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रिश्तों में चुदाई • पठन समय: 14 मिनट • पढ़ा गया: 741 बार

स्त्री-मन… एक पहेली-4

राज वीर मिड्ढा

27 Jul 2013 को प्रकाशित

स्त्री-मन… एक पहेली-4
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मेरी साली की जवान बेटी के साथ सेक्स की कामुकता भरी कहानी के पिछले भागस्त्री-मन… एक पहेली-3में आपने पढ़ा कि दिया मेरे घर में मेरे साथ अकेली है, रात हो चुकी है, वो मेरे बेडरूम में मेरे बेड पर है.

मैंने उसकी टीशर्ट में अपना हाथ सरका प्रिया और इसके साथ ही दिया की टीशर्ट थोड़ी और ऊपर को ख़िसक गयी; तत्काल दिया के सारे शरीर में एक कंपकंपी सी हुई और दिया ने अपना दायाँ हाथ उठा कर मेरी गर्दन के नीचे से निकाल कर मुझे खींच कर अपने साथ लगा लिया.

अब मेरे दायें हाथ की उंगलियाँ दिया के सपाट पेट पर ब्रा की निचली रीमा से ले कर कैपरी के ऊपरी इलास्टिक की रीमा तक ऊपर-नीचे, दाएं बाएं हरकत करने लगी. मैं जानबूझ कर ना तो दिया के वक्ष को अभी सीधे हाथ लगा रहा था और ना ही उसकी योनि को!पेट पर ऊपर की ओर गर्दिश करती मेरी उंगलियाँ ब्रा की निचली पट्टी को छूते ही और ऊपर को जाने की जगह दायें बायें बग़ल की ओर मुड़ जाती थी, ऐसा ही नीचे की ओर उँगलियों की गर्दिश करते वक़्त दिया की कैपरी के ऊपरी इलास्टिक को छूते ही और नीचे जाने की बजाए पेट पर ही इधर उधर हो जाती थी.

अचानक मैंने गौर किया कि दिया की काँखें एकदम रोमविहीन हैं, वहाँ एक भी बाल नहीं था और बग़लों के नीचे की त्वचा एकदम नरम और मुलायम थी.“ऐसी ही बालों से रहित, रोमविहीन दिया की मनमोहक और कोमल योनि भी होगी…” ऐसा सोचते ही मुझ में तीव्र उत्तेज़ना की लहर उठी.

ऊपर मैंने दिया के दायें कान की लौ होंठों से चुमकारना शुरू किया और मैं बीच बीच में दिया के कान में रह रह कर अपनी जीभ भी फिरा रहा था.“सी… ई… ई… ई… ई..ई..ई!!! आ… ई… ई..ई..ई!!! उफ़… फ़..फ़!!! आह… ह..ह..ह!! हा… ह..ह..ह!!!”

इस दोहरे काम-आक्रमण को झेलना दिया के लिए हर्गिज़ आसान न था; दिया के जिस्म में रह रह कर काम-तरंगें उठ रही थी और दिया के मुंह से आनन्ददायक सिसकारियों की आवाज़ ऊँची… और ऊँची होती जा रही थी और दिया की बेचैनी पल प्रतिपल उसके क़ाबू से बाहर होती जा रही थी.

अचानक दिया ने मुझे अपने से थोड़ा परे किया और अपने बाएं हाथ से मेरे नाईट-सूट के बटन खोलने की कोशिश करने लगी लेकिन एक हाथ से बटन खोलना और वो भी बाएं हाथ से… थोड़ी टेढ़ी खीर थी.बहुत कोशिश के बाद एक ही बटन खुल पाया। दिया ने शिकायत भरी नज़रों से मुझे देखा. मैंने तत्काल इशारा समझा और फ़ौरन अपने हाथों को फ़ारिग कर के चंद ही पलों में अपने नाईट-सूट के अप्पर के सारे बटन खोल दिए और उसे उतार कर परे फ़ेंक प्रिया.

अब मैं सिर्फ बनियान और पज़ामे में था और दिया के तन पर अभी भी टी-शर्ट और कैपरी थे.

