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Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din – Ep 26

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06 Nov 2020 को प्रकाशित

Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din – Ep 26
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कुमार की चोटें गहरी थीं और शायद कोई हड्डी नहीं टूटी थी पर मांसपेशियों में काफी जख्म लगे थे और बदन में दर्द था। नीतू के कप्तान कुमार के बर्थ पर ही लम्बे होने से कुमार के बदन का कुछ हिस्सा दबा और दर्द होने के कारण कप्तान कुमार कराह उठे।

नीतू एकदम बैठ गयी और उठ कर कुमार के पाँव के पास जा बैठी। कुमार के पाँव को अपनी गोद में रख कर उस पर कम्बल डालकर वह हल्के से कुमार के पाँव को सहलाने लगी।

फिर नीतू की अपनी आँखें भी भारी हो रही थीं। नीतू बैठे बैठे ही कुमार के पाँव अपनी गोद में लिए हुए सो गयी।

नीतू के सोने के कुछ देर बाद नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना नीतू को मिलने के लिए नीतू की बर्थ के पास पहुँचने वाले थे, तब सुनीता ने उन्हें देखा।

सुनीता को डर था की कहीं नीतू के पति नीतू को कुमार के साथ कोई ऐसी वैसी हरकत करते हुए देख ना ले इसलिए वह ब्रिगेडियर साहब को नमस्ते करती हुई एकदम उठ खड़ी हुई और जस्सूजी के पाँव थोड़े से खिसका कर सुनीता ने ब्रिगेडियर साहब को अपने पास बैठाया।

सुनीता ने ब्रिगेडियर खन्ना साहब से कहा की उस समय नीतू सो रही थी और उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं था। सुनीता ने फिर ब्रिगेडियर खन्ना साहब को समझा बुझा कर अपने पास बैठाया और नीतू और कुमार के साथ घटी घटना के बारे में सब बताया। कैसे नीतू फिसल गयी फिर कुमार भी फिसले और कैसे कुमार ने नीतू की जान बचाई।

नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना ने भी सुनीता को बताया की जब गाडी करीब एक घंटे तक कहीं रुक गयी थी तब उन्होंने किसी को पूछा की क्या बात हुई थी। तब उनके साथ वाली बर्थ बैठे जनाब ने उन्हें बताया की कोई औरत ट्रैन से निचे गिर गयी थी और कोई आर्मी के अफसर ने उसे बचाया था। उन्हें क्या पता था की वह वाक्या उनकी अपनी पत्नी नीतू के साथ ही हुआ था?

यह सब बातें सुनकर नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना साहब बड़े चिंतित हो गए और वह नीतू के पास जाने की जिद करने लगे तब सुनीता ने उन्हें रोकते हुए ब्रिगेडियर साहब को थोड़ी धीरज रखने को कहा और बाजू में सो रहे जस्सूजी को जगाया और ब्रिगेडियर खन्ना से बातचीत करने को कहा।

ब्रिगेडियर साहब जैसे ही जस्सूजी से घूम कर बात करने में लग गए की सुनीता उठखडी हुई और उसने परदे के बाहर से नीतू को हलके से पुकारा।—–नीतू को सोये हुए आधे घंटे से कुछ ज्यादा ही समय हुआ होगा की वह जागी तो नीतू ने पाया की कुमार की साँसे धीमी रफ़्तार से नियमित चल रही थीं।

कभी कभार उनके मुंह से हलकी सी खर्राटे की आवाज भी निकलने लगी। नीतू को जब तसल्ली हुई की कुमार सो गए हैं तब उसने धीरे से अपने ऊपर से कम्बल हटाया और अपनी गोद में से कुमार का पाँव हटाकर निचे रखा।

नीतू ने कुमार के पाँव पर कम्बल ओढ़ा दिया और पर्दा हटा कर ऊपर अपनी बर्थ पर जाने के लिए उठने ही लगी थी की उसे परदे के उस पार सुनीता की आवाज सुनिए दी। उसको अपने पति ब्रिगेडियर खन्ना की भी आवाज सुनाई दी।

नीतू हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई। उस ने पर्दा हटाया और सुनीता को देखा। सुनीता नीतू का हाथ पकड़ कर उसे ब्रिगेडियर साहब के पास ले गयी। सुनीता ने अपने पति ब्रिगेडियर साहब को देखा तो उनके चरण स्पर्श करने झुकी।

