की तरह मसलता रहता था।

अंजलि के अति आकर्षक, सफ़ेद और शबनमी चिकने मांसल कन्धों, भरे-भरे बड़े-बड़े कड़े-कड़े आसमान छूते स्तनों के भारी गोश्त, बुलेट आकार की अत्यन्त उभरे हुए चुचूक, अति गदराए मांसल बाहुओं, कूल्हों और जान्घों के गोश्त तथा घने काले गद्देदार झांटों वाली चूत और भगोष्ठ के गुलाबी उभरे गोश्त का बाथरूम के छिद्र से स्पष्ट दर्शन करते हुए या उसके सख्त उभारों की स्पष्ट क्लोज़-अप की हुईं रंगीन नंगी तस्वीरें और अत्यधिक यौनोत्तेज़क वीडियो अपने कैमरे से प्रोजेक्टर पर ललचाई दृष्टि से देखते हुए न जाने कितनी बार मैंने अपने पिलरनुमा खड़े मोटे लौड़े को नारियल के तेल में सराबोर कर और अपना थूक डाल कर प्रगाढ़ मूठ मारा था।

वस्तुत: मेरे स्टडी-रूम की ज़मीन की टाईल्स, मेरी भाभो अंजलि की मेरे लौड़े द्वारा नग्न चुदाई की अर्चना में हज़ारों-हज़ार बार मूठ मारे हुए अनवरत प्रगाढ़ स्खलित वीर्य स्राव से भरी पड़ी थी। इसमें भी कोई शक़ नहीं कि बीते तीन वर्षों में मैंने जब भी अपनी पत्नी (या पत्नी की गैर-मौज़ूदगी में नौकरानी या किसी अन्य महिला सहकर्मी) के साथ सम्भोग किया तो सामान्यत: अपनी बन्द आँखों में अपने पूर्ण नन्गे शरीर को अंजलि के पूर्ण नन्गे भरपूर परिपक्व जवान शरीर से लिपटा-चिपटा, एवं अपने साँड जैसे विशाल लौड़े को अंजलि के चुस्त अनचुदे बूर के अन्दर गतिशीलता के साथ चुदते होने की अर्चना की। और आज पलक झपकते ही अंजलि जैसे बिरले यौवन की आग के साथ नग्न चुदाई का मेरा सारा सपना जैसे खुद-ब-खुद साकार होने जा रहा था।

मुझे तो जैसे इस बात का यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि अंजलि ने दफ़तर में मेरे अक़स्मात लिन्ग स्पर्श पर अपने मदहोश नयनों की भाषा के द्वारा अपनी ज़बर्दस्त आन्तरिक खुशी जताई थी, और सम्भोग का मूक निमन्त्रण दे डाला था।

रविवार की सुबह होते ही जल्दी ही अंजलि मेरे कमरे में आ गई। अभी मुश्किल से शायद सुबह के साढ़े पाँच बजे थे। उसका पति (मेरा छोटा भाई) रविवार को दिन में दस बजे से पहले सोकर नहीं उठता था। मेरी पत्नी (अंजलि की जेठानी) हर शनिवार की शाम अपने बूढ़े बीमार पिता से मिलने गाँव चली जाती थी और सोमवार की सुबह वापस आती थी।

लिहाज़ा मैं अपनी प्यारी सेक्सी भाभो के इन्तज़ार में अकेला बैठा था। आते ही अंजलि ने बताया कि विगत तीन वर्ष पूर्व, उसने अपनी शादी के बाद से ही अपने पति की नामर्दी की वज़ह से अपनी ज़िन्दगी बर्बाद देख आत्महत्या करनी चाही थी। जैसा कि अंजलि ने बताया, बहुत क़ोशिशों के बावज़ूद भी यौन-क्रिया सम्पन्न करने हेतु उसके पति (मेरे छोटे भाई) का लिन्गोत्थान बिल्कुल ना के बराबर था। अत: वो कच्चे कड़े सिन्गापुरी केले छील कर ज़बर्दस्ती पत्नी की योनि में ठूँस प्रिया करता था और कुछ देर तक बड़ी ही बेरहमी और निर्दयता से कच्चे केले द्वारा चूत पेलने के बाद उसे निकाल कर खा जाया करता था। अंजलि मारे दर्द के कराहती रहती थी पर वो एक नहीं सुनता था। नई-नवेली दुल्हन होने के नाते शुरू-शुरू में अंजलि ने किसी तरह खून का घूंट पी कर बिना किसी और को बताए यह त्रासदी बर्दाश्त कर ली, फ़िर आत्महत्या की धमकी देने पर उसके पति ने यह अत्याचार बन्द किया।

