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Office Sex पठन समय: 10 मिनट पढ़ा गया: 1,022 बार

कमाल की हसीना हूँ मैं-26

शहनाज़ खान

22 Nov 2022 को प्रकाशित

कमाल की हसीना हूँ मैं-26
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मेरा सिर नशे में बुरी तरह झूम रहा था और दिमाग पर नशे की जैसे एक धुँध सी छाई हुई थी।

रस्तोगी के वीर्य ने अब चेहरे पर और मम्मों पर सूख कर पपड़ी का रूप ले लिये था। मैं कुछ देर तक यूँ ही स्वामी के लंड पर बैठी अपनी उखड़ी हुई साँसों और अपने नशे को काबू में करने की कोशिश करने लगी तो पीछे से मेरी दोनों बगलों के नीचे से रस्तोगी ने अपने हाथ डाल कर मेरे जिस्म को जकड़ लिया और उसे ऊपर नीचे करना शुरू किया।

धीरे-धीरे मैं खुद ही अपनी कमर को उसके लंड पर हिलाने लगी। अब दर्द कुछ कम हो गया था। अब मैं तेजी से स्वामी के लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी।

अचानक स्वामी ने मेरे दोनों निप्पलों को अपनी मुठ्ठियों में भर कर अपनी ओर खींचा। मैं उसके खींचने के कारण उसके ऊपर झुकते-झुकते लेट ही गई। उसने अब मुझे अपनी बाँहों में जकड़ कर अपने सीने पर दाब लिया। मेरे मम्मे उसके सीने में पिसे जा रहे थे।

तभी पीछे से किसी की उँगलियों की छुअन मेरे नितंबों के ऊपर हुई। मैं उसे देखने के लिये अपने सिर को पीछे की ओर मोड़ना चाहती थी लेकिन मेरी हरकत को भाँप कर स्वामी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये और मेरे निचले होंठ को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा।

मैंने महसूस किया कि वो हाथ रस्तोगी का था। रस्तोगी मेरे माँसल चूतड़ों को अपने हाथ से सहला रहा था। कुछ ही देर में उसकी उँगलियाँ सरकती हुई मेरी चूत पर धोंकनी की तरह चल रहे स्वामी के लंड के पास पहुँच गईं।

वो अपनी उँगलियाँ को मेरी चूत से उफ़नते हुए रस से गीला कर मेरी गाँड के छेद पर फ़ेरने लगा। मैं उसकी नियत समझ कर छूटने के लिये छटपटाने लगी मगर स्वामी ने मुझे जोंक की तरह जकड़ रखा था। उन साँडों से मुझ जैसी नशे में धुत्त नाज़ुक कली कितनी देर लड़ सकती थी। मैंने कुछ ही देर में थक कर अपने जिस्म को ढीला छोड़ प्रिया।

रस्तोगी की पहले एक ऊँगुली मेरी गाँड के अंदर घुस कर काम रस से गीला करने लगी मगर जल्दी ही वो दो-तीन उँगलियाँ मेरी गाँड में ठूँसने लगा। मैं हर हमले पर अपनी कमर को उछाल देती मगर उस पर कोई असर नहीं होता।

कुछ ही देर में मेरी गाँड को अच्छी तरह चूत के रस से गीला कर के रस्तोगी ने अपने लंड को वहाँ सटाया। स्वामी ने अपने दोनों हाथों से मेरे दोनों चूतड़ों को अलग करके रस्तोगी के लिये काम आसान कर प्रिया। पर मैंने पहले कभी गाँड चुदाई नहीं की थी, इसलिये घबराहट से मेरा दिल बैठने लगा।

रस्तोगी ने एक जोर के धक्के से अपने लंड को मेरी गाँड में घुसाने की कोशिश की मगर उसका लंड आधा इंच भी अंदर नहीं जा पाया। मैं दर्द से छटपटा उठी। रस्तोगी ने अब अपनी दो उँगलियाँ से मेरी गाँड के छेद को फैला कर अपने लंड को उसमें ठूँसने की कोशिश की मगर इस बार भी उसका लंड रास्ता नहीं बना सका।

