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Office Sex पठन समय: 9 मिनट पढ़ा गया: 741 बार

मेरी चालू बीवी-87

इमरान

31 Jan 2026 को प्रकाशित

मेरी चालू बीवी-87
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सम्पादक – इमरानमेरे अपने ऑफिस का बाथरूम मेरे लिए वरदान साबित हो रहा था, मेरे स्टाफ की लड़कियाँ ज्यादातर इसी का प्रयोग करती थीं, बार-बार पेशाब करने जाना, खुद को व्यवस्थित करना और कभी सैनिटरी पैड बदलना… मैं सोच रहा था कि यार क्यों ना अपने बाथरूम में कैमरा लगवा लूँ और अपना पूरा स्टाफ बदलकर प्यारी प्यारी लड़कियों को ही रख लूँ…

खैर, यह सब संभव नहीं था पर सोचकर बहुत अच्छा लग रहा था।

फिलहाल मेरा ध्यान इस देसी कुड़ी, रोज़ी की ओर ही था, बहुत ही मस्त है साली !

देखने को भी मना करती है और दरवाजा भी खुला छोड़ मेरे बाथरूम में नंगी होकर बैठ जाती है, इतने प्यारे पोज़ में उसको बैठे देख मैं यह सोच रहा था कि काश यह इंडियन सीट होती तो मजा आ जाता, इसकी मक्खन जैसी चूत के दोनों खुले होंट दिख जाते।

मेरा लण्ड इतना बैचेन हो गया था कि उसमें दर्द होने लगा था।

मैं उसको अपनी साड़ी कमर तक उठाये, अपने दोनों हाथों से पकड़े, उसकी चिकनी सफ़ेद टांगों को घूरता हुआ खड़ा ही था कि उसने मुझे जाने का इशारा किया।

मैं भी शराफत से एक ओर को हो गया, मैंने दरवाजा बंद नहीं किया और उसकी नजर से तो कुछ बच गया पर अपनी नजर उसी पर रखी।

हाँ, पीछे जरूर हट गया, उसने भी मेरे से नजर हटाई और खड़ी होकर एकदम से अपनी साड़ी को हाथों से छोड़ प्रिया, बस एक पल के लिए ही मुझे उसकी चूत के दर्शन हुए। उसने बिना मेरी ओर देखे फ़्लश चलाया और हाथ धोकर बाहर आ गई।

वो बहुत हल्के से ही मुझ पर नाराज हुई- यह क्या करते हो सर आप? मुझे बहुत शर्म आ रही थी।

मैं- अरे यार तुम भी ना… मैं तो केवल दरवाजा बंद करने को ही कह रहा था… हा हा… और फिर क्या हो गया… अब तो हम दोस्त हो गए ना !!

रोज़ी ने कुछ नहीं कहा, जैसे उसने ये सब स्वीकार कर लिया हो।

मैंने बहुत ही प्यार से रोज़ी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा- तुम भी ना यार, इतना ज्यादा शरमाती हो… अरे यार ये सब तो नार्मल है… इसे एन्जॉय करना चाहिए…

उसने अपनी पलकें झुकाकर अपनी स्वीकृति दी।

तभी मैंने एकदम से चौंकते हुए ही कहा- अरे रोज़ी यह क्या? तुमने मूतने के बाद अपनी योनि साफ़ नहीं की?

मैंने जानबूझ कर ही चूत शब्द का प्रयोग नहीं किया क्योंकि मुझे पता था कि उसको अच्छा नहीं लगेगा।

उसने अपनी आँखों को हल्का सा सिकोड़ा और कुछ भौंचक्की आँखों से मुझे देखा पर मेरी बात का आशय समझते ही उसका चेहरा एक बार फिर पूरा लाल हो गया।

मैं- अरे यार, अब इसमें क्या शरमाना… ये तो नार्मल बात ही है… क्या तुम अपनी बुर गन्दी ही रखती हो… मूतने के बाद तो साफ़ करना चाहिए ना…

रोज़ी- जी नहीं, मैं हमेशा पानी से साफ़ करती हूँ…

मैं- अच्छा तो आज क्यों नहीं की… एक तो कच्छी नहीं पहनी… ऊपर से मूतने के बाद बुर साफ़ भी नहीं की?

रोज़ी को अब मेरी बातों में रस आने लगा था, उसने ना तो अपना हाथ ही मेरे हाथों से छुड़ाया और ना ही कुछ विरोध कर रही थी।

रोज़ी- जी केवल आपकी वजह से जल्दबाजी में नहीं की… आपने कैसे दरवाजा खोल प्रिया था… हम्म्म्म??

मैं अब जोर से हंसा- हा हा हा… तो इसमें भी मेरे ऊपर ही इल्जाम… चलो कोई बात नहीं… इसका हर्जाना भी भर देते हैं !

मैंने मेज पर सामने रखा नेपकिन पेपर उठाते हुए कहा- लाओ जी, मैं अपने हाथ से साफ़ कर देता हूँ।

रोज़ी- हाय राम… क्या कह रहे हैं आप सर… इस पेपर से… आप?

मैंने उसकी बात पूरी नहीं होने दी- अच्छा पेपर से नहीं तो फिर… क्या जीभ से करूँ?