मैंने दिया को कमर में हाथ डाल कर थोड़ा ऊपर उठाया और दिया के हाथ ऊपर कर के आराम से उस की टी-शर्ट निकाल दी. सफ़ेद कसी हुई ब्रा में दिया का कुंदन सा सुडौल शरीर मेरे सामने दमक रहा था. दिया ने हया-वश अपने वक्ष के आगे अपनी बाहों का क्रॉस बना कर सर झुका लिया। मैंने दिया का चेहरा उस की ठोढ़ी के नीचे उंगली लगा कर उठाया तो दिया ने शर्म के मारे आँखें बंद कर ली.

“आँखें खोलो दिया!”“उंहूं…! मुझे शर्म आती है.”“अरे खोलो तो… यहाँ कौन है तेरे मेरे सिवा?” मैंने दोनों हाथों से दिया के दोनों कंधे थाम लिए.

दिया ने हौले-हौले अपनी आँखें खोली तो मुझे सीधे अपनी काली कज़रारी आँखों में झांकते पाया।झट से दिया ने मेरी ही आँखों पर अपना हाथ रख प्रिया- आप मुझे ऐसे ना देखो प्लीज़… मैं तो शर्म से ही पिघल जाऊँगी.

मैंने बहुत नरमी से अपने एक हाथ से अपनी आँखों पर रखे दिया के हाथ को हटाया और उसी हाथ की हथेली का इक चुम्बन लेकर उसी हाथ की लम्बी पतली, नाज़ुक तर्जनी ऊँगली अपने मुंह में डाल ली और उसे चूसने लगा.

तत्काल दिया बेचैन हो उठी और अपनी उंगली मेरे मुंह में इधर उधर मोड़ने-तोड़ने लगी. तब तक मैं करीब क़रीब आधा दिया के ऊपर झुका हुआ था.अचानक ही दिया ने अपनी उंगली मेरे मुंह से निकाल ली और उसी हाथ का अंगूठा मेरे होंठों पर दाएं से बाएं, बाएं से दाएं फिराने लगी. बीच बीच में मैं मुंह से दिया का अंगूठा पकड़ने की कोशिश भी करता, लेकिन दिया अंगूठा किसी तरह छुड़ा लेती.

थोड़ी देर बाद ही मैंने दिया के दोनों हाथों की उंगलियाँ अपने दोनों हाथों की उँगलियों में लॉक कर के (अपना दायाँ हाथ दिया के बाएं हाथ में और अपना बायाँ हाथ दिया के दाएं हाथ में) सिरहाने के आजू बाजू रख दिए और सीधे दिया के ऊपर आ कर दिया की आँखों में झांका।दिया के होंठों पर वही मोनालिसा मुस्कान आयी और दिया ने अपनी उंगलियाँ मेरी उँगलियों में ज़ोर से कस दी.

क्या नज़ारा था…!!! साक्षात् रति भी इतनी सुन्दर ना होगी जितनी उस वक़्त दिया लग रही थी. मैंने झुक कर दिया के होंठों पर एक चुम्बन लिया, फिर धीरे से एक एक चुम्बन दोनों कपोलों पर लिया… एक ठोड़ी पर, एक गर्दन के बीच में ज़रा बायीं और दूसरा ज़रा दायीं ओर…दिया की गहरी साँसों में अब आनन्दमयी सीत्कारें निकलने लगी थी.

मैंने एक और चुम्बन ब्रा में कसे हुये दोनों उरोजों के मध्य में लिया और दोनों उरोजों में बनी दरार में अपनी जीभ घुसा दी.बस जी! कहर ही बरपा हो गया जैसे… दिया ने जोर से सीत्कार करते हुए ने जबरन अपने दोनों हाथ मेरे हाथों से छुड़ाए और दीवानावार मुझे यहाँ-वहाँ चूमने लगी; मेरे माथे पर… मेरे कंधे पर, मेरी गर्दन पर, मेरे सर पर.

दिया का बायाँ हाथ मेरी पीठ पर कस गया और दायाँ हाथ मेरे सर के पृष्टभाग पर जमा कर दिया मुझे ऐसे अपनी ओर दबाने लगी जैसे चाहती हो कि मैं उस के उरोजों में ही समा जाऊं. मैं दिया के उरोज़ों के बीच की दरार की लम्बाई अपनी जीभ से नापने में मशग़ूल था.“हा… हाँ, यहीं यहीं… और करो… यस! जोर से करो… यहीं हाँ यहीं… ओ गॉड!… आह हाय सी… ई..ई..ई!!! ” दिया आनन्द के सागर में अनवरत गोते लगा रही थी.

