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भाभी की चुदाई पठन समय: 14 मिनट पढ़ा गया: 559 बार

उफ़्फ़ तूफ़ानी रात वे-1

नेहा वर्मा

30 Jan 2024 को प्रकाशित

उफ़्फ़ तूफ़ानी रात वे-1
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लेखिका : पूजा वर्मा

मैं तो एक धनवान और एक व्यस्त व्यापारी की पैसे वाले बाप की बेटी थी। मेरे पास स्वयं की बहुत पूंजी थी। परन्तु मेरे पति अनिरुद्ध एक अध्यापक थे, एक साधारण व्यक्ति थे। रात के दस बजे तक वे ट्यूशन करते थे। हमारा प्रेम विवाह था, स्वयं की जिद थी सो पिता ने हार कर विवाह करवा प्रिया था। उनका दैनिक कार्यक्रम बहुत ही टाईट था, उनके पास किसी भी काम के लिये समय नहीं था। अक्सर रात को ट्यूशन के बाद थक कर वो तीन चार पेग दारू पी कर गहरी नींद में सो जाया करते थे। मैं भी उनकी व्यस्तता समझती थी।

जुलाई का महीना था। उन्ही दिनों उनका भाई राजू बी ए करके हमारे पास ही आ गया था। मेरी चुदाई में मेरे पति अब अधिक रुचि नहीं दर्शाया करते थे। पर जवानी का तकाजा है चुदना … बिना चुदाई के मेरी मदमस्त जवानी तड़पने लगी थी। फिर मेरी जैसी आदत थी कि मुझे आराम अधिक पसन्द था। खालीपन में मेरे दिमाग में बस सेक्स की बातें ही अधिक आया करती थी। पैसा अधिक होना भी अय्याशी का एक कारण होता है। अधिकतर तो मेरी नजर तो अब हर किसी लड़के के पैंट के अन्दर लण्ड तलाशती रहती थी। राजू के यहाँ आने के बाद मेरी अय्याश नजरें राजू की ओर उठने लगी थी।

वो एक मस्त भरपूर जवान लड़का था। जब वो रात को पजामा पहनता था तो उसके मस्त चूतड़ की गोलाइयां मेरे दिल को छू जाती थी। उसके लण्ड के उभार की झलक मेरे मन में वासना का गुबार भर देती थी। उसे देख कर मैं मन मसोस कर रह जाती थी। जाने कब वो दिन आयेगा जब मेरी मन की मुराद पूरी होगी। मुझे पता था कि मेरे पड़ोस की लड़की सरिता को वो मन ही मन चाहता था। वो सरिता ही मेरा जरिया बनी।

मेरे मन में सरिता और राजू को मिलवाने की बात समझ में आने लगी।

“राजू, सरिता तुझे पूछ रही थी, क्या बात है?”

“सच भाभी, वो मुझे पूछ रही थी, क्या कह रही थी?”

“आय हाय, बड़ी तड़प उठ रही है, मिलेगा उससे?”

“बस एक बार मिलवा दो ना, फिर जो आप कहेंगी मै आप के लिये करूंगा !”

“सोच ले, जो मै कहूंगी, फिर करना ही पड़ेगा …” मै हंसने लगी।

फिर मैंने राजू को पटाने के लिये उसे मैंने सरिता से मिलवा प्रिया। उसके घर आते ही मैंने सरिता से भी यही बात कही तो वो शरमा गई। सरिता एक तेज किस्म की चालू टाईप की लड़की थी। उसके कितने ही आशिक थे, मेरी तरह वो भी जाने कितनी बार अब तक चुद चुकी थी। सरिता के ही कहने पर मैंने उसे और राजू को मेरे बगल वाले कमरे में बातें करने की आज्ञा दे दी। मुझे पता था कि वो बातें क्या करेंगे, बल्कि अन्दर घुसते ही चुदाई के प्रयत्न में लग जायेंगे।

…और हुआ भी यही ! मैं चुपके से उन्हें देखती रही। वे दोनों भावावेश में एक दूसरे से लिपट गये थे। फिर कुछ ही देर में चूमा चाटी का दौर चल पड़ा था। सरिता के वक्ष स्थल पर राजू ने कब्जा कर लिया था और कपड़े के ऊपर से ही उसके उभारों को मसल रहा था। सरिता के हाथ भी राजू के लण्ड को पकड़ चुके थे।

