रंजनबबिता की पूरी कहानी सुन कर एक बार तो मुझे उस पर दया आई और साथ ही यह विचार भी कि इतना खुल कर बबिता का मुझे सब कुछ बताना कहीं मुझे आमंत्रण तो नहीं?तब तो मैं बबिता को कुछ कह नहीं पाया, बस इतना जरुर कहा कि आपको डाक्टरी सलाह लेनी चाहिए।पर मुझे क्या पता था कि इतना राज मेरे सामने उगलने के पीछे क्या राज छुपा है।हम लगभग रात को 11 बजे रतलाम रेलवे स्टेशन पर पहुँचे, रात बहुत हो चुकी थी, इसलिए मैंने लॉज में रुकना ज्यादा उचित समझा। मैंने कई होटल व लॉज ट्राई किए मगर कमरे खाली नहीं थे।ऐसे में केवल एक लॉज में हमें एक कमरा मिल पाया, तो मैंने सकुचाते हुए बबिता से कहा- भाभी जी आप यहाँ रुक जाइए, मैं किसी और लॉज में कमरा ढूंढता हूँ।तो वो बोली- रंजन परेशान मत हो, हम एक कमरे में ही रुक सकते हैं।मुझे इसके पीछे छिपी उसकी मंशा का अंदाजा ना था, मैंने हल्के स्वर में सहमति दे दी।हमें जो कमरा मिला, वो छोटा सा था। उसमें एक डबल बेड के अलावा एक टी-टेबल थी और एक टीवी भी लगा था। कमरे के साथ ही अटैच बाथरुम था।कमरे में और गुंजाइश नहीं देखते हुए मैंने कहा- भाभीजी, आप यहाँ सो लीजिए में बाहर सो जाता हूँ।तो उसने कहा- कोई जरूरत नहीं… जब हम रुम शेयर कर सकते हैं… तो बेड क्यों नहीं..! तुम मेरे साथ इसी बेड पर सो जाना।अब मेरे दिमाग में एक कीड़ा घुस चुका था कि हो ना हो आज कुछ ना कुछ जरूर होने वाला है। खैर मैं बाहर गया और कुछ खाने के लिए व कोल्ड ड्रिंक की बोतल ले आया।कमरे का दरवाजा लगा हुआ था, मैंने दरवाजा बाहर से खटखटाया, तो अन्दर से बबिता की आवाज आई- खुला है, तुम आ जाओ।मैं दरवाजा खोल कर अन्दर गया तो मैंने देखा बबिता केवल ब्लाऊज व पेटीकोट में थी।