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Hindi Sex Story पठन समय: 10 मिनट पढ़ा गया: 808 बार

गलतफहमी-15

संदीप साहू

23 Jun 2020 को प्रकाशित

गलतफहमी-15
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रोहन ने लंबी सांस लेते हुए कहा- कविता, आज तुम मुझे पसंद करने लगी हो इसलिए मैं और मेरी आदतें तुम्हें अच्छी लग रही हैं, पर जब तुम मुझे पसंद नहीं करती थी, तब भी मैं तुम्हें चाहता था।और इतना कहते हुए उसने मेरे माथे को चूम लिया, उसके चुम्बन में ममत्व था, स्नेह था, निश्छलता थी।

मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत समझ कर मुस्कुरा उठी और अपनी आँखें बंद करके उसके सीने में सर गड़ा कर सुकून से लिपट गई। उसका हाथ मेरे सर से लेकर कमर तक फिसल रहा था, जो मुझे रोमांचित कर रहा था। वैसे किसी की बांहों में रहने का यह मेरा पहला अनुभव था, पर अब रोहन को मैं अपना मान चुकी थी इसलिए शर्म थोड़ी कम थी।

हम ऐसे ही कुछ देर बैठे रहे, फिर मुझे कुछ याद आया और मेरा चेहरा गंभीर हो उठा, फिर मैं रोहन से अलग होकर खड़ी हो गई, रोहन बिस्तर पे ही लेटा था, मैंने रोहन से अपने कपड़े दिखाते हुए कहा- तुम्हें ये कपड़े याद हैं रोहन?रोहन ने कहा- हाँ बहुत अच्छे से..!

फिर मैं अपने टॉप को नीचे से पकड़ कर ऊपर की ओर उठाने लगी तो रोहन बिस्तर पे उठ बैठा.. और कौतुहल भरे स्वर में बोला- यह क्या कर रही हो कविता?शायद उसने मुझसे ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं की थी।

उसके इतना कहते तक मैंने अपना टॉप उतार के फर्श पर फेंक प्रिया और अपनी जींस के बटन पर हाथ रखते हुए बोली- इन्हीं कपड़ों की वजह से मेरे अंदर अहंकार ने प्रवेश किया था और मैंने तुम्हें तमाचा मारा था। अब आज मैं इस अहंकार के जड़ की तुम्हारे सामने उतार फेंकना चाहती हूँ और तुम्हें निर्मल और निश्छल कविता सौंपना चाहती हूँ।यह कहते हुए मैंने अपनी जींस भी शरीर से अलग कर दी। अब मैं लाल ब्रा और काली पेंटी में ही रोहन के सामने खड़ी रही, रोहन की नजरें मेरे गोरे कामुक बदन पर जैसे चिपक सी गई थी।

मैं अभी उम्र के जिस पड़ाव में थी इस समय शरीर के हर अंग में कसावट होती है, चिकनापन होता है, और आकर्षण तो फिर पूछो ही मत। रोहन मुझे आँखें फाड़े देख रहा था, और देखेगा भी क्यों नहीं.. जब पांच फुट तीन इंच हाईट की गोरी सुंदर लड़की जिसके ऊपर की ओर उठे हुए उरोज हों, चिकनी खूबसूरत टांगें हों, हर अंग तराशा हुआ, आँखों में नशा हो, वो लड़की सिर्फ ब्रा और पैंटी में सामने खड़ी हो तो किसी का भी मन बेइमान हो उठेगा..पर रोहन में गजब का धैर्य था।

रोहन कुछ कह पाता इससे पहले ही मैंने हाथ पीछे ले जाकर अपनी ब्रा का हुक खोल प्रिया, मुझे उम्मीद थी कि मुझे इस हालत में देखकर रोहन मुझ पर टूट पड़ेगा, पर मेरी उम्मीद के विपरीत रोहन ने अपना मुंह फेर लिया, और आँखें बंद करके बोला- कविता तुम कपड़े पहन लो, मुझे कविता की आत्मा चाहिए ना कि उसका शरीर!

