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वासना की न खत्म होती आग -8

सारिका कंवल

23 Mar 2015 को प्रकाशित

वासना की न खत्म होती आग -8
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वो मुझे अपने दांतों को भींचते हुए मुझे देख धक्के लगाते ही जा रहे थे और मैं उन्हें देख रही थी कि उनके सर से पसीना टपक रहा था और नीचे योनि और लिंग की आसपास तो झाग के बुलबुले बन गए थे।

करीब 7-8 मिनट यूँ ही मुझे धक्के मारने के बाद उन्होंने मुझे उठाया और अपनी टाँगें आगे की तरफ फैला मुझे गोद में बिठा लिया।मैं समझ गई कि अब धक्के लगाने की बारी मेरी आ गई।पर मेरी हिम्मत अब जवाब देने लगी थी।

मैं भी आधे मन से उनके लिंग के ऊपर बैठने उठने लगी जिससे लिंग योनि में अन्दर बाहर होने लगा।पर यह क्या… मेरी पकड़ कुछ पलों के धक्कों में फिर से मजबूत हो गई और मेरी योनि भी कसने लगी। मैं फिर से गर्म हो गई और जोरों से धक्के लगाने लगी।मुझे ऐसा लगने लगा कि अब तो मैं फिर झड़ जाऊँगी और पता नहीं क्यों मेरा मन फिर से पानी छोड़ने को होने लगा। मैं तेज़ी से धक्के लगाने लगी तो वो भी मेरी हरकतें देख नीचे से जोर जोर झटके देने लगे।

मैं अपनी कमर इतना उठा देती कि लिंग का सुपारा ही बस अन्दर रहता और जोर से फिर धकेलती कि लिंग पूरा योनि में मेरी बच्चेदानी तक जाता।मैं ये सब तेज़ी से करने लगी और फिर एक पल ऐसा आया जिसका मुझे इंतज़ार था, जिसके लिए मैं इतनी मेहनत कर रही थी।फिर से मेरी पूरा बदन अकड़ने लगा, योनि सिकुड़ने लगी।

मैंने एक झटके के साथ उनके होठों से अपने होंठ भिड़ा दिए और जुबान को चूसने लगी, गले में हाथ कस दिए और लिंग जबकि पूरा मेरी बच्चेदानी तक था, फिर भी मेरी कमर हिल हिल कर धक्के देते हुए मैं झड़ने लगी, मैंने चिपचिपा पानी सा रस छोड़ दिया उनके लिंग के ऊपर से जो उनके अण्डकोषों और जांघों को भीगा रहा था।

धीरे धीरे मेरे धक्के कमजोर पड़ते गए और मैं तब रुकी जब मैं पूरी तरह चरम सुख तक पहुँच गई।मैं उनकी गोद में ही थी और उनका लिंग मेरी योनि के भीतर ही था, मैंने कहा- अब बस करें… बार बार फ़ोन बज रहा है, घर जाना है।उन्होंने मुझसे कहा- बस थोड़ी देर और… अभी तो मजा आना शुरू हुआ है।

हम बातें करते हुए कुछ पल ऐसे ही हल्के धक्के लगाते रहे, फिर मैंने फ़ोन सामने से उठा कर देखा तो तारा का मिस कॉल था।मैंने उनसे कहा- अब या तो जाने दो या जल्दी करो, तारा परेशान हो रही होगी।

इतना कहना था कि तारा का फ़ोन फिर से आ गया।मैं तो जानती थी कि तारा को सब मालूम है, मैंने फ़ोन उठा लिया फ़ोन उठाते ही आवाज आई- और कितना टाइम लगेगा?मैंने जवाब दिया- बस निकलने की तयारी कर रही हूँ।वो भी समझ गई, उसने फ़ोन रख दिया।

उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया और मैं बिस्तर पर जाकर लेट गई, वो भी उठ कर आये और मेरी टांगों के सामने घुटनों के बल खड़े हो गए।मैंने स्वयं ही अपनी टाँगें फैला दी उनके लिए पर उन्होंने मेरी टाँगें उठा कर अपने कंधो पर रखी और लिंग को हाथ से हिलाते हुए मेरी योनि की छेद पे टिका कर घुसाने लगे।

