विजय ने कार में रखी अपनी जैकेट मुझे दी और कहा- पहन लो, तुम्हारा बदन भीगा और लोग देखेंगे तो गलत समझेंगे।मैंने उसकी जैकेट पहन ली और हम लोग लिफ्ट से सीधे उसके फ्लैट में पहुँच गए, फ्लैट पर कोई नहीं था।
मैंने पूछा- अभी तो तुम्हारे घर पर कोई नहीं है?
विजय ने बोला- मोम-डैड भोपाल गए हैं, शाम तक आएंगे।
मैंने भी बात टाल दी और उनके बड़े से घर को निहारने लगी।
विजय मुझे आँचल के कमरे में ले गया और कहा- उसकी अलमीरा से जो ड्रेस तुम्हें पसंद हो वो तुम पहन लो।
मैंने सर हिलाया और वो चला गया। मैंने दरवाज़ा बंद किया और उसकी जैकेट बिस्तर पर रख दी और लाकर में से कपड़े देखने लगी।
मैंने कपड़े पसंद किए और सोचा, क्या बाथरूम जाऊँ, यहीं चेंज कर लेती हूँ, दरवाज़ा तो लॉक है ही। मैंने अपनी कुर्ती खोली ही थी और पीछे से अचानक से दरवाज़ा खुला और विजय आया।
विजय ने दरवाजा इतनी जल्दी खोला कि मैं कुछ समझ पाती तब तक तो वो मेरे पीछे खड़ा था। मैंने कुर्ती उतार दी थी और मैं अभी सिर्फ ब्रा में थी और मेरी पीठ दरवाज़े की तरफ थी। उधर से विजय आया और मेरी पीठ सहलाने लगा।
मैंने बोला- क्या कर रहे हो?
विजय बोला- वही जो हर बॉय-फ्रेंड अपनी गर्ल-फ्रेंड के साथ करता है।
मैंने मन ही मन बोला, सच में दिल्ली के लड़के कुछ ज्यादा ही फ़ास्ट होते हैं। मौका देखा नहीं कि चौका मारने को तैयार बैठे रहते हैं।
विजय अपनी सख्त हाथों से मेरी पीठ सहलाने लगा और मुझे एहसास हो गया था कि अब यह ब्रा भी कुछ लम्हों की मेहमान है और पता नहीं कब ये नीचे और मैं ऊपर होऊँगी। थोड़ी देर तब पीठ सहलाने के बाद रणवीर ने मुझे घुमाया और बिस्तर पर उल्टा धकेल प्रिया और मेरी पीठ अपनी होंठों से चूमने लगा।
मुझे अच्छा लग रहा था इसलिए मैंने भी विरोध नहीं जताया। मेरा आधा शरीर बिस्तर के कोने में था और आधा नीचे। विजय मेरी कमर को जकड़े हुए था। विजय मेरी पीठ चूमते-चूमते अपने हाथ भी मेरी कमर के पास घुमा रहा था और थोड़ी देर में ही उसने मेरे पजामे का नाड़ा खोल प्रिया और उसे नीचे मेरे घुटने तक गिरा प्रिया।
थोड़ी देर बाद विजय ने मुझे खड़ा किया और मेरा पजामा मेरे शरीर से अलग कर प्रिया। फिर उसने मुझे अपनी बांहों में उठा लिया और बाहर की तरफ ले जाने लगा।
मैंने पूछा- ये क्या कर रहे हो?
