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भाभी की चुदाई पठन समय: 20 मिनट पढ़ा गया: 649 बार

एक ही थैली के चट्टे बट्टे-4

मस्तराम

28 Jan 2024 को प्रकाशित

एक ही थैली के चट्टे बट्टे-4
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मेरे पति को अब तीस पैंतीस दिन तक किसी टूर पर नहीं जाना था, उन्होंने शिल्पा वाली कहानी कई दिनों तक मुझसे बड़ी बारीकी से सुनी थी ऑर फिर हसरत जाहिर की थी कि काश इस बार शिल्पा जब घर आये तो वो भी मौजूद हों, इस बात पर अफ़सोस भी जताया था कि जब शिल्पा वाली घटना घटी तब वह वहाँ क्यों नहीं थे.

वे इस बार टूर से सिर्फ सौन्दर्य प्रसाधन नहीं लाये थे बल्कि कई इंग्लिश मैगजीन भी लाये थे, जिनका विषय एक ही था सेक्स. उन मैगजीनों में अनेक भरी सेक्स अपील वाली मोडल्स के उत्तेजक नग्न व अर्धनग्न चित्र थे, कुछ कामोत्तेजक कहानियाँ व उदाहरण आदि थे तथा दुनिया के सेक्स से संबंधित कुछ मुख्य समाचार थे.मैं कई दिनों तक खाली समय में उन मैगजींस को देखती व पढ़ती रही थी.

दरअसल मेरी ससुराल इस शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक कस्बे में है, जहाँ से कभी किसी काम से मेरी ससुराल के अन्य लोग आते रहते हैं, कभी मेरे वृद्ध ससुर तो कभी ननद शिल्पा, कभी मेरा एक मात्र देवर जो शिल्पा से चार वर्ष बड़ा है, अगर शहर में उनमें से किसी को शाम हो जाती है तो वे हमारे घर में ही ठहरते हैं.

एक दिन फिर मेरी ससुराल से एक शख्स आया, वह मेरा देवर था. शाम के पांच बजे वह हमारे घर आया था, मेरे पति घर पर नहीं थे, ऑफिस से साढ़े पांच या छः बजे तक ही आते थे.

मैं सोफे पर बैठी इंग्लिश मैगजीन पढ़ रही थी, तभी कॉल-बेल बजी, मैंने मैगजीन को सेंटर टेबल पर डाला ऑर यह सोचते हुए दरवाजा खोला कि शायद मेरे पति आज ऑफिस से जल्दी आ गए हैं, लेकिन दरवाजा खोला तो पाया कि मेरा देवर जतिन सामने खड़ा है, उसने कुर्ता पायजामा पहन रखा था, वह कुर्ता पायजामा में काफी जाँच रहा था.

“भाभी जी नमस्ते!” उसने कहा और अन्दर आ गया.“कहो जतिन! आज कैसे रास्ता भूल गये? तुम तो अपनी भाभी को पसंद ही नहीं करते शायद!” मैंने दरवाजे को लॉक करके उसकी ओर मुड़ कर कहा.“ऐसा किसने कहा आपसे?” वह सोफे पर बैठ कर बोला. वह मेज़ से उस मैगजीन को उठा चुका था जिसे मैं देख रही थी.

मेरे दिल में धड़का हुआ, मैगजीन तो कामोत्तेजक सामग्री से भरी पड़ी थी, कहीं जतिन उसे पढ़ न ले, मैंने सोचा लेकिन फिर इस विचार ने मेरे मन को ठंडक पहुंचा दी कि अगर यह मैगजीन पढ़ ले तब हो सकता है उसकी मर्दानगी का स्वाद आज मिल जाए, इसमें भी तो जोश एकदम फ्रेश होगा! मैं निश्चिंत हो गई.

“कौन कहेगा… मैं जानती हूँ! अगर मैं तुम्हें पसंद होती तो क्या तुम यहाँ छः छः महीने में आते? आज कितने दिनों बाद शक्ल दिखा रहे हो… पूरे साढ़े पांच महीने बाद आये हो, तब भी सिर्फ एक घंटे के लिए आये थे!” मैं उसके सामने सोफे पर बैठ कर बोली.

