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माँ की चुदाई पठन समय: 17 मिनट पढ़ा गया: 993 बार

धोबी घाट पर माँ और मैं -1

जलगाँव बॉय

15 Jan 2022 को प्रकाशित

धोबी घाट पर माँ और मैं -1
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बात बहुत पुरानी है पर आज आप लोगों के साथ बांटने का मन किया, इसलिये बता रहा हूँ।

हमारा पारिवारिक काम धोबी का था, हम लोग एक छोटे से गाँव में रहते थे और वहाँ गाँव में धोबियों का एक ही घर है इसलिए हम लोगों को ही गाँव के सारे कपड़े साफ करने को मिलते थे।मेरे परिवार में मैं, मेरी एक बहन और माँ-पिताजी है। गाँव के माहौल में लड़कियों की कम उमर में शादीयाँ हो जाती है। इसलिये जैसे ही मेरी बहन की रजस्वला हुई, उसकी शादी कर दी गई और वो पड़ोस के गाँव में चली गई।

पिछले एक साल से घर में अब मैं, मेरी माँ और बापू के अलावा कोई नहीं बचा था। मेरी उमर मेरी बहन से एक साल कम ही थी, गाँव के स्कूल में ही पढ़ाई-लिखाई चल रही थी। हमारा एक छोटा सा खेत भी था, जिस पर पिताजी काम करते थे और मैंने और माँ ने कपड़े धोने का काम संभाल रखा था।

कुल मिला कर हम बहुत सुखी-संपन्न थे और किसी चीज की दिक्कत नहीं थी। मेरे से पहले कपड़े धोने में, माँ का हाथ मेरी बहन बटाती थी।मगर अब मैं यह काम करता था हम दोनों माँ-बेटे हफ्ते में दो बार नदी पर जाते थे और धुलाई करते थे।फिर घर आकर उन कपड़ों की ईस्त्री करके उन्हें गाँव में वापस लौटा कर फिर से पुराने गन्दे कपड़े इकट्ठे कर लेते थे। हर बुधवार और शनिवार को सुबह 9 बजे के समय मैं और माँ एक छोटे से गधे पर, पुराने कपड़े लाद कर नदी की और निकल पड़ते।

हम गाँव के पास बहने वाली नदी में कपड़े ना धोकर गाँव से थोड़ा दूर जाकर सुनसान जगह पर कपड़े धोते थे क्योंकि गाँव के पास वालीनदी पर साफ पानी भी नहीं मिलता था और डिस्टर्बन्स भी बहुत होता था।

अब मैं जरा अपनी माँ के बारे में बता दूँ। वो 34-35 साल की एक बहुत सुंदर गोरी-चिट्टी औरत है, ज्यादा लंबी तो नहीं परंतु उसकी लंबाई 5’3″ है और मेरी 5’7″ की है।

माँ देखने में बहुत सुंदर है, धोबियों में वैसे भी गोरा रंग और सुंदर होना कोई नई बात नहीं है। माँ के सुंदर होने के कारण गाँव के लोगों की नजर भी उसके ऊपर रहती होगी, ऐसा मैं समझता हूँ।और शायद इसी कारण से वो कपड़े धोने के लिये सुनसान जगह पर जाना ज्यादा पसंद करती थी।

सबसे आकर्षक उसके मोटे-मोटे चूतड़ और नारियल के जैसे स्तन थे जो ऐसे लगते थे जैसे ब्लाउज़ को फाड़ कर निकल जाएंगे और भाले की तरह से नुकीले थे। उसके चूतड़ भी कम सेक्सी नहीं थे। जब वो चलती थी तो ऐसे मटकते थे कि देखने वाले उसकी हिलती गांड को देख कर हिल जाते थे।

पर उस वक्त मुझे इन बातों का कम ही ज्ञान था।फिर भी थोड़ा बहुत तो गाँव के लड़कों के साथ रहने के कारण पता चल ही गया था।और जब भी मैं और माँ कपड़े धोने जाते तो मैं बड़ी खुशी के साथ कपड़े धोने उसके साथ जाता था।

