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Office Sex पठन समय: 7 मिनट पढ़ा गया: 529 बार

काम-देवियों की चूत चुदाई-6

रोनी सलूजा

13 Oct 2013 को प्रकाशित

काम-देवियों की चूत चुदाई-6
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आप सभी को मेरी इस कहानी जिसमें कई कहानियाँ एक साथ हैं, पढ़ कर मजा आ रहा होगा। कहानी में सभी नाम और स्थान असली नहीं हैं, उन्हें परिवर्तित किया हुआ है।

मजे में दिन यूँ ही निकलते गए। एक दिन शाम को लीना अपने घर जा चुकी थी, मैं भी ऑफिस बंद करने की तैयारी कर ही रहा था। तभी मेरे एक परिचित मित्र आए।

उनके साथ आई मोहतरमा से परिचय कराते हुए कहा- ये मंजू मैडम हैं, महाराष्ट्र की हैं। अपने शहर में सरकारी नौकरी करती हैं और भविष्य में यही बस जाना चाहती हैं, अपना मकान बनवाने के लिए आपसे मिलना चाहती हैं।

उन्होंने अपने साथ लाए प्लाट के पेपर, इंजीनियर का बना हुआ नक्शा और अन्य प्लान के सारे कागजात दिखाए।

मैंने कहा- कल 12 बजे आ जाइए तो चल कर आपकी साईट देख लूँगा, फिर आपको उसका खर्च बता दूँगा।

मैंने उनका नाम पता और फोन नंबर अपने रजिस्टर में लिख लिया और उनके जाने के बाद ऑफिस बंद करके घर चला गया।

अगले दिन ठीक ग्यारह बजे ऑफिस आ गया फिर उनके दिए हुए नक्शों को देखने लगा। मगर नक्शे से ज्यादा मंजू का शारीरिक भूगोल मेरे मानस पटल पर छाया हुआ था।

उसकी शारीरिक बाह्य रुपसुमन बहुत ही लाजबाब थी। उसके चुच्चे बड़े और गांड के उभार बहुत ही विकसित थे। रंग गोरा और आँखे कजरारी थी भरा हुआ चेहरा।

कुछ देर बाद जवानी से लबरेज मंजू भी आ गई, बिल्कुल अप्सरा लग रही थी, अपने काले घने बालों में फूलो की लड़ी बांध रखी थी, एक हाथ में नाम मात्र को कुछ चूड़ियाँ, दूसरे हाथ में घड़ी।

उनके बदन पर मेरून रंग की साड़ी में कमर के साथ नाभि का नजारा और नितंब के उभार तो मुझे घायल किया जा रहे थे। ब्लाउज से बाहर को निकलते बड़े-बड़े उरोज उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे। उम्र शायद उनतीस-तीस के आसपास होगी। उन्होंने गुलाब की खुशबु लगाई हुई थी। ऐसा लग रहा था, जैसे खिला हुआ गुलाब मेरे सामने हो।

इच्छा हो रही थी कि उसकी कोमलता को छू कर महसूस करूँ, पर ये असंभव था।

मैंने उन्हें बैठने के लिए बोलकर चाय वाले से चाय लाने को बोल प्रिया, फिर कहा- मेरी असिस्टेंट लीना आती ही होगी। तब तक आप चाय लीजिए।

कुछ मिनट बाद लीना आई तो उसने तिरछी नजरों से मंजू को देखते हुए अपनी सीट संभाल ली।

फिर मैंने मंजू से लीना का परिचय कराया और मंजू को लेकर उसकी साईट पर निकल गया। उसका प्लाट अच्छी लोकेशन पर था।

बाजू वाले प्लाट पर एक मकान बना हुआ था। जो मित्तल साहब का है और अधिकतर प्लाट खाली पड़े हुए थे।

मैंने सारा एस्टीमेट बना कर मैडम को प्रिया तो मैडम ने भी मंजूरी दे दी।

मंजू मैडम को बोला- मैडम, मित्तल साहब के मकान में एक कमरा स्टोर रूम बनाने को किराये से मिल जाए तो ठीक रहेगा।

उन्होंने मित्तल साहब का दरवाजा खटखटाया तो घूँघट किए एक महिला जिसकी गोद में एक साल का बच्चा था। जो पूरी गांव की गोरी लग रही थी, ने दरवाजा खोला बोली- कौन से काम है बाबू?