और मैंने अपनी जीभ बाहर निकाल कर जीभ की लम्बी नोक हिलाकर उसको दिखाया।

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उसका हाथ जो मेरे हाथ में ही था, मैंने साफ़ महसूस किया उसमें जोर का कम्पन हुआ, उसने एक जोरदार झुरझुरी ली थी।

उसने अजीब सी आँखों से मुझे देखा… मैंने जीभ को लहराते हुए ही कहा- अरे हाँ डियर… नीलू की भी मैं जीभ से ही साफ़ करता हूँ… उसको यह बहुत पसंद है… और मुझे भी इसका स्वाद बहुत अच्छा लगता है। नीलू तो हमेशा मूतने के बाद अपनी बुर मुझसे ही साफ़ करवाती है।

रोज़ी अब कुछ नहीं कर रही थी, उसने अपना हाथ अभी तक मेरे हाथ में पकड़ा रखा था बल्कि अब तो मैं उसकी पकड़ अपने हाथ पर महसूस कर रहा था।

रोज़ी- तो क्या नीलू आपके सामने नंगी लेट जाती है?

मैं- ओह… तो इसमें क्या हुआ? और क्या मैंने अभी तुमको नंगी नहीं देखा… अरे मेरी जान, इसमें क्या तुम्हारी बुर काली हो गई… या मेरी आँखें ख़राब हो गई… जब दोनों को अच्छा लगा तो इसमें बुराई क्या है, बताओ?

उसने कोई जवाब भी नहीं प्रिया पर कुछ कर भी नहीं रही थी, मैंने ही उसके हाथ को पकड़ अपनी मेज पर झुका प्रिया।

उसने कुछ नहीं कहा।

मैं- बताओ ना जान… क्या तुम्हारी इजाजत है? क्या मैं तुम्हारी प्यारी… राजदुलारी बुर को प्यार से साफ़ कर सकता हूँ?

रोज़ी बैचेनी भरी नजरों से मुझे देखे जा रही थी, मैंने भी उसकी साड़ी उठाने की कोई जल्दी नहीं की।

रोज़ी की लाल आँखे बता रही थीं कि वो वासना की आग में जल रही है।

उसका शरीर उसके मन के विचारों से बगावत कर रहा है, वो बुरी तरह काँप रही थी… मैं अगर इस समय उसको चोदना चाहता तो वो बिल्कुल भी मना नहीं करती।

पर बाद में उसको ग्लानि हो सकती थी इसलिए मैं उसके साथ सेक्स नहीं बल्कि उसके विचारों को बदलना चाहता था।

रोज़ी मेरी ऑफिस की मेज पर अधलेटी मेरे बाहों में बंधी थी, मेरा एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे और दूसरा उसके पेट पर रखा था…

पेट वाले हाथ से मैं हल्के हल्के गुदगुदी कर रहा थाजिससे उसकी साड़ी सिमट गई थी, अब मेरा हाथ उसके नंगे पेट पर रखा था।

मैं बहुत धीरे धीरे उस हाथ को उसके पेट पर फिसला रहा था, रोज़ी की साँसें बहुत तेज-तेज चल रही थी, उसके वक्ष के उभार तेजी से ऊपर नीचे हो रहे थे।

मैं अपना चेहरा उसके पास ले गया और उसके गालों से अपने होंठों को चिपका प्रिया।

अचानक उसने अपनी गर्दन को मेरी ओर घुमाया… यही वो क्षण थे जब उसके लाल, कांपते हुए लबों से मेरे होंठ जुड़ गए।

शायद उसके बदन की जरूरत ने उसके संकीर्ण विचारों पर पूर्ण विराम लगा प्रिया था और वो भी अब मस्ती में डूब जाना चाहती थी… अब वो हर पल का पूरा लुफ्त उठाना चाहती थी।

मैं दस मिनट तक उसके होंठों को चूसता रहा, इस बीच हम दोनों की जीभ ने भी पूरी कुश्ती लड़ी… मैं लगातार उसके पेट को सहलाते हुए अपना हाथ साड़ी के ऊपर से ही उसके बेशकीमती खजाने, रोज़ी की चूत के ऊपर ले गया और साड़ी के ऊपर से उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में भर लिया।

बिल्कुल ऐसा लगा जैसे नंगी चूत ही हाथ में आ गई हो… रोज़ी की साड़ी और पेटीकोट इतने पतले थे कि नंगी चूत का अहसास हो रहा था, ऊपर से उसने कच्छी भी नहीं पहनी थी।

मैं मस्ती के साथ उसकी चूत को मसलने लगा…

अब रोज़ी के मुख से मजेदार सिसकारियाँ निकलने लगी- ..अह्ह्हाआआ पुच अह्हाआआ… अह्ह्हाआआ पुच अह्हाआआआ पुच… अहआ पुच अह्हाआआआ पुच …

अब मुझे लगने लगा था कि रोज़ी अपनी चूत को दिखाने के लिए मना नहीं करेगी,अब वो अपनी चूत को नंगी करने को तैयार हो जाएगी, मैंने उसकी चूत को सहलाते हुए ही कहा- हाँ तो अब क्या सोचती हो जानेमन? अब तो अपनी बुर को साफ़ कराने को तैयार हो… अगर महारानी जी की इजाजत हो तो इस परदे को हटाऊँ?

मैंने रोज़ी की साड़ी को पकड़ते हुए पूछा।

कहानी जारी रहेगी।

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मेरी चालू बीवी

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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

रॉनित सांघवी

1 month ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

दीक्षित शर्मा

1 month ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

सन्जू आर्यन

2 months ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

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