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आज दिल खोल कर चुदूँगी-21

नेहा रानी

10 Mar 2012 को प्रकाशित

आज दिल खोल कर चुदूँगी-21
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अब तक आपने पढ़ा..मेरा पानी निकलने वाला था और दीपक ‘गपगप.. खचखच..’ लण्ड मेरी चूत में पेले जा रहा था।मैं इस मस्त चुदाई की मस्ती में अपनी गाण्ड उठा कर चरम पर आ गई ‘आहहह.. सीसीसीईई.. आह.. उउउउइ.. आह.. धीमे आह.. मैं गई राजा.. आह.. म्म्म्ममी.. आहसीईई..’मैं जाँघें भींच कर झड़ने लगी।दीपक मेरी चूत में लगातार झटके मारता रहा और जब दीपक के लण्ड ने मेरी चूत में पानी छोड़ा.. तो दीपक मुझे दबोचते हुए चूत में वीर्यपात करने लगा। उधर महमूद ने भी मेरी चुदती चूत देखकर अंतिम बार मुट्ठ मार कर मेरे मुँह पर वीर्य छोड़ दिया। एक साथ दोनों ने मेरी बुर और मुँह को वीर्य से सान दिया।अब आगे..

अब पूरी तरह चुदाई का दौर शान्त हो चुका था। सुबह सुनील के आते ही मैं अपनी चुदी हुई चूत लेकर महमूद और दीपक को अलविदा कहकर सुनील के साथ कमरे पर आ गई। कमरे पर मेरे पति मेरा इंतजार कर रहे थे।

सुनील चाय लेकर आया, फिर हम तीनों ने बैठ कर चाय पी और मैंने उसी समय अपना एक फैसला पति और सुनील को सुनाया।मैं बोली- सुनील जी.. मुझे अब बनारस वापस जाना है और अब आप मेरी कोई मीटिंग मत रखिएगा.. और आपने जो प्यार और मदद की.. मैं उसका धन्यवाद करती हूँ।मैंने पति से भी पूछा- क्यों.. आपको कोई प्रॉब्लम?पति बोले- नहीं.. मैं भी यही चाहता हूँ।

पति ने भी सुनील को ‘धन्यवाद’ दिया और सुनील से भी पति ने पूछा- नेहा का निर्णय आपको बुरा तो नहीं लगा?सुनील बोले- नहीं आकाश जी.. बुरा आप के जाने का नहीं लग रहा है.. बुरा लग रहा है बिछुड़ने का.. पर जाना जरूरी है और जब भी आप लोगों को आगरा आने का दिल करे.. तो सुनील आपके स्वागत में हमेशा तैयार है। आकाश जी.. आपको जो पैसा दिया है.. और आज की टोटल कमाई भी मैं आपको दे देता हूँ। मुझे आप लोगों से कोई दलाली नहीं लेनी और आप आज अपने सारे पैसे को बैंक में जमाकर दें.. साथ लेकर जाने की जरूरत नहीं है।

पति ने कहा- ठीक है.. ग्यारह बजे चलेगें.. तब तक आप लोग फ्रेश हो लीजिए।सुनील जब चलने लगे.. तो मैं बोली- सुनील जी.. मैं आपका एहसान नहीं चुका सकती..

सबकी आँखों में बिछोह के कारण आँसू निकल आए थे। फिर हम लोग नहा-धोकर नाश्ता करके सुनील का इन्तजार करने लगे।तभी सुनील भी आ गए.. जब पति और सुनील जाने लगे.. तो मैं बोली- मैं भी चलती हूँ आपके साथ.. आप लोग बैंक चले जाना.. और आज मैं अपनी मरजी से अकेले घूमकर शाम तक कमरे पर आ जाऊँगी।

उन लोगों के बैंक जाने के बाद मैं यूँ ही घूमते हुए ताजमहल देखने चली गई।मैं काफी देर तक ताज देखती और घूमते हुए एक जगह बैठ गई। मुझे अकेला देखकर 42-45 साल का एक मर्द आकर मेरे करीब बैठ गया।उसे देख कर लग रहा था कि वह मुझसे बात करना चाहता है।

फिर कुछ देर बाद वह बोल ही दिया- क्या आप अकेली ही आई है घूमने।‘जी अकेली हूँ..’‘ओह.. मैं भी अकेला हूँ.. आप बुरा ना माने.. तो क्या मैं आपके पास बैठ सकता हूँ?’‘यस.. नो प्रॉब्लम..’

