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भाभी की चुदाई पठन समय: 11 मिनट पढ़ा गया: 962 बार

प्रेम के अनमोल क्षण-1

Antarvasna

10 May 2025 को प्रकाशित

प्रेम के अनमोल क्षण-1
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प्रेषिका : रितु डिकोस्टा

श्री मनोहर सिंह मेहता के द्वारा भेजी गई कहानी को मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। मुझे कुछ कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि जिन घरों में भाभियां होती हैं, तो साथ रहने वाले देवर के मन में कभी ना कभी तो पाप जाग ही जाता है और नतीजन भाभियाँ चुदने लगती हैं, या देवर भाभियों के चक्कर में आ ही जाता है। मैं तो कहती हूँ कि आग तो दोनों ओर ही बराबर सी सुलग उठती है …तो वास्तव में इसमें गलती किसी की नहीं होती। आईये देखे, यहाँ श्री मनोहर सिंह जी क्या बता रहे हैं..

मैं गोवा का निवासी हूँ, मेरी यहाँ में पर्यटकों की आवश्यकताओं से सम्बंधित एक दुकान है। यह घटना मेरी जवानी के समय की है जब मैं मात्र 18 वर्ष का था और कॉलेज में पड़गता था। मेरे भैया की शादी हो चुकी थी। मेरे छोटे होने के कारण भाभी मुझसे बहुत स्नेह रखती थी। यूँ तो वो मुझसे सिर्फ़ पांच साल ही बड़ी थी। सच पूछो तो उसके पृष्ठ-उभार मुझे बहुत लुभाते थे, बस ! लुभाते ही थे … पर भाभी के गोल गोल सुघड़ चूतड़ों को दबाने की इच्छा कभी नहीं हुई। भाभी अधिकतर टुक्की वाला ब्लाऊज पहनती थी। उनके कठोर पर्वत मुझे बहुत सुन्दर लगते थे, पर उन्हें मसलने जैसी इच्छा कभी नहीं हुई। उनके चिकने बदन पर मेरी दृष्टि फ़िसल फ़िसल जाया करती थी, पर ऐसा नहीं था कि मैं उस चिकने बदन को अपनी बाहों में लेकर उन्हें चूम लूँ !

बस हम दोनों एक दूसरे के साथ साथ खेलते थे। मैं उनके साथ खाना बनवाने में मदद करता था, वॉशिन्ग मशीन में कपड़े धो देता था और भी बहुत से काम कर देता था।

एक दिन अचानक ही ये सारी मर्यादायें टूट कर छिन्न भिन्न हो गई। दोनों के मन में काम भावनायें जागृत हो उठी…। उस दिन सारा काम निपटाने के पश्चात हम दोनों यूँ ही खेल रहे थे, कि मन में ज्वाला सुलग उठी। भाभी का टुक्की वाला ब्लाऊज कील में फ़ंस कर फ़ट गया और सामने से चिर गया। भाभी का एक कठोर स्तन उभर कर बाहर निकल आया। मेरी नजरें स्तन पर ज्यों ही पड़ी, मैं देखता ही रह गया, सुन्न सा रह गया। भाभी एक दम सिहर कर दीवार से चिपक गई। मैं अपनी आंखे फ़ाड़ फ़ाड़ कर उन्हें देखने लगा। भाभी सिहर उठी और अपने हाथों को अपने नंगे स्तन के ऊपर रख कर छुपाने लगी। मैं धीरे धीरे भाभी की ओर बढ़ने लगा। वो सिमटने लगी। मेरा एक हाथ उसके कठोर स्तनों को छूने के लिये बढ़ गया।

“नहीं भैया, नहीं… मत छूना मुझे !”

“ये… ये… कितने चमक दार, कितने सुन्दर है…”

मेरी अंगुलियों ने ज्यों ही उनके स्तन छुये, मेरे बदन में जैसे आग लग गई। भाभी तुरन्त झुक कर मेरी बगल से भाग निकली, और दूर जाकर जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगी। मैं स्तब्ध सा उन्हे देखता रह गया। जाने क्यूँ इस घटना के बाद मैं चुप चुप सा रहने लगा। मेरे दिल में भाभी के लिये ऐसे वैसे वासना भरे विचार सताने लगे। शायद जवानी का तकाजा था, जो मेरे मन को उद्वेलित कर रहा था।

शाम को मैं छत पर टहल रहा था कि भाभी वहां आ गई।

“क्या बात है, आजकल तुम बहुत गुमसुम से रहने लगे हो?”

