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Hindi Chudai Kahani पठन समय: 12 मिनट पढ़ा गया: 1,125 बार

गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-6(Gaon ke ladkon ne chhoti behan Kavya ko apne jaal mein fasaya-6)

rajukavya

13 Dec 2021 को प्रकाशित

गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-6(Gaon ke ladkon ne chhoti behan Kavya ko apne jaal mein fasaya-6)
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पिछला भाग पढ़े:-गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-5

आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा, आगे की कहानी…

मोहन और लाखन बार-बार काव्या की गांड में जोर-जोर से धक्के मारते और फिर सोनू को बुलाते हुए तंज कसते।मोहन (सोनू की ओर देखते हुए तंज कसते हुए): “क्यों रे सोनू? अपनी आँखों से देख ले, जिसे तू फूलों की तरह छूता था, उसे हम कैसे मसल रहे हैं। तेरी ‘माल’ तो बड़े काम की निकली रे!”

लाखन (खिलखिलाते हुए और काव्या के चूचे को ज़ोर से दबाते हुए): “अरे मोहन भाई, ये क्या जानेगा कि इस गदराई जवानी का रस कैसे निचोड़ा जाता है। देख सोनू, तेरी प्रेमिका की चूत और गांड अब हमारे नाम की मोहर लगा चुकी है। अब ये राजू की बहन नहीं, हम चाचाओं की रखैल है।”

सोनू अपनी मुट्ठियाँ भींच कर रह गया। उसकी आँखों में आंसू और गुस्सा दोनों थे। पर लाखन और मोहन के सामने वह बेबस था।

काव्या की बंद होती आँखों के सामने अब सिर्फ दरिंदगी का नाच था। लाखन ने काव्या के चेहरे को सोनू की तरफ घुमा दिया और उसके होंठों को चूमते हुए बोला, “देख अपने आशिक को काव्या, कैसे भीगी बिल्ली बना बैठा है। अब तो तुझे रोज़ इसी सरसों के खेत में हमारे पास आना होगा।”

काव्या की सिसकियाँ अब सन्नाटे में तब्दील हो चुकी थी। वह बस एक खिलौना बन चुकी थी जिसके साथ ये दोनों अधेड़ उम्र के मर्द अपनी मर्दानगी का भद्दा प्रदर्शन कर रहे थे। मखमली जवानी अब हवस की मिट्टी में पूरी तरह सन चुकी थी।उस शाम सूरज ढलते-ढलते लाखन और मोहन ने अपनी लुंगियां ठीक की और काव्या के बिखरे हुए कपड़ों को उसकी ओर फेंकते हुए अपनी आखिरी और सबसे बड़ी चाल चली।

लाखन: “सुन छोरी, आज का खेल तो सिर्फ ट्रेलर था। कल ठीक इसी वक्त इसी सरसों के खेत में हाजिर हो जाना।”

मोहन (सोनू की तरफ उंगली दिखा कर): “और तू भी सुन ले सोनू, इसे कल खुद लेकर आना। अब ये काव्या तेरी नहीं, हम दोनों चाचाओं की जागीर है।”

काव्या कांपते हाथों से अपने कपड़े पहन कर सोनू के साथ लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर चल दी।

अगले दिन शाम होते ही काव्या की धड़कनें तेज होने लगी। वह उसी खेत की ओर खिंची चली आई, जहाँ लाखन और मोहन पहले से ही बीड़ी पीते हुए उसका इंतज़ार कर रहे थे। आज काव्या ने लाल रंग का सूट पहना था, जिसमें उसकी जवान देह कयामत ढा रही थी।

लाखन: “आ गई मेरी बुलबुल! हमें पता था तू समझदार है।”

मोहन ने बिना कोई बात किए काव्या का हाथ पकड़ा और उसे खेत के सबसे घने हिस्से में ले गया। आज उन्होंने कोई रहम नहीं दिखाया।

जैसे ही काव्या ने अपना सलवार नीचे किया, उसकी गोरी और भारी गांड देख कर दोनों के मुँह में पानी आ गया। लाखन ने आज उसे एक पेड़ के तने से सटा कर खड़ा कर दिया। लाखन ने पीछे से काव्या के दोनों हाथों को पेड़ से सटा कर पकड़ लिया और बिना किसी भूमिका के अपना मोटा लंड उसकी गांड के छेद पर दे मारा, और फिर ताबड़तोड़ प्रहार करना शुरू कर दिया जिससे थरथराहट के साथ काव्या की गांड की उछलने लगी।

जैसे ही दो-तीन झटके और मारे ‘फट-फट-फट-फट’ की आवाज़ें शुरू हुई। काव्या की भारी गांड हर धक्के के साथ हवा में उछलने लगी। वह थर-थर कांप रही थी, और लाखन उसे बेतहाशा ठोक रहा था।

उसी वक्त मोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया और उसकी चूत को अपनी उंगलियों से फाड़ते हुए उसे चाटने लगा। काव्या दोतरफा हमले से पागल हो उठी।

काव्या: “अह्ह्ह… चाचा… आज तो जान ही निकाल लोगे क्या… मम्म… माँ!”

