दोस्तो! मैं राजवीर, पंजाब से. आप सब ने मेरी कहानीहसीन गुनाह की लज़्ज़तपढ़ी और सराही इस के लिए मैं शुक्रगुज़ार हूँ.ढेरों मेल आये जिन में मेरी रचना की, मेरी अर्चनाशक्ति की ढेरों तारीफ़ की गयी.
लेकिन दोस्तो, इस सिलसिले में आई एक मेल बहुत दिलचस्प और ज़िक्र के काबिल है. मेल आयी तो किसी महिला के नाम की आईडी से थी पर मैं शपथपूर्वक नहीं कह सकता कि लिखने वाली भी, सच में कोई महिला ही है.बहरहाल! बात मेल की हो रही थी. उस मेल में लिखने वाले/वाली ने मुझे चैलेंज के साथ हूल दी कि मैंने अपनी जिंदगी में घटी एक सच्ची घटना को मिर्च-मसाला लगा के पाठकों को पेश कर प्रिया. चूँकि ऐसी घटना मेरे जीवन एक बार ही घटी, इसी कारण एक प्रस्तुति के बाद मेरी लेखनी बाँझ हो गयी और अगर मेरी लेखनी में दम है तो मैं दोबारा ऐसी ही कोई और कालजयी रचना रच कर दिखाऊं.
अब और क्या बताऊं दोस्तों! लिखना कोई ऐसी मशीनी प्रक्रिया तो है नहीं कि जब भी बटन दबाओ और उत्पादन शुरू. कहानी तो अंतर्मन से उठती है और ऐसा कभी-कभार ही होता है लेकिन जब भी ऐसा होता है तो शब्द खुद-ब-खुद लय में आते जाते हैं और कागज़ पर उतरते जाते हैं.
पर हर कहानी क्या सच में सिर्फ़ कहानी ही होती है? मेरा तो ख्याल है कि बिल्कुल नहीं… खैर! यह वार्ता फिर कभी… अब वापिस आते है अपनी कहानी पर!
जिन पाठकों ने मेरी पिछली कहानी ‘हसीन गुनाह की लज़्ज़त’ नहीं पढ़ी है मैं उन पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि इस रचना का संपूर्ण आनन्द लेने के लिए पहले आप मेरी पिछली कहानी पढ़ लें. यूं दोनों कहानियाँ अपने आप में सम्पूर्ण हैं.उस कहानी में आपने पढ़ा था कि कैसे मेरी साली की युवा बेटी हमारे साथ रहने आई और कैसे मेरे और उसके बीच सेक्स सम्बन्ध पल्लवित हुए!
दिया के और मेरे उस रात के सपने जैसे प्रेमालाप के बाद हमें दोबारा कोई ऐसा मौका ही नहीं मिला और सच मानिये कि मैंने दोबारा ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की.दिया के मन की तो दिया ही जाने लेकिन मैं भली-भांति जानता हूँ कि असली ख़ुशी ऐसे शाश्वत आनन्ददायक पलों को याद करने में ही होती है और अगर कोई उन सपनीले क्षणों को ज़बरदस्ती दोहराना चाहे तो गहरी मायूसी ही हाथ लगती है.
यूँ भी एक अकथनीय सा अपराधबोध मेरे मन में था. मैं तो दिया से आँख मिलाने में भी झिझकने लगा था. वैसे भी उस रात के बाद, दिया का और हमारे परिवार का साथ भी थोड़ा ही रहा. कुछ दिनों बाद दिया के कॉलेज खुल गए और दिया को हॉस्टल भी मिल गया, तो दिया हमारे घर से चली गयी.
कालान्तर में दिया कभी-कभार आ भी जाती थी मिलने लेकिन वो मिलना एक-आध घंटे का ही होता था जिस में सारा परिवार शामिल रहता. कोई किसी किस्म की शरारत नहीं, कोई चुहलबाज़ी नहीं. कभी कभी मेरी और दिया की नज़र मिल भी जाती तो क्षण भर के लिए… दिया की कजरारी आँखों में एक बिल्लौरी चमक और होंठों पर एक गुप्त सी ‘मोनालिसा मुस्कान’ आ कर गुम हो जाती जिसे सिर्फ मैं ही भांप पाता.दिया जैसी प्रियतमा से प्रेमालाप जैसे जैकपॉट जिंदगी में एक आध बार ही लगते हैं, यह सच्चाई मैं जानता था.