लिंग मेरी योनि में घुसते ही वो मेरे ऊपर पूरी तरह लेट गए और अपने दोनों हाथों से मेरे चूतड़ पकड़ कर मेरे होठों को चूसते हुए धक्के लगाते हुए सम्भोग करने लगे।मैंने अपनी टाँगें उठा कर उनकी जांघों पर रख दी और उनका मुँह अपने होठों से अलग करते हुए बोली- अब जल्दी जल्दी करो… देर हो रही है।

तब उन्होंने भी तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए और मैंने भी जल्दी खत्म हो… सोच कर अपनी कमर उनके हर धक्के पर उठाने लगी।दो मिनट के धक्कों में मैं फिर से गर्म होने लगी और फिर क्या था, उनके जोश और मेरे जोश से धक्कों की रफ़्तार और ताकत इतनी हो गई कि बिस्तर भी हिलने लगा।

मैं कराहते और सिसकते हुए पूरी मस्ती में उनके लिंग से अपनी योनि को रगड़ते हुए धक्के लगाने लगी।वो मेरे चूतड़ों को पूरी ताकत से दबाते हुए खींचते और जोर जोर से धक्के देते तो कभी मेरे स्तनों को बेरहमी से काटे और चूसते।

इधर मैं भी कभी उनके सर के बालों को जोर जोर से खींचती तो कभी अपनी टांगों से उनको पूरी ताकत लगा दबोचने की कोशिश करतेहुए अपनी कमर उठा देती जिससे लिंग मेरी योनि की पूरी गहराई तक जाता।पूरा कमरा हम दोनों के हांफ़ने और सिसकारने से गूंजने लगा था।

करीब 10 मिनट के जोरदार धक्कों के बाद वो पल भी आ गया जिसके लिए हम दोनों इस तरह मेहनत कर रहे थे।मैं उनके सुपारे की गर्मी को अपनी बच्चेदानी में महसूस करने लगी और समझ गई कि अब वो झड़ने को हैं और इधर मेरी जांघों और योनि में भी अकड़न होने लगी।

मेरी साँसें लम्बी होने लगी, उधर उनके भी धक्के तेज़ी से मुझे लगने लगे, मैं कराहते हुए उह्हह्म्म आह्ह्ह्ह करते हुए पानी छोड़ने लगी और उनको पूरी ताकत से पकड़ अपनी कमर बार बार उठा कर नीचे से धक्के देने लगी।वो भी अपनी पूरी ताकत के 15 20 धक्के लगाते हुए मुझसे चिपक गए और अपना रस मेरी योनि की गहराई में छोड़ कर शांत हो गए।

मैं भी उनके शांत होते ही 2-4 झटके देती हुई उनको पूरी ताकत से पकड़ शांत हो गई।मैं धीरे धीरे अपनी पकड़ ढीली करने लगी। कुछ देर क बाद और भीतर से थकी और संतुष्ट सी लगने लगी।उनका भी शरीर अब ढीला पड़ने लगा और उनका लिंग मेरी योनि के भीतर सिकुड़ने लगा।

कुछ देर के बाद हम दोनों उठे और बाथरूम जाकर खुद को साफ किया, फिर अपने अपने कपड़े पहन कर तैयार होकर तारा को फ़ोन किया।तारा के आते ही हमने चाय मंगवाई और बातें करने लगे।

शाम के करीब 4 बज गए थे, मुझे घर भी जाना था तो मैं जल्दी निकलने के चक्कर में थी पर तारा और उनकी बातें बढ़ती ही जा रही थी।मैंने जल्दी जल्दी निकलने को बोला उन्हें और फिर हम अपने अपने घर चले आये।

रात को सोते समय जब मैं कपड़े बदल रही थी गौर किया कि मेरी पैन्टी में दाग सा है जो सूख कर कड़ा हो गया है।मुझे फिर याद आया कि उनका वीर्य मेरी योनि के भीतर से बह कर मेरी पैन्टी गीली कर गया था, इसी वजह से रास्ते भर मुझे मेरी पैन्टी गीली गीली सी लग रही थी।शायद जल्दबाजी में मैंने अपनी योनि ठीक से साफ़ नहीं की थी।

मैं मन ही मन मुस्कुराते हुए एक संतुष्टि की सांस लेते हुए लेट गई और न जाने कब मेरी आँख लग गई।support@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

एस के राजपूत

3 weeks ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

किशोर लहाने

3 weeks ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

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