मैंने ब्रेजियर और पेंटी पहन कर सिर्फ एक सूती मैक्सी पहन रखी थी, जिसके गहरे गले के दो बटन खुले हुए भी थे, वहाँ से मेरे गोरे गोरे सीने का रंग प्रकट हो रहा था.

मैंने देखा कि जतिन ने चोर नजरों से उस स्थान को देखा था फिर नजर झुका कर कहा- यह तो बेकार की बात है… आप जानती ही हैं कि मैं कितना व्यस्त रहता हूँ. कंप्यूटर कोर्स, पढ़ाई और फिर घर का काम… चक्की सी बनी रहती है, आज थोड़ा टाइम मिला तो इधर चला आया, वो भी शिल्पा ने भेज प्रिया क्योंकि भाई साहब ने फोन किया था, उन्होंने शिल्पा को बुलाया था कहा था कि उसे कुछ कपड़े दिलवाने हैं, शिल्पा को तो आज अपनी एक सहेली की शादी में जाना था सो उसने मुझे भेज प्रिया… जतिन बोला.

मैं समझ गई कि मेरे पति ने शिल्पा को किसलिए फोन किया होगा, कपड़े दिलवाने का तो एक बहाना है, असल बात तो वही है जिसकी उन्होंने तमन्ना जाहिर की थी.“आज ही बुलाया था तुम्हारे भैया ने शिल्पा को?” मैंने जतिन से पूछा.“हाँ… कहा था कि आज या कल सुबह आ जाना!” जतिन बोला.

“अच्छा तुम बैठो मैं पानी-वानी लाती हूँ!” मैंने यह कहा और सोफे से उठ कर रसोई की ओर चली गई, फ्रिज में से पानी की बोतल निकाल कर एक ग्लास में पानी डाला और ग्लास अपने देवर जतिन के सम्मुख जरा झुक कर ग्लास उसकी ओर बढ़ा कर बोली- लो पानी पीयो! मैं चाय बनाती हूँ!

जतिन ने सकपका कर मैगजीन से नजर हटाई, मैंने देख लिया था- वह एक मोडल का उत्तेजक फोटो बड़ी तल्लीनता से देख रहा था, उसके चेहरे पर ऐसे भाव आ गए जैसे चोरी पकड़ी गई हो!

उसने कांपते हाथ से ग्लास ले लिया, मेरी ओर देखने पर उसकी पैनी नजर मेरे खुले सीने पर अन्दर ब्रेजरी तक होकर वापस लौट आई, वह नजर झुका कर पानी पीने लगा तो मैं मन ही मन मुस्कुराती हुई रसोई में चली गई.

मैंने चाय पांच मिनट में ही बना ली, चाय लेकर मैं वापस ड्राइंग रूम पहुंची तो देखा कि जतिन तपते चेहरे से मैगजीन को पढ़ रहा है, मेरी आहट पाते ही उसने मैगजीन मेज़ पर उलट कर रख दी,

“लो चाय… चाय का एक कप ट्रे में से उठा कर मैंने उसकी ओर बढ़ाया, उसने कंपकंपाते हाथ से कप पकड़ लिया और नजर चुरा कर कप में फूंक मारने लगा, मैंने भी एक कप उठा लिया, मैंने महसूस कर लिया कि जतिन सेक्स के प्रति अभी संकोची भी है और अज्ञानी भी, ऐसे युवक से संबंध स्थापित करने का एक अलग ही मजा होता है, मैं सोचने लगी कि जतिन से कैसे सेक्स संबंध विकसित किया जाये ताकि मेरी यौन पिपासा में शांति पड़े.

उसके गोल चेहरे और अकसर शांत रहने वाली आँखों में मैं यह देख चकी थी कि कामोत्तेजक मैगजीन ने शांत झील में पत्थर मार प्रिया है और अब उसके मन में काम-भावना से संबंधित भंवर बनने लगे हैं, वह खामोशी से चाय पी रहा था, मेरी ओर यदा कदा देख लेता था.