उसके शब्दों को सुन कर मैं उसे और ज्यादा चाहने लगी। पर मेरे तन में तो आग लग चुकी थी, तो मैंने कहा- मुझे पता है कि तुम केवल मेरे शरीर से प्यार नहीं करते हो..! पर यह शरीर अब तुम्हारा ही है.. और आज इसे मैं तुम्हें सौंपने आई हूँ।

तब उसने मेरी तरफ देखा लेकिन इस बार शरीर को नहीं बल्कि मेरी नजरों से नजरें मिला कर कहा- लेकिन कविता, अभी तुम जो कर रही हो, वो समर्पण नहीं है, यह तो जिद है, जो तुमने अपने अंदर पाल रखी है। तुम अपने आप को टूर वाली गलतफहमी के लिए सजा दे रही हो। जबकि मैं ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता!

तब मैंने कदम आगे बढ़ाया और कहा- रोहन, तुम्हारी इन्हीं बातों के कारण तो मैं तुम पर मरती हूँ।मैं अभी रोहन के जितना पास थी, मेरे लिए वही बहुत था। और फिर माँ की बातें भी मेरे जेहन में घूम रही थी कि सेक्स करने से मैं माँ बन सकती हूं। इसलिए मैं रोहन के साथ और आगे नहीं बढ़ना चाहती थी। लेकिन रोहन की मासूम आँखों में एक प्यास नजर आ रही थी इसलिए मैंने उसके कहने से पहले ही कह प्रिया- रोहन, अगर तुम कुछ करना चाहो तो मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं रोकूंगी, और अगर सही गलत ना सोचूं तो मैं खुद भी यही चाहती हूं कि आज हमारा पहला संसर्ग हो जाये। पर अगर तुम मेरी मजबूरी समझो और धर्य से काम लो तो मैं कम उम्र में राह भटकने से बच सकती हूं।

रोहन और पास आया और मुझे गले लगाते हुए कहा- मैं तुम्हें राह भटकने नहीं दूंगा.. चाहे मुझे इसके लिए कितनी भी तपस्या करनी पड़े।तो मैंने उसे कहा- तुम मेरा यकीन करो जब वक्त आयेगा, तब मैं खुद तुमसे ये सब करने को कहूंगी।और हम दोनों ने वादा करते हुए एक दूसरे को चूम लिया।

उस दिन के बाद हमारी मुलाकात बीच-बीच में होती रही।

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एक महीने के भीतर ही हमारा स्कूल खुल गया, इस बीच हम सिर्फ एक बार ही और मिल पाये थे, मन तो करता था कि जिन्दगी भर चिपके ही रहें, पर आप जो चाहो ऐसा हो ही जाये, ये तो बहुत कम होता ही होता है।अब हमारा ड्रेस बदल गया था, सफेद सलवार नीली कमीज और सफेद दुपट्टे में मैं जवानी की छटा बिखेरते हुई स्कूल पहुंची। इन नये कपड़ों में मेरा अंग-अंग निखर रहा था, क्योंकि अबकी बार मैंने कपड़े जानबूझ कर चुस्त सिलवाये थे, क्योंकि मुझे अपने रस भरे हुये उरोजों और कामुक हो चुके बदन की नुमाईश भी तो करनी थी।

लड़कों के ड्रेस में ज्यादा फर्क नहीं आया था, उनकी हाथ शर्ट अब फुल हो गई थी। पर नये कपड़ों में मेरा रोहन भी बहुत अच्छा लग रहा था। स्कूल के कैंपस में हमारी आंखें टकराई और हम मुस्कुरा उठे।

और ऐसे ही आंख मिचौलियों के बीच यह साल भी आधा गुजर गया, अच्छा समय कैसे बीतता है पता नहीं चलता।और शीतकालीन की छुट्टियों में फिर से स्कूल का टूर बना, पर इस समय रोहन की तबीयत ठीक नहीं थी, वो नहीं जा रहा था, और इसलिए मैंने भी जाने के लिए मना कर प्रिया हमारे कारण विशाल और प्रेरणा भी नहीं गये। अब ऐसे ही पेपर हो गये और गर्मी की छुट्टियां पड़ गई.

