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कमाल की हसीना हूँ मैं-23

शहनाज़ खान

23 Mar 2011 को प्रकाशित

कमाल की हसीना हूँ मैं-23
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मैं उत्तेजना में अपनी दोनों जाँघों को एक दूसरे से रगड़ रही थी और अपने दोनों हाथों से उन दोनों के तने हुए लौड़ों को अपनी मुठ्ठी में लेकर सहला रही थी। अब मुझे उन दोनों के चुदाई में देरी करने पर गुस्सा आ रहा था। मेरी चूत में मानो आग लगी हुई थी। मैं सिसकारियाँ ले रही थी।

मैं अपने निचले होंठों को दाँतों में दबा कर सिसकारियों को मुँह से बाहर निकलने से रोकती हुई जावेद को देख रही थी और आँखों ही आँखों में मानो कह रही थी कि “अब रहा नहीं जा रहा है। प्लीज़ इनको बोलो कि मुझे मसल-मसल कर रख दें।”

इस खेल में उन दोनों का भी मेरे जैसा ही हाल हो गया था। अब वो भी अपने अंदर उबल रहे लावा को मेरी चूत में डाल कर शाँत होना चाहते थे। उनके लौड़ों से प्री-कम टपक रहा था।

“अइयो जावेद ! तुम कुछ करता क्यों नहीं। तुम सारा सामान इस टेबल से हटाओ !” स्वामी ने जावेद को कहा।जावेद और रस्तोगी ने फ़टाफ़ट सेंटर टेबल से सारा सामान हटा कर उसे खाली कर दिया। स्वामी ने मुझे बाँहों में लेकर ऊपर कर दिया। मेरे पैर जमीन से ऊपर उठ गये। वो इतना ताकतवर था कि मुझे इस तरह उठाये हुए उसने टेबल का आधा चक्कर लगाया और जावेद के सामने पहुँच कर मुझे टेबल पर लिटा दिया। गिलास टॉप की सेंटर टेबल पर बैठते ही मेरा जिस्म ठंडे काँच को छूकर काँप उठा।

मुझे उसने सेंटर टेबल के ऊपर लिटा दिया। मैं इस तरह लेटी थी कि मेरी चूत जावेद के सामने थी। मेरा चेहरा दूसरी तरफ़ होने की वजह से मुझे पता नहीं चल पाया कि मुझे इस तरफ़ अपनी चूत को पराये मर्द के सामने खोल कर लेटे देख कर मेरे शौहर के चेहरे पर किस तरह के भाव थे।

उसने मेरे पैर फैला कर पंखे की तरफ़ उठा दिये। मेरी चूत उनके सामने खुली हुई थी। स्वामी ने मेरी चूत को सहलाना शुरू किया। दोनों अपने होंठों पर जीभ फिरा रहे थे।

“जावेद देखो! तुम्हारी बीवी को कितना मज़ा आ रहा है !” रस्तोगी ने मेरी चूत के अंदर अपनी उँगलियाँ डाल कर अंदर के चिपचिपे रस से लिसड़ी हुई उँगलियाँ जावेद को दिखाते हुए कहा।

फिर स्वामी मेरी चूत से चिपक गया और रस्तोगी मेरे मम्मों से। दोनों के मुँह मेरे गुप्ताँगों से इस तरह चिपके हुए थे मानो फ़ेविकोल से चिपका दिये हों। दोनों की जीभ और दाँतों ने इस हालत में अपने काम शुरू कर दिया था। मैं उत्तेजित हो कर अपनी टाँगों को फ़ेंक रही थी।

मैंने अपने बगल में बैठे जावेद की ओर देखा। जावेद अपनी पैंट के ऊपर से अपने लंड को हाथों से दबा रहा था। जावेद अपने सामने चल रहे सैक्स के खेल में डूबा हुआ था।

