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चाचा की कुंवारी साली के साथ चुदाई के हसीन लम्हे

राज शर्मा 6659

08 Jul 2023 को प्रकाशित

चाचा की कुंवारी साली के साथ चुदाई के हसीन लम्हे
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वैरी सेक्सी गर्ल हॉट स्टोरी में पढ़ें कि कैसे मुझे गाँव में मेरे चाचा की साली मिली. उसने मेरे साथ शरारत की तो मैं भी उसकी चुदाई की ताक में था. मैंने उसे कैसे चोदा?

मेरी सेक्स कहानीदेसी आंटी के साथ मेरी पहली चुदाईमें मैंने बताया था कि कैसे मेरी सेक्स लाइफ रेणु आंटी के साथ शुरू हुई थी.

मैं आंटी के साथ सेक्स का पूरा एक्सपीरियंस ले चुका था. रेणु आंटी ने बिस्तर पर कलाबाजी करने के खेल में मुझे बहुत कुछ सिखा प्रिया था. उस सेक्स कहानी को लेकर आप सभी के बहुत सारे मेल भी आए, जिनका मैं दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.

आज बहुत अरसे बाद अपनी एक मित्र के कहने पर आज अपनी वैरी सेक्सी गर्ल हॉट स्टोरी आप सबके साथ शेयर कर रहा हूँ. जिन लोगों ने मेरी पहली सेक्स कहानी नहीं पढ़ी है, उन्हें मैं एक बार फिर से अपना परिचय दे दूं.

मैं राज शर्मा (स्टोरी नाम) कानपुर से हूँ. ये कहानी उस वक़्त की है, जब मैंने जवानी की दहलीज पर कदम रखा था और गाज़ियाबाद में रहता था.

गर्मी की छुट्टियां शुरू हो रही थीं. हर बार की तरह इस बार भी हम कानपुर अपने पैतृक घर गए. जहां जाकर हमें पता चला कि हमारे दादा के छोटे भाई का देहांत हो गया है. जिस वजह से हमें अपने गांव जाना पड़ा. उधर सभी रिश्तेदार आए थे. धीरजा से मेरी मुलाकात वहीं हुई थी.

धीरजा छोटे दादा के बेटे, मतलब मेरे पापा के कजिन(मेरे चाचा लगे) की साली की बेटी थी. उसका फिगर ठीक था. उसने भी जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था. मैं बगीचे से आम और जामुन तोड़ कर लाता था, जो धीरजा को बहुत पसंद थे.

इससे हमारे बीच जान पहचान बढ़ने लगी. तेरहवीं की रस्म होने के भीड़ कम हो गई. धीरजा वहीं अपनी मौसी के साथ रुक गई.

मैं शुरू से ही हंसमुख स्वभाव का था. इसलिए मेरी उससे काफी घुटने लगी थी.

गांव में जल्दी ही अंधेरा हो जाता है. उस समय गांव में लाइट भी नहीं थी. शाम को मनोरंजन के लिए हम सब इकट्ठे होते व कहानी किस्सों का दौर शुरू हो जाता.

ऐसे ही एक दिन मैं कहानी सुनाने लगा. सभी लोग छत पर दरी बिछा कर बैठे थे. मैं खाट पर बैठ कर कहानी सुना रहा था. धीरजा मेरे बहुत नजदीक बैठी थी. वो इतने पास थी कि मेरे पैर हिलते, तो धीरजा से टकरा जाते.

धीरे धीरे मुझे महसूस हुआ कि मेरे पैर धीरजा के पैरों के बीच में आ गए हैं बिल्कुल उसकी बुर से टच होते हुए.मुझे ये महसूस करते ही हल्का झटका लगा.

मैंने अपना पैर हटाने की कोशिश की. तो धीरजा मेरे और नजदीक खिसक आई. जिससे मेरे पैर का अंगूठा धीरजा की बुर की दरार में आ गया. अब मेरे पास अपने पैर को हटाने की जगह नहीं बची थी. मेरा अंगूठा स्थिर था मगर धीरजा की कमर हिल रही थी जिससे वो मजा ले रही थी.