इस नाकामयाबी से रस्तोगी झुँझला उठा। उसने लगभग चीखते हुए जावेद से कहा, “क्या टुकर-टुकर देख रहा है… जा जल्दी से कोई क्रीम ले कर आ। लगता है तूने आज तक तेरी बीवी की ये वाली सील नहीं तोड़ी। मैं तो इसकी गाँड सूखी ही मारना चाहता था पर साली बहुत टाईट है। मेरे लंड को पीस कर रख देगी।” रस्तोगी उत्तेजना में गंदी-गंदी बातें बड़बड़ा रहा था।

जावेद ने पास के ड्रैसिंग टेबल से कोल्ड क्रीम की डिब्बी लाकर रस्तोगी को दी। रस्तोगी ने अपनी उँगली से लगभग आधी शीशी क्रीम निकाल कर मेरे गाँड के छेद पर लगाई। फिर वो अपनी उँगलियों से अंदर तक अच्छे से चिकना करने लगा। कुछ क्रीम उठा कर अपने लंड पर भी लगाई।

इस बार जब उसने मेरी गाँड के छेद पर अपने लंड को रख कर धक्का प्रिया तो उसका लंड मेरी गाँड के छेद को फ़ाड़ता हुआ अंदर घुस गया। दर्द से मेरा जिस्म ऐंठने लगा। ऐसा लगा मानो कोई एक मोटी सलाख मेरी गाँड में डाल दी हो।

“आआहआऽऽऽ ऊऊईऊऊऽऽऽ ओहहऽऽऽ.. आआऽऽऽऽ.. ईईयऽऽऽऽ ममऽऽऽमाँऽऽऽ !” मैं दर्द से छटपटा रही थी।

दो-तीन धक्के में ही उसका पूरा लंड मेरे पिछले छेद से अंदर घुस गया। जब तक उसका पूरा लंड मेरे शरीर में दाखिल नहीं हो गया तब तक स्वामी ने अपने धक्के बंद रखे और मेरे जिस्म को बुरी तरह अपने सीने पर जकड़ कर रखा था।

मुझे लगा कि मेरा शरीर सुन्न होता जा रहा है। लेकिन कुछ ही देर में वापस दर्द की तेज़ लहर ने पूरे जिस्म को जकड़ लिया। अब दोनों ने धक्के मारने शुरू कर दिये। हर धक्के के साथ मैं कसमसा उठती। दोनों के बड़े-बड़े लंड, ऐसा लग रहा था कि मेरे पेट की सारी अंतड़ियों को तोड़ कर रख देंगे।

मैं काफी देर तक स्वामी के जिस्म पर ही पसरी रही। उसका लंड नरम हो कर मेरी चूत से निकल चुका था। लेकिन मुझ में अब बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी। मुझे स्वामी ने अपने ऊपर से हटाया और अपनी बगल में लिटा लिया।

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मेरी आँखें बंद होती चली गई। मैं थकान और नशे से नींद के आगोश में चली गई। उसके बाद भी रात भर मेरे तीनों छेदों को आराम नहीं करने प्रिया गया। मुझे कई बार कई तरह से उन दोनों ने चोदा। मगर मैं नशे में चूर होकर बेसुध ही रही।

एक दो बार दर्द से मेरी खुमारी जरूर टूटी लेकिन अगले ही पल वापस मैं नशे में बेसुध हो जाती। दोनों रात भर मेरे जिस्म को नोचते रहे। मेरे अंग-अंग को उन्होंने चोदा। मेरे मम्मों, बगलों और यहाँ तक कि मेरे पैरों और सैंडलों के बीच में भी अपने लौड़ों से रगड़ कर मुझे चोदा।

सुबह दोनों कपड़े पहन कर वापस चले गये। जावेद उन्हें होटल पर छोड़ आया। मैं उसी तरह बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी हुई थी।

सुबह ग्यारह बजे के आस पास मुझे थोड़ा होश आया तो जावेद को मैंने अपने पास बैठे हुए पाया। उसने सहारा देकर मुझे उठाया और मेरे सैंडल उतार कर मुझे बाथरूम तक पहुँचाया। मेरे पैर बुरी तरह काँप रहे थे। बाथरूम में शॉवर के नीचे मैं लगभग पंद्रह मिनट तक बैठी रही।

मैं एक लेडी डॉक्टर के पास भी हो आई। लेडी डॉक्टर मेरी हालत देख कर समझी कि मेरे साथ कोई जबर चोदन जैसा हादसा हुआ है।

