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रिश्तों में चुदाई पठन समय: 14 मिनट पढ़ा गया: 711 बार

स्त्री-मन… एक पहेली-6

राज वीर मिड्ढा

03 Aug 2013 को प्रकाशित

स्त्री-मन… एक पहेली-6
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मेरी साली की जवान बेटी की कामुकता से भरपूर इस सेक्स स्टोरी के पिछले भागकहानी का प्रथम भाग:स्त्री-मन… एक पहेली-1स्त्री-मन… एक पहेली-5

में आपने पढ़ा कि यौन पूर्व काम क्रीड़ा के चलते उसकी कामवासना पूरे चरम पर थी.अब आगे:

यह सही था कि अब दिया अक्षत-योनि नहीं थी क्योंकि पिछले साल मैंने ही तो दिया को सुहागिन बनाया था तदापि सवा साल पहले के किये गए एक बार के मैथुन का असर तो कब का योनि पर से विदा हो चुका था. दिया की योनि के पद्म दल फिर से सिकुड़ कर योनि की गुफा को फिर से अत्यंत संकरा बना चुके थे, इसी कारण मेरी उंगली दिया की योनि के जरा सी अंदर जाने से दिया के मुंह से दर्द भरी सिसकारी निकली थी.

लेकिन इस बार मैं काम-क्रीड़ा से पहले अपनी उंगलियों से योनि के छेद को ख़ुला करने के मूड में हरगिज़ भी नहीं था. आज लिंग का काम लिंग ही करने वाला था. दिया की योनि से काम-रस बेतहाशा बह रहा था. मैंने प्रिय के बाएं निप्पल को मुंह में ले कर चुमलाया, तत्काल दिया मेरे लिंग को अपनी योनि की ओर खींचने लगी.

एक बार फिर से आजमायश की घड़ी आ रही थी लेकिन मुझे खुद पर, अपने कौशल पर, अपने प्यार पर और सब से बढ़ कर अपनी जान दिया पर भरोसा था कि सब ठीक हो जाएगा. प्यार हो रहा था… कोई लड़ाई नहीं जिस में किसी के जीवन-मृत्यु का सवाल हो!

“आओ न…!” दिया कसमसाई और उस ने बिस्तर पर अपनी टाँगे खोल दी.मैं थोड़ा अचकचाया।“आप को मेरी कसम… अब के जो तरसाया तो…!” दिया के लफ़्ज़ों में मनुहार के साथ साथ आदेशात्मक गूंज थी.

अब न कहनी मुश्किल थी; मैं दिया की खुली टांगों के बीच में आया. चाहे कामऱज़ की वजह से दिया की योनि पहले से ही खूब चिकनी हो रही थी, तदापि चित टांगों के साथ योनि भेदन में दिया को बहुत दर्द होना था तो मैंने दिया के दोनों पैर मोड़ कर दिया के नितंबों से करीब एक फुट की दूरी पर रख दिए; इससे दिया की योनि की मांसपेशियाँ थोड़ी सी ढीली हो गयीं जिस से मुझे दिया की योनि में अपना लिंग प्रवेश करवाने में थोड़ी सुविधा होने वाली थी.

मैंने अपना लिंग अपने दायें हाथ में ले कर शिश्न-मुंड दिया की ऱज़ से सराबोर दिया की योनि पर नीचे से ऊपर भगनासा तक और फिर भगनासा से नीचे की ओर, और फिर नीचे से ऊपर भगनासा तक घिसाना-रगड़ना शुरू किया।अचानक मेरा लिंग दिया की योनि की दरार पर घिसाते-घिसाते, योनि की दरार के बीच में जरा सा नीचे की और किसी नीची जगह पर अटक सा गया. उत्तेजना के मारे दिया के मुंह से व्यर्थ से, आधे-अधूरे ऐसे लफ़्ज़ निकल रहे थे, जिन का कोई अर्थ नहीं था.

“आह… मर गयी… तरसा प्रिया मुझे… ओ पतिदेव… आप ने… ओ गॉड!… आई..ई… मेरे अंदर समा जाओ… मार डालो मुझे… आह..ह..ह..ह.. सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” इत्यादि!