तभी अंजलि ने मेरे दफ़्तर में नौकरी शुरू की, और ज्यों ही उसने क़रीब से अपने जेठ का गठा हुआ मर्दाना वर्ज़िशी शरीर देखा तभी से उसके यौनान्गों में एक सुखद एहसास महसूस होने लगा था और वो मुझसे शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिये बेचैन रहने लगी थी। लिहाज़ा अपनी पूरी दुखद कहानी ईमानदारी से बयान करने के बाद और खुद को अब तक बिल्कुल अनचुदी बताने के बाद अंजलि ने मुझसे हाथ जोड़ कर पति की तरह प्यार करने, सानिध्य में लेने, नग्न-यौन अठ्खेलियाँ करने और अपने सम्पूर्ण नग्न लौड़े को बेझिझक ठूंस-ठूंस कर उसकी चूत चोदने की विनती की। मैंने शर्माते हुये कहा कि मैं तो तुम्हारा जेठ हूं, वैसे निश्चित ही तुम्हें दिल की गहराइयों से बहुत-बहुत प्यार भी करता हूँ, तुम्हें वर्षों से कुत्ते की तरह बार-बार चूसने, चाटने और अपने पूर्णत: खड़े लौड़े से चोदने की भी बेपनाह तमन्ना रखता हूँ, पर हक़ीक़त में जेठ-भाभो के बीच पति-पत्नी जैसा नग्न शारीरिक सम्भोग को अन्ज़ाम देना क्या पाप नहीं?

पर अंजलि ने मेरी एक न मानी, अपनी जंग लगती बेशुमार जवानी की दुहाई देते हुए उसे तत्काल न कर लेने और भरपूर चोद लेने का खुला निमन्त्रण प्रिया। अंजलि ने बार-बार दुहराया कि आज हम दोनों एक-दूसरे को सिर्फ़ एक मर्द और औरत समझे और पूर्ण वस्त्रहीन होकर बिना किसी लज़्ज़ा और सन्कोच के जी भर कर एक-दूसरे की प्यास और यौनाग्नि बुझायें।

उसकी क़राह सुन, मेरे मन का द्वंद्व कुछ कम हुआ। दिल ही दिल मैं तो, न सिर्फ़ अंजलि को चोदने के लिये बेताब था, बल्कि अपनी बड़ी ही प्यारी जवान और गदराई भाभो को वस्त्रहीन कर आत्मसात कर लेने की खातिर गज़ब रूप से बेक़रार हो चुका था। बस मैंने आव देखा न ताव, ऊपर से नीचे तक अंजलि को अपने वर्ज़िशी-बदन के साथ ज़ोर से जकड़ कर लिपटाया और भींच लिया।कोई पन्द्रह मिनट तक हम दोनों एक दूसरे को चूमते रहे, चूसते रहे फ़िर दोनों पूर्ण-रूप से निर्वस्त्र हो गये।

अंजलि ने जयों ही अपने बेहद कसे हुये नारंगी रंग के विशाल कड़े ब्रेसियर का हूक खोला, उसके दोनों प्रचन्ड रूप से फूले हुये पहाड़ की तरह सख्त राक्षसी स्तन कूद कर आज़ाद होते हुए मेरी लौह छाती पर जैसे बल प्रहार करते हुए आ गिरे। अपने भाभो के उन विशाल नग्न वक्षों से चोट खाकर मेरी नंगी छाती भरपूर गुदगुदा गई और मेरा लौड़ा सनसनाते हुए भक से दस इन्च लम्बा, कड़ा, मोटा और पथरीला हो गया।

मैंने अपने ही छोटे भाई के पत्नी की मालदार चूचियाँ ज़ोर-ज़ोर से मसलना, भकोसना और निप्पल चूसना व काटना शुरू कर प्रिया, उसके गदराये कन्धों और नितम्बों में दाँत गड़ाना प्रारम्भ किया।