अंगूठा बुर में लग रहा था तो उसकी बुर का गीलापन भी मुझे गरमाने लगा था. मगर अभी सिर्फ अंगूठा ही चलाया जा सकता था. इसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते थे.अंधेरे के कारण किसी को कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था, मगर सुनाई सब दे रहा था. इसलिए मैं कुछ बोल भी नहीं पा रहा था.

सुबह धीरजा से आंखें मिलीं, तो पट्ठी अपनी मौसी के साथ थी. मुझे देख कर उसने मुँह फेर लिया और शरीफजादी बन गई. मैं भी लंड दबा कर रह गया.

उधर इसी तरह की पोजीशन बनी रही और हम दोनों में कोई बात न हो सकी. पहले जो आम जामुन के चलते बातचीत हो जाती थी, अब वो भी धीरजा करने में सकुचा रही थी.

एक हफ्ते बाद हम सब वापस कानपुर आ गए.

कानपुर आने के बाद चाचा मुझे अपने घर ले गए. जहां धीरजा भी थी. चाची डिलीवरी के लिए अपने मायके गई थीं. जो पास में ही था.

चाचा के घर खाना बनाने के लिए धीरजा, चाचा के घर में आ गई थी. वहां सिर्फ मैं, चाचा, छोटे चाचा व धीरजा ही थे.

सुबह नौ बजे चाचा मुझे घर पर छोड़ कर आफिस चले गए. छोटे चाचा अपने काम से निकल गए थे. घर में सिर्फ मैं और धीरजा ही थे. धीरजा नहाने के लिए बाथरूम में चली गई, जिसकी एक खिड़की हल्की खुली रहती थी. धीरजा ने अपने कपड़े उतारे और नहाने लगी.

मैंने खिड़की की झिरी से अन्दर देखा, तो अन्दर धीरजा बिल्कुल नंगी नहा रही थी. उसकी नंगी जवानी देख कर मेरे लंड में आग लगने लगी. मैं बस चुपचाप उसकी बुर और चूचियां देखते हुए अपने लंड को हिलाने लगा.

धीरजा जब नहा कर बाहर आने लगी, तो मैं कमरे में वापस आ गया.

चाचा के पास एक ही कमरा था. रात में मैं छोटे चाचा के साथ सोया था. दूसरे पलंग पर बड़े चाचा और धीरजा थे. गर्मी के कारण मैंने अपना पलंग पंखे के नीचे खिसका लिया, जिससे मेरे और धीरजा के बीच दूरी खत्म हो गई.

रह रह कर मुझे धीरजा की गांव की वो हरकत याद आने लगी. मेरी नींद उड़ गई थी. धीरजा मेरे बहुत नजदीक लेटी थी.

चूंकि आग लगाने की शुरुआत धीरजा ने की थी. मगर अब वो बिल्कुल घास नहीं डाल रही थी. मैं सोचा कि शायद ये मेरी तरफ से पहल का इंतजार कर रही होगी. ये सोच कर उस रात मुझसे रहा नहीं गया और मेरा हाथ धीरजा के टॉप के ऊपर उसके मम्मों पर चला गया.

मैंने पहले तो हाथ रखा और रुक गया. उसने कुछ हरकत नहीं की. तो धीरे धीरे मैं धीरजा के मम्मों को दबाने लगा.

कोई दो मिनट तक धीरजा की तरफ से कोई हरकत नहीं होने से मेरी हिम्मत बढ़ गई. मेरा हाथ धीरजा के टॉप के अन्दर घुस गया. धीरजा के निप्पल टाइट हो गए थे.

मैं धीरजा के दोनों मम्मों और निप्पलों को बारी बारी से मसलने लगा. धीरजा ने कोई विरोध नहीं किया, उसने सिर्फ अपना हाथ मेरे हाथ पर रख प्रिया. लेकिन मेरे हाथ को हटाने की कोशिश नहीं की. ये मेरे लिए ग्रीन सिग्नल था.