तभी फोन की घंटी बज उठी, मैंने सोफे से उठ कर फोन का रिसीवर उठाया ओर उसे कान में लगा कर बोली- हेलो! आप कौन बोल रहे हैं?“जानेमन हम तुम्हारे पति बोल रहे हैं.” उधर से मेरे पति का स्वर आया- हम थोड़ी देर में आयेंगे… तुम परेशान मत होना… ओ.के…इतना कह कर उन्होंने संबंध विच्छेद भी कर प्रिया.

“किसका फोन था?” जतिन ने प्रश्न किया.“तुम्हारे भाई साहब का…! मेरी कुछ सुनी भी नहीं और थोड़ी देर से आयेंगे ये कह कर रिसीवर भी रख प्रिया.” मैंने दोबारा उसके सामने बैठते हुए कहा.“अब तक उनकी आदत ऐसी ही है… कमाल है!” जतिन बोला.

वह चाय ख़त्म कर चुका था, खाली कप उसने मेज़ पर रख प्रिया, मैं भी चाय पी चुकी थी.

“चलो टी. वी देखते हैं…” मैं सोफे से उठती हुई बोली, मैंने एक शरीर-तोड़ अंगड़ाई ली, मेरी मेक्सी में से मेरा शरीर बाहर निकलने को हुआ, जतिन के होंठों पर उसकी जीभ ने गीलापन बिखेरा और आँखें अपनी कटोरियों से बाहर आने को हुई.

मैंने टेबल से मैगजीन उठा ली और बेडरूम की ओर चल दी, जतिन मेरे पीछे पीछे था.

मैंने बेडरूम में पहुँच कर टी.वी. ऑन करके केबल पर सेट किया एक अंग्रेजी चैनल लगाया ओर बेड पर अधलेटी मुद्रा में बेड की पुश्त से पीठ लगा कर बैठ गई और मैगजीन खोल कर देखने लगी, जतिन भी बेड पर बैठ गया लेकिन मुझसे फासला बना कर.“मुझमें कांटे लगे हैं क्या?” मैंने उससे कहा.“जी… जी… क्या मतलब?” जतिन हड़बड़ा कर बोला.“तुम मुझसे इतनी दूर जो बैठे हो…!” मैंने मैगजीन को बंद करके पुश्त पर रख कर कहा.“ओह्ह… लो नजदीक बैठ जाता हूँ!” कह कर वह मेरे निकट आ गया.

उसके और मेरे शरीर में मुश्किल से चार छः अंगुल का फासला रह गया.

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“तबियत ठीक नहीं है तुम्हारी…? कान कैसे लाल हो रहे हैं…! मैंने उसके चेहरे को देख कर कहा ओर उसके माथे पर हाथ लगा कर बोली- ओहो… माथा तो तप रहा है… ऐसा लगता है कि तुम्हें बुखार है… दर्द-वर्द तो नहीं हो रहा सिर में…! हो रहा हो तो सिर दबा दूँ!” मैंने कहा.“हो तो रहा है भाभी जी… दोपहर से ही सर दर्द है…! अगर दबा दोगी तो बढ़िया ही है!” जतिन बोला.

“लाओ… गोद में रख लो सिर…” मैंने उसके सिर को अपनी ओर झुकाते हुए कहा.उसने ऐतराज नहीं किया और मेरी जाँघों के जोड़ पर सिर रख कर लेट गया, मैं उसके माथे को हल्के हल्के दबाने लगी और मेरे मस्तिस्क में काम-विषयक अनार से छूटने शुरू हो गये थे.

“भाभी… आप बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?” जतिन बोला.“पूछो… एक क्यों दस पूछो…” मैं टीवी से नजर हटा कर उसकी बड़ी बड़ी आँखों में झांक कर बोली.“यह जो मैगजीन है, इसे आप पढ़ती हैं या भाई साहब?” जतिन ने प्रश्न किया.हम दोनों ही पढ़ते हैं क्यों…? मैंने कहा.“दोनों ही…आपको क्या जरूरत है ऐसी मैगजीन पढ़ने की?” वह बोला.“क्यों? हम दोनों क्यों नहीं पढ़ सकते… हमें जरूरत नहीं पड़नी चाहिए?” मैं बोली.“और क्या… आप तो शादी शुदा हो… इसकी या ऐसी मैगजीन मेरे जैसे कुंवारों के लिए ठीक रहती है!” जतिन बोला.“क्यों… जो आनन्द इस मैगजीन से कुंवारे ले सकते हैं… उस पर हमारा अधिकार नहीं है क्या? कैसी बातें करते हो तुम…” मैं उसकी कनपटियाँ सहला कर बोली.