अंजलि खुशी से बेहाल थी। उसने अपने दोनों स्तनों को हाथ में लेकर चूची-चोदन और मुख-चोदन की इच्छा ज़ाहिर की। मैंने भी बेहाल होते हुये झट अपना फुदुआ जो अब काफ़ी मोटे, पिलरनुमा लम्बे और कड़े लण्ड में परिवर्तित हो चुका था, अंजलि के दोनों स्तनों के बीच डाल कर पेलना शुरू कर प्रिया। जब भी मैं अपना लम्बा लौड़ा अंजलि के दोनों मोटे स्तनों के मांस के बीच गाड़ता वो लौड़े के मूठ को मुँह में लेकर आत्मविभोर हो उसका यौन-रस चूस लेती।

मेरा लण्ड भरपूर गुदगुदा उठा। तुरन्त मैंने भी नीचे आकर अंजलि की योनि को चूसना शुरू किया। उसके भगोष्ठ का बाहरी भाग अत्यन्त मांसल था जिसे मैं देर तक चूसता रहा और दाँतों से भगोष्ठ-द्वार का गोश्त काटता-चबाता रहा, साथ ही परम स्वादिष्ट खट्टे चूतरस का आनन्दातिरेक के साथ नैसर्गिक सेवन करता रहा। अंजलि के योनि-स्राव का स्वाद किसी निरामिश पकवान के चटकार शोरबे से भी कहीं ज़्यादा उत्तेजक और असीम कामोत्तेजक था।

उसकी चूत के चारों ओर फैले बेहद घने, काले, घुंघराले और मोटे-मोटे बड़े-बड़े कड़े-कड़े गद्देदार झांटों के बाल मेरी भाभो के अति-कामोत्तेजक योनि-स्राव से पूरी तौर पर सिन्चित थे और उसकी गाढ़ी खुशबू अंजलि की समुचित यौन-परिपक़्वता दर्शा रहे थे। पुरुष-लौड़े से अनछुए और अछूते इस अज़ूबे परिपक्व चूत और झाँटों का मैं देर तक जिह्वा-चोदन करता रहा, उसके बेहद घने, काले, घुंघराले और मोटे-मोटे बड़े-बड़े झांटों के बालों से खेलता रहा, योनि के अन्दर बार-बार ऊँगलियाँ डालता-निकालता और चूसता रहा।

अंजलि अब बिल्कुल चुदने-चुदने हो चुकी थी। मेरा बलिष्ठ लण्ड भी बिल्कुल ताड़ के पेड़ की तरह ऊपर उठ चोदने-चोदने हो चुका था। मैंने अंजलि की योनि को अपने थूक से भर प्रिया और खड़े मोटे सरिये जैसे लौह-लण्ड को पूरा ज़ोर लगा कर भोंकना शुरू किया। अंजलि मारे खुशी और कुँवारेपन के शील-भन्ग के दर्द से चीत्कार कर उठी।

मेरी भाभो अपनी फटती हुए योनि के दर्द पर कराहती रही और मैंने धीरे-धीरे धकेलते हुए अपना समूचा लण्ड अपनी भाभो की बेहद सँकुचित चूत नली के अन्दर ठूँस प्रिया और ज़ोर-ज़ोर से पेलना शुरू कर प्रिया। ज़ल्द ही अंजलि को चूत दर्द का एहसास कम और मस्त चुदाई का नशा कहीं ज़्यादा होना प्रारम्भ हो गया। वो नीचे से अपनी चूत उछाल-उछाल कर पूरी रफ़्तार में चूत सिकोड़ती-ढील देती मेरे लण्ड को गपागप निगलती रही, मेरी इज़्ज़त लूटती रही।

शायद मेरे छोटे भाई ने आज तक उसे ऐसी यौन खुशी नहीं दी थी। मैं घपाघप धक्के मारता गया और अंजलि कोई एक घन्टे तक जन्म-जन्म की प्यासी मछली की तरह छटपटा-छटपटा कर मेरे लौह-लण्ड से आँखें बन्द कर धकाधक-धकाधक चुदती-चुदवाती रही।