बेखुदी के इस आलम में भी दिया मुझे अपना पति ही तस्सवुर कर रही थी. इधर कितनी ही रातों का भटका हुआ और प्यासा मुसाफिर आखिरकार अपनी मंज़िल-ऐ-मक़्सूद के मयख़ाने के दरवाज़े पर दस्तक़ दे रहा था. मैं अपने लिंग-मुंड को वहीं अटका छोड़ कर दिया के ऊपर लम्बा लेट गया. आने वाले क्षणों में मिलने वाले आनन्द का तस्सवुर कर के दिया ने भी आँखें बंद कर के मुझे ज़ोर से अपने आलिंगन में ले लिया.

मैंने दिया के होंठों के कई चुम्बन लिए और कहा- दिया!“हुँ..!”“आँखें खोलो!”“मैं नहीं… आप करो.”“अरे! खोलो तो…!”

दिया ने अपनी आँखें खोली. मेरी आँखें ठीक उस की आँखों से तीन इंच ऊपर थी. मोटी-मोटी काली आँखें जिन में प्यार और काम अपनी सम्पूर्णता के साथ झलक रहे थे. दिया ने झट से मेरे होंठों पर एक चुम्बन जड़ा और अपने दोनों पैरों से मेरी कमर पर कैंची सी मार ली और लगी मेरी कमर अपनी ओर खींचने.

“नहीं दिया, ऐसे नहीं… आराम से! ऐसे तुम्हें दर्द होगा.”“मुझे परवाह नहीं!”“लेकिन मुझे है.”

दिया ने मुदित आँखों से मुझे देखा, मुस्कुरायी और फिर प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया. मैंने वापिस दिया के दोनों पैर मोड़ कर दिया के नितंबों से करीब रख दिए और मैंने अपना लिंग थोड़ा सा पीछे को खींचा और जरा से और ज़ोर से आगे को धकेला।“सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” एक लम्बी सिसकी दिया के मुंह से निकल गयी लेकिन हर चीज़ अभी कंट्रोल में ही थी, मैंने थोड़ा सा ज़ोर और लगाया, अब लिंग-मुंड दिया की जलती धधकती योनि के अंदर था.

दिया के दोनों हाथ मेरी पीठ पर कस कर जमे थे; दिया की योनि के अंदर का उत्ताप मेरे लिंग को जलाने पर उतारू था जैसे. लेकिन पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था. इसी पल का पूर्ण समग्रता से सामना कर के बिस्तर पर अपना अजय अभियान सार्थक करने वाला ही सही मायने में मर्द कहलाता है और मुझे तो कुछ नया साबित भी नहीं करना था, सिर्फ अपने सामर्थ्य के पिछले कृत्य को एक नया मोड़ दे कर दोहराना भर था.

अभी भी दिया के दोनों पैर उसके नितम्बों के पास थे और दोनों टांगों के घुटने हवा में खड़े थे. एक बार मेरा लिंग दिया की योनि की अंतिम रीमा छू ले तो मैं दिया की टांगें सीधी करवा देता लेकिन अगर कहीं अभी से दिया ने टांगें सीधी कर ली तो दिया को फिर से अक्षत-योनि भेदन वाला दर्द याद आ जाना था. मैंने दिया के बाएं उरोज़ के निप्पल के साथ अपनी जीभ लड़ायी. अर्धसुप्त योद्धा एकदम से चैतन्य हो कर तन गया.

मैंने धीरे से निप्पल को चूमा और हल्के से उस के आसपास अपनी जीभ फेरी. दिया के मुंह से निकली सिसकारी ने बता प्रिया कि दिया की समस्त चेतना अभी उस के बाएं उरोज़ पर केंद्रित थी, मैंने अपने लिंग को हल्का सा पीछे खींच कर ज़रा ज़ोर से आगे को किया. अब आधा लिंग योनि में समा चुका था.