जब माँ कपड़े को नदी के किनारे धोने के लिये बैठती थी, तब वो अपनी साड़ी और पेटिकोट को घुटनों तक ऊपर उठा लेती थी और फिर पीछे एक पत्थर पर बैठ कर आराम से दोनों टांगें फैला कर जैसे औरतें पेशाब करते वक्त करती हैं, कपड़ों को धोती थी।मैं भी अपनी लुंगी को जांघ तक उठा कर कपड़े धोता रहता था।

इस स्थिति में माँ की गोरी-गोरी टांगें मुझे देखने को मिल जाती थी और उसकी साड़ी भी सिमट कर उसके ब्लाउज़ के बीच में आ जाती थी और उसके मोटे-मोटे चूचों के ब्लाउज़ से दर्शन होते रहते थे। कई बार उसकी साड़ी जांघों के ऊपर तक उठ जाती थी और ऐसे समय, में उसकी गोरी-गोरी, मोटी-मोटी केले के तने जैसी चिकनी जांघों को देख कर मेरा लंड खड़ा हो जाता था।मेरे मन में कई सवाल उठने लगते, फिर मैं अपना सिर झटक कर काम करने लगता था।

मैं और माँ कपड़ों की सफाई के साथ-साथ तरह-तरह की गाँव भर की बातें भी करते जाते। कई बार हमें उस सुनसान जगह पर ऐसाकुछ दिख जाता था जिसको देख कर हम दोनों एक दूसरे से बात करते, कपड़े धोने के बाद हम वहीं पर नहाते थे और फिर साथ लाया हुआ खाना खा नदी किनारे सुखाये हुए कपड़े को इकट्ठा करके घर वापस लौट जाते थे।मैं तो खैर लुंगी पहन कर नदी के अंदर कमर तक पानी में नहाता था, मगर माँ नदी के किनारे ही बैठ कर नहाती थी।

नहाने के लिये माँ सबसे पहले अपनी साड़ी उतारती थी, फिर अपने पेटिकोट के नाड़े को खोल कर पेटिकोट ऊपर को सरका कर अपने दांत से पकड़ लेती थी।इस तरीके से उसकी पीठ तो दिखती थी मगर आगे से ब्लाउज़ पूरा ढक जाता था। फिर वो पेटिकोट को दांत से पकड़े हुए ही अंदर हाथडाल कर अपने ब्लाउज़ को खोल कर उतारती थी और फिर पेटिकोट को छाती के ऊपर बांध देती थी, जिससे उसके चूचे पूरी तरह से पेटिकोट से ढक जाते थे, कुछ भी नजर नहीं आता था और घुटनों तक पूरा बदन ढक जाता था।फिर वो वहीं पर नदी के किनारे बैठ कर एक बड़े से जग से पानी भर-भर के पहले अपने पूरे बदन को रगड़-रगड़ कर साफ करती थी और साबुन लगाती थी, फिर नदी में उतर कर नहाती थी।

माँ की देखा-देखी मैंने भी पहले नदी के किनारे बैठ कर अपने बदन को साफ करना शुरु कर प्रिया, फिर मैं नदी में डुबकी लगा कर नहाने लगा। मैं जब साबुन लगाता तो अपने हाथों को अपनी लुंगी में घुसा कर पूरे लंड और गांड पर चारो तरफ घुमा घुमा के साबुन लगा के सफाई करता था क्योंकि मैं भी माँ की तरह बहुत सफाई पसंद था।जब मैं ऐसा कर रहा होता तो मैंने कई बार देखा कि माँ बड़ी गौर से मुझे देखती रहती थी और अपने पैर की एड़ियाँ पत्थर पर धीरे-धीरेरगड़ कर साफ करती होती।