वास्तव में मेरी अर्चना से भी परे, अंजलि एक बड़ी ही कसी हुई चूत की मालकिन प्रतीत हुई। मेरा लण्ड तो जैसे लेथ मशीन में पूरी तौर पर जाम होकर कसमसाता हुआ मस्त चूत की गहरी खाई के अन्दर ज़ोर-ज़ोर से भका-भक किसी रेती जैसी चूत-नली-दीवार द्वारा ताबड़तोड़ रगड़ाता जा रहा था। मोटर-पिस्टन जैसे इस तेज़-गति चुदाई के दौरान हम दोनों के अनवरत यौन-स्राव से मेरे स्टडी-रूम में अति-कामोत्तेज़क यौन-पूर्ण खुशबू फैल चुकी थी, तथा फचाफच चुदाई की घनघोर वासनोत्तेज़क आवाज़ हम दोनों की यौन-क्रिया उत्प्रेणनऔर काम-शक्ति बढ़ोत्तरी में अति-सहायक सिद्ध हो रही थी।

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हम दोनों पाशविक हविश के गुलाम बने वहशी जानवर की तरह कामाग्नि में लगातार जले जा रहे थे। मैं बड़ी ही तन्मयता से पागल कुत्ते की तरह अपने ही खास छोटे भाई की जवान विवाहिता पत्नी की कड़ी चूत को लण्ड धकेल-धकेल भचा-भच पेलता जा रहा था, उसके मोटे मान्सल स्तनों के गोश्त को नोचता जा रहा था, अपने दोनों हाथों से एक-एक स्तन को भचोड़ते हुये अपने मुँह में भकोसता जा रहा था, और अंजलि उतनी ही तन्मयता से पागल कुत्ती की तरह लगातार अपने भैसुर के लौह-लण्ड से चुदी जा रही थी, मेरे कड़े लौंड़े को अपनी चूत-नली के अन्दर निगली जा रही थी, मेरे जिह्वा में जिह्वा डाल मेरा मुख-स्राव चूसी जा रही थी।

आश्चर्य हो रहा था कि ना तो हम दोनों का दिल या मन भर रहा था, ना ही भोग-वासना की लज़ीज़ चाशनी में डूबा हुआ शरीर थक पा रहा था।

अति स्वस्थ यौन-क्रिया के तहत ये एक ऐसी सम्पूर्ण सन्तु्ष्टि वाली एक-दूसरे को स्वत: परोसी हुई स्वैच्छिक चुदाई थी कि उसे शब्दो में बता पाना शायद सम्भव नहीं।

अंजलि की चूत-चुदाई के चरम शिखर पहुँचते ही कम से कम 100 मिली लीटर वीर्य मेरे लौड़े से पिचकारी-जनित फ़व्वारे की तरह फूट निकला और मेरे अपने ही छोटे भाई की पत्नी के भगोष्ठ के अन्दर तेज़ गति से प्रवाहित हो गया। अंजलि तो जैसे अपने नायाब योनि के अन्दर और भगान्कुर के ठीक ऊपर मेरा इतना ज़्यादा, मलाई की तरह गाढा और गर्म वीर्य-फ़व्वारे की बरसात पाकर पूरे तौर पर सिन्चित होते हुये गुदगुदा कर निहाल और निढाल हो गई। उसके भगोष्ठ से भी अति-सुखद सम्भोग-पूर्ति इन्गित करता बेशुमार यौन-मीनू स्राव रिस पड़ा।

थोड़ी देर तक एक-दूसरे के ऊपर निढाल चिपके रहने के बाद हम दोनों ने 69 की दशा में छक कर एक-दूसरे का सम्भोगोपरान्त भरपूर यौन मीनू पान किया। हम दोनों हर रिश्ता भूलते हुए पूरी तौर पर एक दूसरे में समा चुके थे, जैसे दरिया का पानी सागर में समा कर खो जाता है, जैसे अन्डे की ज़र्दी और एलब्यूमिन को मिक्सी द्वारा ताबड़तोड़ फेंट कर एक कर प्रिया जाता है, जैसे शराब को सोडे से मिलाकर पी जाया जाता है।

