इमरान ओवैश
सत्यापित कहानीकार (Verified)@imarana-ovasha
18+ कामुक और रोमांस हिंदी कहानियों के आधिकारिक लेखक।
इमरान ओवैश की रचनाएं
शीला का शील-7
कुछ देर बाद जब रंजना अंदर आई तब हमारा ध्यान भंग हुआ। वह दो गिलास दूध लिये थी जो उसने हम दोनों को ही पिलाया।फिर सोनू को अपनी सफाई की ताकीद करके मेरी सफाई की और उस दिन यह सिलसिला वहीं ख़त्म हुआ।
शीला का शील-6
पांच मिनट बाद वह आया और मेरे पास बैठ गया- सॉरी दीदी, शायद मैं ही अनाड़ी हूँ, आप तो लड़की हो, मुझे ही सही से हैंडल करना चाहिए था।‘तो अब कैसे हैंडल करोगे?’ मैंने मुस्कराते हुए कहा।
शीला का शील-5
मैं यह नहीं कह सकती कि मैंने कभी लिंग देखा नहीं था, चाचा का देखा था, उतना बड़ा तो नहीं पर फिर भी बड़ा था… सात इंच तक तो ज़रूर था और वैसे ही मोटा भी।
शीला का शील-4
शीला का दरवाज़ा अभी भी बंद था… उसने शीला को पुकारते हुए दरवाज़ा खटखटाया। दो तीन बार खटखटाने के बाद दरवाज़ा खुला।सामने शीला लाल आँखें लिए खड़ी थी… देख कर ही अंदाज़ा होता था कि रो रही थी।
शीला का शील-1
उसका नाम शीला था।वही सांवली सी आम लड़की जिसका ज़िक्र मैंनेवो सात दिन कैसे बीतेमें किया था।
वो सात दिन कैसे बीते-8
अगले दिन शुक्रवार था और आज भी उसकी क्लास थी जिससे वह साढ़े बारह बजे फारिग हुई। मैंने उसे यूनिवर्सिटी से पिक किया और पहले ही साहू के पीछे जाकर पेट पूजा कर ली।
वो सात दिन कैसे बीते-5
गौसिया को हस्तमैथुन सिखाते हुए मैंने अपने मुख में ढेर सी लार बनाई और उसके सीधे हाथ की उँगलियों को अपने मुख में ले उन्हें लार से गीला किया- वहाँ सूखी उँगलियों से जल्दी ही जलन होने लगती है इसलिए हमेशा ध्यान रखना कि चिकनाई ज़रूरी है।मैंने उसे चेताते ह...
वो सात दिन कैसे बीते-4
गौसिया स्खलित होने के बाद सनसनाते दिमाग के साथ बेजान सी पड़ गई जैसे बेहोश हो गई हो। मैं भी थक गया था तो मैं भ उसकी बगल में लेट कर अपनी साँसें दुरुस्त करने लगा।
वो सात दिन कैसे बीते-3
मैंने उसके घुटने मोड़ कर दोनों जांघों को फैलाया कि वो बंद पड़ी गहरे रंग की लकीर खुल गई, एकदम सुर्ख सा अंदरूनी भाग मेरे सामने आ गया।
वो सात दिन कैसे बीते-2
मेरे पड़ोस की पर्दानशीं लड़की ने मुझ पर भरोसा करके मुझे मिलने के लिये बुलाया।
वो सात दिन कैसे बीते-1
साल भर हो गया शायद, मेरी अंतिम कहानी को छपे…ऐसा नहीं है कि इस बीच ऐसा कुछ हुआ नहीं जो लिखने के काबिल हो मगर कुछ व्यस्तता रही और कुछ लिखने का मन भी नहीं हुआ…