इधर मेरी अपनी वैवाहिक सैक्स-लाइफ बहुत बढ़िया थी! तो मुझे भी जिंदगी से कोई ख़ास शिक़वा नहीं था. लेकिन कभी कभी अनाम सा एक ख़ालीपन महसूस होता था. एक अरमान… दिल में कभी कभार तरंग के रूप में उठता था कि काश! मैं दिन के उजाले में या रात को लाइट जला कर दिया के सम्पूर्ण हुस्न को अपनी आँखों से चूम पाता… एक बार… बस! सिर्फ एक बार… प्रेमालाप के दौरान दोनों के जिस्मों की हर हरकत पर दिया की आँखों के भाव देख पाता, उसके बाद चाहे कयामत भी आ जाती तो मुझे रश्क़ ना होता.
लेकिन फिर वही ‘If the wishes were horses… beggars would ride!’तो मैं दिल के अरमान दिल में ही दबा लेता.
जिंदगी अपने ढर्रे पर चल रही थी. दिया ने M. Com कर ली और अपने घर लौट गयी. दिया के घर का माहौल बड़ा दकियानूसी सा था, अजीब ज़ाहिल लोग थे, औरतों को किसी प्रकार की आज़ादी नहीं थी. यहाँ तक कि लड़की घर से बाहर निकले तो परिवार का कोई ना कोई सदस्य साथ होना चाहिए.घर का छोड़िये… पूरे क़स्बे का माहौल भी सौ साल पुराना था.
पहले की बात और थी… लेकिन अब दिया दो साल बड़े शहर में रह कर, बड़े शहर की आज़ादी के रंग ढंग देख कर वापिस गयी थी तो… उस का ऐसी बंदिशों से ऊबना स्वाभाविक ही था. नतीज़न! घर में हल्की-फ़ुल्की बहस बाज़ी और छिट-पुट नाराज़गी के दौर शुरू हो गए थे.पता लगता था तो सुन कर कोफ़्त तो बहुत होती थी लेकिन हम क्या कर सकते थे. आँखिर यह उनके घर का अंदरूनी मसला था. फिर भी, सुन कर दुःख तो होता ही था.
दिया के घर वापिस लौट जाने के कोई तीन महीने बाद सुधा से उसकी बहन यानि दिया की मां ने फ़ोन पर सुधा को उनके यहाँ आने को कहा, कोई दिया की शादी-ब्याह का मसला था. आते इतवार, मैं और सुधा दोनों दिया के घर गए.हम से दिया के सब घरवाले बहुत खुल कर मिले, ख़ास तौर पर दिया.
मैंने नोट किया कि दिया का इकहरा शरीर आकर्षक रूप से थोड़ा भर गया था, वक्ष थोड़े ज्यादा सख़्त और ज्यादा उभर आये थे, फ़िगर भी शायद 34-26-34 हो चला था. काली आँखों में चमक और बढ़ गयी थी, प्राकृतिक रूप से गहन गुलाबी होंठ थोड़े और भर गए थे जिस से होंठों का कटाव और कातिल हो गया था. सर के गहरे भूरे बाल ज्यादा सिल्की हो गए थे, साफ़ गेहुंए रंग के जिस्म की रंगत में एक चमक थी और कदम धरते वक़्त पुष्ट जांघों और ठोस नितम्बों में हलकी सी हिलोर उठती थी.
कुदरत ने क़ातिल को तमाम हथियारों से नवाज़ प्रिया था और किसी ना किसी पर कयामत बरपा हो के रहनी ही थी.
हमारे घर में रहते या कभी हॉस्टल में रहते वक़्त जब दिया हमारे घर आती तो ‘मौसा जी! नमस्ते’ कह कर ही इतिश्री कर देती थी लेकिन उस दिन अपने घर में तो दिया ‘मौसा जी!’ कह कर मुझ से ज़ोर से लिपट कर मिली. होंठों से होंठ सिर्फ दो इंच दूर थे और बाकी सारा शरीर एक दूसरे से मिला हुआ. मेरी बायाँ हाथ दिया की पीठ पर ठीक ब्रा की पट्टी के ऊपर और दिया के दोनों हाथ मेरी पीठ पर… दिया का दायाँ उरोज़ मेरी छाती में इतनी ज़ोर से गड़ा हुआ था कि मैं स्पष्ट रूप से अपनी छाती पर दिया के उरोज़ का सख़्त निप्पल महसूस कर सकता था, दिया की दायीं जांघ मेरी दोनों टांगों के बीच थी और चूंकि मैं दिया से लंबा था फलस्वरूप मेरा लिंग दिया की नाभि की बगल में लग रहा था और मुझे ऐसा लगा कि दिया जानबूझ कर अपने पेट से मेरे लिंग को दबाया भी.एक क्षण में मेरे लिंग में ज़बरदस्त तनाव आ गया और मुझे लगा कि दिया ने मेरी पीठ पर एक जोर से चिकोटी भी काटी थी शायद!