इस अभूतपूर्व सन्तोषजनक तथा अतिसफ़ल प्रयास के बाद लगभग हर एक दिन बीच कर हम दोनों प्रगाढ़ नग्न सम्भोग करने लगे। हम दोनों के बीच एक प्रचण्ड यौन-रिश्ता तो पूरी तौर पर स्थापित हो ही चुका था, साथ ही एक अटूट प्यार का रिश्ता भी बन चुका था।

वस्तुत: हम दोनों एक दूसरे से अब तक हार्दिक, मानसिक, आत्मिक और शरीरिक रूप से पूरी तौर पर अत्यन्त करीब हो चुके थे, और पति-पत्नी की तरह एक-दूसरे के बीच निर्लज्जता की सभी रीमाओं को लांघ चुके थे। सीढ़ियों से उसके क़दमों की आहट आते ही मैं निर्वस्त्र हो जाया करता था, और वो अन्दर आ कर मेरे स्टडी-रूम का दरवाज़ा बन्द करते ही अपनी झीनी पारदर्शी मैक्सी उतार फेंकती थी।

अंजलि अच्छी तरह जानती थी कि मुझे अपने हाथों से उसका विशाल सख्त ब्रेसियर का हुक खोलना, भारी-भारी स्तनों के गोश्त दबाना और धीरे-धीरे प्यार से सहलाते हुए ब्रेसियर उतारना, चुचूक-चूषण करना एवम साथ ही धीरे-धीरे माँसल कमर के नीचे उसकी जाँघिया सरकाते और घने काले झाँटों से खेलते हुए उसे पूर्ण नग्न करना मुझे अत्यन्त भाता है। अत: मैक्सी को अपने बेहद खूबसूरत तन से अलग करते ही मेरी जवान भाभो अपने आप को एक अति-स्वादिष्ट भोजन की तरह मेरे आगे परोस देती थी। मेरे मुँह में अंजलि उतने ही प्यार से अपना स्तन डालती थी, जैसे अपने बच्चे के मुँह में एक माँ इस इच्छा के साथ एक-एक कर अपना दोनों फूला हुआ दुधुआ डालती है ताकि बच्चा ज़्यादा से ज़्यादा दूध पूरी ताक़त के साथ चूस कर पी जाए।

मैं अपने से दस वर्ष छोटी जवान भाभो के भरे-भरे, भारी-भारी स्तनों के साथ खेलता भी था और बच्चे की तरह पीता भी था। अंजलि के ताज़ा स्तन निप्पल से दूध तो नहीं निकलता था, पर ज़ोर-ज़ोर से चूसने पर एक बड़ा ही स्वादिस्ट लसलसा पदार्थ बाहर आता था जिसके सेवन से हम दोनों की काम-पिपासा और काम-शक्ति कहीं ज़्यादा बढ़ जाती थी।

प्रचण्ड वासना और हविश के वशीभूत, सम्भोग से पूर्व हम दोनों एक दूसरे के नग्न-शरीर पर आपसी सामन्जस्य-रत गर्म मूत्र विसर्जन का मजा भी लेते थे, फ़िर एक-दूसरे के हर गोश्त भरे अंग को, और विशेषकर यौनान्गों को पूरे नंगे हो कर खूब चूसते, चाटते, काटते और नोचते रहते थे, जिसके प्रतिफल से अंजलि के भगोष्ठ-द्वार से रिसने वाले गाढ़े यौन-मीनू की मात्रा काफ़ी बढ़ जाती थी। तथापि, इस यौन-मीनू का भरपूर सेवन करते हुए मैं अंजलि की बेज़ोड़ चुस्त चूत के अन्दर पूरी ताकत से अपना लौड़ा भोंक-भोंक कर घन्टों चूत-चोदन करता रहतता था, बिल्कुल ऐसे ही जैसे गर्म आग की भट्टी में और आग झोंक कर कड़ा लोहा ठूँस-ठूँस पिघलाया जाता है।

अंजलि के अति मान्सल कंचन जैसे कन्धों, बाजूओं, चूचियों, चुचूकों, कूल्हों, जांघों और भगोष्ठ के गोश्त घन्टों चाटने, चूसने, नोचने, काटने, भकोसने और चबाने में मुझे स्वर्ग का सुख मिलता था। अंजलि भी सम्भोग-क्रिया के अन्तर्गत चुदाई से पूर्व मेरे गदह-लन्ड को अपने गले के अन्दर तक ले जाकर उसका लसलसा यौन-रस चूसती रहती थी और देर तक मुख-चोदन करती थी।

