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पेरिस में कामशास्त्र की क्लास-1

विक्की कुमार 0099

10 Aug 2010 को प्रकाशित

पेरिस में कामशास्त्र की क्लास-1
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मेरे प्यारे मित्रो एवं सहेलियों, एक लम्बे अंतराल के बाद आप लोगों से मिलना हो रहा है, आप सबको मेरा प्यार भरा नमस्कार।

उस समय मैंने आपसे वादा किया था कि मैं इस्तान्बुल में बिछुड़ने के बाद, अगली गर्मियों में अपनी क्रिस्टीना से हुई मुलाकात का वर्णन आप तक पहुँचाऊँगा। हालांकि मेरी पेरिस की इस सेक्सी यात्रा का विवरण मैंने आधा-अधूरा लिख रखा था कि उसी दौरान मुझे कम्पनी के काम से नेपाल जाना पड़ा और काठमाण्डू के नजदीक पहाड़ों में हुई एक दुर्घटना में मैं मौत के मुँह में जाते जाते बचा। उस खतरनाक हादसे से मैं सिर्फ भगवान के आशीर्वाद व आप लोगों की दुआओं के कारण सही सलामत निकल पाया। फिर एक लम्बे समय तक आराम करने के बाद जब ठीक हुआ, तो फिर रोजी-रोटी के चक्कर में अत्यधिक व्यस्त रहना पड़ा। अतः आप लोगों से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाया। किन्तु आप लोगों के लगातार आने वाले ई-मेलों नें मेरी क्रिस्टीना से पेरिस में हुई मुलाकात को आप लोगों तक पहुँचाने के लिये प्रोत्साहित किया।

नये पाठकों की जानकारी के लिये मैं क्रिस्टीना के फिगर के बारे में आपको एक बार फिर से बतला देता हूँ। वह इतनी खूबसूरत थी जैसे कोई माडल हो, उम्र लगभग तीस वर्ष, एकदम संगमरमरी गौरी चमड़ी, जैसे नाखून गड़ा दो तो खून टपक जायेगा, ब्लांड (सर पर सुनहरे लम्बे बाल), अप्सराओं जैसा अत्यन्त खूबसूरत चेहरा, बड़ी-बड़ी नीली आँखें जिनमें डूबने को दिल चाहे, तीखी नाक, धनुषाकार सुर्ख गुलाबी रंगत लिये हुए होंठ, अत्यन्त मनमोहक मुस्कान जो सामने वाले को गुलाम बना दे, लम्बाई लगभग पांच फीट छह इंच, टाईट जींस, लो कट टाप जिसमें वक्षरेखा साफ दिख रही थी। ओह क्षमा करें, मैं खास बात तो बताना ही भूल गया कि उसके स्तन 34, कमर 26 और चूतड़ 36 ईंची थे।

इन सब बातों का सारांश यह निकलता था कि उसे पहली बार देखने पर किसी भी साधु सन्यासी का लण्ड भी दनदनाता हुआ खड़ा होकर फुंफकारे मारने लगे। सोने पर सुहागा यह कि वह एक शानदार जिस्म की मालिक होने के साथ साथ इंटेलिजेंट भी थी क्योंकि उसका सामान्य ज्ञान बहुत अच्छा था।

फिर बर्लिन का काम पूरा होने के बाद मेरी तो इच्छा हुई कि क्रिस्टीना से मिलने के लिये पेरिस चला जाऊँ क्योंकि वह बड़े प्यार से बुला रही थी किन्तु किसी की गुलामी करते हुए यह स्वन्त्रता नहीं होती है कि अपनी मर्जी से नौकरी से बहुत ज्यादा छुट्टियाँ ले सको, अतः मन मसोसकर फिर भारत लौट आया।

फिर गर्मियाँ आ गई, क्रिस्टीना से मेरे मिलने की घड़ीं नजदीक आने लगी। जून में मुझे कम्पनी के काम से ज्युरिख, एम्सटर्डम व फ्रेन्कफर्ट जाना था, पर इस ट्रिप पर मेरे साथ मेरे बॉस भी साथ जा रहे थे, जो मुझे कम्पनी के कुछ पुराने क्लाईंट्स से मिलाना चाह रहे थे, इसलिये उनका मेरे साथ जाना जरूरी था। हालांकि मेरी इच्छा थी कि वे साथ नहीं आयें, क्योंकि मुझे डर था कि वे क्रिस्टीना से मिलने के प्रोग्राम में रंग में भंग ना कर दें। पर मैं चाह कर भी उन्हें टरका नहीं सकता था। अतः मैंने सोचा कि काम पूरा हो जाने के बाद उन्हें भारत रवाना कर दूँगा, फिर मैं पेरिस के लिये चला जाऊँगा।