ब्रिगेडियर साहब ने अपनी पत्नी नीतू को उठाकर गले लगाया और पूछा, “नीतू बेटा (ब्रिगेडियर खन्ना कई बार प्यार से नीतू को अपनी पत्नी होने के बावजूद नीतू की कम उम्र के कारण उसे बेटा कह कर बुलाया करते थे।) मैंने अभी अभी इन (सुनीता की और इशारा करते हुए) से सूना की तुम ट्रैन के निचे गिर गयी थी? मेरी तो जान हथेली में आ गयी जब मैंने यह सूना। उस वक्त मैं गहरी नींद में था और मुझे किसीने बताया तक नहीं। मेरा कोच काफी पीछे है। मैंने यह भी सूना की कप्तान कुमार ने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर बचाया? क्या यह सच है?”

ब्रिगेडियर खन्ना फिर अपनी पत्नी के बदन पर हलके से हाथ फिराते हुए बोले, “जानूं, तुम्हें ज्यादा चोट तो नहीं आयी ना?”

नीतू ने ब्रिगेडियर साहब की छाती में अपना सर लगा कर कहा, “हाँ जी यह बिलकुल सच है। मैं कप्तान कुमारजी के कारण ही आज ज़िंदा हूँ। मुझे चोट नहीं आयी पर कुमारजी काफी चोटिल हुए हैं। वह अभी सो रहे हैं।”

सुनीता और कर्नल साहब की और इशारा करते हुए नीतू ने कहा, “इन्होने कुमार साहब की पट्टी बगैरह की। एक डॉक्टर ने देखा और कहा की कुमार जी की जान को कोई ख़तरा नहीं है।”

फिर नीतू ने अपने पति को जो हुआ उस वाकये की सारी कहानी विस्तार से सुनाई। नीतू ने यह छुपाया की कुमार नीतू को पकड़ने के लिए उस के पीछे भाग रहे थे और कुमार की चंगुल से बचने के लिए वह भाग रही थी तब वह सब हुआ।

हालांकि यह उसे बताना पड़ा की कुमार उसके पीछे ही कुछ बात करने के लिए तेजी से भागते हुए हुए आ रहे थे तब उसे धक्का लगा और वह फिसल गयी और साथ में कुमार भी फिसल गए। ऐसे वह वाक्या हुआ। नीतू को डर था की कहीं उसके पति उसकी कहानी की सच्चाई भाँप ना ले।

नीतू की सारी कहानी सुनने के बाद ब्रिगेडियर साहब ने नीतू के बाल सँवारते हुए कहा, “नीतू, शुक्र है तुम्हें ज्यादा चोट नहीं आयी और कुमार भी बच गए। चलो जो हुआ सो हुआ। अब तुम मेरी बात बड़े ध्यान से सुनो। तुम अब कुमार का अच्छी तरह ख्याल रखना। वह अकेला है। उसे कोई तकलीफ ना हो…

उन्हें किसी तरह की कोई भी जरुरत हो तो तुम पूरी करना। उनके साथ ही रहना। उन्होंने तुम्हारी ही नहीं मेरी भी जान बचाई है। मेरी जान तुम हो। उन्होंने तुम्हारी जान बचाकर हकीकत में तो मेरी जान बचाई है। ओके बच्चा? मैं चलता हूँ। तुम अपना भी ध्यान रखना।”

यह कह कर सुनीता और जस्सूजी को धन्यवाद देते और नमस्कार करते हुए ब्रिगेडियर साहब धीरे धीरे कम्पार्टमेंट की दीवारों का सहारा लेते हुए अपने कम्पार्टमेंट की और चल दिए।

अपने पति का इतना जबरदस्त सहारा और प्रोत्साहन पाकर नीतू की आँखें नम हो गयीं। वह काफी खुश भी थी। “कुमार के साथ ही रहना, उन का ख़ास ध्यान रखना। उन्हें किसी तरह की कोई भी जरुरत हो तो तुम पूरी करना।”.