मैं सोचता था, वो शायद इसलिये देखती है कि मैं ठीक से सफाई करता हूँ या नहीं। इसलिये मैं भी बड़े आराम से खूब दिखा दिखा कर साबुन लगाता था कि कहीं डांट ना सुनने को मिल जाये कि ठीक से साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखता हूँ मैं।मैं अपनी लुंगी के भीतर पूरा हाथ डाल कर अपने लौड़े को अच्छे तरीके से साफ करता था। इस काम में मैंने गौर किया कि कई बारमेरी लुंगी भी इधर-उधर हो जाती थी जिससे माँ को मेरे लंड की एक-आध झलक भी दिख जाती थी।

जब पहली बार ऐसा हुआ तो मुझे लगा कि शायद माँ डांटेगी मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तब मैं निश्चिंत हो गया और मजे से अपना पूरा ध्यान साफ सफाई पर लगाने लगा।माँ की सुंदरता देख कर मेरा भी मन कई बार ललचा जाता था और मैं भी चाहता था कि मैं उसे सफाई करते हुए देखूँ पर वो ज्यादा कुछ देखने नहीं देती थी और घुटनों तक की सफाई करती थी और फिर बड़ी सावधानी से अपने हाथों को अपने पेटिकोट के अंदर ले जा कर अपनी छाती की सफाई करती।

जैसे ही मैं उसकी ओर देखता तो वो अपना हाथ छाती में से निकाल कर अपने हाथों की सफाई में जुट जाती थी।इसलिये मैं कुछ नहीं देख पाता था और चूँकि वो घुटनों को मोड़ कर अपनी छाती से सटाये हुए होती थी इसलिये पेटिकोट के ऊपर सेछाती की झलक मिलनी चाहिए, वो भी नहीं मिल पाती थी।

इसी तरह जब वो अपने पेटिकोट के अंदर हाथ घुसा कर अपनी जांघों और उसके बीच की सफाई करती थी, यह ध्यान रखती कि मैं उसे देख रहा हूँ या नहीं।जैसे ही मैं उसकी ओर घूमता, वो झट से अपना हाथ निकाल लेती थी और अपने बदन पर पानी डालने लगती थी।मैं मन-मसोस के रह जाता था।

मेरे तो होश ही उड़ गये और मैं जल्दी से नदी में जाने के लिये उठ कर खड़ा हो गया, पर मुझे इस बात का तो ध्यान ही नहीं रहाकि मेरी लुंगी तो खुली हुई है और मेरी लुंगी सरसराते हुए नीचे गिर गई। मेरा पूरा बदन नंगा हो गया और मेरा 8 ईंच का लंड जो पूरी तरह से खड़ा था, धूप की रोशनी में नजर आने लगा।मैंने देखा कि माँ एक पल के लिये चकित होकर मेरे पूरे बदन और नंगे लंड की ओर देखती रह गई।

मैंने जल्दी से अपनी लुंगी उठाइ और चुपचाप पानी में घुस गया।मुझे बड़ा डर लग रहा था कि अब क्या होगा, अब तो पक्की डांट पड़ेगी।मैंने कनखियों से माँ की ओर देखा तो पाया कि वो अपने सिर को नीचे किये हल्के-हल्के मुस्कुरा रही है और अपने पैरों पर अपने हाथ चला कर सफाई कर रही है।मैंने राहत की सांस ली और चुप-चाप नहाने लगा।

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उस दिन हम ज्यादातर चुप-चाप ही रहे। घर वापस लौटते वक्त भी माँ ज्यादा नहीं बोली।दूसरे दिन से मैंने देखा की माँ, मेरे साथ कुछ ज्यादा ही खुल कर हंसी मजाक करती रहती थी, और हमारे बीच दोहरे अर्थो में भी बातें होने लगी थी।पता नहीं माँ को पता था या नहीं पर मुझे बड़ा मजा आ रहा था।