यौवन का खुमार दिनों दिन मुझ पर चढ़ता ही जा रहा था, पर ऐसी चीजों में मेरा ध्यान आकर्षित होने की वजह से मेरी पढ़ाई में फर्क पड़ने लगा।हम अगली कक्षा में पहुंचे, यहाँ भी हमारे मस्ती भरे दिन थे। शरीर की बनावट और भी कातिल होती जा रही थी, समय के साथ-साथ बहुत सी चीजों की समझ भी आ गई थी।हम इस कक्षा में भी अपना आधा साल गुजार चुके थे, हमने प्रेरणा और विशाल से अपनी बातें छुपानी चाही। पर शायद उन्हें हमारे बारे में सब पता था।

अब एक बार फिर हमारे मजे करने के दिन आ गये, मतलब शीतकालीन की छुट्टी और हमारे स्कूल का टूर! इस बार हम चारों को टूर पर जाने में कोई तकलीफ नहीं थी। और टूर भी हमारे लायक जगह की बनी थी, हम इस बार गोवा जा रहे थे।अब मैं और रोहन साथ रहने में नहीं डरते थे।

इस बार हम ट्रेन से जा रहे थे, हमें ज्यादा किसी से मतलब नहीं होता था, मैं रोहन प्रेरणा और विशाल, हम चारों का एक ग्रुप सा बन गया था, हम एक जगह पर बैठते थे एक साथ घूमते थे।ट्रेन में मैंने और रोहन ने सबसे नजर बचाते हुए एक दूसरे से चिपक कर एक दूसरे को गर्म किया और ये सिलसिला आते और जाते तक थोड़ा थोड़ा चलता ही रहा।

पर असली मजा तो हमें गोवा के बीच पर घूमते हुए आया। हुआ यूं कि वहाँ कोई कपल था जो चट्टानों के पीछे घुस कर सेक्स कर रहा था, उसी वक्त मेरी नजर उन पर पड़ी।हम उसी दिशा में जा रहे थे, उस वक्त हम चारों के अलावा हमारे साथ एक दो लोग और थे। शायद बाकी लोगों ने उन्हें नहीं देखा था तो मैंने सबको वापस चलने को कहा.

मैं ऐसा क्यों कह रही हूं उसका कारण भी नहीं बता सकती थी।फिर मैंने प्रेरणा को उन्हें दिखाते हुए वापस चलने का कारण बताया, पर प्रेरणा ने ये बात विशाल को बता दी। चूंकि वहाँ पर सब मस्ती के ही मूड में थे तो विशाल ने उन्हें जोर से आवाज लगाई- ऐ..! क्या हो रहा है वहाँ.!और विशाल की आवाज सुनकर वो जोड़ा हड़बड़ा गया और बिना कपड़ों के ही इधर उधर भागने लगा।

यह नजारा देख कर हमारी हंसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.. और हंसते हंसते हमारे आंसू भी आ गये.. मैं पहले भी हंसी थी पर अकेली हंसी थी पर उस दिन मैं रोहन के साथ हंस रही थी, मैं रोहन को ऐसे हंसता देख कर बहुत खुश थी।वही मेरे जीवन का सबसे खुशनुमा पल था, जिसका जिक्र मैंने कहानी की शुरुआत में ही किया था।

जब बड़ी मुश्किल से हंसी थमी तो रोहन ने कहा- कविता हम ऐसा कब करेंगे?उसने ये बड़ी मासूमियत से कहा था.तब मैंने कहा.. बस कुछ वक्त और सब्र कर लो, वो वक्त भी आने वाला है।

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