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कोई मिल गया पठन समय: 6 मिनट पढ़ा गया: 205 बार

पहली फ़िसलन

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प्रेषिका : रेनू बाला

मेरे पतिदेव का एक तथाकथित भाई जो उन दिनों मेरे परिवार का हिस्सा बना हुआ था… मेरा भी दोस्त बन गया था, बल्कि काफ़ी अन्तरंग हो गया था। उसने मुझसे एक बार सेक्स करने का वादा ले लिया था, मैंने शर्त रखी थी कि अपने शहर से बाहर ही उसके साथ सेक्स करूँगी। मैं करूँ या न करूँ का फ़ैसला नहीं कर पा रही थी। वह हमेशा मौके की तलाश में रहता, एक बार दूसरे शहर में मौका मिला भी तो मैंने खुद को बचा लिया था।

अब वह जब भी अकेले मिलता या फ़ोन पर बातें करता तो शिकायत जरूर करता कि आपने वादा करके उसे निभाया नहीं !

मैं उसे यह कह कर टालती कि मैं कोई मरी या भागी जा रही हूँ आगे और भी मौके आयेंगे। यूँ वह घर में मुझे अकेले पाकर भी कभी छेड़ता नहीं था बस मीठी-2 बातें करके मुझे पटाने की कोशिश करता और इस तरह वह मेरा विश्वास ही जीत रहा था।

उस घटना के करीब दो माह बाद मेरे पति 3-4 दिनों के लिये बाहर गये हुए थे, उस दौरान वह रोज ही मुझे अपना वादा पूरा करने की याद दिलाता। मेरे यह कहने पर कि शहर से बाहर का वादा है मेरा, तो वह कहता कि तब तो मिल चुका मुझे आपका संसर्ग……… जब भैया शहर से बाहर हैं यानि कि आपका पोल तो खुलने से रहा, और कोई समस्या तो है नहीं। चूँकि वह तकरीबन रोज ही आता था अतः पड़ोसियों को भी कोइ शक नहीं होता। अन्ततः उनके लौटने से एक दिन पहले उसके लगातार मनुहार करने पर मैं पिघल गई, और रात में देने का वादा इस शर्त पर किया कि आज के बाद वह फ़िर कभी मुझसे सम्बन्ध बनाने की कोशिश नहीं करेगा अन्यथा मैं पति को सब कुछ बता दूँगी।

उसने मुझसे वादा किया कि ऐसा ही होगा। उस शाम वह सात बजे ही आ गया और बच्चों के साथ टी वी देखता और बातें करता रहा। डिनर के बाद तीनों बच्चे मेरे बेडरूम में सो गये क्योंकि उसी में ए सी था, पति के बाहर जाने पर हम चारों उसी में सोते थे। दस बजे तक नौकर भी बालकनी में चला गया, हम दोनों बैठक में टी वी देखते बैठे रहे, मेरा तो घबराहट के कारण दिल धक-धक कर रहा था, जब नौकर भी सो गया तो उसने धीरे से दरवाजा बन्द कर प्रिया और बैठक के कमरे की लाइट बुझा कर मुझे पकड़ कर दीवान पर ले गया।

मैं उस दिन एक टू-पीस-नाइटी पहने थी। अंधेरे में वह मुझे बेतहाशा चूमने लगा और अपनी बाहों में लेकर दीवान पर लोट-पोट होने लगा……… वह अत्यन्त ही उत्तेजित था और मेरी भी हालत बुरी थी……… डर, घबराहट और शायद कुछ हद तक उत्तेजित भी हो चुकी थी मैं !……… शायद मानसिक रूप से मैं उसके साथ सम्भोग के लिये तैयार हो चुकी थी………

उसने ज्यादा देर न करके मेरी नाइटी और साया ऊपर करके अपने पैण्ट की जिप खोल कर अपना लिंग निकाल कर मेरी योनि में डाल ही प्रिया ………

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मुझे तो कुछ होश ही नहीं रहा कि आगे क्या-क्या हुआ और कैसे-कैसे उसने किया………

बस इतना याद था कि उसका लिंग मेरे पति की तुलना में बहुत बड़ा और मोटा था। शायद पूरा गया भी नहीं था और मैं चिल्लाई भी थी आहिस्ता से ……… शायद मैं भी सहयोग करने लगी थी, उसका जल्दी ही पतन हो गया जिसका मुझे अन्दाज नहीं हुआ ……… फ़िर पता नहीं मैं या वह मुझे खींचकर बच्चों के खाली बेडरूम में ले गया और दरवाजा अन्दर से बन्द करके हम दोनों फ़िर गुत्थम-गुत्था हो गये………

शायद उसने अपनी पैण्ट उतार दी थी पर मैं नाइटी में ही थी, चूँकि मासिक के दिनो के अलावा मैं पैण्टी नहीं पहनती इसलिये मेरी योनि तक पहुँचने में उसे कोई रुकावट नहीं हुई। मुझे इतना ही याद है कि वह बहुत ही जोर-जोर से मुझे मुझे चोद रहा था और मस्ती में मैं उसके ऊपर चढ़ कर अपनी बुर उसके पोल जैसे लण्ड पर ऊपर नीचे करने लगी थी। सचमुच मुझे भी काफ़ी अनन्द आ रहा था और उस समय कोई अपराध-बोध नहीं हो रहा था, बस एक आदिम-तृप्ति की चाह बच रही थी ………… मुझे और कुछ याद नहीं कितनी देर तक उसने मुझे किया ……… मैं स्खलित हुई या नहीं ……… वह कब स्खलित हुआ !

उसने बाद में बताया कि मेरा अत्यन्त उत्तेजित और रौद्र रूप देखकर (महसूस कर क्योंकि अंधेरा था न) वह अन्दर ही अन्दर डर गया कि मुझे कुछ हो न जाये।

अच्छा, एक बात और …… हमेशा चटर-पटर करने वाली उसकी जुबान उस सारे क्रिया-कलाप के दौरान एक बार भी नहीं खुली। बस चुपचाप वह मुझे लिये जा रहा था …… और ज्वार शान्त होने पर रात ही में बारह-एक बजे के बीच चला गया। हमारे काम्प्लेक्स में उस वक्त तक लोगों का आना जाना लगा रहता था अतः कोई बदनामी का डर नहीं था। मैं उसी कमरे में सो गई।

सुबह मेरा तेरह वर्षीय बड़ा बेटा पूछने लगा- मम्मी चाचा और आप रात में हम लोगों के कमरे में सोये थे क्या? मैं रात में पेशाब करने उठा तो आप दोनों के चप्पल दरवाजे के बाहर देखे थे?

मुझे काटो तो खून नहीं, पर मैं अपने धड़कते दिल को सामान्य रखने का यत्न करते हुए बोली- तुम्हें नींद में गलतफ़हमी हुई होगी क्योंकि चाचा तो साढ़े दस तक चले गये थे। मुझे तुम तीनों के साथ सोने में दिक्कत हो रही थी तो मैं उस कमरे में चली गई। खैर उस दिन के बाद मुझे कुछ अपराध-बोध भी हुआ और मन को तसल्ली भी देती कि अब ऐसा नहीं करूँगी, एक अनुभव ही काफ़ी है। वरना पाँव फ़िसला तो इज्जत जाते देर नहीं लगनी।

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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

सागर सिंह

2 months ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

राज सिंह राजपूत

2 months ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

सीमा शाह

2 months ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

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