मैंने भी उसे अपने विश्वास में लेते हुए कहा, “कल घर पर हसबैंड नहीं थे। चार आदमी जबरदस्ती घुस आये थे और उन्होंने मेरे साथ रात भर चोदन किया।”

लेडी डॉक्टर ने पूछा कि मैंने पुलिस में एफ़-आई-आर दर्ज़ करवाई या नहीं तो मैंने उसको कहा, “मैं इस घटना का जिक्र करके बदनाम नहीं होना चाहती। मैंने अंधेरे में उनके चेहरे तो देखे नहीं थे तो फिर कैसे पहचानूँगी उन्हें… इसलिये आप भी इसका जिक्र किसी से ना करें।”

डॉक्टर मेरी बातों से सहमत हो गई मेरा मुआयना करके कुछ दवाइयाँ लिख दीं। मुझे पूरी तरह नॉर्मल होने में कई दिन लग गये। मेरे मम्मों पर दाँतों के काले-काले धब्बे तो महीने भर तक नज़र आते रहे।

जावेद का काम हो गया था। उनके इलाईट कंपनी से वापस अच्छे संबंध हो गये। जावेद ने जब तक मैं बिल्कुल ठीक नहीं हो गई, तब तक मुझे पलकों पर बिठाये रखा। मुझे दो दिनों तक तो बिस्तर से ही उठने नहीं प्रिया। उसके मन में एक गिल्टी फ़ीलिंग तो थी ही कि मेरी इस हालत की वजह वो और उनका बिज़नेस है।

कुछ ही दिनों में एक बहुत बड़ा कांट्रेक्ट हाथ लगा। उसके लिये जावेद को अमेरिका जाना पड़ा। वहाँ कस्टमर्स के साथ डीलिंग्स तय करनी थी और नये कस्टमर्स भी तलाश करने थे। उसे वहाँ करीब छः महीने लगने थे।

मैंने इस दौरान उनके पेरेंट्स के साथ रहने की इच्छा ज़ाहिर की। मैं अब मिस्टर ताहिर अज़ीज़ खान के बेटे की बीवी बन चुकी थी, मगर अभी भी जब मैं उनके साथ अकेली होती तो मेरा मन मचलने लगता। मेरे जिस्म में एक सिहरन सी दौड़ने लगती। कहावत ही है कि लड़कियाँ अपनी पहली मुहब्बत कभी नहीं भूल पातीं।

ताहिर अज़ीज़ खान जी के ऑफिस में मेरी जगह अब उन्होंने एक 45 साल की औरत, ज़ीनत को रख लिया था। वो नाम के हिसाब से बिल्कुल उलट, मोटी और काली सी थी। वो अब अब्बू की सेक्रेटरी थी।

मैंने एक बार अब्बू को छेड़ते हुए कहा था, “क्या पूरी दुनिया में कोई ढंग की सेक्रेटरी आपको नहीं मिली?”

तो उन्होंने हँस कर मेरी ओर देखते हुए एक आँख दबा कर कहा, “यही सही है। तुम्हारी जगह कोई दूसरी ले भी नहीं सकती और बाय द वे… मेरा और कोई कुँवारा बेटा भी तो नहीं बचा ना।”

अभी दो महीने ही हुए थे कि मैंने ताहिर अज़ीज़ खान जी को कुछ परेशान देखा।

कहानी जारी रहेगी।

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कमाल की हसीना हूँ मैं

कुल भाग: 46
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भाग 2
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भाग 3
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भाग 4
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भाग 5
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भाग 6
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भाग 7
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भाग 8
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भाग 9
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भाग 10
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भाग 11
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भाग 12
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भाग 13
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भाग 14
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भाग 15
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भाग 16
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भाग 17
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भाग 18
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भाग 19
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भाग 20
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भाग 21
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भाग 22
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भाग 23
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भाग 24
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भाग 25
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भाग 26
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भाग 27
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भाग 28
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भाग 29
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भाग 30
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भाग 31
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भाग 32
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भाग 33
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भाग 34
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भाग 35
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भाग 36
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भाग 37
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भाग 42
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भाग 45
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भाग 46
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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां

रोहित राज

2 months ago

सच में बहुत ही हॉट और उत्तेजक कहानी है भाई। मजा आ गया पढ़कर।

राणा राजपूत

2 months ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

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