अचानक मैंने अपना सर जरा सा उठाया तो दिया की रोमविहीन आवरणहीन कोमल बायीं काँख पर मेरी नज़र पड़ी. मैंने अपनी जीभ को वक्षों की घाटी से निकला और दिया के बाएं वक्ष की ऊपरी सतह की कोमल और नाज़ुक त्वचा को चाटते-चूमते दिया की रोमविहीन बायीं बगल की ओर बढ़ा. दिया की बेफिक्र ऊंची-ऊंची आनन्दमयी सिसकारियाँ पूरे बैडरूम में गूँज रही थी.

जैसे ही मेरे होंठों ने दिया की बगल की नरम-नाज़ुक त्वचा को छुआ, तत्काल दिया के मुंह से लम्बी सी सिसकारी निकल गयी और दिया का दायाँ हाथ बनियान के अंदर से मेरी पीठ पर जोर जोर से ऊपर-नीचे फिरने लगा.

मैंने दिया की बगल में मुंह दे कर एक जोर से सांस ली; एक नशीली सी सुगंध मुझे बेसुध करने लगी; इस सुगंध में दिया के जिस्म की ख़ुश्बू, दिया के डिओ की ख़ुश्बू, काम-तरंग में डूबे नारी-शरीर में उठती वो अलग एक ख़ास मादक सी खुशबू… सब मिली-जुली थीं.मैंने दिया की कांख को चूमा… तत्काल दिया के मुंह से एक आनन्दमयी और लम्बी सीत्कार निकल गयी और मैंने दिया की बगल की अंदर वाली रेशम रेशम त्वचा को अपनी जीभ से चाटा. दिया के पसीने की खुशबू के साथ साथ दिया के पसीने का का हल्का सा नमकीन स्वाद साथ में शायद डियो का कसैला सा स्वाद था.

यही सब मैंने दिया की दायीं कांख पर दोहराया. कसम से! मजा आ गया. इधर दिया मारे उत्तेजना के बिस्तर पर जल बिन मछली की तरह तड़फ रही थी. बिस्तर की चादर पर मुट्ठियाँ कस रही थी, रह रह कर बिस्तर पर पाँव पटक रही थी, ऊँची ऊँची सिसकारियाँ ले रही थी, लम्बी लम्बी सीत्कारें भर रही थी.

अचानक ही दिया अपने दोनों हाथों से मेरी बनियान को ऊपर को खींचने लगी. मैंने ज़रा सा उठ कर फ़ौरन अपनी बनियान उतार फेंकी और साथ ही दिया के कन्धों से उसकी ब्रा की पट्टियाँ बाहर की तरफ दाएं-बाएं उतार कर दिया की आँखों में देखा. अब की बार दिया ने पूरी बेबाकी से मुझ से नज़र मिलाई. काम-मद के कारण हो रही दिया की गुलाबी आँखों में आने वाले पलों में मिलने वाले शाश्वत काम-आनन्द की बिल्लौरी चमक थी, उसकी सांस बेहद तेज़ चल रही थी और होंठ रह रह कर लरज़ रहे थे.

हम दोनों के बीच में से एक दूसरे से शर्म-हया नाम का अहसास कब का विदा ले चुका था. अब मैं और दिया चाहे दो अलग-अलग जिस्म थे लेकिन एक जान हो चुके थे.प्रणय के इस आदिम-खेल में अगली सीढ़ी चढ़ने का वक़्त आ गया था.

मैंने दिया के पूरे जिस्म पर एक भरपूर नज़र मारी. बिस्तर पर सीधा लेटा पर तना हुआ एक स्वस्थ नारी शरीर. दोनों मरमरी बाहें सर के नीचे, रेशम-रेशम रोमविहीन साफ़ सुथरी त्वचा, तन का ऊपरी भाग लगभग आवरणहीन, दो अपेक्षाकृत गोरे उरोज़ जिन पर एक ढीली सी ब्रा के कप पड़े हुए, सपाट किसी भी दाग-धब्बे से रहित पेट के बीचोंबीच एक बायीं ओर विलय लेती हुई गहरी नाभि. नाभि से ढाई-तीन इंच नीचे से क्रीम रंग की पिंडलियों तक लम्बी एक कैपरी, नाज़ुक साफ़-सुथरी दायीं टांग के ऊपर बायीं टांग, दोनों पैरों के नाख़ून थोड़े बड़े पर अच्छे से तराश कर उन पर लाल रंग की नेलपॉलिश लगी हुई. टांगों के ऊपरी जोड़ पर कैपरी पर स्पष्ट बना एक V का आकार जिस में V की ऊपरी सतह कुछ उभरी-उभरी सी थी.