वह मेरे करीब आकर बैठकर बात करने लगा, मुझे भी उससे बात करना अच्छा लग रहा था, वह एक सुन्दर गठीला बदन का मालिक था। मैं उसके प्रति आकर्षित होने लगी।मैंने उससे पूछा- आप कहाँ से हो?वह बोला- मैं तो इलाहाबाद का हूँ मैडम..मैं बोली- मेरा नाम नेहा है और मैं वाराणसी की हूँ..‘अरे वाह.. आप तो मेरी तरफ की ही हो..’‘आप यहाँ घूमने आए हो?’‘नहीं नेहा.. मैं यहाँ नौकरी करता हूँ.. यूँ ही आज ताज देखने चला आया और देखिए आपसे मुलाकात हो गई।’

‘वो तो है.. और आपकी फैमली भी है?’वह मायूस होते बोला- नहीं नेहा जी.. मैं अकेला हूँ।‘तब तो सर जी आपको..’वह बीच में बोल बैठा- मेरा नाम सर जी नहीं.. अभिजीत है..‘जी अभिजीत.. आपको तब तो बीवी की याद सताती होगी।’वह शरमाते बोला- याद के सिवा मैं कर भी क्या सकता हूँ नेहा जी।’

उसकी बात भी सही थी.. लेकिन मैं जानबूझ कर कुछ अश्लील मजाक करना चाहती थी, मुझे अभिजीत से बात करना अच्छा लग रहा था।

मैं बोली- बाकी का काम कैसे करते हो? जब बीवी की याद सताती होगी।वह मुस्कुरा दिया- कुछ नहीं.. यूँ ही रह लेता हूँ..मैं थोड़ी और बोल्ड होते हुए बोली- मैं कैसे मानूँ अभिजीत जी कि वाईफ की याद आने पर आप कुछ नहीं करते.. बताईए ना?अभिजीत शरमाते हुए बोला- आप बुरा मान जाओगी।मैं बोली- तुम बताओ तो सही.. मैं बुरा नहीं मानूँगी।अभिजीत सर को झुका कर बोला- मुट्ठ मार लेता हूँ.. जब याद ज्यादा आती है।

मैंने उसको लाईन पर आता देख बात को आगे बढ़ा दिया।‘तब तो आप बहुत गलत करते हो.. बीवी को यहीं ले आओ.. और अपनी तन की प्यास बुझाओ..’मैंने एक साथ कुछ ज्यादा अश्लील शब्द बोल दिए।

वह बोला- वाईफ को यहाँ लाना सम्भव नहीं है।‘तो फिर तुम किसी और के साथ क्यूँ नहीं कर लेते?’वह बोला- नेहा यह सब किसी के साथ कैसे कर सकता हूँ.. कौन मिलेगा और मैं गन्दी जगह जाना नहीं चाहता।मैं बोली- कोई घरेलू शादीशुदा औरत देख लो.. बहुत मिल जाएंगी।

वह मेरी बातों से समझ गया कि उसके थोड़ा आगे बढ़ने पर मैं ही वह औरत हो सकती हूँ.. पर वह भी जानबूझ कर बात घुमा रहा था।

‘आपके पति कहाँ हैं.. क्या आप अकेली आई हो बनारस से?’‘नहीं.. अभिजीत मैं अकेली नहीं आई हूँ पति भी साथ हैं.. पर आज मैं अकेली घूमने निकली हूँ और वैसे पति को काम के सिवाए मैं दिखती ही नहीं.. उनके साथ से अच्छा मैं अकेली ठीक हूँ।’मैं जानबूझ कर पति के बारे में झूठ बोली थी।

‘आप कब तक खाली हैं?’मैं बोली- शाम तक या उससे भी अधिक समय है मेरे पास।वह डरते हुए बोला- आपको बुरा ना लगे तो यहाँ बैठने के अलावा हम दोनों मेरे कमरे पर चलते.. वहीं बैठकर बातें करते और मेरे कमरे की चाय भी पी लेतीं।मैं बोली- आपके साथ मैं आपके कमरे पर चली.. तो कहीं लोग गलत ना समझें.. कि आप मेरे साथ..मैंने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी।

‘नहीं नेहा.. कोई कुछ नहीं सोचेगा.. क्यूँ कि मैं आज तक किसी को लाया ही नहीं कमरे पर.. और मेरा कमरे मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में है। आप जब तक चाहें.. वहाँ रुक सकती हो।’फिर मैं बात करते हुए अभिजीत के कमरे पर पहुँची, अभिजीत ने अपने हाथों से चाय बना कर मुझे पिलाई।

अभिजीत मेरे पास चुपचाप बैठा था।मैं बोली- आपका कमरा तो बढ़िया है.. पर यहाँ एक औरत की जरूरत है.. जो आपको और घर को सुख दे सके। मुझे लग रहा है आज तक इस कमरे में सेक्स की किलकारी नहीं गूंजी हैं।यह सब मैं जानबूझ कर कह रही थी।

