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जीजा साली की चुदाई पठन समय: 9 मिनट पढ़ा गया: 792 बार

लाजो का उद्धार-3

लीलाधर

18 Apr 2011 को प्रकाशित

लाजो का उद्धार-3
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एक एक हुक खुलता हुआ ऐसे अलग हो जाता था जैसे बछड़ा बंधन छूटकर भागा हो। सारे हुक खोलकर उसने पीठ से ब्लाउज के दोनों हिस्सों को फैला दिया। गोरी पीठ सफेद ब्रा के फीते की हल्की-सी धुंधलाहट को छोड़कर जगमगाने लगी। दोनों तरफ बगलों से चिपके ब्लाउज के पल्ले उलटकर अपने ही भार से उसकी त्वचा से अलग होने लगे। रेशमा ब्रा के फीते में उंगली फँसाकर खींची, “बाप रे, कितना टाइट पहनती हो !” कहते हुए उसने ब्रा की हुक भी खोल दी।

“अरे दीदी…” लाजो जब तक आपत्ति करती तब तक हुक खुल चुकी थी और रेशमा ‘इसे क्या भीगे ही पहनी रहोगी?’ कहकर उसकी बात पर विराम लगा चुकी थी।

लाजो खड़ी हो गई। रेशमा ने झुककर साड़ी उठाई ओर उसके कंधों पर लपेटती हुई बोली, “निकालकर दे दो।”

लाजो एक क्षण ठहरी। बड़ी बहन की आँखों की दृढ़ताभरी चमक थी। वैसे भी, हट्टी-कट्टी कद-काठी की रेशमा के सामने शर्मीली, मुलायम लाजो का टिकना मुश्किल था। लाजो ने साड़ी के अंदर ही ब्लाउज और ब्रा को छातियों, कंधों और बाँहों पर से खिसकाया और निकालकर बहन की ओर बढ़ा दिया।

“जानू !” रेशमा ने मुझे आवाज लगाई।

लाजो के मुँह से ‘अर्र… अरे !’ की चीख निकली और वह एकदम हड़बड़ाकर साड़ी लपेटकर सोफे पर धम से बैठ गई। मेरे पहुँचते ही रेशमा ने भीगा ब्लाउज और ब्रा मेरी ओर बढ़ा दिया “प्लीज, जरा इसे बालकनी में सूखने के लिए फैला दोगे?”

“खुशी से।”

“थैंक्यू !”

क्या मजेदार विडम्बना थी। रेशमा लाजो पर जबर्दस्ती कर रही थी और मुझे थैंक्यू कह रही थी। थैंक्यू तो मुझे कहना चाहिए था। जिस चोली और ब्रा को उतारने के सपने मैं कब से देख रहा था वह वह अब मेरे हाथ में थी ! पानी में भीग कर गहरे गुलाबी रंग की हो गई चोली और सफेद ब्रा। दोनों भीगे होने के बावजूद उसके बदन से गर्म थे।

लाजो साड़ी लपेटे झुकी हुई थी। आधी से ज्यादा पीठ खुली थी। पीठ के बीच उभरी रीढ़ की हड्डी नीचे नितम्बों की शुरुआत के पास जाकर अंदर धँस रही थी जिसके गड्ढे के ऊपर साये की डोरी धनुष की प्रत्यंचा जैसी तनी थी। उसके अंदर छोटा सा अंधेरा। रहस्यमय ! अंदर दबे खजाने !

मैंने भीगे वक्षावरणों में मुँह घुसाकर सूंघा। लाजो के बदन की ताजा गंध ! पसीने और परफ्यूम की खुशबू मिली। मैं पजामे के अंदर इतना तन गया था कि चलना मुश्किल हो रहा था। अलगनी पर ब्रा को फैलाते समय मैंने फीते में कंपनी का फ्लैप देखा- 36 सी साइज। बिना बच्चे के ‘सी’ साइज ! लाजो उतनी पतली नहीं है !

मेरे जाने के बाद लाजो रेशमा पर बिगड़ी, “तुमने जीजाजी को क्यों बुलाया?”

“भीगी साड़ी ही लपेटे रहोगी?”