क्या उसके पति ब्रिगेडियर साहब यह कह कर उसे कुछ इशारा कर रहे थे? नीतू इस उधेङबुन में थी की सुनीता ने नीतू को बताया की उन्होंने नीतू और कुमार के लिए भी दोपहर का खाना आर्डर किया था। खाना आ भी चुका था।

सुनीता ने नीतू को कहा की वह कुमार को भी जगाये और खाने के लिए कहे।

नीतू ने प्यार से कुमार को जगा कर बर्थ पर बिठा कर खाने के लिए आग्रह किया। कुमार को चेहरे और पाँव पर गहरी चोटें आयी थीं, पर वह कह रहे थे की वह ठीक हैं। कुमार खाने के लिए मना कर रहे थे पर नीतू ने उनकी एक ना सुनी।

चेहरे पर पट्टी लगाने के कारण उन्हें शायद ठीक ठीक देखने में दिक्कत हो रही थी। नीतू ने खाने की प्लेट अपनी गोद में रखकर कप्तान कुमार के मना करने पर भी उन्हें एक एक निवाला बना कर अपने हाथों से खिलाना शुरू किया।

सुनीता, ज्योतिजी, सुनीलजी और जस्सूजी इस दोनों युवा का प्यार देख कर एक दूसरे की और देख कर शरारती अंदाज में मुस्कराये।

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सबके मन में शायद यही था की “जवाँ दिल की धड़कनों में भड़कती शमाँ। आगे आगे देखिये होता ही क्या।” प्यार और एक दूसरे के प्रति का ऐसा भाव देख सब के मन में यही था की कभी ना कभी जवान दिलों में भड़कती प्यार की यह छोटी सी चिंगारी जल्द ही आगे चल कर जवान बदनों में काम वासना की आग का रूप ले सकती है।

सुनीता नीतू के एकदम पास खिसक कर बैठ गयी और नीतू के कानों में अपना मुंह लगा कर कोई न सुने ऐसे फुसफुसाते हुए कहा…

“नीतू, क्या इतना प्यार कोई किसी को कर सकता है? कुमार ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए तुम्हारी जान बचाई। कोई भी स्त्री के लिए कोई भी पुरुष इससे ज्यादा क्या बलिदान दे सकता है भला? मैं देख रही थी की कुमार तुम्हारे करीब आने की कोशिश कर रहा था और तुम उससे दूर भाग रही थी। ऐसे जाँबाज़ पुरुष के लिए अपना स्त्रीत्व की ही क्या; कोई भी कुर्बानी कम है।”

ऐसा कह कर सुनीता ने नीतू को आँख मारी और फिर अपने काम में लग गयी। सुनीत की बात नीतू के जहन में बन्दुक की गोली के तरह घुस गयी। एक तो उसका तन और मन भी ऐसी मर्दानगी देख कर मचल ही रहा था उस पर सुनीताजी की सटीक बात नीतू के दिल को छू गयी।

खाने के बाद नीतू फिर से कुमार के पाँव से सट कर बैठ गयी। फिर से सारे परदे बंद हुए। क्यों की कुमार को तब भी काफी दर्द था, इस कारण नीतू ने मन ना मानते हुए भी कुमार को प्यार से उसकी साइड की निचली बर्थ पर लिटा कर उसे कंबल ओढ़ा कर खुद जैसे ही अपनी ऊपर वाली बर्थ पर जाने लगी थी की उसने महसूस किया की कप्तान कुमार ने उसकी बाँह पकड़ी।

नीतू ने मूड के देखा तो कुमार का चेहरा कम्बल से ढका हुआ था और शायद वह सो रहे थे पर फिर भी वह नीतू को दूर नहीं जाने देना चाहते थे।

नीतू के चेहरे पर बरबस एक मुस्कान आ गयी। नीतू कुमार का हाथ ना छुड़ाते हुए वहीं खड़ी रही। कुमार ने नीतू का हाथ पकडे रखा।

फिर नीतू धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी पर फिर भी कुमार ने हाथ नहीं छोड़ा और नीतू का हाथ पकड़ अपना चेहरा ढके हुए रखते नीतू को अपने पास बैठने का इशारा किया।

नीतू कुमार के सर के पास गयी और धीरे से बोली, “क्या बात है? कुछ चाहिए क्या?”

परदे को उठा कर अपना मुंह नीतू के मुंह के पास लाकर बोले, “नीतू, क्या अब भी तुम मुझसे रूठी हुई हो? मुझे माफ़ नहीं करोगी क्या?”

नीतू ने अपने हाथ कुमार के मुंह पर रख दिए और बोली, “क्या बात कर रहें हैं आप? भला मैं आपसे कैसे नाराज हो सकती हूँ?”

कुमार ने कहा, “फिर उठ कर ऊपर क्यों जाने लग़ी? नींद आ रही है क्या?”