हालांकि ऐसा करने में मुझे बहुत मशक्कत करना पड़ी क्योंकि यह बॉस नाम का जीव अपने अधीनस्थ को इसलिये साथ रखता है कि रास्ते भर उसे सर-सर कह कर उन्हें मक्खन चमचागिरी करता रहे। जरुरत पड़ने पर उनके अंडकोष उठा-उठा कर घूमता रहे, उनका सामान भी उठाये, फिर उसके खाने-पीने का इन्तजाम करे, अतः कोई बॉस नहीं चाहता है कि उनका नौकर अधूरी यात्रा में साथ छोड़कर चला जाये। इसी प्रकार हर बॉस की तरह मेरे बॉस भी चाहते थे कि मेरे जैसा आज्ञाकारी नौकर उनका साथ छोड़कर ना जाये ताकि यात्रा के दौरान उन्हें कोई समस्या का सामना करना पड़े।

चूंकि मैं अपने बॉस का बहुत सम्मान करता हूँ, अतः मैंने सोचा कि उन्हें मेरे अनुपस्थिति में कोई तकलीफ ना उठानी पड़े इसलिये मैंने यह तय किया कि इस बार मैं लुफ्थहंसा एयरलाईंस से यूरोप जाऊँगा ताकि आफिस का काम पूरा होने पर हमारे अंतिम पड़ाव फ्रेन्कफर्ट से मैं उन्हें सीधे नई दिल्ली वाली फ्लाईट में बिठा दूंगा, और वे निर्विघ्न भारत लौट सकें।

अब मुझे उन्हें मनाना था कि वे मुझे फ्रेन्कफर्ट से कुछ दिनों के लिये पेरिस जाने के लिये छुट्टियाँ प्रदान कर दें। पर मुझे कारण बतालाना जरुरी था कि मैं पेरिस क्यों जाना चाहता हूँ। पेरिस घूमने जाने का बहाना भी नहीं चलता क्योंकि मैं पहले भी चार बार कम्पनी के काम से जा चुका था। मैं उनसे क्रिस्टीना वाली बात तो हरगिज नहीं बतला सकता था क्योंकि वे मेरे पिताजी जैसे थे। अतः मैंने उन्हें बताया कि मैं अपने एक कजिन के साथ छुट्टियाँ बिताने जाना चाहता हूँ। थोड़ी ना-नकुर के बाद मेरे समझाने पर वे मान गये।

अंततः वह समय आ ही गया जब हमने निर्विघ्न अपनी यूरोप की आफिशियल यात्रा सम्पन्न कर ली व मैंने फ्रेन्कफुर्ट से सकुशल अपने बॉस को नई दिल्ली जाने वाली फ्लाईट में बिठा दिया और अगले दिन सुबह वाली ट्रेन से पेरिस के लिये रवाना हो गया।

चूंकि फ्रेन्कफुर्ट व पेरिस की दूरी मात्र 500 किलोमीटर ही है व ट्रेन से का सफर लगभग चार घंटे का ही है। मैंने ट्रेन का सफर इसलिये चुना कि ट्रेन प्लेन के मुकाबले सस्ती है, क्योंकि आगे की यात्रा का सारा खर्च मुझे ही वहन करना था।

मैं दोपहर में एक बजे पेरिस के एक मुख्य रेलवे स्टेशन पेरिस ईस्ट या फ्रेन्च में “गारे दि लिस्ट” पहुंच गया।

क्रिस्टीना वहाँ प्लेट्फार्म पर मेरा इन्तजार कर रही थी, जैसे ही उसने मुझे देखा तो वह मेरी बाहों में आ गई, शायद हिन्दुस्तान होता तो सब लोग आश्चर्य से देखते किन्तु पश्चिमी देशों में पब्लिक प्लेस पर यह नजारा आम है। दिक्कत यह है कि हम हिन्दुस्तानियों को सबसे ज्यादा चिन्ता अपने पड़ोसियों की ही रहती है, इस चक्कर में हम अपने घर का ध्यान रखना ही भूल जाते हैं।