मोहन अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। उसने लाखन को हटाया और काव्या को वहीं मिट्टी पर लिटा दिया। उसने काव्या की दोनों टांगों को मोड़ कर उसके सीने से सटा दिया और अपनी पूरी ताकत से उसकी चूत में प्रहार शुरू किए।

‘चट-चट-चट-चट-थप-थप-थप!’पूरे खेत में मांस से मांस टकराने की गूँज तेज़ हो गई। लाखन ऊपर से उसके चूचों को मसल रहा था और मोहन नीचे से उसे फाड़ रहा था। काव्या का शरीर पसीने से तर-बतर होकर चमक रहा था। झटकों की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि काव्या का दिमाग सुन्न हो गया।

अंत में, दोनों ने एक साथ काव्या के शरीर को झिंझोड़ा और अपना गर्म सैलाब उसकी चूत और गांड के अंदर भर दिया। काव्या मिट्टी में सनी हुई, और पूरी तरह से “चाचाओं की रखैल” बन चुकी थी। खेल अब रोज़ का होने वाला था।

काव्या के भीतर अब अजीब सी बेहयाई पैदा होने लगी थी। समाज का खौफ और राजू का डर तो अपनी जगह था, लेकिन लाखन और मोहन के उन फौलादी झटकों ने काव्या के जिस्म की सोई हुई आग को जगा दिया था। वह जान चुकी थी कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था, तो क्यों ना इसका मजा ही लिया जाए।

तीसरे दिन जब वह खेत में पहुंची, तो उसकी चाल में घबराहट नहीं बल्कि एक नशीली लचक थी। काव्या का बदला हुआ अंदाज देख लाखन और मोहन खेत के बीचों-बीच बैठे अचम्भित हो रहे थे। काव्या ने पास आते ही अपनी ओढ़नी खुद सरका दी और अपनी कुर्ती के बटन खोलते हुए उनकी ओर एक कातिलाना मुस्कान उछाल दी।

काव्या: “क्यों चाचा, आज भी वही पुरानी बातें करोगे या फिर कुछ नया सिखाओगे?”

उसकी बेबाकी देख कर लाखन की आँखें चमक उठी। उसने लपक कर काव्या की कमर पकड़ी और उसे अपनी गोदी में खींच लिया।

लाखन: “अरे वाह! कल तक तो तू रो रही थी और आज शेरनी बनी फिर रही है?”

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काव्या (लाखन के गले में हाथ डाल कर): “जब चुदना ही मुकद्दर है, तो रो-रो कर क्यों? आज तो मैं खुद अपनी मर्जी से अपनी गांड और चूत का पानी निकलवाना चाहती हूँ।”

काव्या अब खुद पहल कर रही थी। उसने मोहन को अपनी ओर खींचा और उसका हाथ अपने टाइट चूचों पर रख दिया।

मोहन: “लाखन भाई, ये तो हमारे ही रंग में रंग गई है! देख तो सही कैसे मचल रही है।”

काव्या ने खुद ज़मीन पर घुटने टिका दिए और अपना भारी पिछवाड़ा आसमान की ओर उठा दिया। उसने पीछे मुड़ कर अपनी जुबान होंठों पर फेरी और लाखन को दावत दी।

काव्या: “चाचा, आज इतनी ज़ोर से मारना कि मेरी गांड का छेद कल तक बंद ना हो पाए। आज मुझे दर्द नहीं, बस आपकी मर्दानगी का अहसास चाहिए।”

लाखन ने बिना देर किए अपना भारी लंड काव्या की गांड के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे जड़ तक उतार दिया। फट..टटटटटट.!’

इस बार काव्या चीखी नहीं, बल्कि उसने एक लंबी आह भरी। ‘थप-थप-थप-थप’ की आवाज़ के साथ जब लाखन ने झटके मारने शुरू किए, तो काव्या अपनी गांड को पीछे की ओर धकेल कर लाखन के हर वार का स्वागत करने लगी।

उछलता हुआ पिछवाड़ा-

काव्या की गांड अब पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से थर-थर-थर-थर कांप रही थी। वह खुद अपनी कमर चला रही थी ताकि लाखन का लंड और गहराई तक जा सके। मोहन ने सामने से आकर काव्या का मुँह पकड़ लिया और अपना लंड उसके हलक तक उतार दिया। काव्या अब एक मंझी हुई खिलाड़ी की तरह दोनों ओर से रंदा जा रही थी।

