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जीजा साली की चुदाई • पठन समय: 7 मिनट • पढ़ा गया: 347 बार

तो लगी शर्त-1

शालू

01 Apr 2010 को प्रकाशित

तो लगी शर्त-1
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सम्पादक : राज कार्तिकदोस्तो, कहानी पढ़ने से पहले मेरा आप सब से परिचय करवा दूँ। मेरा नाम है अंजली।मेरे मोहल्ले के लड़के मुझे सविता भाभी के नाम से जानते हैं क्योंकि मैं एकदम मस्त मौला हूँ और अपनी मर्जी से करती हूँ सब कुछ। लड़कों की हिम्मत नहीं होती मेरे आसपास भी फटकने की।

उम्र है मेरी… !!??!! अरे हट ना ! लड़कियों से उनकी उम्र नहीं पूछी जाती जी।इतना तो है कि मैं बहुत सुन्दर हूँ और मेरे इलाके के लड़के तो क्या बुड्ढे भी लाइन में खड़े होकर मेरे लिए आहें भरते हैं पर मैं किसी को भी घास नहीं डालती।

भगवान ने मेरा शरीर भी फुरसत से बनाया है, एकदम हरा-भरा। मेरी चूचियों का उत्थान देख कर तो बुड्ढों का लण्ड टपक जाता है। भरपूर गोलाई लिए ऊपर को तनी हुई चूचियाँ हैं मेरी। पतली सी कमर और चूतड़ों की तो पूछो ही मत ! ना जाने कितने घायल होकर गिर पड़ते हैं मेरे मटकते चूतड़ देख कर।तो ऐसी हूँ मैं !

अब मेरी कहानी !इस कहानी को आप लोगों के बीच मेरे एक मित्र राज कार्तिक लेकर आ रहे हैं।तो अब कथा-प्रारम्भ :

मेरी शादी को तब दो महीने ही हुए थे, मेरे चाचा की लड़की साधना की शादी थी तब, मैं भी शादी में गई थी।क्या बताऊँ !उस समय क्योंकि मेरी नई-नई शादी हुई थी या अगर खुले शब्दों में कहें तो मुझे नया-नया लण्ड का मज़ा मिला था तो लण्ड के पानी ने मेरी जवानी को और निखार प्रिया था।आप लोगों की भाषा में ‘क़यामत’ हो गई थी मैं।

शादी में जिसने भी मुझे देखा मेरी तारीफ किये बिना ना रह सका।सभी की जुबान पर एक ही बात थी- हाय छोरी ! तन्ने कैसै की नजर ना लगै… तू तो बौहोत निखरगी है ब्याह क पाच्छै !भाभियाँ भी मजाक करने से नहीं चूकी- ननद सा… लागे हमारे ननदोई सा पुरा रगडा लगावे है… रूप निखार दियो तेरी तो…”

मेरी एक भाभी कुछ शरारती किस्म की है तो वो मुझसे बोली- शालू… देक्खाँ त सई के ननदोई सा रात ने कुछ करें बी क नईं !मैं शरमाई पर फिर मेरा भी दिल किया कि देखा जाए।

हम दोनों ने जैसे-तैसे कमरे में अंदर झाँकने का रास्ता ढूँढा। अंदर देखा तो मेरे तो कान लाल हो गए। पूरे बदन में झुरझुरी सी फ़ैल गई।साधना मेरी चचेरी बहन बिस्तर पर नंगी बैठी थी शरमाई सी। उसके सामने ही मेरे नए जीजाजी जिनका नाम राज है, वो खड़े थे बिल्कुल नंगे।उनका मुँह दूसरी तरफ था।मैं उनका लण्ड नहीं देख पा रही थी जिसको देखने की लालसा में मैं भाभी के साथ यहाँ बैठी थी।

वो आपस में धीरे धीरे कुछ बोल रहे थे पर समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात कर रहे हैं। तभी राज जीजा हमारी तरफ घूमे तो उनका लण्ड देखते ही मेरी चूत ने तो पानी छोड़ प्रिया। मस्त मूसल सा लण्ड था राज जीजा का ! एकदम तन कर खड़ा हुआ।“भाभी आज साधना की तो खैर नहीं… जीजा इस मूसल से फाड़ डालेंगे साधना की !”