मैं धीरजा के मम्मों को छोड़ कर उसकी बुर की तरफ आ गया. पहले पैंटी के ऊपर से बुर को हल्का रगड़ा, तो महसूस हुआ धीरजा की पैंटी गीली हो रही थी. मेरा हाथ बुर को महसूस करने लगा. धीरजा की पैंटी के अन्दर नंगी बुर पर आ गया. मेरे हाथ की उंगलियां धीरजा की बुर के होंठों को खोल कर अन्दर घुसने लगी, जिससे धीरजा गर्म होने लगी.

वो चाचा के साथ लेटी होने के कारण ज्यादा हिल नहीं सकती थी, न आवाज कर सकती थी. उसने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया.

मैं तेजी से उसकी बुर में उंगली कर रहा था, जिससे धीरजा की बुर ने पानी छोड़ प्रिया. मेरा हाथ धीरजा की बुर के पानी से गीला हो गया, जिसे मैंने धीरजा की पैंटी में ही साफ कर प्रिया.

अगले दिन जब चाचा आफिस चले गए छोटे चाचा भी गांव चले गए थे. उनके जाने के बाद धीरजा फिर से नहाने गई. तो वो टॉवल, कमरे में ही छोड़ कर बाथरूम में घुस गई.

मैं फिर से धीरजा को नंगा नहाते देखने लगा. जब धीरजा नहा चुकी, तो उसने मुझे टॉवल देने को बोला.

जब मैंने पूछा- टॉवल लेकर क्यों नहीं गई थीं?तो वो बोली- कपड़े धोने थे तो टॉवल टांगने की जगह नहीं थी.

मैं हाथ बढ़ा कर टॉवल धीरजा को देने लगा, जिसके लिए धीरजा ने हल्का सा दरवाजा खोला. लेकिन धीरजा के नंगे जिस्म की हल्की झलक मुझे मिल ही गई.

धीरजा बदन को पौंछ कर बाहर आई और अपने बालों को झटका, तो पानी की बूंदें मेरे चेहरे पर टकरा गईं.

थोड़ी देर पहले ही मैंने धीरजा की नंगी नहाते देखा था. मैंने धीरजा को पकड़ लिया.

और रात के बारे में कुछ बोलता, इससे पहले ही धीरजा बोल उठी- राज मुझे छोड़ो, खाना बनाना है मुझे.वो मेरा हाथ झटक कर किचन में घुस गई.

मैं भी झिझक के मारे उससे कुछ ज्यादा न कह सका. अब तक दोपहर के 12 बज गए थे. चाचा के लंच के लिए आने का टाइम हो रहा था. इसलिए मैंने भी कुछ नहीं किया.

आज चाचा भी दस मिनट पहले ही आ गए थे. मैं उनके सामने खटिया पर लेटा हुआ एक किताब पढ़ रहा था.

चाचा ने मुझसे कुछ नहीं कहा. वो लंच करके फिर से चले गए.

अब मेरे पास पूरा टाइम था.

धीरजा और मैं लंच करके बेड पर आराम करने लगे. धीरजा मेरे साथ बेड पर लेटी थी. उसके हाथ में मैगज़ीन थी. मेरा ध्यान सिर्फ धीरजा के जिस्म पर था. आग दोनों तरफ लगी थी, लेकिन शुरू मुझे ही करना था.

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मैंने अपना हाथ धीरजा के मम्मों पर रखा और धीरजा को अपनी तरफ चिपका लिया.

धीरजा- ये क्या कर रहे हो राज?मैं- तुम्हें प्यार कर रहा हूँ.

धीरजा- पागल हो क्या?मैं- पागल तो तुमने गांव में ही कर प्रिया था, जब मेरा पैर तुमने अपने पैरों के बीच में दबा लिया था. वक़्त और मौका नहीं मिला था … और न ही तुमने मुझे कुछ करने प्रिया था.धीरजा इठला कर बोली- अच्छा … मौका मिलता तो क्या करते?मैं- कल रात में जो किया था, क्या भूल गई उसे?