मैं जब भी किसी के घर से कपड़े लेकर वापस लौटता तो माँ बोलती- क्यों, रधिया के कपड़े भी लाया है धोने के लिये क्या?तो मैं बोलता- हां!इस पर वो बोलती- ठीक है, तू धोना उसके कपड़े… बड़ा गन्दा करती है। उसकी सलवार तो मुझसे धोई नहीं जाती।फिर पूछती थी- अंदर के कपड़े भी धोने के लिये दिये हैं क्या?अंदर के कपड़ों से उसका मतलब पेन्टी और ब्रा या फिर अंगिया से होता था, मैं कहता- नहीं!तो इस पर हंसने लगती और कहती- ती लड़का है ना, शायद इसलिये तुझे नहीं दिये होंगे, देख अगली बार जब मैं माँगने जाऊँगी तो जरूर देगी।

फिर अगली बार जब वो कपड़े लाने जाती तो सच-मुच में वो उसकी पेन्टी और अंगिया ले के आती थी और बोलती- देख, मैं ना कहती थी कि वो तुझे नहीं देगी और मुझे दे देगी, तू लड़का है ना, तेरे को देने में शरमाती होगी, फिर तू तो अब जवान भी हो गया है।

मैं अन्जान बना पूछता कि क्या देने में शरमाती है रधिया?तो मुझे उसकी पेन्टी और ब्रा या अंगिया फैला कर दिखाती और मुस्कुराते हुए बोलती- ले, खुद ही देख ले।इस पर मैं शरमा जाता और कनखियों से देख कर मुंह घुमा लेता तो, वो बोलती- अरे, शरमाता क्यों है? ये भी तेरे को ही धोने पड़ेंगे। कह कर हंसने लगती।

हालांकि, सच में ऐसा कुछ नहीं होता और ज्यादातर मर्दों के कपड़े मैं और औरतों के माँ ही धोया करती थी। क्योंकि उसमें ज्यादा मेहनत लगती थी।पर पता नहीं क्यों माँ अब कुछ दिनों से इस तरह की बातों में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगी थी। मैं भी चुपचाप उसकी बातें सुनता रहता और मजे से जवाब देता रहता था।

जब हम नदी पर कपड़े धोने जाते तब भी मैं देखता था कि माँ अब पहले से थोड़ी ज्यादा खुले तौर पर पेश आती थी। पहले वो मेरी तरफ पीठ करके अपने ब्लाउज़ को खोलती थी और पेटिकोट को अपनी छाती पर बांधने के बाद ही मेरी तरफ घूमती थी। पर अब वो इस पर ध्यान नहीं देती और मेरी तरफ घूम कर अपने ब्लाउज़ को खोलती और मेरे ही सामने बैठ कर मेरे साथ ही नहाने लगती।जबकि पहले वो मेरे नहाने तक इन्तजार करती थी और जब मैं थोड़ा दूर जाकर बैठ जाता, तब पूरा नहाती थी।

मेरे नहाते वक्त उसका मुझे घूरना बदस्तूर जारी था। मुझ में भी अब हिम्मत आ गई थी और मैं भी जब वो अपनी छातियों की सफाई कर रही होती तो उसे घूर कर देखता रहता।माँ भी मजे से अपने पेटिकोट को जांघों तक उठा कर एक पत्थर पर बैठ जाती और साबुन लगाती, और ऐसे दिखावा करती जैसे मुझे देख ही नहीं रही है।

उसके दोनों घुटने मुड़े हुए होते थे और एक पैर थोड़ा पहले आगे पसारती और उस पर पूरा जांघों तक साबुन लगाती थी, फिर पहले पैर को मोड़ कर दूसरे पैर को फैला कर साबुन लगाती। पूरा अंदर तक साबुन लगाने के लिये वो अपने घुटने मोड़े रखती और अपने बांये हाथ से अपने पेटिकोट को थोड़ा उठा के, या अलग कर के दाहिने हाथ को अंदर डाल के साबुन लगाती।

