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माँ की चुदाई पठन समय: 8 मिनट पढ़ा गया: 536 बार

धोबी घाट पर माँ और मैं -2

जलगाँव बॉय

19 Jan 2022 को प्रकाशित

धोबी घाट पर माँ और मैं -2
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घर पर मैं जब भी इस्तरी करने बैठता, तो मुझे बोलती- देख, ध्यान से इस्तरी करियो। पिछली बार श्यामा बोल रही थी कि उसके ब्लाउज़ ठीक से इस्तरी नहीं थे।

मैं भी बोल पड़ता- ठीक है, कर दूँगा। इतना छोटा-सा ब्लाउज़ तो पहनती है, ढंग से इस्तरी भी नहीं हो पाती। पता नहीं कैसे काम चलाती है, इतने छोटे से ब्लाउज़ में?

तो माँ बोलती- अरे, उसकी छातियाँ ज्यादा बड़ी थोड़े ही हैं, जो वो बड़ा ब्लाउज़ पहनेगी, हाँ उसकी सास के ब्लाउज़ बहुत बड़े-बड़े हैं।बुढ़िया की छाती पहाड़ जैसी है।कह कर माँ हंसने लगती।फिर मेरे से बोलती- तू सबके ब्लाउज़ की लंबाई-चौड़ाई देखता रहता है क्या? या फिर इस्तरी करता है?

मैं क्या बोलता, चुपचाप सिर झुका कर इस्तरी करते हुए धीरे से बोलता- अरे, देखता कौन है, नजर चली जाती है बस।इस्तरी करते-करते मेरा पूरा बदन पसीने से नहा जाता था। मैं केवल लुंगी पहने इस्तरी कर रहा होता था, माँ मुझे पसीने से नहाये हुए देख कर बोलती- छोड़ अब तू कुछ आराम कर ले, तब तक मैं इस्तरी करती हूँ।

माँ यह काम करने लगती।थोड़ी ही देर में उसके माथे से भी पसीना चूने लगता और वो अपनी साड़ी खोल कर एक ओर फेंक देती और बोलती- बड़ी गरमी है रे, पता नहीं तू कैसे कर लेता है, इतने कपड़ों की इस्तरी? मेरे से तो यह गरमी बरदाश्त नहीं होती।

इस पर मैं वहीं पास बैठा उसके नंगे पेट, गहरी नाभि और मोटे चूचों को देखता हुआ बोलता- ठंडी कर दूँ तुझे?‘कैसे करेगा ठंडी?’‘डण्डे वाले पंखे से… मैं तुझे पंखा झाल देता हूँ, फेन चलाने पर तो इस्तरी ही ठंडी पड़ जायेगी।’‘रहने दे, तेरे डण्डे वाले पंखे से भी कुछ नहीं होगा, छोटा-सा तो पंखा है तेरा।’

कह कर अपने हाथ ऊपर उठा कर, माथे पर छलक आये पसीने को पोंछती तो मैं देखता कि उसकी कांख पसीने से पूरी भीग गई है, और उसकी गरदन से बहता हुआ पसीना उसके ब्लाउज़ के अंदर, उसकी दोनों चूचियों के बीच की घाटी में जाकर उसके ब्लाउज़ कोभीगा रहा होता।घर के अंदर, वैसे भी वो ब्रा तो कभी पहनती नहीं थी, इस कारण से उसके पतले ब्लाउज़ को पसीना पूरी तरह से भीगा देता था और उसकी चूचियां उसके ब्लाउज़ के ऊपर से नजर आती थी।

कई बार जब वो हल्के रंग का ब्लाउज़ पहनी होती तो उसके मोटे- मोटे भूरे रंग के निप्पल नजर आने लगते। यह देख कर मेरा लंड खड़ा होने लगता था।कभी-कभी वो इस्तरी को एक तरफ रख कर अपने पेटिकोट को उठा कर पसीना पोंछने के लिये अपने सिर तक ले जाती और मैं ऐसे ही मौके के इन्तजार में बैठा रहता था क्योंकि इस वक्त उसकी आंखें तो पेटिकोट से ढक जाती थी, पर पेटिकोट ऊपर उठने के कारण उसकी टांगें पूरी जांघ तक नंगी हो जाती थी और मैं बिना अपनी नजरों को चुराये उसकी गोरी- चिट्टी, मखमली जांघों को तो जी भर के देखता था।

माँ अपने चेहरे का पसीना अपनी आंखें बन्द करके पूरे आराम से पोंछती थी और मुझे उसके मोटे कदली के खम्भे जैसी जांघों का पूरा नजारा दिखाती थी।गाँव में औरतें साधारणतया पेन्टी नहीं पहनती हैं, कई बार ऐसा हुआ कि मुझे उसके झांटों की हल्की सी झलक देखने को मिल जाती। जब वो पसीना पोंछ के अपना पेटिकोट नीचे करती, तब तक मेरा काम हो चुका होता और मेरे से बरदाश्त करना संभव नहीं हो पाता, मैंजल्दी से घर के पिछवाड़े की तरफ भाग जाता, अपने लंड के खड़ेपन को थोड़ा ठंडा करने के लिये।जब मेरा लंड डाउन हो जाता, तब मैं वापस आ जाता।