धीरजा- रात को तुमने ठीक नहीं किया. मौसाजी जाग जाते तो!मैं- मुझे पता था तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी कि चाचा जग जाएं और तुमने वही किया. वैसे रात में पानी बहुत निकाला था.धीरजा- तुमने इतना गरम कर प्रिया था, तो पानी तो निकलता ही. फिर तुम उंगली इतनी जल्दी जल्दी कर रहे थे, तो मुझसे रहा ही न गया.

मैं- रात में दिखा नहीं था, कैसे पानी निकला!धीरजा- तो अब क्या करने का इरादा है?मैं- जो रात में नहीं हुआ था … वो!धीरजा- रात में क्या नहीं हुआ … तुमने बुर में उंगली घुसा दी, मेरा पानी निकाल प्रिया और क्या चाहिए तुम्हें?

उसके मुँह से बुर शब्द सुनते ही मैंने धीरजा का गाउन ऊपर कर प्रिया. उसके ब्रा के साथ ही उसके गाउन को निकाल प्रिया … और धीरजा के मम्मों पर टूट पड़ा.

धीरजा भी मस्ता गई. मैं उसके मम्मों मसलने और चूसने लगा.

धीरजा- आह राज … दर्द हो रहा है इतनी जोर से कर रहे हो!मैं- दर्द तो रात में भी हो रहा था, तब कुछ नहीं बोलीं. अभी तो दर्द की शुरुआत है जान.धीरजा- ऐसी शुरुआत है … तो अंत कैसा होगा. प्लीज धीरे करो … आंह निप्पल इतनी तेज मत खींचो यार … लगती है. रात में भी तुमने तेज मसल दिए थे, बहुत दर्द हो रहा था.मैं- दर्द के साथ मजा भी तो ले रही थीं.वो हंस दी.

मैं धीरजा के मम्मों और निप्पलों को बेदर्दी से चूस रहा था. मेरा एक हाथ धीरजा की पैंटी के अन्दर घुस गया और धीरज की बुर की फांकों को खोल कर उंगली धीरजा की गीली हो चुकी बुर की गहराई नापने लगी.

धीरजा ने अपनी टांगें खोल दीं- उफ्फ राज … तुमने मेरी बुर में आग लगा दी … आंह … बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही करते रहो.मैं- आज तो तेरी बुर का पानी निचोड़ लूंगा.धीरजा- सिर्फ उंगली से ही करते हो या कुछ और भी करते हो.मैं- पहले उंगली से तेरी बुर की गहराई तो देख लूं.

धीरजा का हाथ मेरी लुंगी के अन्दर छिपे लंड पर चला गया. उसने मेरी लुंगी हटा दी और धीरजा मेरे लंड को मसलने लगी.

धीरजा- तेरा लंड तो बहुत गर्म है. बहुत मस्त है … जल्दी से इसे मेरी बुर के अन्दर डाल दे … मेरी बुर लंड की बहुत प्यासी है.मैं- पहले तूने लंड लिया है क्या?धीरजा- हां क्लास के एक लड़के ने ऊपर से रगड़ा था … मगर वो अन्दर नहीं घुसा पाया था. कहीं तू भी उसकी तरह ऊपर से रगड़ कर पानी तो नहीं छोड़ देगा?

इतना सुनते ही मैंने धीरजा की पैंटी को उतार कर उसको पूरी नंगी कर प्रिया और उसकी मस्त गुलाबी फूली हुई बुर को देखने लगा.

धीरजा- ऐसे क्या देख रहा है … कभी नंगी लड़की नहीं देखी क्या?मैं- देखी तो है, लेकिन इतने नजदीक से नहीं देखी और अपने साथ बिस्तर पर नंगी कभी नहीं देखी.धीरजा- वैसे किसको देखा है?

मैं- तुझे दो दिन से खिड़की से झांक कर नहाते हुए नंगी देख रहा हूँ. पर अब तुझे नजदीक से देख रहा हूँ.धीरजा- हम्म … बाद में देख लेना अच्छे से … अभी तो जल्दी से चोद दे. मेरी बुर में आग लगी है … रात से तूने आग लगा दी है. आज अगर तू कुछ नहीं करता, तो मैं ही तुझे पकड़ कर चोद देती.मैं- इतनी आग लगी है तेरी बुर में! देखूँ तो सही कितनी गरम है.