तत्काल दिया ने मेरे सर के पीछे से बाल पकड़ मुझे थोड़ा परे धकेलने की कोशिश की लेकिन मैं ऐसे कैसे पीछे हटता!मैंने अपनी वही पुरानी तक्नीक अपनायी, लिंग थोड़ा सा योनि से बाहर खींच कर जहाँ था, फिर से वही पहुंचा प्रिया, फिर थोड़ा बाहर निकाला और फिर जहाँ था, वही पहुंचा प्रिया, ऐसा मैं करता ही चला गया. पांच-सात मिनट बाद दिया थोड़ा सहज़ हो गयी और मेरी ताल पर अपनी ताल देने लगी, इधर मैं अपना लिंग उस की योनि से बाहर खींचता तो दिया अपने नितम्ब पीछे खींच लेती और जैसे ही मैं अपना लिंग उस की योनि में आगे धकेलता, दिया अपने नितंब ऊपर को उछालती।

हर थाप के साथ मेरा लिंग, दिया की योनि में थोड़ा और ज्यादा गहरे समाने लगा. तीन-चार मिनट बाद ही मेरा लिंग पूरे का पूरा दिया की योनि में आने-जाने लगा. इधर ऊपर मेरा मुंह दिया की बायीं बगल में कब समा गया, मुझे पता ही नहीं चला. मैं जीभ से दिया के रस-भरे उरोज़ चाटता, चूसता दिया की बालों रहित बगल में दिया के पसीने की मादक सुगंध लेता-लेता बगल की रेशमी त्वचा चूम रहा था. दिया इस आनन्द के कारण सातवें आसमान में थी और मैं जन्नत में. थप्प-थप्प… थप्प-थप्प… थप्प-थप्प…!! नीचे कबीरदास की चक्की पूरे यौवन पर चल रही थी.

दिया ने चूस-चूस कर मेरा निचला होंठ सूज़ा प्रिया था, आवेश में आ कर अपने तीखे नाखूनों से मेरी पीठ पर अनगिनत खूनी लकीरें उकेर दी थी. मैंने भी उत्तेज़ना-वश चूस-चूस कर दिया के दोनों उरोजों पर जगह जगह अनगिनत निशान डाल दिए थे.

मैं इन आनन्द के क्षणों को पूर्ण रूप से महसूस करना चाहता था इस लिए मैंने अपने लिंग को दिया की योनि में गहराई में लेजा कर अचानक वहीँ रोक प्रिया. मैं अपने लिंग के चारों ओर दिया की योनि की हल्की-हल्की पकड़ और स्पंदन महसूस कर रहा था. जैसे रेशम की नर्म-गर्म सी, नाज़ुक सी मुट्ठी जैसी कोई चीज़ मेरे मेरे लिंग पर रह-रह कर कस रही हो.

कुछ पल मैं इस स्वर्गिक आनन्द का मज़ा लेता रहा और फिर दिया ने मुझे टहोका तो मैंने फिर से काम-क्रीड़ा शुरू की. अभी तीन चार बार ही अपने लिंग को दिया की योनि के निकाला डाला था कि अचानक दिया ने अपनी दोनों टांगें सीधी कर ली; तत्काल मुझे अपने लिंग पर दिया की योनि का एक ज़बरदस्त खिंचाव महसूस हुआ. मेरा लिंग जैसे किसी नर्म-ग़र्म संडासी में कस गया था. दिया की योनि की दीवारों की मेरे लिंग पर रगड़ कई गुना बढ़ गयी थी और साथ ही दिया के मुंह से निकने वाली आहों कराहों में गज़ब की तेज़ी आ गयी थी.

दिया के टाँगें बिस्तर पर सीधी करने से दिया की योनि में आये अति कसाव के कारण मेरे लिंग का दिया की योनि में घर्षण बहुत ही बढ़ गया था और लिंग का योनि में आवा गमन बहुत मुश्किल हो रहा था.जैसे ही अपने लिंग को मैं बाहर निकाल कर दोबारा योनि में धकेलने के लिए जोर लगाता था, दिया के मुंह से इक दर्द भरी आह निकल जाती थी. दिया की योनि में से कामरस के साथ साथ जैसे आग की लपटें निकल रही थी.