“नहीं … हां वो … ओह क्या बताऊ मैं…!”

“भैया मेरी कसम है तुझे … जो भी हो, अच्छा या बुरा… कह दो। मन हल्का हो जायेगा।”

“बात यह है कि भाभी … अब कैसे बताऊँ…”

“मैंने कसम दी है ना … चलो अपना मुँह खोलो…” शायद भाभी को मेरी उलझन मालूम थी।

“ओह कैसे कहूँ भाभी,… आप मुझे बहुत अच्छी लगने लगी हैं !”

“तो क्या हुआ … तुम भी देखो ना मुझे कितने अच्छे लगते हो, है ना?” भाभी की नजरें झुक गई।

“पर शायद… मैं आपको प्यार करने लगा हूँ…”

“ऐ … चुप… क्या कहते हो … मैं तुम्हारी भाभी हूँ…” सुनकर भाभी ने मुस्करा कर कहा

“कसम दी थी सो बता प्रिया … पर मैं क्या करू… मैं जानता हूँ कि तुम मेरी भाभी…”

“भैया, अपने मन की कहूँ… प्यार तो मैं भी तुम्हे करती हूँ” भाभी ने भी झिझकते हुये कहा।

“क्या कहती हो भाभी …”

भाभी ने धीरे से मेरे सीने पर अपना सर रख प्रिया… मेरी सांसें तेज हो उठी। तभी भाभी मुड़ कर तेजी से भाग कर सीढ़ियाँ उतर गई। मैं भौचक्का सा उन्हें देखता रह गया। यह क्या हो गया ? भाभी भी मुझसे प्यार करती हैं !!! और फिर बड़े भैया ? सभी कुछ गड-मड हो रहा था। मैं छत से नीचे उतर आया। भाभी मुझे देख कर खुशी से बार बार मुस्करा रही थी जैसे उनकी कोई मन की मुराद पूरी हो गई हो। मैं चुपचाप अपने कमरे में चला आया। कुछ ही देर में भाभी भी वहीं पर आ गई। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, भाभी मेरे पास बैठ कर मेरे बालों को सहलाने लगी।

“कमल, तुम तो बहुत प्यारे हो, तुम्हें देख कर मुझे तो बहुत प्यार आता है !”

“भाभी…”

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“ना भाभी नहीं, दीपाली कहो, मेरा नाम लो …” भाभी ने अपनापन दिखाते हुये कहा।

“दीपा, तुम्हें देख कर जाने मन में क्या क्या होने लगता है, ऐसा लगता है कि तुम्हें प्यार कर लूँ, चूम लूँ…” मैंने अपने होंठों पर जीभ फ़ेर कर अपनी मन की बता दी। मेरे गीले होंठ देख कर भाभी ने भी अपने होंठ थूक से गीले कर लिये और मेरे पर धीरे से झुक गई और इतने नजदीक आ गई कि उसकी गरम सांसें मेरे चेहरे से टकराने लगी।

“गीले होंठ बहुत रसीले होते हैं, एक बार और गीले कर लो !”भाभी ने अपना रस भरा अनुभव बताया।

मैंने अपने होंठ फिर से गीले कर लिये और भाभी ने अपने गीले होंठ मेरे होठों से लगा दिये और मेरा ऊपर का होंठ अपने होंठों से चूसने लगी। इतने नरम और थरथराते होंठ मुझे असीम सुख दे रहे थे। मैं पहली बार गीले नरम होंठों का स्पर्श इतनी मीनूरता के साथ महसूस कर रहा था। धीरे धीरे भाभी ने अपनी जीभ भी मेरे मुख में डाल दी। भाभी की एक एक हरकत मुझे वासना की पीड़ा दे रही थी। वो अब मेरे होंठों को बेतहाशा पीने लगी थी। जब वो उठी तो उनकी आंखे वासना से सुर्ख हो गई थी। पर मेरी हिम्मत अब भी उनके स्तनों को दबाने की नहीं हो रही थी।