अप्सरायें शायद ऐसी ही होती होंगी.

मैंने झुक कर दिया की गर्दन के निचले भाग पर अपने होंठ टिका दिए. तत्काल दिया के मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली। प्रिय के वक्ष अभी तक पूर्ण रूप से अनावृत नहीं हुए थे अपितु दोनों उरोजों पर ब्रा के कपों के ढीले से ही सही पर आवरण पड़े थे और मैं उन्हें अपने हाथों की बजाए होंठों से हटाने पर तुला हुआ था.दिया को इसका बराबर एहसास था और वो अपनी आँखें बंद कर के इस स्वर्गिक आनन्द के अतिरेक की अभिलाषा में बेसुध सी हो रही थी.

मेरे होंठ दिया की गर्दन से धीरे धीरे नीचे की ओर सरकने लगे और दिया के शरीर में भी शनै: शनै: हलचल तेज़ होने लगी. सर्वप्रथम उसके दोनों हाथ मेरे सर के पिछली ओर आ जमे और मुझे और मेरे होंठों को नीचे की ओर गाईड करने लगे, दूसरे, दिया के मुंह से रह रह कर तेज़ सिसकारियाँ और आहें निकलने लगी- सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!! आई..ई..ई..ई.!!!! आह..ह..ह..ह..ह… ह..ह..ह!!!! उफ़..आ..आ..आ.. आ..आ.आ!!

अचानक मेरे गाल के धक्के से प्रिये के दाएं उरोज़ का कप थोड़ा ऊपर उठ तो गया लेकिन अभी दिया की पीठ पर ब्रा का हुक बंद होने की वजह से हटा नहीं. लिहाज़ा मेरी होंठों और जीभ का सफ़र उस पर्वत की चोटी पर पहुँचने से पहले ही रुक गया. तत्काल मैंने अपने होंठों और जीभ का रुख अपने दायीं ओर मोड़ लिया और दोनों पर्वतों के बीच की घाटी को चुम्बनों से भरता हुआ और अपने मुंह के स्राव से गीला करता हुआ दूसरे पर्वतश्रृंग की ओर अग्रसर हुआ.

लेकिन यह यात्रा तो और भी जल्दी रुक गयी; अचानक ही दिया ने मुझे पीछे हटाया और उठ कर बैठ गयी; अपने दोनों हाथ पीछे कर के ब्रा का हुक खोल कर ब्रा को परे रख प्रिया और अपने दोनों हाथ ऊँचे कर के अपने सर के आवारा बालों को संभाल कर, बालों की चोटी का जूड़ा करने लगी।बाई गॉड! क्या नज़ारा था।

उजला गेहुंआ रंग, सिल्क सा नाज़ुक जिस्म, अधखुली नशीली आँखों के दोनों ओर बालों की एक-एक आवारा लट, हाथों की जुम्बिश के साथ-साथ वस्त्र विहीन, सख़्त और उन्नत दोनों उरोजों की हल्की हल्की थिरकन, दोनों उरोजों के ऊपर एक रुपये के सिक्के के आकार के हल्के बादामी घेरे और उन दो घेरों के बीचों-बीच 3-D चने के दाने के आकार के कड़े और तन कर खड़े निप्पल जो उरोजों की हिलोर से साथ-साथ ऐसे हिल रहे थे कि जैसे मुझे चुनौती दे रहे हों.

अधखुले आद्र और गुलाबी होंठों में बालों पर चढ़ाने वाला काला रबर-बैंड और बालों में बिजली की गति से चलती दस लम्बी सुडौल उंगलियाँ।यकीनन मेरी कुंडली में शुक्र बहुत उच्च का रहा होगा तभी तो रति देवी मुझ पर दिल खोल कर मेहरबां थी.

तभी दिया अपने बाल व्यवस्थित करने के उपरान्त मेरी ओर झुकी, उसकी कज़रारी आँखों में शरारत की गहन झलक थी.

कामुकता से परिपूर्ण मेरी यह कहानी आपको कैसी लग रही है?मुझे सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इंतज़ार रहेगाsupport@mohakkisse.comकहानी जारी रहेगी.

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स्त्री-मन… एक पहेली

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