भाभी ने मुझे चुप करवा प्रिया और खुद भी चुपचाप अंदर देखते हुए अपनी चूचियाँ मसलती रही।जीजा तेल की शीशी उठाकर फिर से साधना के पास गए और साधना को लेटा कर उसकी चूत पर अच्छे से तेल लगाया। साधना भी मदहोश होकर मज़ा ले रही थी। तेल लगा कर जीजा ने साधना की चूत पर लण्ड रखा और जोर से धक्का लगा प्रिया।साधना जोर से चीख उठी।

लण्ड चूत को चीरता हुआ अंदर धस गया। राज जीजा ने बिना तरस खाए जोर जोर से दो तीन धक्के और लगा दिए। लण्ड अंदर की तरफ घुसता चला गया जैसे कोई कील गाड़ दी गई हो।साधना चीखती जा रही थी पर जीजा पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था, वो तो अपनी ही मस्ती में धक्के पर धक्के लगा रहे थे।साधना छटपटाती रही और जीजा चोदते रहे।

जीजा ने करीब आधा घंटा तक साधना को रगड़ रगड़ कर चोदा था। उनकी चुदाई देख कर मेरी तो चूत-पैंटी-पेटीकोट सब गीले हो गए थे। मेरी चूत ने पानी ही इतना छोड़ प्रिया था।

फिर भाभी और मैं नीचे अपने कमरे में आकर लेट गए। भाभी की हालत भी खस्ता हो रही थी। साधना और राज जीजा की चुदाई देख कर उसकी चूत में भी कीड़े कुलबुलाने लगे थे। तभी कमरे के बाहर भाई नजर आये और उन्होंने भाभी को इशारा किया। भाभी तो इसी इशारे में इन्तजार में थी। वो उठ कर चली गई अब कमरे में मैं अकेली थी। चूत मेरी भी लण्ड लेने को छटपटा रही थी पर मैं भला किस से चुदवाती।

मैं कुछ देर ऐसे ही लेटी रही और फिर उठ कर दुबारा साधना और जीजा की सुहागरात देखने खिड़की के पास पहुँच गई।जीजा अब दूसरी बार साधना को चोद रहे थे और साधना पहले की तरह ही चीख रही थी। साधना की चीखों को समझ पाना मुश्किल था क्यूंकि उसकी चीखें कभी तो मस्ती भरी महसूस हो रही थी तो कभी दर्द भरी।

पर अब वो मस्त होकर चुदवा रही थी।जीजा का गठीला बदन देख कर मेरी चूत फिर से पानी-पानी हो गई। मैं बहुत देर तक अकेली वहाँ बैठी साधना और जीजा की चुदाई देखती रही।फिर जब नींद ज्यादा आने लगी तो जाकर सो गई।

सुबह उठते ही मैं सीधा साधना के कमरे के पास पहुँची। इत्तिफाक ही था कि जैसे ही मैं कमरे के बाहर पहुँची जीजा ने अंदर से दरवाजा खोला।जीजा बाहर आ रहे थे तो मुझे शरारत सूझी।“जीजा तुम तो चीखें बहुत निकलवाते हो …? !”“तूने कब सुनी…?”

“रात को, जब तुम साधना को रगड़ रहे थे और वो चीख रही थी, तब सुनी !”“अजी, हमारे कमरे में तो रात को जो भी रहेगा उसकी ऐसे ही चीखें निकलेंगी… क्यों तुम्हारे वाले नहीं निकलवाते तुम्हारी चीखें?”

“हमारी चीखें निकलवाने वाला तो अभी पैदा ही नहीं हुआ जीजा जी !” कह कर मैं हँस पड़ी।“और अगर हमने तुम्हारी चीखें निकलवा दी तो ???” जीजा ने भी अपना तीर मुझ पर चलाया।अगर मैं सतर्क ना होती तो शायद पहली ही बार में घायल हो जाती। पर मैंने अपने ऊपर काबू रखा,”रहने दो जीजा… मैं साधना नहीं हूँ !”

इस पर जीजा बोले,”तो लगी शर्त? अगर मैंने तुम्हारी चीखें निकलवा दी तो !?”मैं भी…

कहानी जारी रहेगी !राज की आईडी है : support@mohakkisse.com

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तो लगी शर्त

कुल भाग: 2
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पाठकों की राय

1 टिप्पणी
ज

जय फेंटेसी मैन

3 months ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

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