मैंने कहा- मित्तल साब से।

बोली- उ इहाँ नई रहत, उ तो बाहर मा हैं। हम उनी के गांव के हैं। सो अपने मरद के साथ इहाँ रहत हैं। मित्तल साब तो कबहूँ-कबहूँ आत हैं इहाँ।

मंजू मैडम- क्या नाम है तुम्हारा? मित्तल साहब का फोन नंबर है तुम्हारे पास?

महिला- हमरा नाम आरती है। साब का फोन नंबर ऊ कलेंडर पर लिखे हैं।

मंजू मैडम ने फोन लगाया मित्तल साब से बात हुई तो उन्होंने कमरा देने के लिए हाँ कर दी। फिर आरती से उनकी बात करवा दी, जी साब जी कहते हुए आरती ने फोन वापस दे प्रिया।

“साब बोले हैं कमरा दे दो, किराया नाही लेना, आओ बाई जी आप के कमरा दिखा देव।”

सड़क से लगे हुए दो कमरे थे, एक वो जिस में से दरवाजा खोलकर आरती बाहर निकली थी। उसके बाजू का कमरा आरती ने हम लोगों को दिखा प्रिया। उसमें एक तख्त और एक पुरानी कुर्सी रखी थी।

बोली साब- इ सामान कहो तो हटा दूँ।

मैंने कहा- तख्त कुर्सी रखा रहने देना। मेरे काम आ जायेंगे।

कमरे का पीछे का दरवाजा आँगन में खुलता है। आँगन के बाद फिर कमरे बने हुए थे। एक कमरा खुला था, शायद उसमें आरती रहती होगी।

दूसरे दिन से भूमिपूजन के साथ काम शुरू हो गया। आरती भी आई थी वहाँ। घूँघट से दिखता सुन्दर मुखड़ा, घुटनों तक साड़ी और बिना ब्रा के ब्लाउज से उसके यौवन के दीदार करके मेरा तो लौड़ा अंगड़ाई लेने लगा।

मंजू मैडम प्रसाद बाँट रही तो आरती बोली- साब, हमार मरद हरिया को भी इहाँ काम पर लगा लो, बड़ी मेहरबानी होगी।

मैंने उसके बच्चे को खिलाते हुए कहा- तुम कह रही हो तो लगा लूँगा।

तो आरती मुस्कुराते हुए चली गई। दूसरे दिन मैं कमरे में तख्त पर बैठ मकान के प्लान पर नजर डाल रहा था।

तभी सर पर तौलिया बांधे मैले से कपड़े पहने एक व्यक्ति आया, बोला- साब, मैं हरिया हूँ। म्हारी जोरू आरती और बचुआ के साथ इही मकान में रहत हूँ। साब मजूरी करत हूँ। आप अपने इहाँ लगा लो।

मैंने कहा- देखो हरिया अभी जरूरत नहीं है। जब होगी तो बता दूँगा।

थोड़ी देर बाद आरती आई बोली- साब आप कहत थे कि हरिया को लगा लोगे। फिर काहे मना कर दिए? ऊ का लगा लो साब बहुत अहसान होगा हम पर।

मैंने मौका देख उसका हाथ पकड़कर तख्त पर बिठा लिया कहा- अभी मेरे पास पर्याप्त काम करने वाले हैं, जैसे ही जरूरत होगी मैं हरिया को लगा लूँगा।

आरती- साब ऊ का काम पर लगा लोगे तो ऊ को काम के खातिर भटकना नाहीं पड़ेगा और रात में प्लाट की चौकीदारी भी करत रहेगा।

वो मुस्कुराते हुए चली गई।

फिर मिस्त्री से बोल प्रिया- हरिया को टीम में शामिल कर लो।

दूसरे दिन साईट पर गया तो वहाँ का काम जिस द्रुतगति से चल रहा था। उसी गति से मेरा दिल गाँव की गोरी आरती के हुस्न का दीवाना हुआ जा रहा था।

मैं कमरे में जाकर दरवाजे लगाकर तख्त पर आराम करने लगा। तभी आंगन में मुझे चूड़ियों की खनक सुनाई दी।

कहानी जारी रहेगी।

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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

एस के राजपूत

1 month ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

अल्फाज

1 month ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

अंकिता सिंह 7

2 months ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

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