“अरे वाह… आपको आनन्द के लिये मैगजीन की क्या जरूरत? आपके पास तो जीवित आनन्द देने वाली मशीन है… मेरे कहने का मतलब है कि आप भैया से आनन्द ले सकती हो और वे आपसे… परेशानी तो हम जैसों की है… जो अपनी आँखों की प्यास बुझाने के लिये ऐसी मैगजीनों पर आश्रित हैं.” जतिन ने बात को गंभीर मोड़ प्रिया.

“ओहो… तो मेरे देवर की आँखें प्यासी रहती हैं तभी ऐसी बातें कर रहे हो…” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, फ़िर बोली- तो क्या तुमने अभी तक अपनी आँखों की प्यास नहीं बुझाई… मेरे कहने का मतलब ये है कि… क्या इन बड़ी बड़ी आँखों को देवी दर्शन नहीं हुए?“देवी दर्शन?” वह इस शब्द पर उलझ गया.“यानि कि किसी युवती को बिना कपड़ों के नहीं देखा?” मैंने देवी दर्शन का मतलब समझाया.“इसे कहते हो आप देवी दर्शन… वाकई आप तो जीनियस हो भाभी जी… वैसे कह ठीक रही हो आप! अपनी किस्मत में ऐसा कोई मौका अभी तक नहीं आया है, आगे भी शायद ही आये…” वह सोचता हुआ सा बोला, फ़िर टी.वी पर आते एक दृश्य में दो मिनी स्कर्ट वाली लड़कियों को देख कर बोला- टी.वी. या किताबों में ही देख कर संतोष करना पड़ता है!

“तुम सचमुच ही बद-किस्मत हो, लेकिन एक बात बताओ! जब तुम ऐसी मैगजीन देख लेते होगे तब तो और प्यास भड़क उठती होगी और शरीर में उत्तेजना भी फ़ैल जाती होगी… उस उत्तेजना को तुम कैसे शांत करते हो फ़िर?” मैं बोली.“क्या भाभी जी आप भी कैसी बातें करती हो? क्यों मेरे जख्म पर नमक छिड़क रही हो… कैसे शांत करता हूँ… अपना हाथ जगन्नाथ…!” वह बोला.“यानि अपने हाथ से ही अपने को संतुष्ट कर लेते हो और अगर मैं तुम्हारी ये मुश्किल दूर कर दूँ तो?” मैंने उसके गालों को सहला कर भेद भरे स्वर में कहा, मेरी आँखें रंगीन हो चुकी थी.“क्या? आप कैसे मेरी मुश्किल दूर कर सकती हैं?” वह जिज्ञासु होकर बोला.

“इस बात को छोड़ो… यह बताओ कि अगर मैं तुम्हें यह छूट दे दूँ कि तुम मेरे कठोर और सुन्दर स्तनों को कपड़े हटा कर देख सकते हो तो बताओ तुम क्या करोगे?” मैंने अब उससे एकदम साफ़ कहा.“जी… जी…” वह सकपका गया, उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ और बोला- आप तो मजाक कर रही हो भाभी!“चलो मजाक में ही सही अगर कह दूँ तो क्या… कह ही रही हूँ… जतिन देवर जी… अगर तुम चाहो तो मेरे गाउन के चारों बटन खोल कर मेरी ब्रा में कैद मेरे स्तनों को ब्रा को हटा कर देख सकते हो…” मैंने उसके कुरते के गले में हाथ डाल कर उसके मजबूत सीने को सहला कर कहा.“लगता है आप मुझ पर मेहरबान हैं या फ़िर मजाक कर रहीं हैं…!” उसे अभी भी यकीन नहीं आया.

“ओहो… बड़े शक्की आदमी हो… चलो मैं ही तुम्हारे स्तनों को देख भी लेती हूँ और मसल भी देती हूँ…” मैंने झल्ला कर उसके सीने पर मौजूद उसके दोनों छोटे छोटे निप्पलों को मसलना शुरू कर प्रिया.“उफ… यह क्या कर रही हो भाभी…मुझे परेशानी होगी…!” वह मचल कर बोला.“अब तुम तो कुछ करने को तैयार नहीं हो… तो मुझे ही कुछ करना पड़ेगा ना…!” मैंने कहा.