अलग होते वक़्त दिया ने कपड़ों के ऊपर से ही अपने बाएं हाथ से मेरे लिंग को भी टटोला. यह सब कुछ क्षण भर में, सब घर वालों के सामने ही हुआ और किसी को भनक तक नहीं लगी. अलग होते वक़्त दिया की आँखों में वही बिल्लौरी चमक और होठों पर वही कातिल मुस्कान थी.मैं थोड़ा बदहवास सा हो चला था… मुझे दिया से ऐसी दीदा-दिलेरी की उम्मीद हरगिज़ ना थी. कस्बई लड़की शहर में रह कर सयानी हो चली थी.
मामला यह था कि दिया के माँ-बाप ने दिया के लिए एक लड़का भी देख रखा था जो आस्ट्रेलिया में था लेकिन दिया जिद वश हाँ नहीं कह रही थी. मेरी और सुधा की दिया को समझाने की लम्बी कोशिश (जिस में असली मुद्दा तो यह था कि आस्ट्रेलिया जा कर दिया अपने मां-बाप की दकियानूसी रोक-टोक से आज़ाद रहेगी और कुछ अपना अपने तौर पर कर पाएगी.) के बाद दिया ने अपने माँ-बाप को उस रिश्ते के लिए हाँ कह दी.
मौसी की देवरानी का मचलता बदन
शाम को वापिसी में और घर आ कर भी मैं कुछ अजीब सा खालीपन महसूस कर रहा था.‘दिया की शादी हो जायेगी… दिया ऑस्ट्रेलिया चली जायेगी… फिर जाने दिया से मुलाक़ात कब होगी… होगी भी या नहीं… पता नहीं? वक़्त के साथ दिया की प्राथमिकतायें बदल जायेंगी और वो परी कथाओं जैसा हमारा मिलन भूली-बिसरी बात हो जायेगी. ओ भगवान! यह कहाँ ला कर पटका मुझे?’मुझे, मेरे जानने वाले बहुत ही प्रैक्टिकल सोच वाला व्यक्ति मानते हैं लेकिन यह सोच तो हरगिज़ प्रैक्टिकल ना थी.
जैसे-तैसे खुद को संभाला मैंने… दुनियावी तौर पर दिया पर मेरा किसी किस्म का कोई हक़ ही नहीं बनता था और सब से बड़ी बात यह थी कि मुझे अपना परिवार, अपनी बीवी जान से ज्यादा प्यारे थे. पर मन पर किस का ज़ोर चलता है.
अगले दिन शाम को जब मैं ऑफिस से घर आया तो देखा कि दिया की माँ और दिया के पिता यानि मेरी साली और साढू भाई घर आये बैठे थे. पूछने पर बताया कि आस्ट्रेलिया वाले लड़के ने आगामी नवंबर में आना है और दिया की शादी नवंबर में ही होगी.लेकिन लड़के ने कहा है कि दिया को बेसिक कम्प्यूटर कोर्स और अगर हो सके तो C++ का डिप्लोमा जरूर करवा दें. अब उन लोगों का कम्प्यूटर से खुद का नाता तो ईंट और कुत्ते वाला ही था तो वो लोग मेरी शरण में आये थे.
यह सब तो मेरे लिए चुटकी बजाने जैसा आसान काम था क्योंकि शहर के 80% कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट मुझ से जुड़े थे. अभी तो अगस्त चढ़ा ही था सो इस फ्रंट पर तो कोई दिक्क़त नहीं थी.उन का इरादा यह था कि दिया मेरे सुझाये किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में 2-3 घंटे की क्लास अटेण्ड करे और रोज़ घर वापिस लौट जाए पर मैंने उन लोगों को ऐसा समझाया कि C++ लैंग्वेज़ सीखने में बहुत मेहनत और समय चाहिए और समय ही हमारे पास कम है तो अच्छा रहेगा कि दिया रोज़ घर आने जाने के चक्कर में ना पड़ कर 3 महीने यहीं शहर में रहे और सीखे.
मुझे पता था कि आम तौर पर कम्प्यूटर इंस्टिट्यूटस का अपना कोई हॉस्टल नहीं होता सो इस नेक काम के लिए मेरा घर तो था ही!