तभी वह बोला- नेहा आप चाहो तो अभी किलकारी गूँज उठें।यह कह कर अभिजीत मुझे किस करने लगा।मैं बोली- यह क्या कर रहे हो.. प्लीज ऐसा मत करो..तभी अभिजीत बोला- तुम भी तो यही चाह रही थी नेहा.. अब मना मत करो। मैंने अब तक किसी गैर औरत से सेक्स किया नहीं है.. पर मेरे पास उम्र का अनुभव तो है।

यह कहता हुआ वह मेरे अंग-अंग को चूमने लगा और मैं भी एक प्यासा मर्द पाकर चुदाई के नशे में उसके आगोश में बैठकर सेक्स का खेल खेलने लगी।मेरी चूत की प्यास भी तेज होने लगी, वह मेरी चूचियों को मसलने लगा और मैं अपने मम्मे मसलवाते जानबूझ कर एक भरपूर अंगड़ाई लेकर अभिजीत को अपनी बाँहों भर के चुदाई का खुला निमंत्रण देते हुए वहीं सोफे पर लेटे गई।

उसने मेरे बड़े-बड़े मम्मों को अपनी मजबूत चौड़ी छाती के बीच दबा कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और अपने होंठों को मेरे नाजुक होंठों पर कसकर.. उनका रसपान करने लगा।मैं उसकी मजबूत बाँहों में कसमसाते हुए बोली- मैं आपकी बीवी नहीं हूँ.. एक अंजान औरत हूँ।

वह बोला- मेरे लिए दोनों एक जैसे हैं। क्योंकि बीवी को चोदने में यही फीलिंग होती है।

फिर अभिजीत ने उठकर अपने और मेरे कपड़े निकाल दिए और मेरे चूचों को पीकर मुझे लण्ड चूसने को बोला।मैं अभिजीत का लण्ड मुँह में भर कर चूसने लगी, कुछ देर की चुसाई से अभिजीत का लण्ड फनफनाने लगा।फिर अभिजीत ने मुझे सोफे पर लिटाकर लण्ड को पकड़ कर मेरी चूत के मुँह पर रख एक झटका दिया, मेरी चिकनी बुर में अभिजीत ने अपने लण्ड का सुपारा धकेल दिया।मैं भी कमर उचाकर चूत में लण्ड लेने की कोशिश कर रही थी। अभिजीत झटके पर झटके देते हुए पूरा लण्ड मेरी बुर में डाल कर मेरी चूत को चोदने लगा।

‘आआह्ह.. जान.. मजा आ रहा है.. खूब चोदिए मुझे.. वाह और जोर से.. डालिए.. वाह.. बहुत अच्छे से चोद रहे हो इस्स्स्स्स् स्स्स्स.. मेरी बुर को खूब चोदो.. जम कर चोदो..’‘ले.. चूत उठाकर चुद.. मेरे लण्ड से.. वाह.. आज तुमने बहुत मजा दिया मेरी रानी.. वाह नेहा.. तुमने अपनी चूत देकर मुझे धन्य कर दिया।’ ये कहते हुए अभिजीत मेरी चूत पर शॉट पर शॉट मारते हुए मेरी चूत का पोर-पोर हिला कर मेरी चुदाई कर रहा था।

अभिजीत भी जम कर मेरी बुर को चोद रहा था।थोड़ी देर बाद अभिजीत ने मुझे पलटने को कहा और मैं पलट गई।अब मैं कुतिया बनी हुई थी और अभिजीत कुत्ते की तरह मुझे चोद रहे थे और वैसे ही वो हाँफ़ भी रहे थे। अभिजीत का लण्ड मेरी चूत से टकरा कर ‘थप-थप’ की आवाज कर रहा था। मैं मजे से मदहोश हुई जा रही थी।

तभी अभिजीत बोले- आह नेहा.. अब मेरा निकलेगा.. तेरी गरम बुर पाकर मेरा लण्ड झड़ जाएगा.. आआह्ह्ह.. आअह्ह्ह्ह.. आआह्ह्ह्ह..।इस तरह की मादक आवाज निकालते हुए अभिजीत ने मेरी बुर में अपना वीर्य भलभला कर छोड़ने लगे।मैं भी अभिजीत के गरम वीर्य को पाकर झड़ गई। अभिजीत बहुत प्यासा था.. उसने शाम तक मेरी दो बार और चुदाई की और फिर भी हम दोनों का मन नहीं भरा था। मन मार कर वहाँ से मुझे आना पड़ा।

मेरे प्यारे दोस्तो.. आज मैं कहानी की यह सीरीज ‘आज दिल खोल कर चुदूँगी’ का अंतिम भाग आप लोगों के सामने रख रही हूँ.. पर इसका मतलब यह नहीं कि आगे मेरी चुदाई नहीं हुई है। मैं फिर हाजिर होऊँगी.. एक नई कहानी के साथ.. क्योंकि मैं अभी तक लण्ड से बुर लड़ा रही हूँ।

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पाठकों की राय

1 टिप्पणी

डार्क किंग

4 days ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

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