अब जतिन से पीछे नहीं रहा गया, उसने अपने ऊपर मुझे लेते हुए मेरे स्तनों को मेक्सी के ऊपर से ही सहलाना शुरु कर प्रिया और बोला- आज तो आप मुझे कत्ल कर के ही छोड़ेंगी… ये दोनों पर्वत कब से मुझे परेशान कर रहे हैं… अब मुझे मौका मिला है इन्हें परेशान करने का…” वह मेक्सी के बटन खोलने लगा था, उसकी क्रिया में बेताबी थी, मैं उसके कुर्ते के बटन खोल कर उसके सीने को सहला रही थी.

उसने कांपते हाँथों से मेक्सी के दोनों पल्लों को स्तनों से हटा कर ब्रेजरी के कप को नीचे कर प्रिया और स्तब्ध निगाहों से पहले मेरे गुलाबी रंग के कठोर स्तनों को देखता रहा फ़िर मैंने ही स्तन के निप्पल को उसके होठों में देकर कहा- लो… बुझाओ प्यास… मैं जानती हूँ… जबसे तुमने मैगजीन देखी है… तब से ही तुम्हारी प्यास भड़क उठी है!

उसने निप्पल मुंह में ले लिया और उसे चूसते हुए दूसरे स्तन को भी ब्रेजरी के कप में से निकालने की कोशिश करने लगा, उसकी कोशिश देख कर मैंने हाथों को पीछे ले जा कर ब्रेजरी के हुक को खोल प्रिया तो उसने दूसरे स्तन को भी उसके कप से निकाल कर हाथ में ले लिया और उसके निप्पल को जोर जोर से मसलने लगा.

मैं तरंगित होती जा रही थी, मैगजीन के पन्नों ने मेरी नसों का लहू गर्म कर प्रिया था, जिसको शीतल करने के लिये मुझे भी एक पुरुषीय-वर्षा की जरूरत थी, मैं उसके बालों को सहला रही थी.“चूसो जतिन! जितना चाहो चूसो… तुम्हारे भईया को भी यही पसंद है…” मैंने उत्तेजित होते हुए कहा.

“लेकिन मेरी दिलचस्पी तो दूसरी चीज में भी है, उसे भी चूसने की इजाजत मिल जाये तो मजा दोगुना हो जाये…!” जतिन ने निप्पल को मुंह से निकाल कर कहा.“उफ… पहले इस पहली चीज से तो जी भर लो! वह दूसरी चीज भी दूर नहीं है…” मैंने उसकी क्रिया से आनन्दित होते हुए कहा.

मेरे हाथ उसके पाजामे पर पहुँच चुके थे, मैं उसके नाड़े को खोलने ही जा रही थी कि उसने जरा नीचे को सरक कर मेरे सपाट चिकने पेट और नाभि को चूमना शुरू कर प्रिया, वह मेरी मेक्सी से परेशान होने लगा था, मैंने मेक्सी को शरीर से अलग कर प्रिया और पूरी तरह चित लेट गई, मेरी यौवन संपदा को साक्षात देख कर वह पागल सा होने लगा, मेरी जाँघों को और मेरे गोरे पांव के तलवों को पागलों की तरह जोर जोर से चूमने चाटने लगा.

मैं भी पागलों सी हो गई, मेरे कंठ से कामुक सिसकारियाँ छूटने लगी, उसके होंठ और उसकी जीभ मेरे शरीर में नया सा नशा घोलने लगी, वह मेरी टांगों के जरा जरा से हिस्से को चूम रहा था और सहला रहा था, उसने मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे पेट के बल लिटा प्रिया, अब मेरी पीठ और नितंबों के चूमे जाने का नंम्बर था, वह बड़ी ही कुशलता से मेरे संवेदनशील शरीर को सहला रहा था और चूम रहा था.“तुम तो पूरे गुरु आदमी हो उफ… कैसे मेरे… उफ… .उफ… कैसे मेरे सारे शरीर में हर अंगुल पर एक ज्वालामुखी सा रखते हो… उफ…” मैं तरंगित स्वर में बोल रही थी- उफ… कहीं से ट्रेनिंग ली है क्या?“ऐसा ही समझो भाभी… मैं एक कम्प्यूटर आर्टिस्ट हूँ… कम्प्यूटर की कई सी.डी. ऐसी आती हैं जिनमें संभोग के गजब गजब के आसन और मुद्रायें होती हैं…” उसने मेरे नितंबों से पेंटी सरकाते हुए कहा.