आज क्रिस्टीना गजब ढा रही थी, क्योंकि जब पहले देखा तब सर्दियाँ थीं, तब उसने पूरे कपड़े पहन रखे थे, किन्तु अब तो गर्मियाँ शुरु हो चुकी थी। अतः उसने बेहद कम कपड़े पहने थे। एक डेनिम की मिनी स्कर्ट जिसमें उसकी पूरी चिकनी टांगें दिख रही थी, ऊपर से उसने सफ़ेद रंग का एक टाप पहना था जिसमें उसके स्तन आधे दिख रहे थे। अंदर की अंगिया भी सफ़ेद ही थी, पर उसके बनने में इतने कम कपड़े का इस्तेमाल हुआ था कि वह उसके 34 इन्च के अपने उन्नत पयोधरों को ढकने में नाकामयाब हो रही थी, इससे तो उसका ना होना ही ठीक था।

मैंने मन ही मन सोचा कि यह काम शायद वह मुझसे ही कराना चाह रही हो। उसके खुले सुनहरे लम्बे बाल तो कयामत लग रहे थे। ऊपर से उसने जो गहरे रंग के सन ग्लासेस लगा रखे थे, उससे वह किसी फिल्म स्टार से कम नहीं लग रही थी। सच कहूँ तो मैं तो उसके पासंग में भी नहीं ठहर पा रहा था। मुझे लग रहा था कि शायद गधा गुलाबजामुन खाने जा रहा है।

फिर कार से लगभग एक घंटे के सफर के बाद हम उसके अपार्टमेन्ट तक पहुँच गये जो यह शहर के बाहरी हिस्से में है लेकिन एक खूबसूरत जगह में था। उस जगह की प्राकृतिक खूबसूरती क्रिस्टीना के आर्टिस्ट मन को भाने वाली थी। गर्मियों में वैसे भी पेरिस की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं, और ऊपर से क्रिस्टीना जैसी खूबसूरत बाला का साथ हो तो फिर क्या कहने।

रास्ते भर मैं अपने आप को संयत रखे रखा, कारण पेरिस बहुत भीड़ भाड़ वाला महानगर है, इसलिये मैं नहीं चाहता था कि मेरी किसी हरकत से क्रिस्टीना का मन ड्राईविंग से भटके व कोई दुर्घटना हो जाये।

अंत में हम उसके अपार्टमेंट में दाखिल हुए जो छोटा मगर बहुत अच्छा सजा हुआ था, उसमें एक ड्राईंगरूम, एक बेडरूम व एक छोटी रसोई व बाथरूम था। ड्राईंग रूम के ही एक कोने में उसने अपनी पेंटिंग्स बनाने के लिये कुछ जगह घेर रखी थी। वह एक आर्टिस्ट थी जो पेंटिंग्स बनाकर आर्ट डीलर्स को बेचती थी। वह साथ ही कुछ पब्लिशिंग कम्पनियों के लिये भी बतौर आर्टीस्ट काम करती थी। वैसे भी पेरिस आर्टिस्टों के लिये मक्का के समान पवित्र है, अतः कुल मिलाकर उसका जीवन अच्छा गुजर रहा था, बस कमी थी तो किसी पुरुष की।

क्रिस्टीना वैसे तो फ्रांस के दक्षिणी हिस्से की रहनी वाली थी, पर पढ़ाई के लिये पेरिस आई थी व बाद में जॉब के कारण वहीं रुक गई थी। अभी तो वह यहाँ अकेली ही रहती है, उसके परिवार वाले तो उसके पैतृक गांव में ही रहते थे, जहाँ उनके अंगूर के बाग थे। वह पेरिस में पहले अपने किसी सहपाठी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में लम्बे समय तक रही थी। बाद में मनमुटाव के कारण उसका बाय फ्रेंड उसे छोड़ कर चला गया। मैंने उससे इस विषय में ज्यादा नहीं पूछा क्योंकि मैं उसका दिल नहीं दुखाना चाहता था।

जैसे ही हम घर में दाखिल हुए, दोनों बेसब्री से एक दूसरे के गले लग गये और बदन टटोलने लग गये। फिर पता ही नहीं चला कि हम दोनों के कपड़े कब शरीर से अलग हो गये। अंत में शुरु हुआ दुनिया का सबसे पुराना खेल- पलंग पोलो जिसे आदि-मानव के जमाने से खेला जा रहा है। यह दुनिया एक मात्र खेल है जिसमें दोनों खिलाड़ी जीतते हैं, अगर कोई हार भी जाता है तो भी वह कुछ ना कुछ हासिल कर खुश ही रहता है।

कहानी जारी रहेगी।

support@mohakkisse.com/vikky.kumar.1000

प्रकाशित : 22 अप्रैल 2013

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पेरिस में कामशास्त्र की क्लास

कुल भाग: 5
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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

साहिल खान

3 weeks ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

सेक्सी जिगोलो

4 weeks ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

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