मुझे लगा कि इसके आगे तो सरिता चुद जायेगी, और एक बार राजू ने उसे चोद प्रिया तो उनके रास्ते खुल जायेंगे फिर तो वे दोनों कहीं भी चुदाई कर लेंगे।

मैंने दरवाजे पर दस्तक देकर उन्हें रोक प्रिया।

सरिता ने दरवाजा खोला, उसके वासना से भरे गुलाबी आँखों के डोरे सब कुछ बयान कर रहे थे।

“मिल लिये अब बस, अब कल मिलना !”

सरिता के नयन झुक गये। उसने अपने कपड़े ठीक किये बालों को सेट किया और बाहर आ गई।

“राजू, अब बाहर भी आ जाओ !”

“भाभी अभी नहीं, रुको तो !”

सरिता ने मुझे शरमा कर देखा और जल्दी से बाहर निकल गई। मैं राजू को देखने के लिये कमरे में घुस गई। उसका लण्ड तन्नाया हुआ था। मुझे देखते ही वो जल्दी से घूम गया।

“क्या छिपा रहे हो राजू? मुझे भी तो बताओ !”

“कुछ नहीं भाभी, आप जाओ…”

“ऊ हुं … पहले बताओ तो …” मैंने जान कर के उसके सामने आ गई।

“उई मां … राजू ये क्या !!!” और मैं जोर से हंस पड़ी।

उसने शरम के मारे अपने दोनों हाथ लण्ड के आगे रख दिये और उसे छिपाने की कोशिश करने लगा।

“मजा आया ना सरिता के साथ … ऐ ! क्या क्या किया … बता ना?”

“कुछ नहीं किया भाभी…”

“वो तो, तुम्हारे हाव भाव से पता चल चल रहा है कि क्या किया … उसे मजा आया?”

उसने अचानक मुझे कंधों से पकड़ लिया और अपनी ओर खींच लिया।

“अरे यह क्या कर रहा है… छोड़ दे … देख लग जायेगी।”

उसकी सांसें तेज हो गई थी, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था। उसने मुझे कस कर जकड़ लिया। मुझे उसका सीधे आक्रमण करना बहुत अच्छा लगा।

“बस भाभी, कुछ ना बोलो … मुझे करने दो…” वो लगभग हांफ़ता हुआ बोला।

मुझे और क्या चाहिये था ! मैं उसकी बाहों में ना ना करते हुये समाने लगी। मेरी अर्चनायें साकार सी होती लगी। अब तो उसके कड़क लण्ड का स्पर्श भी मेरी चूत के आसपास होने लगा था। तभी उसके हाथों ने मेरे सीने को दबा प्रिया।

मेरे मुख से आह सी निकल गई। मेरे मन में उसका लण्ड थामने की इच्छा होने लगी। तभी वो झटके से अलग हो गया।

“ओह भाभी … मैं यह क्या करने लगा था … मुझे माफ़ कर देना !”

“एक तो शरारत की… फिर माफ़ी … बड़े भोले बनते हो…” मैंने कातर स्वर में कटाक्ष किया।

वो सर झुका कर हंस प्रिया। ओह … हंसा तो फ़ंसा ! अब कोई नहीं रोक सकता मुझे … समझो उसके मस्ताने लण्ड का मजा मुझे मिलने ही वाला है।

सरिता को चोदने की आशा में मैंने उसे फ़ंसा लिया था, अब तो सरिता गई भाड़ में ! कमबख्त को घर में घुसने ही नहीं दूंगी।

शाम को पतिदेव जब दारू पी कर खर्राटे भरने लगे। बाहर मौसम बहुत सुहावना हो रहा था, बादल गरज रहे थे, लगता था कि तेज बरसात होने वाली है।

ठण्डी हवा चलने लगी थी। रात भी गहरा गई थी, मन का मयूर कुछ करने को बेताब हो रहा था। तो मेरे मन में वासना का शैतान बलवान होने लगा। मैंने पति को झकझोर के उठाने की कोशिश की पर वो तो जैसे दारू की मदहोशी में किसी दूसरी दुनिया में खो चुके थे। मैंने जल्दी से एक दरी ली और छलांगें मारती हुई छत पर आ गई।