थोड़ी ना-नुकर के बाद दिया के मां-बाप ने इस के लिए हाँ कर दी.‘दिया आने वाले 3 महीने हमारे घर में रहने वाली है.’ सोच कर ही मेरे लिंग में तनाव आ गया.
अगले ही दिन मैंने एक बहुत नामी कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट के मालिक से बात पक्की की जिसने एक-आध दिन पहले ही सुबह 10 से 2 टाइमिंग का नया बैच शुरू किया था और उसी शाम को थोड़ा अँधेरा हुये मैं अपनी कार पर दिया को लेने दिया के घर जा पहुंचा. चूंकि सुधा ने सब कुछ पहले से ही फ़ोन पर तय कर रखा था तो दिया पहले से ही तैयार थी.
दिया मोरपंखिया कुर्ते और काली लैगी में कहर ढा रही थी. प्राकृतिक तौर पर लाल होठों पर दिलक़श मुस्कान, बिना दुपट्टे का उन्नत वक्ष, पतला कटि-प्रदेश, सपाट पेट, अर्ध-गोलाई लिए कसे हुये नितम्ब, पुष्ट जाँघें, पारे से थिरकते जिस्म का एक-एक कटाव नुमाया हो रहा था.
दिया को इस रूप में देख कर उत्तेजना से मेरा बुरा हाल था.पाठकगण! वैसे तो यह कोई ऐसा छुपा राज़ नहीं… लेकिन फिर भी बता देता हूँ कि इन जनाना लैगियों में नाड़ा नहीं होता, इलास्टिक होता है जिस कारण जल्दी से लैगी उतारना और पहनना बहुत सुविधाजनक होता है और गाहे-बगाहे हाथ अंदर सरका कर स्त्री की योनि से खेलने और भगनासा सहलाने में बहुत सुविधा रहती है.
जल्दी से चाय आदि पी कर मैंने दिया को ले कर वापस कार मोड़ी. आने वाले आधा-पौना घण्टा कार में मैं और दिया बिलकुल अकेले होंगे, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. उत्कंठा के मारे मेरा गला सूख रहा था. क्या करूंगा मैं…??? क्या मैं और दिया कार की पिछली सीट पर ही रति-रमण करेंगे या मैं दिया को अपनी लैगी और पैंटी नीचे कर के अपनी ओर दिया का मुंह कर के अपनी गोद बिठा कर ऊपर से दिया के गुलाबी होठों का रस चूसूंगा और नीचे से मेरा लिंग दिया का योनि-भेदन करेगा?
‘ना ना! हट… छिः छिः! यह कैसी छिछोरी सोच…?? यह तो वासना है… निकृष्टतम वासना… विकृत वासना का घिनौना रूप…!’ मेरे सोये आलोक ने वापिस अंगड़ाई ली.
‘मैं तो दिया से प्यार करता हूँ… चाहे मुझे हक़ नहीं है ऐसा करने का, लेकिन करता हूँ. अपनी प्रियतमा से ऐसे पशुवत व्यवहार की अर्चना भी अपराध है!!! थू… थू… थू!!!’मैं थोड़ा सयंत हुआ और कार के शीशे चढ़ा कर मैंने कार मंथर गति से आगे बढ़ाई।
क़स्बे की हद से निकलते ही मैंने हिम्मत कर के अपना बायाँ हाथ गियर रॉड से उठा कर दिया के दायें हाथ पर रखा प्रिया। तत्काल एक लहर सी दिया के रोम रोम से गुज़र गयी जिसे मैंने स्पष्ट महसूस किया. दिया ने मेरे हाथ में अपने हाथ की उंगलियाँ कस कर पिरो दी. मैंने एक पल के लिए दिया की ओर देखा। सामने से आते किसी वाहन की हैडलाईट के नीम उजाले में दिया की कजरारी आँखों में वही बिल्लौरी चमक और गुलाबी होंठों पर वही जानी-पहचानी मोनालिसा मुस्कान दिखी।
हम दोनों एक दूसरे से कुछ बोल तो नहीं रहे थे लेकिन मौन सम्प्रेषण चालू था. दिया के शरीर में रह रह कर उत्तेज़ना की तरंग उठ रहीं थी जिन के फलस्वरूप दिया का हाथ मेरे हाथ पर कस कस जाता था जिन्हें मैं स्पष्ट महसूस कर रहा था. मैं निःसंदेह जन्नत में था.
कहानी जारी रहेगीsupport@mohakkisse.com
सेक्सी कहानी का अगला भाग :स्त्री-मन… एक पहेली-2