बीच चुदाई में भी हम दोनों कई बार रुक-रुक कर एक-दूसरे के मिश्रित यौन-रस से सना लन्ड और चूत भरपूर चूसते-चाटते रहते थे। इस क्रिया के द्वारा न सिर्फ़ हम दोनों की काम-पिपासा बढ़ती थी, बल्कि हम शिखर वीर्य-स्खलन की अवधि भी अपनी इच्छानुसार बढ़ाते रहते थे।

एक दूसरे को हम जितना ही पा रहे थे उतना ही पाने का और प्रबल नशा सा छाया रहता था। मेरी खातिर जैसे मेरी ज़िन्दगी में सिर्फ़ चुदास अंजलि के सिवा और किसी चीज़ की कोई अहमियत नहीं रह गई थी। वैसे ही मेरी भाभो के दिल में इस अति-चुदास भैसुर को बार-बार नग्न आत्म-सात करने के सिवा कोई और अरमान नहीं नज़र आता था।

बार-बार कहती- भैया, अपने गदह-लन्ड के द्वारा एलशीशियन कुत्ते की गति से चोद कर मेरी चूत बुरी तरह फाड़ डालिये, हर धक्के में अपने कड़े लौड़े को पूरा बाहर निकालिए और पूरा अन्दर घुसाइये, ताकि आपके लौह-लन्ड से मेरा भगोष्ठ-द्वार बार-बार टकराए, एवं बार-बार बुरी तरह रगड़ा कर मेरी भगोष्ठ और चूत के अन्दर भगान्कुर तक की दीवार, साथ ही आपका विशाल स्तूपनुमा लौड़ा ऐसा ज़ोरदार गुदगुदाए कि हम दोनों का वर्षों से भूखा-प्यासा कामाग्नि में धू-धू जलता शरीर पूर्ण सन्तुष्टि पा सके! भैया, बस सिर्फ़ आप धकेल-धकेल कर धुँआधार पेलते चले जाइये और गाढ़े गर्म धात की पिचकारी छोड़ते जाइये, मेरी भगान्कुर को सराबोर करते जाइये।

अनेकों बार ऐसा भी हुआ कि हमने दूध पीते हुये और उबला अण्डा खाते हुये एक दिन में तीन-तीन चार-चार पाँच-पाँच बार एक-दूसरे को खूब ज़ोर-ज़ोर से चोदा और बुरी तरह अपने जंगली यौन की नंगी राक्षसी भूख-प्यास मिटाई। पर चुदाई की यह आग, भूख और प्यास दिनोंदिन बढ़ती ही गई।

वैसे तो पहले भी मैंने अनेकों पराई विवाहित एवं अविवाहित युवा लड़कियों, परिपक्व औरतों, अतिपरिपक्व महिलाओं और प्रौढ़ औरतों के साथ नग्न चूंची चूषण और प्रगाढ़ चूत चुदाई का चरम सुख प्राप्त किया है। पर अंजलि जैसी, या यूं कहें कि एक सिने-तारिका जैसी जवान, शारीरिक रूप से बेहद मालदार और उदाहरणीय यौन क्रियाशील भाभो को उन्मुक्त यौन-क्रिया हेतु सुलभता से पाकर मैं जन्मों-जन्मों के लिए धन्य हो गया।

ऐसा महसूस होता है जैसे मैं और अंजलि दिन पर दिन और भी जवान होते जा रहे हैं। हर धुँआधार नग्न चुदाई के बाद हम दोनों भाभो और भैसुर एक ही शावर के नीचे नंगे नहाते हैं, और मूड आ जाने पर एक बार फ़िर नहाते हुए प्यासी अंजलि की ज़ोरदार चूत-चुदाई कर लिया करते हैं।

एक-दूसरे की खातिर पूर्ण ईमानदारी से समर्पित इस सुखद निर्वस्त्र यौन-भोग कार्य हेतु हाल ही में मैंने एक हवा भरने वाला बड़ा सा वाटर-प्रूफ़ गद्दा खरीद लिया है, जिसे शावर के नीचे बिछा कर हम दोनों अभूतपूर्व भीगा-भीगा नग्न यौन-सुख प्राप्त किया करते हैं। वैसे ही, कभी-कभी छत की सीढ़ी का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर खुली धूप में गद्दा-चादर बिछा कर खुले आसमान के नीचे गर्म चुदाई का ताबड़तोड़ मजा भी लेते हैं।