उफ़्फ़, कितनी ठण्डी बयार चल रही थी। तभी राजू ने मुझे आवाज लगाई। मैंने नीचे झांक कर देखा फिर कहा- ऊपर आ जाओ मस्त मौसम है।

वो पजामा पहने हुए था। वो भी छत पर आ गया। हवायें तेज चलने लगी थी। मुझे लगा कि राजू की नीयत मुझे देख कर डोल रही है। पजामे में उसका लण्ड खड़ा हुआ था। वो बार बार उसे मसल रहा था। मुझे लगा लोहा गरम है और यही गरम गरम लोहा मेरी चूत में उतर जाये तो अन्दर का माल पिघल कर बाहर आने में देरी नहीं करेगा। वो मुझे टकटकी लगा कर देख रहा था।

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“क्या हो रहा है देवर जी … किसकी याद आ रही है?”

“जी, कोई नहीं … मैं तो बस…”

“होता है जी, जवानी में ऐसा ही होता है … सरिता की याद आ रही है ना?”

मैं उसके काफ़ी नजदीक आ गई और उसकी बांह पकड़ ली। तभी जोर की बिजली तड़की।

मैं जान कर सहम कर उससे जा चिपकी।

“हाय रे, कितनी जोर से बिजली चमक रही है।”

उसने भी मौका देखा और मुझे जोर से जकड़ लिया। मैंने नजरें उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे उभरे हुये थे। मैंने उसे और उतावला करने के लिये उसे धीरे से दूर कर प्रिया।

सरिता को बुला दूँ क्या…?

“ओह भाभी, इतनी रात को वो कैसे आयेगी।”

मैंने छत पर दरी बिछा दी और उस पर लेट गई- अच्छा दिन में उसके साथ क्या क्या किया था। देखो साफ़ साफ़ बताना…।

“वो तो भाभी मैंने उसे…!”

“चूम लिया था… है ना… फिर उसकी छाती पर आपकी नजर पड़ी…”

तभी बरसात की हल्की हल्की बूंदें गिरने लगी। मैं तो मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में थी, भीगने सी लगी।

“आपको कैसे पता… जरूर आपने छुप कर देखा था…”

“ऊंह … जवानी में तो यही होता है ना…”

बरसात धीमी होने लगी थी। मैं भीगने लगी थी।

“भाभी उठो … नीचे चलते हैं।”

तभी बिजली जोर की चमकी और एकाएक तेज बरसात शुरू हो गई। मैंने अपने हाथ और पांव फ़ैला दिये।

“देवर जी, तन में आग लगी हुई है… बदन जल रहा है… बरसात और तेज होने दो…”

मैंने देवर का हाथ जोर से पकड़ लिया। वो भी भीगता हुआ मुझे देखने लगा। उसने एक हाथ से अचानक मेरे गाल सहला दिये। जाने क्या हुआ कि उसके होंठ मुझ पर झुकते गये… मेरी आँखें बन्द होती गई। हम दोनों के हाथ एक दूसरे पर कसने लगे। उसके लण्ड का उभार अब मेरी चूत पर गड़ने लगा था। उसके हाथ मेरे चूतड़ों पर आ गये थे और गोलों को धीरे धीरे सहलाने लगे थे।

पानी से तर बेसुध होकर मैं तड़प उठी।

“भाभी, ऐसा ना कहो … मेरे दिल में भी आग लग गई है।”

“देख ना कर ऐसा ! मैं तुझे सरिता से भी जोरदार लड़कियों से दोस्ती करा दूँगी, उनके साथ तू चाहे जो करना, पर अब हट जा।”

“पर भाभी आप जैसी कहाँ से लाऊँगा !”