मैं चूंकि थोड़ी दूर उसके बगल में बैठा होता, इसलिये मुझे पेटिकोट के अंदर का नजारा तो नहीं मिलता था। जिसके कारण से मैं मन मसोस के रह जाता था कि काश मैं सामने होता।पर इतने में ही मुझे गजब का मजा आ जाता था, उसकी नंगी, चिकनी चिकनी जांघें ऊपर तक दिख जाती थी।

माँ अपने हाथ से साबुन लगाने के बाद बड़े मग को उठा के उसका पानी सीधे अपने पेटिकोट के अंदर डाल देती और दूसरे हाथ से साथ ही साथ रगड़ती भी रहती थी।यह इतना जबरदस्त नज़ारा होता था कि मेरा तो लंड खड़ा होकर फुफकारने लगता और मैं वहीं नहाते-नहाते अपने लंड को मसलने लगता।

जब मेरे से बरदाश्त नहीं होता तो मैं सीधा नदी में कमर तक पानी में उतर जाता और पानी के अंदर हाथ से अपने लंड को पकड़ कर खड़ा हो जाता और माँ की तरफ घूम जाता।जब वो मुझे पानी में इस तरह से उसकी तरफ घूम कर नहाते देखती तो मुस्कुरा के मेरी तरफ देखती हुई बोलती- ज्यादा दूर मत जाना, किनारे पर ही नहा ले, आगे पानी बहुत गहरा है।

मैं कुछ नहीं बोलता और अपने हाथों से अपने लंड को मसलते हुए नहाने का दिखावा करता रहता।

इधर माँ मेरी तरफ देखती हुई अपने हाथों को ऊपर उठा-उठा के अपनी कांख की सफाई करती, कभी अपने हाथों को अपने पेटिकोट में घुसा कर छाती को साफ करती, कभी जांघों के बीच हाथ घुसा के खूब तेजी से हाथ चलाने लगती… दूर से कोई देखे तो ऐसा लगेगा कि मुठ मार रही है, और शायद मारती भी होगी।

कभी कभी वो भी खड़ी होकर नदी में उतर जाती और ऐसे में उसका पेटिकोट, जो उसके बदन से चिपका हुआ होता था, गीला होने के कारण मेरी हालत और ज्यादा खराब कर देता था।

पेटिकोट चिपकने के कारण उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ नुमाया हो जाती थी। कपड़े के ऊपर से उसके बड़े-बड़े, मोटे-मोटे निप्पल तक दीखने लगते थे।पेटिकोट उसके चूतड़ों से चिपक कर उसकी गांड की दरार में फंसा हुआ होता था और उसके बड़े-बड़े चूतड़ साफ-साफ दिखाई देते रहते थे।

वो भी कमर तक पानी में मेरे ठीक सामने आकर खड़ी होकर डुबकी लगाने लगती और मुझे अपने चूचियों का नजारा करवाती जाती।मैं तो वहीं नदी में ही लंड मसल के मुठ मार लेता था, हालांकि मुठ मारना मेरी आदत नहीं थी।

घर पर मैं यह काम कभी नहीं करता था, पर जब से माँ के स्वभाव में परिवर्तन आया था, नदी पर मेरी हालत ऐसी हो जाती थी कि मैं मजबूर हो जाता था।अब तो घर पर मैं जब भी इस्तरी करने बैठता, तो मुझे बोलती- देख, ध्यान से इस्तरी करियो। पिछली बार श्यामा बोल रही थी कि उसके ब्लाउज़ ठीक से इस्तरी नहीं थे।

मैं भी बोल पड़ता- ठीक है, कर दूँगा। इतना छोटा-सा ब्लाउज़ तो पहनती है, ढंग से इस्तरी भी नहीं हो पाती। पता नहीं कैसे काम चलाती है, इतने छोटे से ब्लाउज़ में?अभी के लिये इतना ही… समय मिलने पर आगे भी लिखूँगा।support@mohakkisse.com

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