“मुझे कोई कपड़ा दो।”

“जीजाजी उधर हैं।”

“नहीं, पहले कपड़ा दो।”

“जानू !” रेशमा पुकारी, “एक कपड़ा लेते आओ।”

“नहीं…” लाजो चीख पड़ी।

“ठीक है।” रेशमा ने मुझे रोका, “अभी उधर ही रहो।”

“दे रही हो?” उसने लगभग हुक्म के अंदाज में पूछा।

लाजो हैरान उसे देखती रह गई, खुद उसकी बड़ी बहन उसके साथ क्या कर रही है ! उसे यकीन नहीं हो रहा था वह किधर ले जाई जा रही है। टॉपलेस तो हो ही चुकी थी ! आश्चर्य और उत्तेजना से लगभग लाल हो गई थी।

रेशमी पजामा… अंदर तम्बू के पोल की तरह तना लिंग, मोटी जांघें, रोशनी में चमकती भीगी चौड़ी पीठ, कठोर नितम्ब… एक एक छवि उसके दिमाग ताश के पत्तों की तरह फेर रही थी।

“छोड़ो !” रेशमा ने उसके कंधे से साड़ी खींची। छाती पर लाजो के हाथों का दबाव ढीला पड़ गया। रेशमा उसके स्तनों के सामने से कपड़े को खींचती हुई हँसी, “मुझसे कैसी शरम !”

‘मेरी बहन सुंदर है !’ रेशमा बोली।

उत्तेजित होने के बावजूद शर्म से लाजो की आँखों में आँसू आ गए। उसने बाँहों से स्तन ढक लिए।

रेशमा ने साड़ी उठाई और चली गई। कमरे में आकर मेरे हाथ में देकर बोली, “यह लो ! एक और पुरस्कार !”

साड़ी के स्पर्श से मेरा ऐसे ही दुखने की हद तक टाइट हो रहा लिंग और तनकर जोर जोर धड़कने लगा। टॉपलेस लाजो कैसी लग रही होगी? मन हुआ दौड़कर उसके पास चला जाऊँ।

“यू आर ग्रेट। मैं तुम्हारा दीवाना हूँ।” मैं रेशमा का बेहद एहसानमंद हो गया।

“ऐसी बीवी तुम्हें नहीं मिलेगी।” वह घमण्ड से बोली। उसने पजामे के ऊपर से मेरे लिंग पर थपकी दी और बोली, “अब तैयार रहो, तुम्हारी जरूरत पड़ेगी। मुझे नहीं लगता वह मुझे आसानी से पेटीकोट उतारने देगी।”

लिंग पर थपकी से मेरे बदन में करेंट की लहरें दौड़ गईं, मैंने आग्रह किया, “इस पर एक चुम्बन देती जाओ, प्लीज।”

उसके गुलगुले होठों से मेरे लिंग का सख्त मुँह टकराया और मेरी भूख और बढ़ गई। मैंने पजामें की इलास्टिक नीचे खिसकाई, “बस एक बार मुँह के अंदर लेके…”

पर वह उठ गई, “अब यह लाजो से ही करवाना !” कहकर चली गई।

मैं ठगा-सा रह गया। इतनी दूर तक स्वयं कहेगी मैंने सोचा नहीं था। मैंने फिर अपने-आपको उसका बेहद कृतज्ञ महसूस किया।

मैंने दरवाजा खोला और अर्द्धनग्न लाजो को देखने के लिए बाहर चला आया। हॉल के अंदर न जाकर रास्ते में ही खड़ा हो गया। रेशमा अब मुझे बुलाने वाली थी।

:

लाजो सोच रही थी दीदी उसके लिए कपड़े लाने गई है। उसके दिमाग में उथल-पुथल मची थी। अपनी बाँह हटाकर देखी, चूचियाँ खड़ी थीं, घबराकर उसने उन्हें फिर से दबा लिया। नग्न पुरुष के अंगों का दृश्य उसके दिमाग में बार बार घूम रहा था। अपने पति का उसने देखा था मगर आज देखे पुरुष का तो… हर दृश्य उसकी योनि में ‘फुक’ का सा स्पंदन उठा रहा था। हर स्पंदन के साथ बदन में एक लहर-सी दौड़ जाती थी। वह उसे भूलने की कोशिश कर रही थी। अर्द्धनग्न अवस्था में बैठी समझ नहीं पा रही थी क्या करे।