उसकी बातें मुझे घायल किये दे रही थी। मेरी योनि भी अब चुदने के खुल चुकी थी। मुझे अहसास हो रहा था कि उसमें से अब पानी निकलने लगा है।

“राजू, प्लीज, अच्छा अपनी आँखें बन्द कर ले और दरी पर लेट जा !” मेरे मन में चुदने की इच्छा बलवती होने लगी। उसने मेरी बात झट से मान ली और वो दरी पर सीधा लेट गया। मैंने उसके खड़े लण्ड को चड्डी के ऊपर से निहारा और उसकी चड्डी धीरे से नीचे उतार दी। उसका तन्नाया हुआ लण्ड झूमता हुआ मेरी आँखों के सामने लहरा गया। उसका अधखुला लाल सुपारा मुझे घायल कर रहा था।

“भाभी, क्या कर रही हो, देखो फिर मुझसे रहा नहीं जायेगा।”

बरसात जोर पकड़ चुकी थी, बादलों की गड़गड़ाहट से मेरा दिल भी लरजने लगा था।

“तो क्या कर लेगा, बोल तो जरा…?”

“देखो भाभी, बस करो वर्ना मैं आपको चोद …”

“हाय रे ! हाँ हाँ, बोल दे ना… तुझे मेरी कसम… क्या कह रहा था? ” मैंने उसका उफ़नता लण्ड पकड़ लिया। आह ! गरम, कड़क लोहे जैसा ! मेरा दिल मचल उठा।

मैंने अपना पेटीकोट ऊपर उठा लिया और अपनी गीली चूत को उसके अधखिले सुपारे पर रख प्रिया। मेरी चूत में एक तेज मीठी सी गुदगुदी हुई और उसका लण्ड मेरी चूत में समाता चला गया। तभी गर्जन के साथ बिजली तड़क उठी। हवा भी तेज हो गई थी। साथ ही राजू का सबर भी टूट गया और उसने मुझे दबा कर पलटी मार दी।

अब वो मेरे ऊपर था। उसका भार मेरे शरीर पर बढ़ता चला गया, उसका मस्त लौड़ा मेरी चूत को चीरता हुआ पैंदे तक बैठ गया।

मैंने चूत का और जोर लगा कर उसे जड़ तक गड़ा प्रिया। दोनों के जिस्म तड़प उठे।

उसके जबरदस्त धक्कों से मैं निहाल हो उठी। मेरा बदन इस तूफ़ानी रात में जैसे जल कर आग होने लगा। राजू अपनी आंखें बन्द किये मुझे झटके दे देकर चोदे जा रहा था।

तभी वासना की अधिकता से मैं जल्दी ही चरम रीमा पर पहुंच गई और मेरे जिस्म ने अकड़ कर अपना रज छोड़ प्रिया। राजू की तड़प भी जल्दी ही रीमा को पार गई और उसके लण्ड ने पानी छोड़ प्रिया। हम दोनों जल्दी ही झड़ गये थे।

“देवर जी, चोद प्रिया ना अपनी भाभी को …”

जोर की बरसात अभी भी दोनों को पागल किये दे रही थी। राजू मेरे से फिर एक बार और चिपक गया, फिर जाने कैसे एक बार और उसका लण्ड कड़क उठा और मेरे शरीर को फिर से भेदता हुआ चूत में उतर गया। मैं फिर से एक बार और चुदने लगी। फिर जैसे बरसात थम सी गई। हम दोनों निढाल से पास पास में लुढ़क गये।

फिर मैं उठी और राजू को भी उठाया। हम दोनों जल्दी जल्दी नीचे आये और नल के नीचे खड़े हो कर स्नान कर लिया। फिर मैंने अपने कपड़े सम्हाले और भाग कर अपने कमरे में चली आई। मैं पति की बगल में जाकर सो गई और उसे ध्यान से देखने लगी। मेरा ध्यान धीरे धीरे राजू पर आ गया और चुदाई के बारे में सोचने लगी।

सुबह मेरी नींद जरा देर से खुली। मुझे रात की घटना सपने जैसी लगी। उफ़ ! कैसी तूफ़ानी रात थी, क्या मैं सच में चुदी थी। पर मेरा भ्रम जल्दी ही टूट गया। मुझे यकीन हो गया था कि रात को मैं वास्तव में चुदी थी। राजू भी आज सर झुकाये शर्माता हुआ मुझसे छुपने की कोशिश कर रहा था।

दूसरे भाग में समाप्त !

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उफ़्फ़ तूफ़ानी रात वे

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