“बबुआ, कैसा लगा … दिल की मुराद पूरी हुई या नहीं ?” भाभी ने मुझे मुस्कराते हुये पूछा।

मैं शरमा गया। मेरी आंखें झुक गई।

“मेरे भोले देवर, तू तो बुद्धू ही रहेगा !” और वो हंस दी।

इन सभी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा लण्ड बेहद कड़ा हो चुका था और पजामे में तम्बू जैसा तना हुआ था। भाभी ने मेरा कड़क लण्ड देखा तो उसके मुख से आह निकल गई। वो उठ कर चल दी। आज तो भाभी का मन बाग बाग हो रहा था। रात को भी भाभी ने मुझे खाने के बाद मिठाई भी खिलाई, फिर मेरा चुम्मा भी लिया। अब मेरे दिल में भाभी के शरीर की सम्पूर्ण रचना बस गई थी। रह रह कर मुझे भाभी को चोदने को चोदने का मन करने लगा था। अर्चना में भाभी की रस भरी चूत को देखता, उनके भरी हुई उत्तेजक चूंचियों के बारे में सोचने लगता था। भैया नाईट शिफ़्ट के लिये जाने वाले थे। मैं भी अपने कमरे में कम्प्यूटर पर काम करने लगा। भैया के जाने के बाद भाभी मेरे कमरे में चली आई।

“भाभी, मम्मी-पापा सो गये क्या ?”

“हां सो गये, भैया के जाते ही वे भी सो गये थे, समय तो देखो ग्यारह बज रहे हैं।”

“ओह हाँ, मैं भी अब काम बन्द करता हूँ, भाभी एक चुम्मा दे दो !”

मैं उठ कर बिस्तर पर बैठ गया। भाभी ने लाईट बन्द कर दी और कमरा भी अन्दर से बन्द कर प्रिया।

“अब चाहे कितनी भी बाते करो, कोई डर नहीं !”

“भाभी आप कितनी सुंदर हैं, आपके प्यारे नरम होंठ बार बार चूमने को मन करता है !”

“सच … तुम भी बहुत अच्छे हो… मेरे दिल में बस गये हो।”

“मुझसे बहुत प्यार करती हो ना …?”

हमारी प्यार भरी बातें बहुत देर तक चलती रहीं। मेरा दिल बहुत खुश था… भाभी और मैं बिस्तर पर लेट चुके थे… भाभी ने अपने गीले होंठ एक बार फिर मेरे गीले होठों से चिपका दिये। मेरा डण्डा तन गया था। भाभी मेरी पीठ को सहलाते हुये सामने पेट पर हाथ ले आई। भाभी के कड़े स्तन मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। वो बार बार अपनी चूंचियाँ मेरी छाती पर दबा दबा कर रगड़ रही थी। मुझे लगा कि जैसे मैं भाभी को सचमुच में प्यार करने लगा हूँ। मैंने अपने प्यार का इजहार भी कर प्रिया,”भाभी सच कहूँ तो मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, तुम्हारे बिना अब नहीं रहा जायेगा !”

“आह, मेरे कमल, तुमने तो मेरे दिल की बात की बात कह दी, मैं भी कैसे रह पाऊंगी तुम्हारे बिना… ?!!”

“पर भाभी, बड़े भैया का क्या होगा…?”

“बड़े भैया अपनी जगह है, अपन दोनों को तो बस प्यार करना है सो करते रहेंगे !”

भाभी के हाथ मेरे शरीर पर इधर उधर फ़िसल कर मुझे रोमान्चित करने लगे थे। मेरी छाती पर सर रख कर वो लेट गई थी और प्यार भरी बातें करने लगी थी। क्या वो प्यार की प्यासी थी, या उन्हें शारीरिक तृप्ति चाहिये थी ? पर कुछ भी हो, मैं तो बहुत खुश था। भाभी अपने एक एक अंग को मेरे शरीर के ऊपर दबा रही थी, सिसक रही थी… चुम्बनों से मेरा मुख गीला कर प्रिया था।

रितु डिकोस्टा

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प्रेम के अनमोल क्षण

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