इतना बोल कर मैं उस वैरी सेक्सी गर्ल के पैरों के बीच में आ गया और धीरजा की बुर खोल कर अपना लंड धीरजा की बुर के गुलाबी होंठ पर रगड़ने लगा.बुर पर लंड की रगड़ धीरजा से बर्दाश्त नहीं हुई. धीरजा की बुर गीली हो गई थी. वो गांड उठाते हुए लंड अन्दर लेने की कोशिश करने लगी.

धीरजा- प्लीज राज तड़पा मत यार … अन्दर डाल कर चोद दे मुझे.मैं- हां … यही तो तेरे मुँह से सुनना था मुझे.

मैंने धीरजा की गीली हो चुकी बुर में धक्का दे मारा. धीरजा पहले ही अपनी बुर में लंड लेने के लिए गांड उठाए थी. मेरे तगड़े धक्के से लंड का सुपारा धीरजा की बुर में घुस गया.

मेरे मोटे लंड के लिए धीरजा की बुर बहुत टाइट थी. अभी तक उसकी बुर में सिर्फ उंगली या पेन पेन्सिल ही घुसी थी. वो दर्द से दोहरी हो गई और उसने अपने दांत दबा कर लंड के दर्द को सहन करने की कोशिश की.

मैंने एक और तेज धक्का मारा. मेरा आधा लंड धीरजा की बुर खोलता हुआ अन्दर घुस गया.

धीरजा तड़फ उठी- राज बहुत तेज दर्द हो रहा है … रुक जा अभी.मैं- लंड बाहर निकाल लूं क्या?धीरजा- नहीं बाहर मत निकलना, वरना फिर से अन्दर डालेगा … तो फिर दर्द होगा. थोड़ी देर यूं ही रुक जा बस. पहले तूने किसी को नहीं चोदा क्या?

मैं धीरजा के निप्पलों को मसलने और चूसने लगा.

मैं- चोदा है, लेकिन वो आंटी थी. दो बच्चों की माँ थी. उसकी चूत तो पहले ही इतनी खुली थी कि लंड को कसावट का मालूम ही नहीं चला था. तेरी बुर तो बहुत टाइट है.धीरजा- हां अब तक इसमें कोई लंड नहीं गया न … चल अब पूरा अन्दर कर दे.

इतना सुनते ही मैंने एक और धक्का मार कर पूरा लंड धीरजा की बुर में जड़ तक घुसेड़ प्रिया.

धीरजा की चीख निकलती, लेकिन धीरजा ने अपने हाथ से अपना मुँह बंद कर प्रिया. धीरजा की आंखों में आंसू आ गए. मेरा लंड सीधा बच्चेदानी से टकराया.

धीरजा- उई … माँ मर गई … राज तेरा लंड बहुत मोटा है … थोड़ी देर यहीं रोक के रख!मैं- मेरा लंड तो ऐसा ही है … तेरी बुर बहुत टाइट है. अभी तक लंड नहीं लिया न तूने.धीरजा- हां लेकिन उंगली तो बराबर करती थी. इसलिए दर्द कम हुआ. झिल्ली भी टूट गई है … वरना ब्लड भी आ जाता.

मैंने कुछ पल रुक कर उसे दूध चूसे और पूछा- हां अब बोल … आगे चलूँ?धीरजा- हां अब कुछ दर्द कम है … धीरे धीरे चोदो.

मैंने अपना लंड धीरे धीरे धीरजा की बुर में अन्दर बाहर करना शुरू कर प्रिया. लंड की रगड़ से धीरजा की बुर एक बार फिर से पिघल गई. मेरा लंड धीरजा की बुर के रस से नहा गया.