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माँ पूछती- कहाँ गया था?तो मैं बोलता- थोड़ी ठंडी हवा खाने… बड़ी गरमी लग रही थी।‘ठीक किया, बदन को हवा लगाते रहना चाहिये, फिर तू तो अभी बड़ा हो रहा है, तुझे और ज्यादा गरमी लगती होगी।’‘हाँ, तुझे भी तो गरमी लग रही होगी माँ? जा तू भी बाहर घूम कर आ जा। थोड़ी गरमी शांत हो जायेगी।’और उसके हाथ से इस्तरी ले लेता।

पर वो बाहर नहीं जाती और वहीं पर एक तरफ मूढे पर बैठ जाती, अपने पैर घुटनों के पास से मोड़ कर और अपने पेटिकोट को घुटनों तक उठा कर बीच में समेट लेती। माँ जब भी इस तरीके से बैठती थी तो मेरा इस्तरी करना मुश्किल हो जाता था।उसके इस तरह बैठने से उसकी घुटनों से ऊपर तक की जांघें और दीखने लगती थी।

‘अरे नहीं रे, रहने दे मेरी तो आदत हो गई है गरमी बरदाश्त करने की।’‘क्यों बरदाश्त करती है? गरमी दिमाग पर चढ़ जायेगी, जा बाहर घूम के आ जा। ठीक हो जायेगा।’‘जाने दे, तू अपना काम कर, यह गरमी ऐसे नहीं शान्त होने वाली। तेरा बापू अगर समझदार होता तो गरमी लगती ही नहीं, पर उसे क्या, वो तो कहीं देसी पी के सोया पड़ा होगा। शाम होने को आई मगर अभी तक नहीं आया।’

‘अरे, तो इस में बापू की क्या गलती है? मौसम ही गरमी का है, गरमी तो लगेगी ही।’‘अब मैं तुझे कैसे समझाऊँ कि उसकी क्या गलती है? काश तू थोड़ा समझदार होता।’कह कर माँ उठ कर खाना बनाने चल देती।

हम दोनों साथ में बातें भी कर रहे होते।मैं मजाक करते हुए बोलता- सच में माँ, तुम तो गरम स्त्री हो।वो पहले तो कुछ समझ नहीं पाती, फिर जब उसकी समझ में आता कि मैं आयरन-इस्तरी न कह के, उसे स्त्री कह रहा हूँ तो वो हंसनेलगती और कहती- हाँ, मैं गर्म इस्तरी हूँ।और अपना चेहरा आगे करके बोलती- देख कितना पसीना आ रहा है, मेरी गरमी दूर कर दे।‘मैं तुझे एक बात बोलूँ, तू गरम चीज मत खाया कर, ठंडी चीजें खाया कर।’‘अच्छा, कौन सी ठंडी चीजें मैं खाऊँ कि मेरी गरमी दूर हो जायेगी?’‘केले और बैंगन की सब्जियाँ खाया कर।’

इस पर माँ का चेहरा लाल हो जाता था और वो सिर झुका लेती और धीरे से बोलती- अरे केले और बैंगन की सब्जी तो मुझे भी अच्छीलगती है, पर कोई लाने वाला भी तो हो, तेरा बापू तो ये सब्जियाँ लाने से रहा, ना तो उसे केले पसंद हैं, ना ही उसे बैंगन।‘तू फिकर मत कर, मैं ला दूँगा तेरे लिये।’‘हाय, बड़ा अच्छा बेटा है, माँ का कितना ध्यान रखता है।’मैं खाना खत्म करते हुए बोलता- चल, अब खाना तो हो गया खत्म, तू भी जा के नहा ले और खाना खा ले।‘अरे नहीं, अभी तो तेरा बापू देशी चढ़ा कर आता होगा। उसको खिला दूँगी, तब खाऊँगी, तब तक नहा लूँ… तू जा और जाकर सो जा, कल नदी पर भी जाना है।’

मुझे भी ध्यान आ गया कि हाँ, कल तो नदी पर भी जाना है। मैं छत पर चला गया। गरमियों में हम तीनों लोग छत पर ही सोया करते थे। ठंडी ठंडी हवा बह रही थी, मैं बिस्तर पर लेट गया और अपने हाथों से लंड मसलते हुए माँ के खूबसूरत बदन के ख्यालों में खोया हुआ सपने देखने लगा और कल कैसे उसके बदन को ज्यादा से ज्यादा निहारुँगा, यह सोचता हुआ कब सो गया, मुझे पता हीनहीं लगा।कहानी जारी रहेगी।support@mohakkisse.com

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Dosto namaskar aapke liye main apni kahani ka 2nd part le kar hajir hun. Dosto ye kahani ” Train Me Liya Meri Maa Mera Lund” ka 2nd part hai.

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