“आआऽऽऽऽहहऽऽऽ जावेदऽऽऽ ममऽऽऽऽ मुझे क्याऽऽऽ होता जा रहा है?” मैंने अपने सूखे होंठों पर ज़ुबान फिराई, मेरा जिस्म सैक्स की गर्मी से झुलस रहा है।

जावेद उठ कर मेरे पास आकर खड़ा हो गया। मैंने अपने हाथ बढ़ा कर उसके पैंट की ज़िप को नीचे करके, बाहर निकलने को छटपटा रहे उसके लंड को खींच कर बाहर निकाला और उसे अपने हाथों से सहलाने लगी।

रस्तोगी ने पल भर को मेरे निप्पल पर से अपना चेहरा उठाया और जावेद को देख कर मुस्कुरा दिया और वापस अपने काम में लग गया। मेरी लंबी रेशमी ज़ुल्फें जिन्हें मैंने जूड़े में बाँध रखा था, अब खुल कर बिखर गईं और जमीन पर फ़ैल गईं।

रस्तोगी अब मेरे निप्पल को छोड़ कर उठा और मेरे सिर के दूसरी तरफ़ आकर खड़ा हो गया। मेरी नजरें जावेद के लंड पर अटकी हुई थीं, इसलिये रस्तोगी ने मेरे सिर को पकड़ कर अपनी ओर घुमाया।

मैंने देखा कि मेरे चेहरे के पास उसका तना हुआ लंड झटके मार रहा था। उसके लंड से निकलने वाले प्री-कम की एक बूँद मेरे गाल पर आकर गिरी जिसके कारण मेरे और उसके बीच एक महीन रेशम की डोर से संबंध हो गया। उसके लंड से मेरे मुँह तक उसके प्री-कम की एक डोर चिपकी हुई थी।

उसने मेरे सिर को अपने हाथों से पकड़ कर कुछ ऊँचा किया। दोनों हाथों से वो मेरे सिर को पकड़ कर अपने लंड को मेरे होंठों पर फिराने लगा। मैंने अपने होंठ सख्ती से बंद कर रखे थे।

जितना वो देखने में भद्दा था उसका लंड भी उतना ही गंदा था। उसका लंड पतला और लंबा था। उसके लंड का शेप भी कुछ टेढ़ा था। उसमें से पेशाब की बदबू आ रही थी। साफ़-सफ़ाई का ध्यान नहीं रखता था। उसके लंड के चारों ओर फ़ैला घना जंगल भी गंदा दिख रहा था। लेकिन मैं आज इनके हाथों बेबस थी।

मुझे तो उनकी पसंद के अनुसार हरकतें करनी थी। मेरी पसंद नापसंद की किसी को परवाह नहीं थी। अगर मुझसे पूछा जाता तो ऐसे गंदों से अपने जिस्म को नुचवाने से अच्छा मैं किसी और के नीचे लेटना पसंद करती।

मैंने ना चाहते हुए भी अपने होंठों को खोला तो उसका लंड… जितना सा भी सुराख मिला उसमें रस्तोगी ने उसे ठेलना शुरू किया। मैंने अपने मुँह को पूरा खोल दिया तो उसका लंड मेरे मुँह के अंदर तक चला गया। मुझे एक जोर की उबकाई आई जिसे मैंने जैसे-तैसे जब्त किया।

रस्तोगी मेरे सिर को पकड़ कर अपने लंड को अंदर ठेलने लगा लेकिन उसका लंड आधा भी मेरे मुँह में नहीं घुस पाया और उसका लंड मेरे गले में जा कर फ़ंस गया। उसने और अंदर ठेलने की कोशिश की तो उसका लंड गले के छेद में फ़ंस गया।

मेरा दम घुटने लगा तो मैं छटपटाने लगी। मेरे छटपटाने से स्वामी के काम में रुकावट आ रही थी इसलिये वो मेरी चूत से अपना मुँह हटा कर रस्तोगी से लड़ने लगा।

