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वो रात सुहागरात बनी-1

रंजन कोटा

30 Apr 2012 को प्रकाशित

वो रात सुहागरात बनी-1
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रंजन

यूँ तो हर किसी के जीवन में कोई न कोई घटना घटती रहती है, किन्तु कुछ घटनायें जीवन को वो मोड़ दे देती हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ, जो मैं आप सभी के साथ शेयर करने जा रहा हूँ।

यह बात लगभग 4 साल पुरानी है, तब मेरी उम्र लगभग 24 साल रही होगी। मेरी उम्र के लगभग सभी दोस्त शारीरिक सुख का लाभ ले चुके थे, पर मैं कहा करता था कि मैं तो अपने औजार का उद्घाटन अपनी बीवी के सामने ही करूँगा, उससे पहले किसी से संबंध नहीं बनाऊँगा।

पर मुझे खुद को नहीं पता था कि मेरे साथ आगे क्या होने वाला है।

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ, इसलिए मेरी मेरे समाज में अपनी एक पहचान है। सभी समाज बन्धु व उनके परिजन मुझे जानते हैं। चूंकि यह घटना 4 साल पुरानी है मुझे किसी सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेने रतलाम जाना था।

एक समाज बन्धु जिनका कि नाम जय कुमार है, ने मुझे फोन किया और कहा- मेरी श्रीमती भी रतलाम जाना चाहती हैं, आप उसे भी साथ ले जाना।

मैंने ‘हाँ’ कह दिया और उनको बता दिया कि मैं शाम को चार बजे घर से निकलूँगा, आप अपनी श्रीमती को गली के मोड़ पर छोड़ देना हम ऑटो में एक साथ ही रेलवे स्टेशन चले जायेंगे।

उनकी श्रीमती का नाम संगीता था। जिससे कि मैं पूर्व परिचित भी था और आकर्षित भी, क्योंकि उसका शारिरिक गठन ही कुछ ऐसा था, जो भी देखे, देखता रह जाए। मैं उसे साथ ले जाने में भी उत्साहित था।

शाम होते ही मैं ऑटो लेकर उसकी गली के मोड़ पर पहुँचा, तो वो मेरा इन्तजार करती नजर आईं। उसे देखते ही मेरी आँखों में जैसे चमक आ गई।

क्या मस्त लग रही थी वो…!

वैसे ही तो गोरा बदन और उस पर लाल रंग की नेट की साड़ी, पतली कमर, नीली आँखें, स्लेक्स वाला ब्लाऊज, थोड़ा बाहर की ओर झाँकते उसके उरोज… जो मेरी शुरु से कमजोरी रही है मुझे बड़े-बड़े स्तन वाली औरतों में शुरु से ही दिलचस्पी रही है। यदि कोई बड़े स्तन वाली महिला या लड़की मेरे सामने से गुजरे तो मैं उसे तब तक देखता रहता हूँ, जब तक कि वो सामने से निकल ना जाए। संगीता तो वैसे भी सब तरफ से कमाल की थी, वो ऑटो में मेरे पास आकर बैठी और हम स्टेशन के लिए रवाना हुए। रास्ते में सामान्य सी बात हुई। हम स्टेशन तक पहुँचे और तुरन्त ही ट्रेन आ चुकी थी। हम अपने कोच में अपनी सीट पर जाकर बैठ गए। वहाँ कुछ अन्य लोग भी थे। सबकी नजर संगीता पर थी, क्योंकि मर्द तो मर्द ही है.. किसी भी सुन्दर स्त्री को देख कर किसका लण्ड फुंफकार नहीं मारता और वो तो वैसे भी कयामत ढा रही थी।

अब हमारी बातचीत चालू हुई, यहाँ-वहाँ की बात करते-करते पारिवारिक चर्चाओं का दौर चालू हुआ।

तब मैंने उससे पूछ ही लिया- भाभी जी, आप इतनी सुन्दर हैं और जय जी में ऐसा क्या है जो आपने उनसे शादी की?

उसका कोई प्रति-उत्तर नहीं मिला, मैंने जैसे उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। उसकी आँखों में मुझे गीलापन नजर आने लगा। मैं उसके पास जाकर बैठा, उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा- भाभीजी, मुझे लगता है कि मैंने आपसे कोई गलत प्रश्न किया है, मैं माफी चाहता हूँ..!

तो वो बोली- नहीं रंजन ऐसी कोई बात नहीं है, पर तुम पहले ऐसे आदमी हो जिसने मेरे दिल का दर्द समझा है।

और वो सिसकने लगी, तो मैंने उसका हाथ दबाते हुए उसे ढाँढस बंधाने की कोशिश की औैर कहा- भाभीजी आप मुझे अपना मित्र समझें और खुल कर बताएँ कि क्या आप अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं हैं?

तब उसने कहा- रंजन मैं तुम्हें वो सब कुछ बताऊँगी, जो मेरे दिल में तब से दफन है जब से मेरी शादी हुई, क्योंकि तुमने मुझे दोस्त बनाया है।

– मेरी शादी 18 साल की उम्र में जय जी के साथ हुई, तब उनकी उम्र 30 साल थी, क्योंकि मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं थी इसलिए सेक्स समझ तो मुझमें बिल्कुल नहीं थी, पर मेरी सहेलियाँ मुझे चिढ़ाया करती थीं- ‘वो बुड्डा तुझे क्या मजा देगा..’