नीतू ने कुमार की बात काटते हुए कहा, “मुझे कोई नींद नहीं आ रही। भला इतना बड़ा हादसा होने के बाद कोई सो सकता है? जो हुआ यह सोचते ही मेरा दिल धमनी की तरह धड़क रहा है। पता नहीं मैं कैसे बच गयी। मेरी जान तुम्हारी वजह से ही बची है कुमार!”

कुमार ने फट से अपने हाथ नीतू की छाती पर रखने की कोशिश करते हुए कहा, “मैंने तुम्हें कहाँ बचाया? बचाने वाला सबका एक ही है। उसने तुम्हें और मुझे दोनों को बचाया। यह सब फ़ालतू की बातें छोडो। तुमने क्या कहा की तुम्हारा दिल तेजी से धड़क रहा है? ज़रा देखूं तो वह कितनी तेजी से धड़क रहा है?”

नीतू ने इधर उधर देखा। कहीं कोई उन दोनों की प्यार की लीला देख तो नहीं रहा? फिर सोचा, “क्या पता कोई अपना मुंह परदे में ही छिपाकर उनको देख ना रहा हो?”

नीतू ने एक हाथ से कुमार की नाक पकड़ कर उसे प्यार से हिलाते हुए और दूसरे हाथ से धीरे से प्यार से कुमार का हाथ जो नीतू के स्तनोँ को छूने जा रहा था उसको अपने टॉप के ऊपर से हटाते हुए कहा, “जनाब को इतनी सारी चोटें आयी हैं, पर फिर भी रोमियोगिरी करने से बाज नहीं आते? अगर मैं आपके पास बैठी ना, तो सो चुके आप..!

मैं चाहती हूँ की आप आराम करो और एकदम फुर्ती से वापस वैसे ही हो जाओ जैसे पहले थे। मैं चाहती हूँ की कल सुबह तक ही आप दौड़ते फिरते हो जाओ। फिर अगले पुरे सात दिन हमारे हैं। अब सो जाओ ना प्लीज? तुम्हें आराम की सख्त जरुरत है।”

कुमार ने नीतू की हाथों को अपने करीब खींचा और उसे मजबूर किया की वह कुमार के ऊपर झुके। जैसे ही नीतू झुकी की कुमार ने करवट ली, कम्बल हटाया और नीतू के कानों के करीब अपना मुंह रख कर कहा, “मुझे आराम से भी ज्यादा तुम्हारी जरुरत है।”

नीतू ने मुंह बनाते हुए कहा, “हाय राम मैं क्या करूँ? यह मजनू तो मान ही नहीं रहे! अरे भाई सो जाओ और आराम करो। ऐसे जागते और बातें करते रहोगे तो आराम तो होगा ही नहीं ऊपर से कोई देखेगा और शक करेगा।”

कुमार ने जिद करते हुए कहा, “नहीं मैं ऐसे नहीं मानूंगा। अगर तुम मुझसे रूठी नहीं हो तो बस एक बार मेरे मुंह के करीब अपना मुंह तो लाओ, फिर मैं सो जाऊंगा। आई प्रॉमिस।”

नीतू ने अपना मुंह कुमार के करीब किया तो कुमार ने दोनों हाथों से नीतू का सर पकड़ा और अपने होँठ नीतू के होँठों पर चिपका दिए।

हालांकि सारे परदे ढके हुए थे और कहीं कोई हलचल नहीं दिख रही थी, पर फिर भी कुमार की फुर्ती से अपने होठोँ को चुम लेने से नीतू यह सोच कर डर रही थी की इतने बड़े कम्पार्टमेंट में कहीं कोई उन्हें प्यार करते हुए देख ना ले।

पर नीतू भी काफी उत्तेजित हो चुकी थी। कुमार ने नीतू का सर इतनी सख्ती से पकड़ा था की चाहते हुए भी नीतू उसे कुमार के हाथों से छुड़ाने में असमर्थ थी।

मजबूर होकर “जो होगा देखा जाएगा” यह सोच कर नीतू ने भी अपनी बाँहें फैला कर कुमार का सर अपनी बाँहों में लिया और कुमार के होँठों को कस के चुम्बन करने लगी।

पढ़ते रहिये, क्योकि यह कहानी आगे जारी रहेगी!

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Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din

कुल भाग: 73
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भाग 4
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भाग 5
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भाग 6
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भाग 7
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भाग 8
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भाग 9
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भाग 10
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भाग 11
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भाग 12
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भाग 13
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भाग 14
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भाग 15
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भाग 16
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भाग 17
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भाग 25
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भाग 30
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भाग 31
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भाग 32
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भाग 66
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