धीरजा- आह … बहुत अच्छा लग रहा है राज … आज तुम्हारा लंड लेकर मजा आ गया. मुझे तो लगा था कहीं तुम भी राजेश की तरह बुर पर लंड रखते ही झड़ गए, तो मेरी बुर का क्या होगा.मैं- ये लंड तो 28 साल की रेणु की बुर की गर्मी पी चुका है. तेरी बुर में उससे बहुत ज्यादा गर्मी है. वैसे तेरी बुर में घुस कर मेरे लंड को मजा आ गया. तेरी बुर की रगड़ मेरे लंड को गरम कर रही है. मैं अभी और अन्दर बाहर करूंगा.धीरजा- हां तो रोका किसने है … ऐसे ही चोदते रहो. तुम्हारे लंड की रगड़ मुझे भी अच्छी लग रही है.

मैं फिर से इकसठ-बासठ करने लगा. जैसे जैसे धीरजा की बुर में लंड की जगह बन रही थी, मेरा लंड स्पीड बढ़ा रहा था. अब मैं अपने लंड को पूरा बुर से बाहर निकाल कर तेज धक्के के साथ लंड अन्दर घुसाने लगा था.

धीरजा भी गांड उठा कर मेरे धक्कों का जवाब देने लगी थी.

उसका अब तक तीन बार बुर का जूस निकाल चुकी थी. लंड भी अब तक पूरी जगह बना चुका था. मैं और धीरजा दोनों ही पसीने से भीग चुके थे. मेरे धक्के गहरे और तेज होने लगे थे.

धीरजा भी गांड उठा कर धक्के के साथ ताल मिला रही थी. मेरी जांघें धीरजा की गांड से टकरा के तबले की आवाज निकाल रही थीं. लंड के साइड से बह कर धीरजा की बुर का पानी गांड के छेद से होता हुआ नीचे रखी धीरजा की पैंटी को गीला कर रहा था.

धीरजा- ओह्ह यस राज … जोर जोर से चोदो … आंह बहुत मजा आ रहा है … आह मेरी बुर की प्यास आज तुमने बुझा दी है.मैं- मेरा पानी निकलने वाला है.धीरजा- अन्दर मत निकालना … मेरे फेस पर निकालो.

मेरा लंड धीरजा की बुर में फूलने लगा मेरे लंड की नसें तन रही थीं. लंड में रक्त संचार बढ़ने लगा था. लंड की रगड़ से धीरजा की बुर भी सिकुड़ने लगी थी. ऐसा लगने लगा था, जैसे बुर लंड को निचोड़ लेगी.

मेरे धक्के तेज और गहरे होने लगे. धीरजा ने पूरी गांड ऊपर उठा दी और बहुत तेज झड़ने लगी. मेरे गोटे भी तैयार थे. मैंने अपना लंड जैसे ही धीरजा की बुर से बाहर निकाला, लंड ने फव्वारा छोड़ प्रिया, जो धीरजा की बुर से फेस तक लाइन बनाता चला गया.

धीरजा ने मेरे लंड का पानी अपने जिस्म पर क्रीम की तरह मल लिया. हम दोनों थक के एक दूसरे से चिपक के नंगे ही लेट गए.

शाम 4 बजे तक हम दोनों ने 2 राउंड चुदाई की. फिर दोनों नहा कर ऐसे रेडी हो गए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो.

मैं वहां दो हफ्ते रुका और रोज धीरजा की चुदाई करता. धीरजा चुदाई के बाद मेरे लंड के जूस को अपने जिस्म पर मल लेती, जिससे उसके जिस्म पर एक चमक आने लगी थी.

मैं उसके बाद कभी धीरजा से नहीं मिल सका.

पाठकों आपको मेरी वैरी सेक्सी गर्ल हॉट स्टोरी कैसी लगी, मुझे मेल या हैंगआउट करेंsupport@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

तुषार गुप्ता

1 month ago

रिश्तों की ये कहानी सच में बहुत ही कामुक थी। अंत बहुत ही गर्म था।

k

kumarboss99

2 months ago

बहुत ही उत्तेजक और रोमांचक कहानी लिखी है भाई। मजा आ गया।

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