जब दीदी खाली हाथ लौटी तो वह उलझन में पड़ गई।

“कपड़े?” उसने पूछा, उसका हाथ छाती पर दबा था।

“एक ही बार लेना।”

क्या मतलब? वह सवालिया निगाह से देखती रह गई।

“तुम्हारा पेटिकोट भी तो भीगा है।”

लाजो की नजर नीचे गई। सामने बड़ा सा धब्बा था, मानो पेशाब किया हो। साया भींगकर जाँघों और बीच में फूले उभार पर चिपक गया था। अंदर काला धब्बा-सा दिख रहा था। शायद बालों का।

लाजो उसे तुरंत हथेली से छिपा कर बोली, “नहीं…”

“अंदर पैंटी नहीं पहनी हो क्या?”

“तुम पागल हो गई हो !”

रेशमा सोफे पर बैठ गई, ” तुम्हारे जीजाजी कह रहे थे लाजो आए इतनी देर हो गई, उसने मुझसे बात नहीं की?”

“दीदी, प्ली…ऽ….ऽ….ऽ….ज!”

“तुम उनकी चहेती साली हो, वो तुमसे बात करना चाहते हैं ! बुलाऊँ उनको?”

लाजो को लग रहा था वह स्वप्न तो नहीं देख रही। उसके साथ क्या हो रहा है? ऊपर नंगी और नीचे केवल साए में एक विचित्र अवस्था में थी। शर्म से गली जा रही थी लेकिन निचले ओठों के अंदर छुपा भगांकुर बेलगाम धुकधुकाए जा रहा था। सारा शरीर सनसनी से और शर्म से लाल हो रहा था। उसका मन हुआ कि भागकर बाथरूम या रसोई में छिप जाए।

एक आवेग में उठी, पर मुड़ते ही देखा जीजाजी रास्ते में खड़े हैं, वापस पीछे मुड़ी। दीदी सीधे उसकी आँखों में देख रही थी। अब बैठने में उसे बेहद कायरता और शर्म महसूस हुई। वह जस की तस खड़ी रह गई।

“जानूँ, लाजो के लिए ‘कपड़ा’ ले आओ।” रेशमा ने ‘कपड़ा’ को थोड़ा विशेष रूप से उच्चरित किया।

“वो पीली वाली, नैन्सी किंग की।”

‘पीली वाली, नैन्सी किंग की’ नाइटी थी जो हमने हाल में ही खरीदी थी। शिफॉन और नायलॉन की बनी। पीले रंग की। इतनी झीनी थी कि इसके इनर और आउटर दोनों पहनने के बाद भी अंग साफ नजर आते थे। इनर कंधों से पतले स्ट्रैप्स से टंगता था और काफी नीचे उतर कर छातियों को आधे से अधिक खुला छोड़कर शुरू होता था। मैं इनर छोड़कर केवल आउटर ले गया। इसको पहनना तो कुछ न ही पहनने के बराबर था।

मैं जब पहुँचा लाजो वैसे ही खड़ी थी। नंगी पीठ पर लम्बे बाल फैले थे और…

मुझे आया देखकर रेशमा लाजो से बोली, “लो आ गया तुम्हारा ‘कपड़ा’। पहन लो।”

लाजो के दोनों हाथ छातियों और पेड़ू पर दबे थे। कपड़ा लेने के लिए एक हाथ तो उठाना ही पड़ता। वह सिर झुकाए मूर्तिवत खड़ी रही।

इतना उत्तेजित होने और उसे नंगी देखने के लिए अधीर होने के बावजूद मुझे असहजता महसूस हुई। वह असहाय खड़ी थी। मुझे दया सी आई। छोड़ दो अगर नहीं चाहती है।

कहानी जारी रहेगी।

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लाजो का उद्धार

कुल भाग: 5
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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

शालू सिंह

1 week ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

ऋषभ

4 weeks ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

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