मेरी ज़िन्दगी में मेरी अपनी ही भाभो के द्वारा बार-बार प्रिया गया, प्रिया जा रहा और आगे भी अनवरत प्रिया जाने वाला यह अमर प्रेम तथा अनूठा यौन और यौवन से परिपूर्ण भरपूर नग्न पाशविक सम्भोग सुख, शायद ईश्वर का एक ऐसा वरदान है जो विरले ही किसी को प्राप्त हो। शायद यह हम दोनों के पूर्व-जन्म के कुछ अच्छे कर्मों का फल है कि हम दोनों दुनिया की नज़र में पति-पत्नी ना होते हुए भी उम्मीद से कहीं ज़्यादा सन्तुष्टि के साथ एक-दूसरे का भरपूर निर्वस्त्र यौवन-भोग कर रहे हैं।

अंजलि ने कई बार अपने दिल के आन्तरिक तलों से असीम आभार और उद्गार प्रगट करते हुए यह स्वीकारा है, बल्कि अनुमोदन किया है कि जेठ और भाभो के बीच हो रही बारम्बार नग्न चुसाई और चुदाई जब इस क़दर भरपूर, सुखद, सफल और मस्त जवानी की पुनर्वास लाने वाली साबित हो रही है, तो दुनिया के हर भैसुर-भाभो को सम्भोग-रत होने की उत्प्रेरणा और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, ताकि वो जीवन के सच्चे सुख से रूबरू हो सकें और उनकी ज़िन्दगियों से दुख: कोसों दूर चला जाए।

वस्तुत: अपनी प्यारी भाभो की हक़ीक़त से भरी इस अनोखी अभिव्यक्ति की तारीफ़ में मैं जो कुछ भी कह पा रहा हूँ, शायद वो बहुत ही कम है, न सिर्फ़ इसलिये कि हम दोनों ने एक-दूसरे को रज़ामन्दी से बेहद-बेहद चोदा है, बल्कि इसलिये कि हम दोनों ने आन्तरिक प्यार भरी चुदाई का वो नैसर्गिक स्वाद लिया है, पूर्ण-नग्न सम्भोग-जनित एक ऐसे मर्म को समझा और महसूस किया है जो आमतौर पर कोई वास्तविक पति-पत्नी भी शायद ही समझ पाया हो।

पर मैंने एक बेहद सच्ची और जीवन्त घटना बयान किया है, जो अभी भी मेरी ज़िन्दगी में ज़ारी है। यहाँ तक कि यह भी एक हक़ीक़त है कि आज रविवार होने के प्रतिफल से अभी-अभी, यह सच्चाई लिखने के थोड़ी ही देर पहले मेरे और अंजलि के बीच एक प्रगाढ़ नग्न सम्भोग सम्पन्न हुआ है, तथा अभी से कोई घन्टे भर बाद भी हम दोनों पुन: एक बार शावर के नीचे एक-दूसरे का लौड़ा और चूत चूसते हुए भयन्कर नग्न चुदाई के लिये कटिबद्ध हैं।

आज की छुट्टी का पूरा दिन और पूरी रात हमारे पूर्ण रूप से प्रेम-पूर्वक समर्पित जन्गली शारीरिक सम्भोग सुख-पूर्ति की खातिर तत्पर है। खुदाई प्यार से सिंचित सम्भोग के समक्ष कामान्धता के ज़रिये प्रेम-रहित चुदाई कोई महत्व नहीं रखती। अपने से कम या ज़्यादा उम्र की सम्पूर्ण यौन तुष्टि की तलाश वाली स्त्रियों को मैं उन्नत ढन्ग से अति प्रेम-पूर्वक चोदने के लिये सदा तैयार और तत्पर हूँ।support@mohakkisse.com

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श्रृंखला

कहानी श्रृंखला (STORY SERIES)

अक्षतयौवना अंजलि का स्वैच्छिक समर्पण

कुल भाग: 2
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