दोनों के लिए काम-शिखर अब ज्यादा दूर नहीं था. मैंने अपनी कमर की स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी; दिया ने भी उसी अनुपात में अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू कर दी. दिया की आँखें बदस्तूर बंद थी लेकिन दिया स्वार्गिक-आनन्द के इन पलों के एक-एक क्षण का मज़ा ले रही थी. मेरे हर धक्के के साथ दिया के मुंह से एक जोरदार “हक़्क़…” या “हा…!” की आवाज़ निकल जाती थी.शनै:शनै: दिया के शरीर में एक अकड़न सी उभरने लगी और मुंह से अस्पष्ट से शब्द निकलने लगे “ऊँ… ऊ… ऊँ… ऊँ… हाँ… आँ… हा… हाय… उ… हक़्क़… ई… ई… इ… ई… ई..इ… ग… यी”. दिया का स्खलन अब दूर नहीं था और मैं भी अपनी मंज़िल के करीब ही था. मैंने अपना सारा वज़न अपनी कोहनियों पर ले लिया और अपनी कमर को बिजली की सी तेज़ी से चलाने लगा.

दिया की सिसकारियाँ पूरे बैडरूम को गुँजाये दे रही थी जिन्हें सुन कर मैं और उत्तेजित हो कर हर वार पर बेरहमी से दिया की योनि में अपने लिंग को जड़ तक उतारे जा रहा था.

तभी दिया ने अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर ऐसी सख्ती से जकड़े कि दिया का ऊपर वाला धड़ हवा में मेरी छाती के साथ चिपक गया. दिया बेसाख्ता मुझ पर चुम्बनों की बरसात किये दे रही थी और नीचे मेरा लिंग दिया की योनि को बिजली की तेज़ी से मथे दे रहा था.

अब तक मेरे लिंग पर दिया की योनि की दीवारों का दबाब इस कदर बढ़ गया था कि मेरे लिए अपना लिंग दिया की योनि से बाहर खींचना लगभग नामुमकिन सा हो गया था. अचानक दिया का तमाम शरीर अकड़ने लगा, दिया ने मेरे बाएं कंधे पर जोर से काटा और एक जोर से “आ… आ… आ… आ… आ… ह… ह… ह..ह…!!! ” की चीख सी मारी. साथ ही दिया की आँखें उलट गयी तथा वो निष्चेष्ट सी हो कर मेरी बाहों में झूल गयी.

दिया स्खलित हो चुकी थी.

मुझे दिया की योनि के अंदर अपने लिंग के आसपास गर्म-गर्म द्रव सा महसूस होने लगा. जैसे ही मैंने अपना लिंग पूरी सख्ती से दिया की योनि से बाहर खींच कर वापिस दिया की योनि की गहराई की आखिरी हद तक पंहुचाया, तभी मेरे अंदर… मेरे खुद का ज्वालामुखी फट पड़ा. मैंने दिया को सख्ती से अपनी बाहों में कस लिया और दिया की योनि के अंदर मेरे लिंग से वीर्य की जोरदार एक बौछार हुई… फिर दूसरी… फिर तीसरी. मेरे वीर्य से दिया की योनि बाहर तक सराबोर हो उठी और मैंने पसलियाँ तोड़ देने की हद तक दिया को अपने आलिंगन में दबा डाला.

अचानक ही दिया जैसे होश में आयी और मेरी सख्त पकड़ से खुद को छुड़ा कर दिया ने मुझे ठीक अपने ऊपर, अपने आगोश में ले लिया और मेरे सर के बालों में अपनी उंगलियाँ फेरने लगी. सामने दीवार घड़ी पर साढ़े चार बज़ रहे थे. हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ किया वादा निभा प्रिया था. अभी तो हम दोनों एक-दूसरे के आगोश में थे लेकिन अब जिंदगी में कभी ऐसा मौक़ा दोबारा आएगा या नहीं… और अगर आएगा भी तो दिया पॉजिटिव रेस्पॉन्स देगी या नहीं, इस का जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही था.

लेकिन यह भी सच है कि“त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्, देवो न जानति कुतो मनुष्यम्”देखते हैं कि जिंदगी आगे क्या-क्या रंग दिखाती है?अगर आगे ऐसा कुछ हुआ तो आप सब से अपने अनुभव जरूर बाँटूगा.तब तक विदा!!!

राजवीरआपको मेरी कहानी कैसी लगी?मुझे आप सब पाठकों की प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगीsupport@mohakkisse.com

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स्त्री-मन… एक पहेली

कुल भाग: 6
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