तो उसने बोला- अब जो होगा, मेरे कमरे में होगा, यह आँचल का कमरा है और अगर उसको शक हो गया तो वो मेरी बैंड बजा देगी। इसलिए आगे का प्रोग्राम मेरे रूम में।
विजय मुझे अपने कमरे में लाया और बड़े प्यार से आहिस्ते से मुझे बिस्तर पर लेटा प्रिया। अब चूंकि मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी इसलिए विजय का कपड़ों में रहना तो गुनाह था। इसलिए जब विजय ऊपर आने लगा और मैं उठी और उसकी टी-शर्ट उतारने लगी।
विजय ने भी मेरा साथ प्रिया और अपनी टी-शर्ट उतारने लगा और फिर मैं उसके शॉर्ट्स पर झपटी जिसके अंदर काला सा नाग फन मार कर खड़ा था। जो मैं बाहर से ही देख सकती थीं फिर भी मैंने हार नहीं मानी और उसका सामने करने का निश्चय किया और उसका शॉर्ट्स उतार प्रिया। उतारते ही उसका काला लंड मुझे पर ऐसे झपटा, जैसे सांप को अपना शिकार मिल गया हो।
मैंने दोनों हाथों से विजय के लंड को पकड़ा और सहलाने लगी। मैं फिर नीचे झुकी और अपने जीभ बाहर निकाली और उसको हल्का सा चाटा। दूसरी बार फिर मैंने उससे चाटा और अपने हाथों से विजय के लंड को जोर-जोर से ऊपर-नीचे हिलाने लगी और फिर उसको मुँह में ले लिया।फिर जिस तरह मैं उसके लंड को अपने हाथों से ऊपर-नीचे कर रही थी, उसी तरह अपने मुँह को में उसको लंड को भी कभी अंदर घुसाती तो कभी बाहर।
थोड़ी बाद मैंने विजय को लेटाया और फिर मज़े से उसके लंड को चूसने और चूमने लगी। उससे भी मज़ा आ रहा था, वो भी मेरे बालों को सहला रहा था। फिर मैंने विजय के लंड के चारों और अपनी जीभ घुमाई। यह पहली बार था जब मैंने किसी ऐसे पुरुष का लंड चूसा था जिसके लंड के पास ज़रा भी बाल नहीं थे।
मैंने सोचा शायद दिल्ली वालों की एक और खासियत है, ये हर चीज़ साथ-सुथरी मेन्टेन रहनी चाहिये। जब मेरा मन भर गया तो विजय ने मेरे मम्मों को अपने दोनों हाथों से पकड़ा और दबाने लगा। थोड़ी देर बाद उसने मेरे पीठ के नीचे हाथ लगाकर ब्रा का हुक खोल प्रिया और मम्में हवा में लटक गए।
अब विजय ने अपना निशाना मेरे मम्मों से हटा कर मेरे चूचुकों पर केंद्रित कर लिया और फिर अपनी ऊँगली और अंगूठे से उनको मींजने लगा और फिर अपनी होंठ मेरे चूचुकों में सटा दिए और खींचने लगा। मुझे हल्की-हल्की चुभन सी हुई जैसे कोई कांटा लगने पर दर्द होता है, उस तरह के दर्द का एहसास हो रहा था। थोड़ी देर तक उसने मेरे एक ही निप्पल के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया, पर फिर उसने वही हाल मेरा किया और मेरे मुँह से कराहने का आवाज़ आने लगीं।
मैंने मन ही मन सोचा ‘जूही, अभी तो बस शुरुआत हुई है, तुझे आज आगे ना जाने क्या-क्या सहना पड़ेगा।’जब विजय का मन मेरी चूचुकों से तृप्त हो गया तो फिर वो मेरी चूत की और बढ़ा और मेरी नाभि, कमर को चूमते हुए मेरी कमर में दोनों हाथ फंसा कर मेरी पैंटी उतार दी और अब मैं और विजय पूरे तरह से नग्न अवस्था में थे। विजय अपनी जीभ से मेरी चूत चाटने लगा और मेरी सिसकारियाँ तेज होती जा रही थीं।
पर उसने ज्यादा समय मेरी चूत नहीं चाटी और चुदाई के मूड में आ गया। उसने मेरी दोनों टाँगों को पकड़ा और फैला प्रिया। अपने लंड को मेरी चूत के पास लाया और मेरी जाँघों पर थपथपाने लगा जैसे कि कोई गुरु बेंत को मारने से पहले हवा में घुमा कर चैक करता है।
मेरा गुप्त जीवन- 190
थोड़ी देर बाद अपने लंड को पकड़ा और मेरी चूत के मुँह के पास लाकर चिपका प्रिया और फिर अचानक से ज़ोर का झटका मारा और सटाक से उसका लंड मेरी चूत के अंदर। मेरी सांस रुक गई थोड़ी देर के लिए, मुझे दर्द तो पहले से हो रहा था और फिर जब उसने एक झटके में अपना लंड मेरी चूत में डाला तो दर्द और बढ़ गया।
मैं दर्द से कराहने लगी, “आआह्ह एएए हाई मरर गईई बहुत दर्द हो रहा हैईइ आआह्हह ऊऊओह्ह।”