वह अब मेरे नितंबों पर चुंबन धर रहा था, मैं शोला बन गई थी, मेरी उत्तेजना शिखर पर पहुँच गई थी.अब मुझसे रुका नहीं जा रहा था लेकिन फ़िर भी जतिन द्वारा मिलते चुंबनों के आनन्द ने मुझे और प्यासा बना डाला था, मैं चाहती थी कि मेरे शरीर के पोर पोर से वह काम रस चूस ले और मुझे पागल करके छोड़ दे.

वह अपनी क्रिया में व्यस्त था, मैं पुनः पीठ के बल हो गई थी और वह मेरी जाँघों को खोल कर मेरी केश विहीन योनि को चूस रहा था, मैं उत्तेजना में अपने स्तनों को स्वयं ही मथ रही थी.“अपनी टांगें मेरी तरफ कर लो…” मैंने उससे कहा, तो उसने मेरा कहा मान लिया, उसके पाँव मेरे सिर के भी पीछे तक चले गए, मैंने फुर्ती से उसका पाजामा व अंडरवीयर उसके उत्तेजित लिंग से हटाया और आठ नौ इंच के लिंग को मुंह में ले लिया, उसका लिंग मेरे पति से मोटा था इस कारण मुझे होंठ पूरे खोलने पड़ गये, मैं उसे चूसने लगी.

अब तड़पने और उछलने की बारी उसकी थी.“उफ… उफ… भा… भाभी… .आप तो लगता है मुंह में निचोड़ लेंगी मुझे… उफ…!”

“यह पहला टेस्ट तो मैं मुंह से ही लूंगी… फ़िर योनि में डलवाऊँगी, तुम लगे रहो उस काम में, जिसमें लगे हो…” इतना कह कर मैं फ़िर लिंग चूसने लगी, जतिन लिंग पर मेरे होठों का घर्षण अधिक देर तक नहीं झेल पाया और वह मेरी योनि को भूल कर मेरे कंठ में ही तेजी से धक्के मार कर स्खलित हो गया, उसका सुगन्धित व खौलता वीर्य मैं पी गई, फ़िर भी मैंने लिंग को नहीं छोड़ा और उसे चूस चूस कर पुनः उत्तेजित करने लगी.थोड़ी देर मैं वह फ़िर कठोर हो गया तो मैंने योनि में उसे डलवाया.

जतिन ने ऐसे ऐसे ढंग से योनि को लिंग से रगड़ा कि मैं चीख पड़ी, उसने अन्ततः बेड से नीचे उतर कर खड़े होकर मेरी जाँघों को खोलकर ऐसे धक्के मारे कि मैं तृप्त हो गई और चरमोत्कर्ष तक पहुंची, वह पुनः स्खलित हो कर मुझसे लिपट गया.

अब मैं और मेरे पति इतने उन्मुक्त हो गये हैं कि मेरे घर मेरा देवर आ जाये, मेरा भाई आ जाये, शिल्पा आ जाये या मेरी कोई सहेली आ जाये या मेरे पति का कोई दोस्त आ जाये हम लोग हर किसी को अपनी काम क्रीड़ा में शामिल कर लेते हैं.

मेरी कामुकता ने सारी हदें पार कर दी हैं, मुझे तो कपड़े अच्छे लगते ही नहीं है, अब उस दिन मेरे ससुर आये थे तब भी मैंने ब्रा-पेंटी पर पारदर्शी गाउन पहन रखा था और मेरे पति ने उनकी उपस्थिति में भी शर्म ना की और मेरे उभारों को चूमते रहे!मेरे ससुर को ही ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में जाना पड़ा था!

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