खेत की मिट्टी पर अब हवस का एक नया अध्याय लिखा जा रहा था, जहाँ शिकार अब खुद शिकारी के जाल में मजे से फड़फड़ा रहा था। काव्या अब डरपोक लड़की नहीं, बल्कि उन दो चाचाओं की प्यासी रखैल बन चुकी थी।

खेत की खामोशी पूरी तरह से टूट चुकी थी। काव्या का डर अब कामुकता की उस आग में तब्दील हो गया था, जहाँ उसे दर्द में भी एक अनोखी लज्ज़त मिलने लगी थी। लाखन और मोहन ने जब देखा कि काव्या अब खुद अपनी कमर हिलाकर उनके लंड का स्वागत कर रही है, तो उनका जोश दोगुना हो गया।

लाखन ने काव्या को मिट्टी से उठाया और उसे सरसों के ढेर पर टिका दिया। काव्या ने खुद अपनी टांगें फैला दी और अपने दोनों हाथों से अपने भारी चूचों को मसलने लगी।

काव्या: “चाचा… आज रहम मत करना… आज अपनी इस भतीजी की जवानी को ऐसा मथो कि सारा रस बाहर आ जाए।”

लाखन की आँखों में खून उतर आया। उसने काव्या को अपनी ओर घुमाया और उसे अपनी मजबूत जांघों पर बिठा लिया। इस बार काव्या ऊपर थी और लाखन नीचे। काव्या ने खुद लाखन का मोटा लंड पकड़ा और उसे अपनी गीली चूत के छेद पर टिकाकर एक झटके में नीचे बैठ गई।“आह्ह्ह्ह… उफ्फ्फ…!”

काव्या की आँखें मुँद गई। वह लाखन की गोद में ऊपर-नीचे उछलने लगी। हर बार जब वह नीचे बैठती, ‘पट-चट’ की आवाज़ खेत के सन्नाटे को चीर देती। उसकी गांड का मांस लाखन की जांघों से टकरा कर ‘थप-थप’ का शोर मचा रहा था।

मोहन पास खड़ा होकर काव्या की थरथराती गांड और उसकी कमर की लचक देख रहा था। उससे अब और रहा नहीं गया। उसने काव्या के पीछे आकर अपना लंड उसकी गांड के दरार पर रगड़ना शुरू किया।

मोहन: “लाखन भाई, ये तो आज पूरी घोड़ी बनी हुई है। देख कैसे अपनी चूत से तेरा लंड निगल रही है!”

काव्या ने पीछे मुड़ कर देखा और अपनी नशीली आँखों से मोहन को इशारा किया। मोहन ने देरी नहीं की और अपनी पूरी ताकत से अपना लंड काव्या की गांड के तंग छेद में ठूंस दिया।’फट.टटटटटट..!’अब काव्या दो चक्की के पाटों के बीच पिस रही थी। आगे से लाखन का वार और पीछे से मोहन की धमक। काव्या का शरीर एक मशीन की तरह थरथरा रहा था। वह कभी लाखन के कंधों को काटती तो कभी हवा में हाथ मार कर अपनी उत्तेजना ज़ाहिर करती।

जैसे-जैसे शाम गहरी हुई, झटकों की रफ़्तार बढ़ती गई। काव्या की गांड अब बेकाबू होकर थर-थर-थर-थर कांप रही थी। लाखन और मोहन, दोनों मिल कर उसे एक लय में ठोक रहे थे। आवाजों का सैलाब सरसों के खेत में गूंज रहा था, सिर्फ ‘थप-थप-फट-फट-पट-पट’ की आवाज़ें गूँज रही थी।

काव्या अब पूरी तरह से बेबाक हो चुकी थी। उसने अपनी ज़ुबान बाहर निकाल ली थी और हाँफते हुए बस और गहरे झटकों की मांग कर रही थी।

अंत में, जब दोनों चाचाओं के सब्र का बांध टूटा, तो उन्होंने काव्या को ज़मीन पर पटक दिया। लाखन ने उसकी चूत में और मोहन ने उसकी गांड में अपना सारा गर्म लावा एक साथ छोड़ दिया। काव्या पसीने से लथ-पथ, मिट्टी में सनी हुई, पर एक तृप्त मुस्कान के साथ वहीं पड़ी रही। अब उसे गाँव के राजू का डर नहीं था, उसे तो बस अगले दिन की शाम का इंतज़ार था।अगले दिन क्या हुआ जानने के लिए बने रहें अपने भाई राजू के साथ।

कमेन्ट करके जरूर बताएं कहानी कैसी लगी, धन्यवाद !

अगला भाग पढ़े:-गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-7

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