विजय ने जैसे ही अपना लंड निकाला, मेरा दर्द थोड़ा सा कम हुआ और मैंने चैन की सांस ली, पर मुझे तो पता था यह इतना जल्दी शांत होने वाला नहीं था। विजय मेरे ऊपर लेट गया और अपने होंठ मेरे होंठों से सटा दिए और फिर उसने शॉट मारना शुरू किया।
मुझे फिर से वही दर्द हुआ, पर मेरे होंठों पर अब विजय के होंठ थे। इसलिए मैं चिल्ला भी नहीं सकती थी। फिर धीरे-धीरे विजय ने शॉट की स्पीड बढ़ा दी, पर धीरे-धीरे मेरे बदन ने मेरे दर्द की स्पीड घटा दी, और मज़ा का मीटर तेजी से दौड़ने लगा।
मैंने विजय की पीठ को अपनी दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी टाँगों को विजय की टाँगों से चिपका लिया और विजय के शॉट चालू रहे। थोड़ी देर बाद जब विजय को लगा कि उसका वीर्य गिरने वाला है, उसने अपना लंड बाहर निकाला और मम्मों पर अपने वीर्य गिरा प्रिया और दोनों हाथों से मेरे मम्मों को पकड़ कर उनको मेरे मम्मों के आस-पास मलने लगा।
थोड़ी देर तक हम दो जिस्म और एक जान की तरह एक-दूसरे पर लेटे रहे, पर जैसे ही विजय की मर्दानगी वापस जगी, उसने मुझे घुमा कर रख प्रिया।
उसने मुझे उल्टा लिटाया और बोला- अब तुम्हारी गांड की बारी है।
विजय ने अपना लंड मेरी गांड के छेद के पास ले गया और मेरे ऊपर लद गया और दोनों हाथों से मेरे मम्मों को पकड़ लिया और फटाक से झटका मारा। मुझे फिर से ऐसा दर्द उठा मान लो अब तो मर ही गई क्योंकि यह वाला दर्द पिछले वाले से भी ज्यादा था, पर विजय ने एक सेकंड के लिए भी अपना गांड मारने का कार्यक्रम बंद नहीं किया।
मेरी गांड जोरों-शोरों से पूरे दम से मारता रहा, जब तक वो थक नहीं गया। फिर मेरे ऊपर लेट गया। उधर मेरी जान और गांड दोनों मरी पड़ी थीं।
मैं दर्द से चिल्ला रही थी, “आआह्ह आआऊऊओह्ह्ह्ह उउफ्फ्फ्फ।”
पर जनाब तो थक कर मेरे शरीर को सोफा समझ चुके थे और वहीं विश्राम करने का उनका पूरा प्रोग्राम था। चार बज गए थे और आँचल आने वाली थी, इसलिए हमने इसको इस वक़्त यही ठीक समझा और तय किया कि नहा लेते हैं, फिर आराम से बैठ कर बात करेंगे।
मैं नहाने गई, मेरे चेहरे में थोड़ा रंग लगा था। उसे साफ़ करने लगी। वहीं पीछे से विजय आ गया और मेरी गांड दबाने लगा। मैंने फिर भी हार नहीं मानी और अपना काम करती रही जब तक कि मेरे चेहरे से रंग नहीं निकल गया। उसने मुझे नहाते नहाते बाथटब में लगभग फिर से चोद ही प्रिया था, पर देर हो गई थी, इसलिए मैं बाहर आई, अपनी ब्रा-पैंटी उठाई और आँचल के कमरे में गई। उसके लाकर से एक ब्रा-पैंटी निकाली जो मुझे फिट लगी और जो कपड़े मैंने पहनने के लिए निकाले थे, वो ले जाकर पहन लिए। मेरी कुर्ती जो उसके कमरे में थी उसे उसके बाथरूम में डाल प्रिया।
थोड़ी देर तक हम दोनों ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखते रहे। तभी आँचल आई और पूछने लगी कि मेरी तबीयत कैसी है।
मैंने हँस कर कहा- एकदम बढ़िया।
फिर हमने तय किया छप्पन चलते हैं, वहीं कुछ खाएगें और फिर वहीं टी-आइ में कुछ शॉपिंग करेंगे। आँचल ने कार की चाभी मांगी तो विजय ने कहा- रुको कमरे में है, मैं लेकर आता हूँ।
आँचल ने कहा- रहने दो, तुम बैठो मैं ले आती हूँ। आँचल चाभी ढूंढ रही थी, उससे मिल नहीं रही थी फिर उसने बेड के नीचे देखा तो एक कोने में चाभी पड़ी थी। जैसे ही वो चाभी उठा रही थी, उसने देखा मेरी सलवार भी नीचे पड़ी थी। वो बाहर आई और उसने कुछ नहीं कहा।
उसने बोला- चलो चलते हैं।
मैं जैसे ही उठी, पैर में थोड़ा सा दर्द होने लगा।
आँचल ने पूछा- क्या हुआ?
तो मैंने कहा- कुछ नहीं चेंज करते वक़्त पाँव में बस थोड़ी चोट लग गई थी और कुछ नहीं।
आँचल जिस तरह मुझे देख रही थी, वो समझ गई थी कि ये वो चोट किसी और चीज़ की नहीं बल्कि विजय की चुदाई के कारण हो रही है, पर उसने उस समय कुछ नहीं कहा और फिर हम लोगों लिफ्ट से नीचे चले गए।
आप लोगों को मेरे जीवन का यह हिस्सा कैसा लगा? मुझे जरूर बताइएगा।