मुझे मजे की परिभाषा ही नहीं आती थी, इसलिए मैंने उन पर गौर नहीं किया। शादी हुई और जब सुहागरात का समय आया तो मुझे मेरे बेडरुम में ले जाया गया। थोड़ी देर बाद जय जी कमरे में आए और मेरे पास बैठ गए, मुझे होंठों पर ‘किस’ किया तो जैसे मेरे शरीर में करंट दौड़ गया, क्योंकि मेरे शरीर से किसी मर्द का यह पहला स्पर्श था। उन्होंने मेरे कपड़े उतारना शुरु किए और मुझे केवल ब्रा और पैन्टी में छोड़ दिया और खुद के कपड़े उतारे। वो पूरी तरह नंगे हुए तो मैंने देखा कि जहाँ से हम सूसू करते हैं वहाँ उनके कुछ लटका हुआ था, मेरी उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। अब वो मेरे पास आए और मेरी ब्रा खोलकर मेरे स्तनों से खेलने लगे। मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। खेलते-खेलते उन्होंने मेरे स्तनों को एक-एक कर मुँह में भरना शुरु किया तो मेरे मुँह से सिसकारियां निकलना चालू हो गईं और साथ ही सूसू वाली जगह पर मुझे खुजली सी होने लगी। अब उन्होंने मेरी पैन्टी नीचे उतारी, मेरी सूसू वाली जगह जहाँ कि बाल थे, देखकर कहा- क्या तुम अपनी चूत के बाल साफ नहीं करतीं?

तो मैं कुछ नहीं समझी क्योंकि चूत शब्द मेरे लिए नया था।

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मैंने पूछा- ये चूत क्या होती है?

तो वो ठहाका मारकर हँसने लगे और बोले- मेरी रानी तूम चूत को नहीं जानती क्या ?

तो मैंने ‘ना’ में सिर हिलाते हुए कहा- नहीं, मैं तो उससे कभी नहीं मिली..!

तो वो और जोर से हँसने लगे और बोले- अरे मेरी भोली रानी, यह जो तुम्हारे नीच छेद है इसे ही चूत कहते हैं..!

तो मैंने भी पूछ लिया- यह जो आपके नीचे लटक रहा है, इसे क्या कहते हैं..!”

तो उन्होने कहा- इसे लण्ड कहते हैं..और अब हम इन दोनों का खेल खेलेंगे।

तो मैंने पूछा- वो कैसे..!

तो उन्होंने कहा- बस देखती जाओ.. कुछ बोलो मत..!

और मुझे सीधा लेटा कर वो मेरे ऊपर आ गए और अपने लण्ड को मेरी चूत में डालने की कोशिश करने लगे, पर वो अन्दर नहीं जा पा रहा था। तब मैंने अनुमान लगाया कि अगर ये कड़क होता तो शायद अन्दर घुस पाता। पर वो ढीला ‘केले’ जैसा महसूस हो रहा था। उन्होंने कई बार कोशिश की, पर वो नाकामयाब रहे और कुछ देर में ही उनके लण्ड से कुछ सफेद पानी सा निकलने लगा और फिर वो एक तरफ लेट गए और उन्हें नींद आ गई।

पर मेरी चूत में तो खुजली चल रही थी, मैंने अपनी ऊँगली अन्दर डाली और अन्दर-बाहर की तो मुझे कुछ अच्छा लगा और मैंने हाथ की स्पीड बढ़ा दी और कुछ देर बाद मेरी चूत से भी सफेद पानी निकला और थोड़ी शान्ति भी मिली और फिर मैं ऐसे ही सो गई।

सुबह दोनों उठे, नहा-धोकर खाना खाया और मैं अपने कमरे में आ गई। मैं नई बहू थी इसलिए कुछ काम तो करना था नहीं, अपने कमरे में आकर कुण्डी लगाकर अपने बेड पर बैठी, सामने टीवी और डीवीडी प्लेयर था, एक ड्रावर में बिना रैपर की कुछ सीडियां थीं।

मैंने एक सीडी निकाली और प्लेयर में लगा कर ऑन किया, तो टीवी स्क्रीन पर मैंने देखा कि एक नग्न महिला के साथ दो नग्न पुरुष बिस्तर पर हैं और उसके साथ वही सब कर रहे हैं, जो कल जय जी ने मेरे साथ करने की कोशिश की थी।

पर मैंने गौर करके देखा तो पता लगा कि उन दोनों पुरुषों का लण्ड बहुत बड़ा और कड़क है और वो दोनों उस स्त्री के आगे-पीछे दोनों छेदों में अपना लण्ड डाल रहे हैं।

मैं उस दृश्य को देखकर बहुत उत्तेजित हो रही थी। मैंने भी अपनी ऊँगली अपनी चूत में डाली और उन बड़े लौड़ों की कल्पना कर अपनी उत्तेजना शान्त की।

अब लण्ड और चूत का खेल मेरी समझ में आने लगा, पर केवल खेल समझ आने से क्या होता है… खिलाड़ी भी तो वैसा ही चाहिए, पर जय का तो रोज ही वही हाल था। मैंने उनमें उत्तेजना भरने की काफी कोशिश की, कई सेक्स-वर्धक गोलियाँ भी खिलाईं, पर उनमें कोई फर्क नहीं आया। वो भी मेरी पीढ़ा जानते थे। उन्होंने कई बार कहा कि संगीता तू कोई दोस्त ढूंढ ले, जो तेरी प्यास बुझा सके। पर मुझे ये गंवारा ना था। मैं अपने पति से बहुत प्यार करती हूँ, मैंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। तब से आज तक मैं प्यासी हूँ। अब तुम्हीं बताओ रंजन, मैं रोऊँ नहीं तो क्या करूँ..!

संगीता की पूरी कहानी सुन कर एक बार तो मुझे उस पर दया आई और साथ ही यह विचार भी कि इतना खुल कर संगीता का मुझे सब कुछ बताना कहीं मुझे आमंत्रण तो नहीं।

कहानी जारी रहेगी।

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वो रात सुहागरात बनी

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