“अबे इसे मार डालेगा क्या। तुझे क्या अभी तक किसी सी अपना लंड चुसवाना भी नहीं आया?” रस्तोगी अपने लंड को अब कुछ पीछे खींच कर मेरे मुँह में आगे-पीछे धक्के लगाने लगा। उसने मेरे सिर को सख्ती से अपने दोनों हाथों के बीच थाम रखा था।

जावेद मेरे पास खड़ा मुझे दूसरों से आगे-पीछे से इस्तेमाल किये जाते देख रहा था। उसका लंड बुरी तरह तना हुआ था। यहाँ तक कि स्वामी भी मेरी चूत को चूसना छोड़ कर मेरे और रस्तोगी के बीच लंड-चुसाई देख रहा था।

“योर वाईफ इज़ एक्सीलेंट! शी इज़ अ रियल सकर”, स्वामी ने जावेद को कहा।

“ऊऊऽऽऽहहऽऽऽ अन्ना! तुम ठीक ही कहता है… ये तो अपनी रेशमा को भी फ़ेल कर देगी लंड चूसने में।”

जावेद उनकी बातें सुनता हुआ हैरानी से मुझे देख रहा था। मैंने कभी इस तरह से अपने हसबैंड के लंड को भी नहीं चूसा था। ये तो उन दोनों ने मुझे इतनी स्ट्रॉन्ग शराब पिला कर मेरे नशे और जिस्म की गर्मी को इस कदर बढ़ा दिया था कि मैं अपने आप को किसी चीप रंडी जैसी हरकत करने से नहीं रोक पा रही थी।

स्वामी ने कुछ ही देर में रस्तोगी के पीछे आकर उसको मेरे सामने से खींच कर हटाया।

“रस्तोगी तुम इसको फ़क करो। इसकी कंट को रगड़-रगड़ कर चौड़ा कर दो। मैं तब तक इसके मुँह को अपने इस मिसाईल से चोदता हूँ।”ये कहकर स्वामी आ कर रस्तोगी की जगह खड़ा हो गया और उसकी तरह ही मेरे सिर को उठा कर उसने अपनी कमर को आगे किया जिससे मैं उसके लंड को अपने मुँह में ले सकूँ। उसका लंड एक दम कोयले सा काला था लेकिन वो इतना मोटा था कि पूरा मुँह खोलने के बाद भी उसके लंड के सामने का सुपाड़ा मुँह के अंदर नहीं जा पा रहा था।

उसने अपने लंड को आगे ठेला तो मुझे लगा कि मेरे होंठों के किनारे अब चिर जायेंगे। मैंने सिर हिला कर उसको अपनी बेबसी जताई। लेकिन वो मानने को तैयार नहीं था। उसने मेरे सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर एक जोर का धक्का मेरे मुँह में दिया और उसके लंड के आगे का टोपा मेरे मुँह में घुस गया।

मैं उस लंड के आगे वाले मोटे से गेंद को अपने मुँह में दाखिल होता देख कर घबरा गई। मुझे लगा कि अब मैं और नहीं बच सकती। पहाड़ की तरह दिखने वाला काला भुजंग मेरे ऊपर और नीचे के रास्तों को फाड़ कर रख देगा। मैं बड़ी मुश्किल से उसके लंड पर अपने मुँह को चला पा रही थी।

मैं तो अपने सिर आगे-पीछे क्या कर रही थी, स्वामी ही खुद मेरे सिर को अपने हाथों से पकड़ कर अपने लंड के आगे-पीछे कर रहा था। मेरे मुँह में स्वामी के लंड को दाखिल होता देख अब रस्तोगी मेरे पैरों के बीच आ गया था। उसने मेरी टाँगों को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और अपने लंड को मेरी चूत पर लगाया।

मैं उसके लंड की टिप को अपनी चूत की दोनों फाँकों के बीच महसूस कर रही थी। मैंने एक बार नजरें तिरछी करके जावेद को देखा।

कहानी जारी रहेगी।

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

राज कुमार 160

3 weeks ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

कुमार आरव

1 month ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

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